हिमाचल चुनाव: भ्रष्टाचार बनाम विकास

हिमाचल चुनाव: भ्रष्टाचार बनाम विकास

हिमाचल में 9 नवम्बर को होने वाले विधानसभा चुनाव काफी दिलचस्प होते जा रहे हैं। यह तो पहले ही स्पष्ट था कि चुनाव नवम्बर में हो जायेंगे क्योंकि उसके बाद प्रदेश की तीन आदिवासी विधानसभा सीटों -लाहौल-स्पीति, पांगी-भरमौर तथा किन्नौर- पर मतदान संभव नहीं रहता क्योंकि भारी बर्फबारी हो जाने के कारण यातायात अवरुद्ध हो जाता है। तब तो एक गांव से दूसरे गांव पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है। 2012  में हुए चुनाव में पहली बार ऐसा हुआ था कि चुनाव सारे प्रदेश के में एक साथ हुए थे। वरन प्रदेश की 65  सीटों पर चुनाव तो मार्च में हो जाते थे और यहाँ चुनाव मई में होते थे जब तक कि सारे प्रदेश की सीटों पर परिणाम निकल चुके होते थे और सरकार भी बन चुकी होती थी। यह सीटें प्राय: सत्ताधारी दल के पक्ष में चली जाती थीं। अब यहाँ के मतदाता भी स्वतंत्र रूप से मतदान करते हैं और उनके मन पर कोई बोझ नहीं होता।

कहने को तो कांग्रेस कहती थी कि उसके प्रत्याशी तय हैं लेकिन नामांकन-पत्र भरने से दो दिन पहले केवल 59 प्रत्याशिओं की सूची जारी कर सकी।  भाजपा ने इस मामले में पहल कर दी थी और उसने सभी 68 सीटों पर अपने प्रत्याशियों की लिस्ट जारी कर दी थी।

कांग्रेस के खेमे में टिकटों के तय होने पर बड़ी खींचतान व मारामारी चल रही थी। कांग्रेस ने छ: मास पूर्व पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए एक नियम बनाया था कि एक परिवार में एक व्यक्ति को टिकट देगी। इसी कारण  पंजाब के तत्कालीन अध्यक्ष के. अमरिंन्द्र सिंह के परिवार के किसी और सदस्य को टिकट नहीं दिया। इसी प्रकार नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नि को टिकट नहीं दिया गया हालांकि उन्होंने बड़ा जोर लगाया। यह वीरभद्र सिंह की रणनीति का ही कमाल है कि कांग्रेस हाईकमान को उनके दबाव में झुकना पड़ा और उन्हें उस शिमला ग्रामीण सीट से अपना प्रत्याशी बनाना पड़ा जहां वह चाहते थे और जिस सीट से वह 2012 में विजयी रहे थे। वीरभद्र की तमन्ना है कि अपने बेटे विक्रमादित्य की राजनीति में जड़ें पक्की कर जायें। इसी कारण हाईकमान को पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ठाकुर कौल सिंह की बेटी को भी नामांकित करने पर मजबूर होना पड़ा। इसे कांग्रेस हाईकमान की कमजोरी माना जा रहा है।

वास्तविकता तो यह है कि कांग्रेस के पास हिमाचल में वीरभद्र के अतिरिक्त कोई कद्दावर नेता है ही नहीं जो भाजपा की चुनौति का सामना कर सके। या यूं कहिये कि वीरभद्र ने किसी अन्य को सिर उठाने ही नहीं दिया। यदि किसी ने हिम्मत की भी तो उसे गिरा दिया।

केवल वर्तमान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू ही निकले जो वीरभद्र सिंह का मुकाबला कर रहे हैं, जो मुख्यमन्त्री के कड़े विरोध के वाबजूद भी टिके हुये हैं। टिकट वितरण में उनकी काफी भूमिका रही है। यह सत्य नहीं है कि टिकट वितरण में उन्होंने मुख्यमन्त्री की हां में हां मिलाई है। यह अलग बात है कि वीरभद्र सुक्खू समर्थकों की जीत में अडंगे डालें क्योंकि वह न अपना विरोध पचा पाते हैं और न सह पाते हैं।

इस बार कंग्रेस व भाजपा के दोनों दिग्गज प्रतिद्वन्दियों ने अपनी-अपनी सीटें बदल ली हैं। वीरभद्र ने अपनी शिमला ग्रामीण सीट अपने बेटे विक्रमादित्य के लिये छोड़ दी है। स्वयं वह दूसरे जिले में स्थित अर्की सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। उधर प्रेम कुमार धूमल ने भी अपनी हमीरपुर सीट छोड़कर पास की सुजानपुर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। वीरभद्र के लिये उनकी सहयोगी मंत्री व ठयोग से विधायक विद्या स्टोक्स ने उनकी सीट से चुनाव लडऩे का निमन्त्रण दिया था। पर उन्हें अर्की की सीट ज्यादा आसान दिखी।

