ताजमहल या तेजो महालय

ताजमहल या तेजो महालय

ताजमहल भले ही संसार के सात अजूबों में से एक रहा हो मगर वह हमेशा विवादों में भी रहा। पहले विवाद साहित्य में होते थे। एक शायर ने लिखा था-इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है। तो उसके जवाब में दूसरे शायर ने लिखा था- इक शहंशाह ने बनवा के हशीं ताजमहल हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक। मगर आज विवाद बहुत आगे बढ़ गया है। ताजमहल फिर विवादों में है। इस बार मुद्दा है कि ताजमहल शाहजहां ने बनाया था या यह पुराना शिवमंदिर तेजो महालय था जिसे ताजमहल का नाम दे दिया गया। यह विवाद इन दिनों अखबारों और टीवी की सुर्खियों में है।

विवाद कुछ ऐसे शुरू हुआ। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग की ओर से हाल में जारी एक पुस्तिका में ताजमहल को शामिल नहीं किए जाने के बाद विवाद उठा था। भाजपा विधायक संगीत सोम ने इसे गद्दारों की बनवाई इमारत बताते हुए विवाद को और हवा दे दी। हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि यह भारत माता के सपूतों के खून पसीने से बनी इमारत है और वह इस महीने के अंत में ताजमहल देखने जाएंगे। दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल को लेकर चल रहा विवाद थम नहीं रहा है। अब भाजपा के एक और बड़े नेता इस विवाद में कूद गए हैं। अयोध्या में राम मंदिर निमार्ण के समय चले आंदोलन में एक प्रमुख चेहरा रहे पार्टी के सांसद विनय कटियार ने कहा  कि ताजमहल पहले शिव मंदिर था, जिसे मकबरे में बदल दिया गया। पार्टी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कहा  कि ताजमहल और लालकिला भारतीय संस्कृति की पहचान नहीं हैं।

विनय कटियार ने कहा- ताजमहल हिंदू मंदिर है, जिसको तेजो महल कहा जाता था। इतिहासकार पीएन ओक की एक किताब भी ऐसा ही कहती है। शाहजहां ने इसमें अपनी पत्नी को दफनाने के बाद इसे एक मकबरे में बदल लिया था। तेजो महल को हिंदू राजाओं ने बनवाया था। उसका स्थापत्य और शिल्प देख कर लगता है कि वह हिंदू धर्म से जुड़ी कोई इमारत थी। हरियाणा के कैैबिनेट मंत्री अनिल विज ने भी ताज महल मसले पर बयान दिया, ‘ताजमहल एक खूबसूरत कब्रिस्तान है।

योगी आदित्यनाथ या संगीत सोम को ताजमहल की अवमानना करने का दोषी बताना मूर्खता है। किसी भी देश में कोई कब्र राष्ट्रीय पहचान नहीं है। अत: यदि मुमताज बीबी का मकबरा दुनिया में भारत की पहचान बन गया, तो यह हमारे नेताओं, नीतिकारों की मूढ़ता का प्रमाण है।

यह ताजमहल नाम भी बहुत पुराना नहीं है। सौ साल पहले तक इसे ‘ताज बीबी का मकबराÓ कहा जाता था (जैसे, दिल्ली में हुमायूँ का मकबरा आज भी कहलाता है)। शुरू से उस का यही नाम था और इस का कोई महत्व न था। न मुसलमान, न अंग्रेज इसे कुछ समझते थे। यह इतनी मामूली चीज थी कि एक अंग्रेज गवर्नर जेनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने इसे तोड़कर सारा संगमरमर बेचने का निर्णय किया था। यह काम सन् 1830 के आस-पास शुरू भी हुआ। वह पूरा इसलिए न हो सका कि उतने खरीदार नहीं मिले!

