साथ-साथ चुनाव के सवाल

साथ-साथ चुनाव के सवाल

निर्वाचन आयुक्त ओ.पी. रावत ने भोपाल में 5 अक्टूबर को कहा कि निर्वाचन आयोग अगले साल लोकसभा और विधानसभाओं (सभी 31) के चुनाव साथ-साथ कराने को तैयार है। केंद्र सरकार ने चुनाव आयोग से इस बारे में राय मांगी थी, जिस पर उसने रजामंदी जतायी लेकिन यह भी संकेत दिया कि उसे इस विशालकाय काम की तैयारी के लिए पूर्व सूचना की दरकार होगी और इसके लिए सभी राजनैतिक पार्टियों को अपनी सहमति देनी होगी। दरअसल रावत ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग करीब 40 लाख ईवीएम और वीवीपीएटी मशीनों के ऑर्डर तकरीबन 154 अरब रु. का दे चुका है और ये मशीनें सितंबर 2018 तक उपलब्ध हो जाएंगी।

असल में यह इत्तेफाक नहीं है। दोनों चुनाव साथ कराने की बात भाजपा के 2014 के चुनाव घोषणा-पत्र में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपने चुनावी विजय के बाद से ही यह प्रिय विषय रहा है। दिसंबर 2015 में एक संसदीय स्थायी समिति इस बारे में सिफारिश कर चुकी है। उसका मानना है कि दो चरणों में चुनावों को एक साथ कराना संभव है। पहले तय समय पर लोकसभा च़ुनाव हो और फिर एक मध्यावधि लोकसभा चुनाव हो तो दोनों स्तरों यानी लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ कराना संभव है। विकास के मामले में दूसरे देशों से होड़ लेने के लिए ऐसा सुधार देश के लिए बेहद जरूरी माना गया है। मार्च 2016 में मोदी ने पार्टी कार्यंकर्तांओं से कहा था कि वे इस विचार के कायल हैं, ताकि उन्हें जमीनी स्तर पर सामाजिक कार्य करने का अधिक समय मिले।

इस प्रस्ताव की संभावना पर कानून मंत्रालय ने चुनाव आयोग से 2015 में राय मांगी थी। मई 2016 में आयोग ने इस  पर रजामंदी जाहिर करते हुए फंड, समय और उसकी रूपरेखा के बारे में पूछा था।

बेशक, इस पर सरकार को ही फैसला लेना होगा लेकिन लगता है चुनाव आयोग सरकार से हल्के इशारे के बाद ही इसके लिए तैयारी में जुट गया।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाइ. कुरैशी ने पहले इस विचार को अच्छा मगर बेहद कम व्यावहारिक बताया था। वे 2014 में एक किताब एन अनडोकुमेंटेड वन्डर: द ग्रेट इंडियन इलेक्शन लिख चुके हैं। उन्होंने बताया कि इसके लिए संविधान संशोधन की दरकार होगी और फिर राज्य विधानसभाओं कार्यकाल घटाने या बढ़ाने पड़ेंगे, जिसके लिए सर्वानुमति की जरूरत होगी. वे अभी भी मानते हैं कि यह संभव तो है लेकिन मशीनों की संख्या दोगुनी करनी होगी।

जाहिर है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने अनेक विचारों की ही तरह देश में चुनाव प्रक्रिया के एकीकरण के विचार तभी से आगे बढ़ा रहे हैं, जब उन्होंने 2014 के आम चुनावों में अपनी पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलवाई थी। उसके बाद से उन्होंने इस विचार को पीएमओ, संसदीय समिति से लेकर नीति आयोग और चुनाव आयोग से इस पर सिफारिश मंगवाई है। चुनाव आयोग भी राजी हो गया। नीति आयोग से इसका ब्लूप्रिंट तैयार करने को कहा गया। उनके इशारे और नीति आयोग में हाल के विचार-विमर्श के बाद इस दिशा में बढऩे की उम्मीद है। फिर भी साथ-साथ चुनाव कराने के लिए इन सवालों के जवाब तलाशने होंगे। एक, क्यों और कैसे चुनाव प्रक्रिया साल-दर-साल बंटती चली गई? दो, चुनाव प्रक्रिया एक साथ संपन्न करने के संवैधानिक, राजनैतिक और व्यावहारिक मायने क्या हैं? तीसरे, देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए संवैधानिक व्यवस्था करके साथ-साथ चुनाव वाजिब है?