जब अन्तिम समय में श्रीमति स्टोक्स ने ठयोग से चुनाव लडऩे का फैसला किया और अपना नामांकन दाखिल किया तो जांच के समय उनका नामांकन चुनाव अधिकारी ने रद्द कर दिया क्योंकि कांग्रेस ने दो प्रत्याशियों को नामित कर दिया था। जिसने पहले नामांकन भरा उसे कांग्रेस का अधिकृत प्रत्याशी माना।

हिमाचल में 1977 के बाद से दो-पार्टी व्यवस्था बन गई है-एक बार कांग्रेस तो दूसरी बार भाजपा। जनता ने कभी तीसरी पार्टी को मौका  ही नहीं दिया।

कांग्रेस व भाजपा दोनों ही 68-68 सीटों पर एक-दूसरे के आमने-सामने चुनावी युद्ध में ख़ी हैं। दोनों सभी सीटों पर एक-दूसरे के सामने खड़े हैं। 14 सीटों पर माक्र्सवादी भी अपना भाग्य आजमा रहे हैं। 1977 के बाद अब तक कोई माक्र्सवादी सफल नहीं हो पाया है।

2012 के चुनाव में नेशनल कांगे्रस पार्टी, बसपा, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी आदि ने भी अपना भाग्य आजमाया था बड़े जोर-शोर से, पर मायूसी के सिवाय कुछ हाथ न लगा था।

2012 के चुनाव में भी भाजपा प्रो. प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में दोबारा सत्ता में आ रही थी पर गलत व्यक्तियों को टिकट दे दिये जाने के फलस्वरूप कांगड़ा जिले ने भाजपा को धोखा दे दिया। सब से बड़े 15 सीटों के जि़ला में जो भाजपा का गढ़ माना जाता है उसे केवल 3 सीटें मिली थी़। वर्तमान विदेश मन्त्री सुषमा स्वराज ने तो खुले में ही कह दिया था कि भाजपा को कांग्रेस ने नहीं, भाजपा के अपने ही नेताओं ने हराया था।

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इस बार कांग्रेस तो पहले ही चुनावी लड़ाई हार गई लगती है। मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह जो आज तक अपने आपको भ्रटाचार के विरूद्ध सब से बड़ा नेता जगज़ाहिर करते फिरते थे आज स्वयं ही भ्रष्टाचार के आरोपों में अदालत के और जनता के कटघरे के चक्कर लगाते फिरते हैं। उनकी सम्पत्ति भी आयकर व अन्य इकाइयों ने अपने कब्ज़े में ले रखी है। परिवारवाद के आरोपों से भी घिरे पड़े हैं। इससे भी ऊपर हैं कांग्रेस में व्याप्त जबरदस्त गुटबन्दी।

हिमाचल का इतिहास बताता है कि मतदाता सत्ताधरी दल में गुटबन्दी को कभी क्षमा नहीं करता। 1993 में भाजपा में शान्ता कुमार व स्वर्गीय जगदेव चन्द में भयानक सत्ता संघर्ष था। भाजपा 7 सीटों पर लुढ़क गई थी। यही हाल था सत्ताधरी  कांगेस का 1998 में। मतदाता ने उसे विपक्ष में बिठा दिया था।

इसी प्रकार 2003 में भाजपा बुरी तरह गुटबन्दी का शिकार थी।

जनता ने उसे तख्त से तख्ते पर बिठा दिया। जब कांग्रेस 2003 में सत्ता में आई तब भी उसने इतिहास से कोई सबक नहीं लिया। फलस्वरूप जनता ने 2007 के चुनाव में उसको अपनी औकात दिखा दी और सत्ता से वंचित कर दिया। 2012 के चुनाव में यही हुआ भाजपा के साथ जो अब कांग्रेस के साथ होने जा रहा दिखता है। इस समय मुख्यमन्त्री कांग्रेस अध्यक्ष को नीचा दिखाने की होड़ में हैं और अध्यक्ष मुख्यमन्त्री को धूल चटाने की फिराक में।

बहुत सारे भाजपा विद्रोहियों ने नामांकन भर दिये थे। पार्टी ने तत्परता दिखा कर स्थिति बहुत हद तक सम्भाल ली है। पर अभी कुछ और प्रयास चल रहे हैं। शान्ता कुमार भी दुखी लग रहे थे। पार्टी ने केन्द्रीय मन्त्री जगत प्रकाश को उनके पास भेजकर स्थिति सम्भाल ली है। पर अन्दरूनी तौर पर नुकसान को सम्भालना होगा।

प्राप्त  संकेतों के अनुसार भाजपा 45 और 50 सीटों पर अपनी विजय दर्ज कर लेगी। एक न्यूज चैनल ने तो भाजपा को 45-47 सीटें मिलने की भविष्यवाणी की है।

 

शिमला से अम्बा चरण वशिष्ठ

 

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