उचित व्यक्ति को सही समय पर दान करने से ही पुण्य प्राप्त होता है

उचित व्यक्ति को सही समय पर दान करने से ही पुण्य प्राप्त होता है

मनुष्य के अन्दर रहने वाले गुणों में दया-दान और परोपकार प्रमुख हैं। इन्हीं सद्गुणों के माध्यम से हम आध्यात्मिक मार्ग पर बढ़ पाते हैं जिसके फलस्वरूप हम अपने आप को उत्तम साबित कर पाते हैं। हम जब भी एक श्रेष्ठ मानव बनने का प्रयास करते हैं तो यह सबकुछ हम अपने स्वंय के लिये करते हैं, जिस पर किसी दूसरे का अधिकार नहीं हो सकता। हमारे उत्तम गुण हमें जीवन-भर प्रभावित करते हैं। कुछ सत्यकार्य करना हमारा स्वभाव होता है। हम उन्हीं कार्यों को अपने मन से करते हैं, जिनका हम परिणाम महसूस कर सकते हैं। आग्रह के साथ किया जाने वाला कार्य हमें सफल बनाता है। हमारे मन को संतोष प्रदान करता है। कु छ सत्यकार्य को करने से पहले हम इसके परिणाम को अपने मस्तिष्क में रखते हैं, जो हमारे परिणाम में सहायक होता है। कुछ ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार अपने नुकसान और फायदों को ध्यान में रखते हुए हम दान-पुण्य करते हैं। कुछ उचित कार्यों को हम एक-दूसरे को दिखाने के लिये करते हैं। कुछ व्यक्ति जो उच्च समाज में बैठते हैं, अपनी छवि को बढ़ाने के लिये थोड़े अच्छे कार्यों को करके लोगों के समक्ष अपना आकर्षण दिखाते हैं। इस प्रकार के कार्य केवल किसी उद्देश्य मात्र के लिए किया जाता है। इस प्रकार के कार्यों से कुछ समय के लिये लाभ प्राप्त हो सकता है, लेकिन इससे हमारा विकास संभव नहीं है।

सभी गुणों में दान करने की प्रथा आजकल सबसे अधिक प्रचलित हो चुकी है। दान करने वाले व्यक्ति सभी लोगों के समक्ष सभी की जानकारी में दान करने लगे हैं। इन लोगों का केवल एक मात्र उद्देश्य होता है, अपने आप को सर्वश्रेष्ठ दिखाना। समाज की भीड़ में इस दान के माध्यम से ये लोग अपनी पहचान बना लेते हैं। हम मनुष्यों में एक गुण होता है कि जब हम कुछ धन कमाने लगते हैं तो हम इस धन को सबकुछ मानने लगते हैं। कभी-कभी हम अपने द्वारा खरीदी गयी कुछ वस्तुओं को किसी दूसरे व्यक्ति को दे देते हैं, जिससे हमारी प्रशंसा हो। लेकिन इन सभी चीजों से हटकर यदि हम किसी दूसरे व्यक्ति के दिल तक पहुंच पायेंगे तो हमें अपने सत्यकार्यों को किसी को भी दिखाने कि आवश्यकता नहीं होती। सहानुभूति, प्यार, दया और क्षमा बांटने से हम सभी के दिलों में स्थान ग्रहण कर पायेंगे।

दान करने से पहले हम यह तैयारी कर लेते हैं कि हमें क्या दान करना है? कितना दान करना है? इस प्रकार के दान को हम कैसे दान मान पायेंगे? किसी जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना ही वास्तविक दान होता है। इस संदर्भ में हम कर्ण और राजा हरिशचन्द्र को कदपि नहीं भूल सकते हैं। निर्धारित समय पर किया जाने वाला कर्म कभी भी कर्म नहीं हो सकता है। कर्म करने की भावना सदैव हमारे दिल में होनी चाहिए और इसे कर्म न मानकर हमें धर्म मानना चाहिए

उपाली अपराजिता रथ

Leave a Reply

Your email address will not be published.