क्या भारत कश्मीर समस्या के स्थायी समाधान के करीब है?

क्या भारत कश्मीर समस्या के स्थायी समाधान के करीब है?

जहां तक कश्मीर समस्या के स्थायी समाधान के प्रश्न की बात है तो इसका कोई आसान जवाब नहीं है, जबकि 1947 से ही यह हमारे देश के लिए एक हरा जख्म बना हुआ है। पहली बात ये कि इस समस्या के चार बड़े पक्ष हैं। उनमें से एक है भारत, जिसका इस खूबसूरत हिमालयी राज्य पर वैध अधिकार है, दूसरा है पाकिस्तान जो इस सूबे पर झूठा दावा करता है और इसके एक हिस्से पर जबरन कब्जा जमाए बैठा है, और दो अन्य पक्ष हैं वे कश्मीरी, जो यहाँ रह रहे हैं और जो विस्थापित हैं। बीते कुछ दशकों में, विवादित पक्षों ने अपने आप को वहाँ ला खड़ा किया है जहाँ से उनका निकल पाना मुश्किल हो गया है।

दूसरा, यह समस्या कई स्तरों पर है। यहाँ आतंकवाद है जिसे पाकिस्तान धन और उकसावे से बढ़ावा देता है, जबकि भारत आतंकवाद विरोधी कार्रवाई में जुटा है, वहीं राज्य के भीतर और बाहर के नेताओं और हाशिए पर खड़े समूहों में शह-मात का खेल चल रहा है। फिर कुछ स्थानीय लोगों में भारत की नीयत को लेकर संशय है। इतना ही नहीं, ‘भारत को हजार जख्मÓ देकर लहूलुहान करने और झुकाने पर आमादा, पाकिस्तान इसे अपने देश की नीति बनाए बैठा है, और राज्य में कई दशकों से आतंकी गतिविधियों और उपद्रव को बढ़ावा देता आ रहा है। वास्तव में, आजादी हासिल करने के बाद से ही उसने कश्मीर में भारत-विरोधी नापाक गतिविधियों को अंजाम देना शुरु कर दिया था।

समस्या की जड़

किसी समाधान की संभावना पर चर्चा से पहले, उस समस्या की जड़ का पता लगा लेना आवश्यक होता है। हम बँटवारे को ठीक से ना निपटाने के लिए शायद अंग्रेजों पर दोषारोपण कर सकते हैं, लेकिन उनकी छोड़ी गई विरासत को अब हमें ही संभालना है। यह विवाद 1947 में शुरु हुआ जब भारत और पाकिस्तान दो अलग देशों का जन्म हुआ था। पाकिस्तान का गठन एक इस्लामिक राज्य के रूप में हुआ जबकि भारत ने ‘धर्मनिरपेक्षताÓ को अपनी राजकाज की नीति के रूप में अपनाया। उस समय 650 से भी अधिक राजे-रजवाड़ों के सामने तीन विकल्प थे-दोनों में  से किसी एक देश के साथ मिल जाएं या स्वतंत्र रहें।

‘राजाओं के पास चुनाव करने की स्वतंत्रताÓ का विकल्प महज एक सैद्धांतिक बात थी। हर प्रांत की आबादी पहले से ही ब्रिटेन के खिलाफ थी, और उसने अपना फैसला भी पहले ही कर लिया था। कश्मीर की जहाँ तक बात है, तो वह दो देशों के बीच फंसा था, जहाँ का शासक एक हिंदू था जबकि अधिकांश आबादी मुस्लिमों की थी। उस समय महाराजा हरि सिंह उस राज्य के शासक थे और उन्होंने भारत या पाकिस्तान के साथ जाने की बजाए तटस्थ रहने का फैसला किया।

सब कुछ वैसा ही रहता, और किसी तरह की कोई समस्या भी नहीं खड़ी होती। लेकिन, पाकिस्तान इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। उसने कश्मीर पर विजय पाने के लिए मुस्लिम कबायलियों को भेज दिया। वे लगभग श्रीनगर तक पहुंच गए, और तब हरि सिंह ने पाकिस्तानी आक्रमण को विफल करने के लिए भारत से सैन्य मदद मांगी। महाराजा दिल्ली के साथ विलय के समझौते पर दस्तखत किए, जिसने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बना दिया। इस बीच, पाकिस्तानी कबायलियों ने कश्मीर के एक चौथाई हिस्से पर अपना कब्जा जमा लिया था जबकि तीन-चौथाई राज्य भारतीय नियंत्रण में था।