कैसे दोनों स्तर के चुनाव अलग हुए 

वर्ष 1967 में चौथे आम चुनाव के बाद ही लोकसभा और विधानसभाओं की चुनाव प्रक्रिया अलग-अलग होनी शुरू हो गई। यह वही साल है जब कांग्रेस के पतन की शुरुआत हुई और पार्टी व्यवस्था में अनेक टुकड़े होने लगे। इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के क्षत्रपों का दबदबा घटाने के लिए 1971 से साथ-साथ चुनाव प्रक्रिया को अलग कर दिया। कांग्रेस का असली पतन तो 1989 और 1996 में हुआ। लेकिन दलगत व्यवस्था में कांग्रेस ही इकलौती पार्टी थी, जो विभिन्न धाराओं और प्रशासन का प्रतिनिधित्व करती थी। विपक्ष विभिन्न विचारधाराओं की सक्रिय पार्टियों का बंटा हुआ समूह था। इससे 1977-80, 1989-90 और 1996-99 में अस्थिरता रही। इसके बाद 1999 और 2014 में भाजपा और कांग्रेस के इर्दगिर्द दोध्रुवीय संघीय गठजोड़ कायम हुआ। सोलहवें आम चुनाव में भाजपा पूर्ण बहुमत और एनडीए दो-तिहाई बहुमत के साथ उभरा तो कांग्रेस 44 सीटों तक सिमट गई। इससे एक नया बहुमत वाला गठजोड़ कायम हुआ और विपक्ष एक-तिहाई तक सिमट गया।

इस तरह 1967 के चुनावों के बाद पहली दफा राज्यों में अस्थिर गठजोड़ सरकारें बीच में ही लुढ़कने लगीं। इससे 1971 तक बार-बार मध्यावधि चुनाव हुए, जब चौथी लोकसभा कार्यकाल से एक साल पहले ही भंग हो गई। इस तरह साथ-साथ चुनावों की मानो पूर्णाहुति हो गई। 1972 में इंदिरा गांधी ने 18 विधाानसभाओं को भंग करके दोबारा चुनाव करवाया। फिर, 1975-76 में लोकसभा का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा देने, 1978 में मोरारजी देसाई सरकार द्वारा राज्य विधानसभाओं को भंग करने और 1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी से अलग-अलग चुनाव की प्रक्रिया लगातार पुख्ता होती गई। 1989 तक आते-आते कई क्षेत्रीय दलों का उभार हुआ और नई दिल्ली की गद्दी में हिस्सेदारी के दावे से दलगत व्यवस्था में और बिखराव आया।

इस तरह देश में चुनाव एक सालाना औैर समूचे वर्ष चलने वाला इवेंट मैनेजमेंट बन गया। दुनिया में इतने बड़े पैमाने पर चलने वाली इकलोती प्रक्रिया है। फिर, स्थानीय निकाय के चुनाव भी चलते रहते हैं। इससे और भी मामला पेचीदा हो जाता है। सो, आश्चर्य नहीं कि कई समितियों और आयोगों ने साथ-साथ चुनाव कराने की प्रक्रिया अपनाने की सिफारिश की। विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट (1999) में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ कराने के लक्ष्य को साधने के लिए राजनैतिक, संस्थागत और चुनाव सुधार की सिफारिश की गई।

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नया प्रस्ताव

नीति आयोग द्वारा हाल में जारी एक विस्तृत नोट में एक देश, एक चुनाव की बात की गई है, जिस पर विभिन्न पक्षों ने विचार किया है। उसमें मौजूदा और संभावित चुनाव प्रणाली के गुण-दोषों का आंकड़ों के साथ विवेचन किया गया है। इसकी दलील है कि संसदीय प्रणाली में विधायिकाओं की कोई तय अवधि नहीं होती (संदिग्ध दलील), इसलिए दोनों स्तरों के चुनावों को 2019 के सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव और 2021 में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव के बीच दो चरणों में राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को घटा या बढ़ाकर किया जा सकता है। मध्यावधि में लोकसभा के भंग होने की स्थिति में अगले चुनाव तक छोटी अवधि के लिए राष्ट्रपति अपनी चुनींदा मंत्रिपरिषद के जरिए देश का प्रशासन चला सकते हैं।

