धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिन्दुत्व पर बार-बार प्रहार क्यों?

धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिन्दुत्व पर बार-बार प्रहार क्यों?

अनेकता में एकता ही इस प्राचीन भारत की सभ्यता रही है जो विश्व के किसी दूसरे कोने में देखने को भी नहीं मिलती। हमने इस अनेकता में एकता को हमेशा ही स्वीकार किया है। हम उन लोगों का भी सम्मान करते हैं जो हमसे सहमत नहीं होते। जब कोई हमसे सहमत नहीं होता तो हम उसकी असहमति पर भी अपनी सहमति बना लेते हैं और यह कहते हैं कि हम आप से सहमत नहीं है लेकिन फिर भी हम आपकी असहमति की सुरक्षा करेंगे।

हाल के दिनों में नजर डालें तो  इस देश की विविधता पर न जाने कितनी चर्चाएं हो चुकी हैं । कभी-कभी तो चर्चाएं इतनी भयानक हो जाती है कि ये शत्रुता का रूप धारण कर लेती हैं और अन्त में देश-विरोधी बातें होने लगती हैं। आजकल लोग अपनी देश-विरोधी बातों को छुपाने के लिये देश के संविधान, बोलने की आजादी और मौलिक अधिकार का हवाला देने लगते हैं। समाज में फैल रही यह नाकारात्मक विचारधारा पूर्ण रूप से जोखिम भरी है, जो धीरे ही सही लेकिन इस देश को खत्म कर देगी। इन सभी विचारों को समाज से किसी भी प्रकार निकाल बाहर करना होगा, क्योंकि देश और धर्म से बड़ा कुछ नहीं होता।

इस देश के राजनीतिक दल लोगों के वोट पाने के लिये किसी भी प्रकार की रणनीति तक जा सकते हैं, जो इस देश में वर्षों से देखने को मिलती रही हैं। लेकिन, हमारी न्यायपालिका का रवैया राष्ट्र-चिन्ह, राष्ट्र-गान, राष्ट्रीय संस्थानों, राष्ट्रीय महापुरूषों और हिंदू त्यौहारों के संबंध में कष्टदायक है। भारत के इतिहास को न केवल तथाकथित धर्मनिरपेक्षी और बुद्धिजीवियों ने खत्म करने का प्रयास किया, बल्कि इसे खत्म करने में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का भी हाथ था। भारत की स्वतंत्रता के पश्चात नेहरू ने  कई आयोजनों के माध्यम से हिंदू-विरोधी मानसिकता को बढ़ावा देना आरम्भ किया।

इसीसे संबन्धित इतिहास को गलत प्रकार से लोगों के समक्ष प्रस्तुत करने की घटना कर्नाटक के श्रीरंगपटना के शासक टीपू सुल्तान के संदर्भ मे हैं, जिसके बारे अभी तक विद्यार्थियों को गलत ढ़ंग से ही बताया गया है। टीपू के संदर्भ में जब कुछ वरिष्ठ इतिहासकारों ने अध्ययन किया तो उन्हें कुछ स्तब्ध करने वाली बातें ज्ञात हुर्इं। वरिष्ठ इतिहासकार डॉ चिदानंद के अनुसार टीपू सुल्तान एक धार्मिक रूप से कट्टर शासक था, जिसने तलवार के बल पर लाखों हिंदूओं का धर्म-परिवर्तन कराया।  वह हिंदू-विरोधी था अत: इससे यह साफ होता है कि वह पक्षपाती भी था। टीपू ने अपने शासनकाल में कर्नाटक में उर्दू और पारसी भाषा को आवश्यक कर दिया, जिससे यह भी साफ होता है कि टीपू कन्नड़ विरोधी था। यदि उसने अंग्रेजो के साथ लड़ाई लड़ी तो उसका एक मात्र उद्देश्य अपने शासन को बचाना था, न कि मातृभूमि को। कुछ ऐसे उदाहरण है जो यह बिल्कुल साफ करते हैं कि टीपू हिंदू समुदाय के प्रति कितना कट्टर था। पहला, उसने कर्नाटक के कोदागु जिले के 5000 कोदावाओं की हत्या कराई। दूसरा,उसने केरल (मालाबार) के 2000 नांबियार लोगों की हत्या कराई। तीसरा, दीवाली के दिन उसने मांडया जिले के मेल्कोट में 1001 आयंगर ब्राह्मणों की हत्या का आदेश दिया। इसके विरोध में मेल्कोट में आज भी ब्राह्मण दिवाली नहीं मनाते हैं।

सिद्दारमैया के नेतृत्व वाली कर्नाटक की कांग्रेस सरकार आने वाले 10 नवम्बर को टीपू की जयंती मनाने की तैयारी कर रही है, जो कि करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं के साथ खेलने जैसा है। हालांकि इससे साफ होता है कि कांग्रेस इसके माध्यम से मुस्लिम वोट पाने का प्रयास कर रही है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि कुछ लोगों का तर्क है कि यदि ये लोग राष्ट्रगान न भी गाये तो यह उनके अधिकार के अंतर्गत है। वैसे न्यायपालिका ने इनकी बातों को मान कर राष्ट्र-गान के संबंध में अपना निर्णय सुना दिया है। इस देश का आम नागरिक यह जानना चाहता है कि न्यापालिका ने इन याचिकाकर्ताओं से इनके राष्ट्र-गान न गाने की समस्या के बारे में क्यों नहीं पूछा? राष्ट्रगान किसी धर्म से नहीं जुड़ा है। इसे संसद में पारित किया गया है और संविधान में शामिल किया गया है। तो किस प्रकार कोई इस पर प्रश्न-चिन्ह खड़ा कर सकता है?

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न सभी हिंदू पूछना चाहते हैं कि आखिर हिंदू त्यौहारों को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है? प्रत्येक दिन मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकरों से भी आवाजें आती हैं। आखिर इसका क्या? कुछ त्यौहारों में तो लाखों निर्दोष भेड़-बकरों की निर्मम हत्या की जाती है। आखिर इससे निकलने वाली गंदगी का क्या? क्या किसी संस्था या संगठन ने इसके विरूद्ध अपील की है? मेरी समझ से, नहीं।

भारत के लोग चाहते हैं कि देश की न्यायपालिका सभी मुद्दों पर अपनी निष्पक्ष राय रखें। देश के विकास में निर्णय लेने वालों से यह आशा की जाती है कि वे तथाकथित धर्मनिरपेक्षी, वामपंथी और बुद्धिजीवियों के बहकावे में न आयें जो बड़ी चालाकी से हिंदू-विरोधी षडयंत्र करने के प्रयास में रहते हैं।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

 

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