1947 से ही, दोनों देश कश्मीर को लेकर छोटे-बड़े युद्ध लड़ते रहे हैं। लेकिन 1989 में इस समस्या ने दूसरा ही रूप ले लिया जब पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने राज्य में आतंकवाद शुरु कर दिया। उन्होंने दहशत का माहौल पैदा कर दिया और घाटी में रहने वाले हिंदू पंडितों की चुन-चुन कर हत्या शुरु कर दी जिससे वे भारत के दूसरे हिस्सों में पलायन के लिए मजबूर हो गए।

एलओसी – संवेदनशील प्रभावी सीमा

वह नियंत्रण रेखा (एलओसी), जो 1947 के बाद होने वाली झड़प के बाद बनी, वस्तुत: दोनों देशों के बीच की सीमा बन गई है, लेकिन लोगों के गुस्से के डर से दोनों देश इसे स्वीकार नहीं करते हैं। इतिहास गवाह है कि युद्ध से इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता, जैसा कि किसी अन्य का भी नहीं हुआ है। अब यदि दोनों देशों के बीच बड़े पैमाने पर युद्ध छिड़ा तो उसके नतीजे विनाशकारी हो सकते हैं क्योंकि दोनों ही परमाणु हथियारों से लैस हैं। दोनों ही देश मिट सकते हैं।

हालाँकि, पूरे राज्य पर दोनों में से कोई भी देश अपना दावा छोडऩे को तैयार नहीं है। दोनों ही देशों के लिए यह प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। दोनों ही देशों ने अपने-अपने नागरिकों का ऐसा ब्रेनवॉश कर दिया है कि अपने अडयि़ल रुख से पीछे हटना उनके लिए लगभग असंभव है। चाहे भारत हो या पाकिस्तान, अगर किसी नेता ने दूसरे देश को रियायत दे दी तो उसका राजनीतिक भविष्य दाँव पर लग जाएगा।

उदाहरण के लिए, पाकिस्तान में ही, इस्लामाबाद में बैठे नेता समझौता करते हैं, तो रावलपिंडी में बैठी उसकी सेना इसमें अड़ंगा डाल देगी। यही नहीं, कुछ पश्चिमी देशों से गुप्त आर्थिक मदद लेने वाले गैर-सरकारी तत्व भी चुप नहीं बैठेंगे। हमने पहले भी पाकिस्तान के इस अजीबोगरीब व्यवहार के अनेक उदाहरण देखे हैं। 1999 में, भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस से लाहौर गए थे, जिससे दिल्ली और लाहौर के बीच नियमित बस सेवा शुरु हई थी। वाजपेयी और उनके पाकिस्तानी समकक्ष, नवाज शरीफ ने तब प्रसिद्ध लाहौर घोषणा पर दस्तखत किए थे। सबको ऐसा लगा कि हालात सुधर रहे हैं और दो लडऩे-झगडऩे वाले देश अच्छे पड़ोसी बन जाएँगे।

हालाँकि, शांतिपूर्ण सीमा की सारी उम्मीदें तब चूर-चूर हो गईं जब तथाकथित मुजाहिदीन गुरिल्लाओं ने करगिल की चोटियों पर कब्जा जमा लिया, जो लद्दाख क्षेत्र में भारत का इलाका है। बाद में यह बात साबित हो गई कि कब्जा जमाने वाले आतंकवादी नहीं बल्कि पाकिस्तानी फौज और अर्धसैनिक बलों के जवान थे। उन रणनीतिक चोटियों पर कब्जा जमाने की साजिश पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख, परवेज़ मुशर्रफ के निर्देश पर रची गई थी। आगे चल कर नवाज शरीफ का तख्तापलट कर मुशर्रफ ने सत्ता पर कब्जा जमा लिया।

एक खूनी जंग छिड़ गई और खबरों के मुताबिक सैनिकों और नागरिकों को मिलाकर, 30,000 से भी अधिक लोगों की जान चली गई। दोनों देशों के बीच एक बड़ी समस्या आपसी अविश्वास की है। यही कारण है कि जब कभी भारत ने पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है, उसकी सेना ने पीछे से छिपकर वार किया और 2001 में भारतीय संसद, 2016 में पठानकोट, उड़ी और 2008 में सबसे खौफनाक मुंबई सीरियल हमले को अंजाम दिया।

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दोनों देशों के बीच तनातनी इस हद तक बढ़ चुकी है कि सुलह का रास्ता आसान नहीं रह गया है। जैसा कि ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट ने एक भारतीय रणनीतिकार के बयान का उल्लेख भी किया है जिनके मुताबिक, ‘इस विवाद में पाकिस्तान का क्या काम है? कानून के मुताबिक उसका क्या हक है? पाकिस्तान इस विवाद में पक्ष है ही नहीं, इसे हम समझ लें, और तभी बातचीत हो सकती है!’