यानी, ताज बीबी के मकबरे का कोई सांस्कृतिक या मजहबी मोल न था। यह तो आजादी के बाद नेहरूपंथी हिन्दू हैं, जिन्होंने हर मुसलमानी चीज पर गर्व करना शुरू कर दिया! वरना विश्व की महानतम प्राचीन सभ्यता की पहचान तीन सौ साल पहले बनी एक कब्र होती? यह नेहरूवादियों का हिन्दू संस्कृति के साथ-साथ इस्लाम के बारे में अज्ञान दर्शाता है। ‘ताजमहलÓ न केवल भारत में, वरन पूरे विश्व में अपनी पहचान बना चुका है। हालांकि इस बात को लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं कि ताजमहल को शाहजहां ने बनवाया है या फिर किसी और ने।

इस सवाल का जवाब दिया था -पुरुषोत्तम नागेश ओक ने जो नाम राष्ट्रवादी इतिहासकारों में बहुत सम्मानित हंै। यद्यपि स्थापित इतिहासकार उन्हें मान्यता नहीं देते थे, क्योंकि उन्होंने इतिहास का विधिवत शिक्षण या अध्यापन नहीं किया था, पर उन्हें ऐसी दृष्टि प्राप्त थी, जिससे उन्होंने  भारत के इतिहास में खलबली मचा दी।

ओक का मत था कि भारत में जिन भवनों को मुगलकालीन निर्माण बताते हैं, वह सब भारतीय हिन्दू शासकों द्वारा निर्मित हैं। मुस्लिम शासकों ने उन पर कब्जा किया और कुछ फेरबदल कर उसे अपने नाम से प्रचारित कर दिया। स्वतन्त्रता के बाद भारत सरकार ने भी सच को सदा दबा कर रखा; पर श्री ओक ने ऐसे तथ्य प्रस्तुत किये, जिन्हें आज तक कोई काट नहीं सका है।

सिद्ध शोधकर्ता और इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक ने अपनी शोधपूर्ण पुस्तक में थ्योरी के माध्यम से ताजमहल के रहस्य से पर्दा उठाया है। इतिहासकार पुरुषोत्तम ओक ने अपनी पुस्तक में लिखा हैं कि शाहजहां ने दरअसल, वहां अपनी लूट की दौलत छुपा रखी थी इसलिए उसे कब्र के रूप में प्रचारित किया गया। यदि शाहजहां  ताजमहल का वास्तव में निर्माता होता तो इतिहास में ताजमहल में मुमताज को किस दिन बादशाही ठाठ के साथ दफनाया गया, उसका अवश्य उल्लेख होता।

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शहंशाह के लिए मुमताज के कोई मायने नहीं थे। क्योंकि जिस जनानखाने में हजारों सुंदर स्त्रियां हों उसमें भला प्रत्येक स्त्री की मृत्यु का हिसाब कैसे रखा जाए। जिस शाहजहां ने जीवित मुमताज के लिए एक भी निवास नहीं बनवाया वह उसके मरने के बाद भव्य महल बनवाएगा?

इतिहासकारो के अनुसार आगरा से 600 किलोमीटर दूर बुरहानपुर में मुमताज की कब्र है, जो आज भी ज्यों की त्यों है। बाद में उसके नाम से आगरे के ताजमहल में एक और कब्र बनी जो नकली है। बुरहानपुर से मुमताज का शव आगरे लाने का ढोंग क्यों किया गया? माना जाता है कि मुमताज को दफनाने के बहाने शाहजहां ने राजा जयसिंह पर दबाव डालकर उनके महल (ताजमहल) पर कब्जा किया और वहां की संपत्ति हड़पकर उनके द्वारा लूटा गया खजाना छुपाकर सबसे नीचले माला पर रखा था जो बहुत काल तक वहीं रखा रहा।

पुना ओक के अनुसार क्योंकि शाहजहां ने मुमताज के लिए दफन स्थान बनवाया और वह भी इतना सुंदर तो इतिहासकार मानने लगे कि निश्चित ही फिर उनका मुमताज के प्रति प्रेम होना ही चाहिए। तब तथाकथित इतिहासकारों और साहित्यकारों ने इसे प्रेम का प्रतीक लिखना शुरू कर दिया।  यह झूठ आज तक जारी है। मुमताज से विवाह होने से पूर्व शाहजहां के कई अन्य विवाह हुए थे अत: मुमताज की मृत्यु पर उसकी कब्र के रूप में एक अनोखा खर्चीला ताजमहल बनवाने का कोई कारण नजर नहीं आता।

इतिहास में मुमताज से शाहजहां के प्रेम का उल्लेख जरा भी नहीं मिलता है। यह तो अंग्रेज शासनकाल के इतिहासकारों की मनगढ़ंत कल्पना है जिसे भारतीय इतिहासकारों ने विस्तार दिया। ताजमहल परिसर में अतिथिगृह, पहरेदारों के लिए कक्ष, अश्वशाला इत्यादि भी हैं। मृतक के लिए इन सबकी क्या जरूरत?