इस पर बहस की गुंजाइश है क्योंकि इसके लिए बड़े संवैधानिक संशोधन की दरकार है, साथ-साथ चुनाव कराने की दलील को बड़े राजनैतिक और संस्थागत नजरिए से भी देखने की जरूरत है। मध्यावधि में लोकसभा को भंग करने और छह महीने से भी कम अवधि के लिए राष्ट्रपति को गद्दी सौंपने की संभावना पर ध्यान से संविधान सभा के नजरिए के हिसाब से देखना चाहिए। इस बहस के दो पहलू हैं। दोनों ही भारतीय गणराज्य में राष्ट्रपति को लेकर हैं। हमारे संविधान में राष्ट्र-प्रमुख के लिए सीधे चुनाव के बदले एक निर्वाचन मंडल के जरिए चुनाव की व्यवस्था ब्रिटिश राजशाही के तर्ज पर किया गया है। अनुच्छेद 54 में राष्ट्रपति के अधिकारों को मंत्रिमंडल के शिखर पर ब्रिटेन के राजा की तरह ही रखा गया है। नीति आयोग के परिपत्र में अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह हमारे राष्ट्रपति को कार्यवाहक अधिकार देने की बात है जो भारत की व्यवस्था के अनुकूल नहीं है। इसलिए साथ-साथ चुनाव कराने की खातिर छोटी अवधि के लिए भी नीति आयोग का यह सुझाव प्रशासन के सिद्धांतों पर खरा नहीं उतरता।

नीति आयोग के प्रस्ताव के समर्थन में विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट का उद्धरण दिया जा रहा है। लेकिन उसे संपूर्णता में ही देखा जाना चाहिए। उसमें राजनैतिक अइौर चुनावी सुधारों के एवज में दलगत प्रणाली को कमजोर करने और उसे गैर-संस्थानिक रूप देने की बात की गई है। पार्अियों फंड में गड़बडिय़ों और चुनाव तथा राजनीति पर उसके असर का जिक्र किया गया है। अगर यह हुआ तो दलगत व्यवस्था मजबूत होगी और अरिुथरता दूर होगी।

बहरहाल, दलगत वयवस्था में कमजोरी और पार्टियों की संस्थागत ताकत अलग-अलग होने से अस्थिर सरकारों की संभावना ही बड़ा मसला है। इससे मिलाजुला जनादेश, अस्थिर विधायिका और सरकारें की संभावना बनती है। दिग्गज पत्रकार, विद्वान प्राण चोपड़ा ने 1999 में सुझाव दिया था कि सत्तारूढ़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव और वैकल्पिक व्यवस्था के प्रति विश्वास प्रस्ताव पर एक साथ मतदान की प्रक्रिया ज्यादा सुरक्षित रहेगी और मध्यावधि चुनाव की आशंका दूर होगी। जाहिर है, यह सरकार अगर चुनाव आयोग की सक्रिय मदद से राजनैतिक सुधार और पार्टी व्यवस्था को संस्थागत रूप देने का काम करती है तो चुनावों की संख्या जरूर कम होगी। बीच की अवधि में लोकसभा चुनावों के साल होने वाले विधानसभा चुनावों को साथ कराने से भी सुधार हो सकता है और धीरे-धीरे व्यवस्था में स्थिरता आती जाएगी।

अनुभव

असली सवाल यह है कि प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा किन वजहों से साथ-साथ चुनाव पर जोर देने को उत्साहित हुए? जवाब शायद अंतरराष्ट्रीय और भारतीय अनुभवों से जुड़ा हो सकता है क्योंकि सरकार का मुश्किल से समझ में आने वाला तर्क चुनाव का अर्थशास्त्र, समय प्रबंधन, बेहतर तालमेल और प्रशासन की बातें हैं। पहले अंतरराष्ट्रीय अनुभव की बात करते हैं।