इस पर पाकिस्तानी विदेश नीति से जुड़े अधिकारी ने पलटवार किया, जिसे ब्रुकिंग्स ने उद्धृत किया है। उसने कहा था, ‘मेरा मानना यह है कि अगर भारत अपने मौजूदा रास्ते पर चलता रहा, तो नतीजे का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है। मैं नहीं जानता कि सीमा कहाँ पर तय होगी, लेकिन मौजूदा सीमा निश्चित रूप से बदल जाएगी। भारत को

एक उचित समझौते की तैयारी कर लेनी चाहिए। फिर 1947 में शुरु हुई बंटवारे की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी।‘

इन अनिश्चितताओं के बावजूद, अगर कश्मीर के सुलगते मसले का कोई हल संभव है, तो उसके लिए सही समय अभी ही है। भारत इस समय मजबूत स्थिति में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश तेजी से आगे बढ़ रहा है। आर्थिक शक्ति के रूप में यह मजबूत होता जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, इसका कद अब तक की सबसे बड़ी बुलंदी पर है। फिलहाल, भारत को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिए सबसे अच्छा गंतव्य माना जाता है। वह दिन दूर नहीं जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इसे स्थायी सदस्यता मिल जाएगी।

इस प्रकार की तरक्की के साथ, भारत जल्द ही खुशहाल हो जाएगा। इसके साथ ही, पाकिस्तान हर मोर्चे पर पतन की ओर जा रहा है। इसका नतीजा यह होगा कि दोनों देशों के नागरिकों के जीवन स्तर में बढ़ते अंतर को देख कर पाकिस्तानी अपने हुक्मरानों से कुछ तीखे सवाल पूछ सकते हैं। आर्थिक पिछड़ेपन और अपने देश की अछूतों जैसी स्थिति से तंग आकर, पाकिस्तानी अपने राजनीतिक और सैनिक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं।

अगर ऐसा हुआ, तो निश्चित रूप से यह देश के नेतृत्व को कश्मीर पर भारत के साथ किसी समझौते के लिए मजबूर कर देगा ताकि उन्हें भी भारत की समृद्धि और विकास का कुछ लाभ मिल सके। सीमा की इस समस्या का एक और हल पाकिस्तान के बँटवारे या विघटन के रूप में सामने आ सकता है, जिससे इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि यह इस्लामिक देश अब अंदर ही अंदर जातीय विद्वेष का शिकार हो चुका है।

इस कारण, बलूचिस्तान बाहरी समर्थन या उसके बिना भी अलग हो सकता है। फिलहाल, वहाँ की सेना में पंजाबियों का वर्चस्व है। उन्होंने ही देश को एक कर रखा है। एक बार उन्हें यह समझ आ गया कि देश को एक रखने की वे बहुत भारी कीमत चुका रहे हैं, तो वे अन्य विकल्प ढूँढने लग जाएँगे। देश की एकता के लिए वे जो कीमत चुका रहे हैं उसमें पंजाबी भाषा और पंजाबी संस्कृतिक की धीमी हत्या भी शामिल है।

हालाँकि, एक स्वाभाविक विघटन का घोर विरोध पाकिस्तानी नहीं बल्कि एक बाहरी करेगा और वह है चीन। फिलहाल, बीजिंग ने बलूचिस्तान समेत पाकिस्तान में अपना काफी कुछ दाँव पर लगा रखा है। आज्ञाकारी पाकिस्तान उसकी बहुत बड़ी महत्वाकांक्षी और जबरदस्त रणनीतिक ‘वन बेल्ट, वन रोडÓ (ओबीओआर) परियोजना का अभिन्न हिस्सा है क्योंकि इससे चीन को अरब सागर के गर्म जल वाले बंदरगाह, ग्वादर तक का रास्ता बेरोकटोक मिल जाएगा। पाकिस्तान के बँटवारे से भारत तथा अन्य देशों के विरुद्ध चीनी चाल और रणनीतिक योजना नाकाम हो सकती है। इसके व्यापक महत्व को देखते हुए, चीन अपने सबसे मजबूत सहयोगी को टूटने से रोकने के लिए अपना सबकुछ लगा देगा।

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स्थायी समाधान के लिए सही समय