इतिहासकार पुरुषोत्त ओक ने अपनी पुस्तक ”ताजमहल ए हिन्दू टेम्पल” में सौ से भी अधिक सबूत एवं तर्क देकर दावा करते हैं कि ताजमहल वास्तव में शिव मन्दिर था जिसका असली नाम ‘तेजोमहालय’ हुआ करता था। ओक यह भी मानते हैं कि इस मन्दिर को जयपुर के राजा मानसिंह (प्रथम) ने बनवाया था जिसे तोड़ कर ताजमहल बनवाया गया। इस बारे में उनके तर्क विचार करने योग्य हैं:

  • किसी भी मुस्लिम इमारत के नाम के साथ कभी महल शब्द प्रयोग नहीं हुआ है। ‘ताजÓ और ‘महलÓ दोनों ही संस्कृत मूल के शब्द हैं। ताजमहल शिव मन्दिर को इंगित करने वाले शब्द ‘तेजोमहालयÓ शब्द का अपभ्रंश है। तेजोमहालय मन्दिर में अग्रेश्वर महादेव प्रतिष्ठित थे।
  • ताज के पश्चिमी छोर में लाल पत्थरों के अनेक उपभवन हैं जो कब्र की तामीर के सन्दर्भ में अनावश्यक हैं। संपूर्ण ताज परिसर में 400 से 500 कमरे तथा दीवारें हैं। कब्र जैसे स्थान में इतने सारे रिहाइशी कमरों का होना समझ से बाहर की बात है।

इसके अलावा मुख्य गुम्बद के किरीट पर जो कलश वह हिन्दू मंदिरों की तरह है। यह शिखर कलश आरंभिक 1800 ईस्वी तक स्वर्ण का था और अब यह कांसे का बना है। आज भी हिन्दू मंदिरों पर स्वर्ण कलश स्थापित करने की परंपरा है। यह हिन्दू मंदिरों के शिखर पर भी पाया जाता है। इस कलश पर चंद्रमा बना है। इसका शिखर एक उलटे रखे कमल से अलंकृत है।

इतिहास के मुताबिक ताजमहल का निर्माण कार्य 1632 में शुरू और लगभग 1653 में इसका निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। दरअसल 1632 में हिन्दू मंदिर को मुस्लिम रंग रूप देने का कार्य शुरू हुआ। 1649 में इसका मुख्य द्वार बना जिस पर कुरान की आयतें तराशी गईं। आस पास मीनारें खड़ी की गई और फिर सामने स्थित फव्वारे को फिर से बनाया गया। सवाल यह भी उठता है कि कब्रगाह को महल क्यों कहा गया? क्या किसी ने इस पर कभी सोचा, क्योंकि पहले से ही निर्मित एक महल को कब्रगाह में बदल दिया गया। कब्रगाह में बदलते वक्त उसका नाम नहीं बदला गया। यहीं पर शाहजहां से गलती हो गई। उस काल के किसी भी सरकारी या शाही दस्तावेज एवं अखबार आदि में ‘ताजमहल’ शब्द का उल्लेख नहीं आया है

26 मार्च 2015 को आगरा के छह वकील ने जिला अदालत में एक याचिका दायर की, दावा करते हुए कि ताजमहल शिव मंदिर है, जो कि तोज महल के नाम से जाना जाता है और हिंदुओं को पूजा करने के लिए अपने परिसर में प्रवेश की अनुमति दी जानी चाहिए। मुकदमा ने आगे दावा किया कि ”12 वीं शताब्दी के दौरान, राजा परमर्दी देव ने तजो महालय मंदिर महल का निर्माण किया था, जो वर्तमान में आम भाषा में ताजमहल के रूप में जाना जाता है मंदिर बाद में जयपुर के तत्कालीन महाराजा राजा मान सिंह द्वारा विरासत में मिला था। 17 वीं शताब्दी में उसके बाद, संपत्ति का संचालन और प्रबंधन राजा जय सिंह द्वारा किया गया था, लेकिन शाहजहां ने (1632) में अपने शासन के दौरान कब्जा कर लिया था।“