दुनिया में खासकर ब्रिटेन, ब्राजील, अर्जेंटीना, कनाडा, जर्मनी, अमेरिका और यूरोप के उपलब्ध तथ्यों से पता चलता है कि साथ-साथ चुनाव राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर ज्यादा एकीकृत नतीजे देते हैं। साथ-साथ चुनाव से दलगत व्यवस्था के राष्ट्रीयकरण और बेहतर एकजुटता की संभावना बनती है। हालांकि यूक्रेन में 2000 में प्रतिकूल नतीजे आए, जहां दोनों स्तरों के नतीजे अलग आए।

लेकिन भारत का 1950 और 1960 के दशकों के नतीजों को देखकर कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकलता। उन दशकों में कांग्रेस एक मायने में इकलौती पार्टी थी। इसलिए साथ-साथ चुनाव से वर्चस्वशाली पार्टी की ताकत बढऩे का नतीजा निकालना भारी भूल हो सकता है। हालांकि जैसा कि रजनी कोठारी बताते हैं  कि कांग्रेस के दबदबे के उस दौर में भी केरल और ओडीसा नेे 1960 के दशक में ही साथ चुनावों की परंपरा तोड़ दी थी। दरअसल 1967 में चौथे आम चुनाव और 1971 के बाद पूरी तरह साथ चुनाव की प्रक्रिया टूट गई। यह उस दौर की राजनीति की वजह से हुआ था।

इससे कुछ और जरूरी सवाल उठते हैं, जिनका जवाब साथ चुनाव कराने के पेरोकारों को जरूर देना चाहिए। एक, भारत जैसे विविध और अनेक तरह की सक्रियताओं वाले समाज और देश में क्याचुनाव प्रणाली मशीनी किस्म की हो सकती है? क्या भारत की विविध सक्रियताओं की वजह से ही चुनाव इतने बंट नहीं गए हैं? क्या यह सही नहीं है कि कांग्रेस के दौर में केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने की दलीलें कोई  खास नीतिगत बदलाव लेकर नहीं आई हैं? क्या यह भरोसे से कहा जा सकता है कि कृत्रिम तरीके से बनाई गई चुनावी एकरूपता लोगों को लोकसभा और विधानसभा के लिए अलग फैसले लेने से रोक पाएगी? कैसे लोग यह जान पाएंगे कि राष्ट्रीय स्तर के नीतिगत फैसले ही राज्यस्तर बेहतर नतीजे देंगे? ऐसे अनेक सवाल हैं लेकिन फिलहाल भाजपा में इसको लेकर भारी उत्साह है और कोई भी उपलब्ध नतीजों पर गौर करने के मूड में नहीं है।

भारत की संघीय राजनीति में चुनावी जवाबदेही की शृंखला पेचीदा और उलझन भरी है। हमेशा वोटर आसानी से नहीं समझ पाता कि सरकार की खास नीति का क्या असर हुआ है। अगर केंद्र सरकार किसी राज्य सरकार की किसी नीति में अड़ंगे लगा देती है या गठजोड़ के मामले में कोई क्षत्रप केंद्र की नीति के आड़े आ जाता है तो वोटर भला कैसे समझ पाएगा। अगर राज्य सरकार केंद्र के काय्रक्रमों पर जोर नहीं देती तो वोटर को यह समझाना मुश्किल हीो सकता है कि योजना अच्छी थी मगर दूसरी पार्टी की राज्य सरकार होने से नतीजा नहीं दे पाई। यह मनरेगा या सार्वजनिक वितरण प्रणाली के मामले में हो चुका है।

प्रधानमंत्री मोदी ने योजना आयोग को भंग कर दिया क्योंकि वह केंद्रीयकरण था और राज्यों की स्वायत्तता और आर्थिक योजना की पहल को रोकता था। साथ चुनाव कराने की प्रस्तावित कृत्रिम व्यवस्था के जरिए वे एक पार्टी केंद्रीयकरण की उसी व्यवस्था को थोपना चाहते हैं।

(लेखक उत्तर प्रदेश के नोएडा स्थित सेंटर फॉर पब्लिक अफेयर्स के मानद निदेशक हैं)

अजय के. मेहरा

 

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