यहाँ यह बता देना जरूरी है कि अगर कश्मीर समस्या का समाधान संभव है, तो वह अभी ही है। और समस्या का हल कोई निकाल सकता है तो वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं। मोदी के साथ बड़ी बात यह है कि वह किसी भी बात को भारतीयों को समझा सकते हैं। अगर भारत को तेजी से तरक्की करनी है, तो उसे पड़ोस की खटपट से निकलना होगा। और हमारे प्रधानमंत्री में कड़े फैसले लेने और उन्हें लागू करने की क्षमता के साथ ही इच्छाशक्ति भी है। अगर पाकिस्तान में भी ऐसा ही नेता हो जो लोगों को साथ लेकर चल सके, तो बातचीत से समझौते का हल निश्चित रूप से निकल सकता है।

यही नहीं, कश्मीरी युवाओं में भी असंतोष बढ़ रहा है जिन्हें आतंकवादी अपने संघर्ष के मोर्चे पर खड़ा होने के लिए मजबूर कर रहे हैं। उन्हें यह समझ आने लगा है कि उनके तथाकथित नेता अपने निजी फायदे के लिए उनका इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे युवा अब तक ‘आज़ादीÓ के नाम पर अपना जीवन और अपना भविष्य दाँव पर लगाते चले आ रहे थे। उन्हें या तो मार डाला जाता है या वे अपंग हो जाते हैं, या कम से कम जेल में तो सडऩा ही पड़ता है जबकि उनके नेता ऐशो-आराम की जिदंगी बिता रहे हैं और अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए विदेश भेजते हैं ताकि उनका एक सुनहरा भविष्य बन सके।

इसी बीच, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने जुलाई 2017 में टेरर फंडिंग पर एक बड़ा हमला किया है। उसने पाया कि पाकिस्तान से पैसा हासिल करने के अलावा, ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (एपीएचसी) के नेताओं को लंदन तथा दुबई स्थित संगठनों से भी पैसा मिलता है। इस कार्रवाई के बाद, 24 जुलाई को एनआईए ने श्रीनगर और दिल्ली से आतंकी गतिविधियों और पैसे देकर कश्मीर में पत्थरबाजी कराने के साथ ही उपद्रव के लिए सीमा पार से धन प्राप्त करने के आरोपों में सात कश्मीरी अलगाववादियों को गिरफ्तार किया था। एनआईए ने एक डोजियर भी तैयार किया है जिससे लश्कर-ए-तैयबा और हुर्रियत के बीच सीधा संबंध स्थापित हो जाता है। उसने इन नेताओं को आपराधिक साजिश रचने और भारत के खिलाफ युद्ध छेडऩे के आरोपों के तहत गिरफ्तार किया है। इनमें से एक आरोपी अल्ताफ अहमद शाह कट्टरपंथी हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी का दामाद है, जो जम्मू-कश्मीर का विलय पाकिस्तान के साथ करने का समर्थन करता रहा है, जबकि दूसरा है शाहिद-उल-इस्लाम जो हुर्रियत नेता मीरवाइज उमर फारुक का करीबी है। एक और आरोपी, अयाज़ अकबर खांडे गिलानी के नेतृत्व वाले तहरीक-ए-हुर्रियत का प्रवक्ता है।

कश्मीरी युवा अब इस बात को समझने लगे हैं कि इन स्वयंभू नेताओं या उनके परिवारों का कुछ नहीं बिगड़ेगा। चाहे हुर्रियत हो, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हरकत-उल-मुजाहिदीन या अन्य संगठन, वे सभी एक ही हैं। हाल ही में, इन आतंकवादी संगठनों के खिलाफ ज्यादा से ज्यादा कश्मीरियों ने आवाज उठाना शुरु कर दिया है। जैसा कि हम जानते हैं, खालिस्तानी आंदोलन के विफल होने का एक कारण इसके नेताओं का भ्रष्टाचार और स्वार्थ था। पुलिस ने भी सख्त रुख अपनाया था। कश्मीर में भी, इस बात के संकेत हैं कि यह आंदोलन उसी रास्ते पर जा रहा है।

इतिहास ने हमें दिखाया है कि किसी भी जटिल समस्या का समाधान समय के साथ हो जाता है। आयरलैंड की समस्या, एलटीटीई का विवाद और खालिस्तानी आंदोलन भी इसी के कुछ उदाहरण हैं। इसलिए, हमारे पास इस उम्मीद के ठोस कारण हैं कि सबको सद्बुद्धि मिलेगी और उस राज्य में शांति लौटेगी जिसे कभी ‘धरती का स्वर्ग’ कहा जाता था। अब, लाख टके का सवाल यह है कि यह कितनी जल्दी होगा?

सुनील गुप्ता

 

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