इतिहासकार पु.ना.ओक ने अपनी किताब में ताजमहल के वास्तविक इतिहास को ब्यान किया है। मगर उनकी खोज पर भारत सरकार ने ध्यान नही दिया। ओक ने ये पुस्तक 1965 में लिखी थी और उस समय भारत सरकार के पास पर्यटन से आय का मुख्य स्त्रोत ताजमहल था। अगर भारत सरकार ओक की बातो को मानकर उसे एक विवादित क्षेत्र मान लेती तो ताजमहल से पर्यटन स्त्रोत खत्म हो जाता। ताजमहल उस समय भारत का सबसे पुराना और जीवंत उदाहरण था और लोग इसे देश विदेश से देखने आते थे जिससे भारतीय पर्यटन से भारत को काफी मुनाफा होता था। लेकिन अगर सरकार ओक की पुस्तक को ज्यादा फैलने नही दिया था क्योंकि उनको डर था कि इससे हिन्दू-मुस्लिम विवाद ना हो जाये।

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ताजमहल के नाम के बारे में ओक ने लिखा ताजमहल शब्द का प्रयोग मुगल कागजातों में कही नही किया गया था। दूसरा ये है कि शाहजहां की बेगम का नाम मुमताज महल नही था बल्कि उसका असली नाम मुमताज-अल-जमानी था। कई यूरोपीय पर्यटकों ने शाहजहां के दौर में ताजमहल को ताज-ए-महल कहा जता था जो संस्कृत शब्द तेज-ओ-महालय से निकला था। एक तथ्य ये भी है कि अगर ताज को कब्रगाह माना जाता है तो इसके आगे महल कैसे प्रयुक्त हो सकता है जबकी हमने आपको बताया कि मुमताज के नाम में महल कही नही लगता था।

ताजमहल शब्द संस्कृत शब्द तेजो-महालय से निकला है जो शिव मन्दिर की ओर इशारा करता है और ऐसा माना जाता है कि वो मन्दिर आगरा के भगवान अग्रेश्वर महादेव का मन्दिर था। ताजमहल के अंदर प्रवेश करने से पूर्व जुते चप्पल क्यों खोली जाती है जबकि कब्रगाह में जुटे खोलना आवश्यक नही है लेकिन वात्विकता में वो शिव मन्दिर था तब से जूते-चप्पल खोलने की परम्परा रही थी। इसके अलावा ताजमहल के अंदर गुम्बद में अंदर की तरफ 108 लिखा हुआ है जो हिन्दुओं की पवित्र संख्या है। तेजोमहालय शिवजी के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है जिसे शाहजहा ने कब्जा कर कब्रगाह में परिवर्तित कर दिया था।

श्री ओक का मत था कि भारत में जिन भवनों को मुगलकालीन निर्माण बताते हैं, वह सब भारतीय हिन्दू शासकों द्वारा निर्मित हैं। मुस्लिम शासकों ने उन पर कब्जा किया और कुछ फेरबदल कर उसे अपने नाम से प्रचारित कर दिया।

पुरुषोत्तम नागेश ओक ने 1964 में भारतीय इतिहास को पुनर्जीवित करने के लिए संस्थान की स्थापना की थी। ओक ने दावा किया कि अरब प्रायद्वीप राजा विक्रमादित्य के भारतीय साम्राज्य का हिस्सा था और काबा मूल रूप से एक हिंदू मंदिर था।

उन्होंने कई किताबें लिखी जिनमें से कुछ भूलों वाले भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान बहुत लोकप्रिय हो गए। इस किताब में, उन्होंने दावा किया कि कुतुब मीनार, वास्तव में, एक खगोलीय अवलोकन टावर था जिसे विष्णु ध्वज या विष्णु स्तम्भ कहते हैं और लाल किला एक हिंदू शासक द्वारा बनाए गए महल थे।

सतीश पेडणेकर

 

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