अयोध्या की दीवाली और टीपू सुल्तान की जयन्ती

अयोध्या की दीवाली और टीपू सुल्तान की जयन्ती

दीवाली की शुरुआत आज से लगभग पौने दो लाख साल पहले त्रेता युग में अयोध्या से हुई थी। उस दिन श्री राम चन्द्र चौदह साल का वनवास काट कर, श्री लंका के रावण को पराजित कर अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण सहित अपने शहर अयोध्या वापिस आए थे। वे पुष्पकलावती विमान से वापिस आए थे। रात्रि का समय था। अयोध्या के लोगों ने रामचन्द्र जी के वापिस अपने राज्य में पहुँचने पर प्रसन्नता में दीप माला की थी। तभी से सारे देश में उस दिन दीपमाला की परम्परा शुरु हुई। धीरे धीरे दीवाली या दीपावली का विस्तार होता गया और उसका स्वरूप भी विस्तृत होता गया। लगभग हज़ार वर्ष पहले भारत में विदेश से आई इस्लामी शक्तियों का वर्चस्व बढ़ता गया और धीरे-धीरे अयोध्या अपनी महत्व खोती गई। उज़बेकिस्तान से आए बाबर ने भारत में मुग़ल वंश का राज ही स्थापित नहीं किया बल्कि इसकी गज़़ट नोटिफिकेशन अयोध्या में राम मंदिर का विध्वंस कर उस पर एक मस्जिद का निर्माण कर किया। उन दिनों राजा किसी दूसरे देश को जीतने पर, नई बादशाहत  की घोषणा वहाँ के किसी महत्वपूर्ण प्रतीक का विध्वंस कर उसके खंडहरों पर नई व्यवस्था का प्रतीक स्थापित कर ही करता था। अयोध्या में बाबर ने भी यही किया। उसके बाद अयोध्या धीरे धीरे अपना महत्व खोती गई। अठारहवीं शताब्दी में जब अंग्रेज़ हिन्दुस्तान में आ गए और कुछ सालों में ही उन्होंने भारत पर अपना क़ब्ज़ा कर लिया तो उन्होंने अपने राज्य विस्तार में एक बात का ख़ास ध्यान रखा। उन्होंने भारत के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक नगरों को दरकिनार कर नए स्थानों को सत्ता केन्द्र स्थापित किए। उन्होंने काशी, प्रयागराज, अयोध्या, मथुरा इत्यादि सभी नगरों की अवहेलना की। अंग्रेज पुराने सांस्कृतिक भारत को उखाड़ कर वहाँ नया भारत स्थापित करना चाहते थे जिसका अपनी संस्कृति से कोंई सम्बध नहीं था। कोलकाता, मुम्बई, चेन्नई, इत्यादि इसी रणनीति का प्रमाण था।

अयोध्या में मंदिर को तोड़ कर जो बाबरी ढाँचा खड़ा किया गया था, वह अयोध्या में स्थायी विवाद का कारण बन गया था। वैसे भी सरयू का प्रवाह कहीं चलता था कहीं रुकता था। अयोध्या बदरंग होता जा रहा था। दीपावली सारे देश में मनाई जाती थी, अयोध्या में भी मनाई जाती रही। लेकिन त्रेता युग की उस दीवाली को जिस दिन भगवान राम अपने घर वापिस आए थे, उसे भी लोग भूल गए थे। मामला यहाँ तक पहुँच गया जो लोग काशी, वाराणसी और अमृसर इत्यादि शहरों की बात करते हैं, उन्हें साम्प्रदायिक की उपाधि दी जाने लगी। ऐसे वातावरण में उत्तर प्रदेश की सरकार द्वारा अयोध्या में दीपावली को मनाना और त्रेता युग की तर्ज़ पर ही उसका भव्य आयोजन करना एक नई शुरुआत है। यह बहुत पहले किया जाना चाहिए था। लेकिन अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद नई सरकार ने भारत की सांस्कृतिक परम्पराओं के नकार को ही पंथ निरपेक्षता का नाम दिया। सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित अनेक दिवसों को महोत्सव का दर्जा दिया और भारत के करोड़ों लोगों द्वारा मनाए जाने वाले सांस्कृतिक-ऐतिहासिक उत्सवों से किनारा कर लिया। यही कारण है कि दीवाली का उत्सव  सरकार नहीं मनाती थी क्योंकि इससे साम्प्रदायिकता की बू आती थी और पर्यावरण दिवस लोग नहीं मनाते क्योंकि यह सरकारी उत्सव है। बाद में तो स्थिति यहाँ तक पहुँची कि बुद्धिजीवियों ने बहुत मेहनत करके यह सिद्ध किया कि भारत के अधिकांश सांस्कृतिक ऐतिहासिक उत्सव ऐसे हैं जिनसे पर्यावरण का नाश होता है और मानव अधिकारों पर चोट पहुँचती है। धीरे धीरे न्यायालयों ने आदेश जारी करने शुरु कर दिए की मूर्ति विसर्जन से नदियाँ प्रदूषित होती हैं, दीपावली पर पटाखा जला देने से प्रदूषण फैलता है, जलीकट्टू पर बैल पूजा से पशुओं के प्रति निर्दयता का प्रसार होता है, इसलिए इनको तुरन्त बन्द कर देना चाहिए। बैल दौड़ में पशुओं के प्रति निर्दयता सूंघने वाले अनेक लोग अपने सामने बकरा कटवा कर उसका माँस खाने को पशु प्रेम की संज्ञा देने लगे।

Layout 1

ऐसे वातावरण में उत्तर प्रदेश की सरकार ने आम भारतीयों के साथ खड़े होकर पहली बार दीवाली का उत्सव मनाया तो लगा सरकार और लोगों में द्वैत समाप्त हो गया है। यह द्वैत विदेशी शासन में तो होता है लेकिन पंथ निरपेक्षता को नाग की तरह गले में धारण किए स्वतंत्र भारत की सरकार भी इसी द्वैत की रक्षा करती रही। योगी आदित्यनाथ की सरकार को बधाई देनी चाहिए कि उन्होंने अयोध्या को उसका उचित स्थान दिलवाने की पहल तो की।

16

लेकिन विरोध पक्ष का कहना है कि इस दीवाली उत्सव पर जो ख़र्चा आया है वह सरकार नहीं कर सकती। लोक वित्त का उपयोग सांस्कृतिक कामों के लिए नहीं किया जा सकता। वे यह तब कह रहे हैं जब हर प्रदेश सरकार ने सांस्कृतिक मंत्रालय खोल रखे हैं, उसके लिए वाकायदा एक मंत्री होता है और मंत्रालय का करोड़ों रुपए का बजट निर्धारित होता है। इन प्रावधानों पर कोई आपत्ति नहीं करता। सरकार चाहे किसी भी पार्टी की क्यों न हो, संस्कृति मंत्रालय बदस्तूर काम करता रहता है। इसके बाबजूद अयोध्या जो भारत का पुरातन सांस्कृतिक केन्द्र है और दीपावली इस देश का सबसे बड़ा सांस्कृतिक उत्सव है, उस पर आपत्ति का कारण क्या है? देश की आम जनता ने तो इस सांस्कृतिक उत्सव में बढ़ चढ़ कर भाग लिया और हार्दिक प्रसन्नता ज़ाहिर की लेकिन अपने आप को उसी जनता का प्रतिनिधि कहने वाले नेता इस का डट कर विरोध क्यों कर रहे हैं ?

इस मामले में सोनिया कांग्रेस सबसे अग्रणी मुद्रा में है। वह पंथनिरपेक्षता के नाम पर भारतीयता के विरोध पर उतर आई लगती है। सोलहवीं शताब्दी में बाबर काल में गिराए गए राम मंदिर का मामला, जब बीसवीं शताब्दी में तूल पकडने लगा तो सोनिया कांग्रेस अपने तमाम वामपंथी बुद्धिजीवियों सहित बाबर के पक्ष में खड़े हो गए और उसकी उदारता के क़सीदे ही नहीं पढऩे लगे बल्कि अयोध्या के महाराजा राम चन्द्र के अस्तित्व से ही इंकार करने लगे। यह मामला इतना आगे बढ़ा कि ये तमाम शक्तियाँ सुदूर तमिलनाडु के रामेश्वरम में श्री लंका को रामेश्वरम से जोडऩे वाले रामसेतु को ही नष्ट करने के लिए एकजुट हो गईं। जब 2017 में अयोध्या में दीवाली महोत्सव का आयोजन हुआ तो ये सभी शक्तियाँ इसके विरोध में उतर आईं। लेकिन उनका यह विरोध केवल शाब्दिक विरोध तक सीमित नहीं है, इन शक्तियों को राम के मुक़ाबले एक प्रतीक की तलाश थी जो भारत में उभर रही तथाकथित साम्प्रदायिक शक्तियों से मुक़ाबला किया जा सके। अब लगता है इन शक्तियों ने अयोध्या के दीवाली महोत्सव का तोड़ ढूँढ लिया है। दीवाली के सांस्कृतिक महोत्सव के मुक़ाबले सोनिया कांग्रेस का सांस्कृतिक महोत्सव। सोनिया कांग्रेस की सरकार कर्नाटक में है। अत: यह दायित्व भी कर्नाटक सरकार को ही उठाना था। कर्नाटक सरकार ने टीपू सुल्तान की जयन्ती मनाने का फ़ैसला किया है। टीपू सुल्तान अठारहवीं शताब्दी में मैसूर रियासत का शासक रहा था। टीपू सुल्तान अरब के सैयद वंश से ताल्लुक़ रखता था। शुरुआती दौर में अरबों ने हिन्दुस्तान पर हमले किए थे और भारत के कुछ हिस्सों पर क़ब्ज़ा भी कर लिया था। कालान्तर में अरबों के स्थान पर मध्य एशिया से आए तुर्कों व अन्य कबीलों ने क़ब्ज़ा कर लिया लेकिन कुछ इक्का दुक्का स्थानों पर अरबों ने भी अपना क़ब्ज़ा बनाए रखा। वर्तमान मैसूर में सैयद वंश के टीपू सुल्तान का राज्य की यही कहानी है। ये सभी इस्लामी राज्य दुनियावी बादशाहत का एक फजऱ़् जीते हुए इलाक़े के लोगों को इस्लाम मज़हब में खींच कर लाना भी मानते थे। उसके लिए ये किसी सीमा तक भी जाने को तैयार रहते थे। टीपू सुल्तान का राज्य भी इसी कोटि में आता था। इस्लामी शासन के अवसान काल में हिन्दुस्तान पर क़ब्ज़ा करने के लिए इंग्लैंड और फ्रांस में होड़ लगी तो टीपू इंग्लैंड के स्थान पर फ्रांस के पक्ष में हो गया, इसलिए कुछ वामपंथी इतिहासकारों ने उसे ब्रिटिश साम्राज्यवाद ले लोहा लेना वाला स्वतंत्रता सेनानी बना दिया।

tipu

लेकिन मामला अयोध्या की दीवाली का आ खड़ा हुआ। दीवाली तो हर साल आएगी। इसलिए एक बार फिर टीपू सुल्तान की ही पुकार हुई। टीपू सुल्तान का एक और गुण है। उसका  जन्म दिन दीवाली के आसपास ही 10 नवम्बर को आता है। इक्ष्वाकु वंश के श्रीराम। राम अयोध्या के राजा। अरब के सैयद वंश के टीपू सुल्तान। मैसूर पर क़ब्ज़ा करके उसके राजा। सोनिया कांग्रेस की कर्नाटक सरकार ने निर्णय किया है कि वह हर साल दीवाली के तुरन्त बाद टीपू सुल्तान के जन्म दिन का सांस्कृतिक महोत्सव मनाया करेगी। भारत के महानायक श्री रामचन्द्र और सोनिया कांग्रेस के महानायक अरबी सैयद वंश के टीपू सुल्तान। क्या मुक़ाबला है ? कर्नाटक सरकार ने टीपू सुल्तान की जयन्ती मनाने और उसे भव्यता प्रदान करने के लिए अनेक उपक्रम शुरु कर रही है।

राज्य सरकार के पर्यटन विभाग ने दो एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर लिया है और पाँच एकड़ के लिए प्रयासरत है। टीपू सुल्तान के किले की ओर पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए राज्य सरकार एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रही है। गऩीमत है अरब देशों से किसी को उद्घाटन के लिए नहीं बुला लिया गया।

ऐसा नहीं कि सोनिया कांग्रेस की कर्नाटक सरकार ने अपना यह अनोखा राग अयोध्या की दीवाली की भव्यता और उसमें उमड़े जन समूह के उल्लास से झुंझला कर छेड़ दिया हो। सोनिया कांग्रेस ने वामपंथियों के साथ मिल कर मोदी से लड़ाई को भारत से लड़ाई में तब्दील कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी अरसे से यह माँग करती आ रही है कि जम्मू कश्मीर में अलग झंडा समाप्त किया जाना चाहिए। सोनिया गान्धी की कर्नाटक सरकार ने तुरन्त माँग कर डाली कि कर्नाटक को अपना अलग झंडा रखने की अनुमति दी जाए। उसका स्वरूप और औचित्य बताने के लिए राज्य सरकार ने वाकायदा एक कमेटी का गठन कर दिया है। सोनिया कांग्रेस की राजनीति अब टीपू सुलतानों के सहारे ही चलेगी। हो सकता है बाबर के भारत आगमन का भी जश्न मानाया जाए। कहीं टीपू के बाद कर्नाटक सरकार इस काम में न जुट जाए। सोनिया कांग्रेस कुछ भी कर सकती है। त्रेता युग के राम के अयोध्या आगमन का जबाब सोनिया कांग्रेस की तरफ़ से अब इन्हीं टीपुओं और बाबरों के सहारे दिया जाएगा। अलग झंडे की माँग कर ही दी है। आगे आगे देखिए होता है क्या।

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.