आखिर एक साथ चुनाव महत्वपूर्ण क्यों?

आखिर एक साथ चुनाव महत्वपूर्ण क्यों?

लोग कुछ भी कहें लेकिन मोदी सरकार के आलोचक भी यह मानने लगे हंै कि भाजपा सरकार अपने मुख्य मतदाताओं के विषय में न सोचते हुए देश के हित में कठोर से कठोर कदम उठा रही है। सरकार ने अभी तक कई साहसिक कदम उठाए है, इसके बावजूद इसे राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय रूप से थोड़ी कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है-उदाहरण के तौर पर नोटबंदी और जीएसटी पर सरकार द्वारा लिये गये निर्णय है। कुल मिलाकर यह स्पष्ट है कि  मोदी सरकार पिछली सरकारों जैसी नहीं है, जो उचित निर्णयों को लागू करने का साहस न करते हुए, लोगों को लुभाने वाली निर्णय लेती थी। बल्कि यह सरकार कठिनाईयों का सामना करते हुए देशहित में आने वाले निर्णयों को लागू करने में कभी पीछे नहीं हटती है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा देश भर में विधानसभा और लोकसभा के चुनाव को एक साथ कराये जाने के प्रस्ताव को भी उपरोक्त संदर्भ में देखा जाना चाहिये। हालंाकि यह कोई नया विचार नहीं है। इसे कई मौकों पर कई नेताओं ने उठाया है 1999 में न्यायाधीश बी. पी. जीवन रेड्डी के नेतृत्व में लॉ कमिशन ने देश के निर्वाचन व्यवस्था को सुधारने के लिये, देश भर में विधानसभा और लोकसभा चुनाव कराने के प्रस्ताव को अपनी 170वीं रिपोर्ट के माध्यम से लोगों के समक्ष रखा। देशभर में एक साथ चुनाव कराने से सभी लोग विधानसभा और लोकसभा के चुनाव के लिये एक ही दिन अपना मत डालने जायेंगे। यह चुनाव देश भर में कई भागों में होंगे।

1967 तक देश में विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ होते थे। लेकिन 1968 और 1969 में कुछ राज्यों में अचानक हुई कुछ घटनाओं के कारण यह व्यवस्था भंग हो गई। उसी प्रकार 1970 में भी लोकसभा का चुनाव भंग हो गया, जिससे 1971 में एक बार फिर चुनाव कराना पड़ा। उसके बाद संविधान की धारा 356 के तहत कई राज्यों की सरकारों को केन्द्र सरकार द्वारा भंग कर नया निर्वाचन किया गया जिससे एक साथ चुनाव की प्रथा टूट गई।

देश भर में एक साथ चुनाव न कराये जाने के परिणाम को नीति आयोग के बिबेक देबराय और किशोर देसाई के द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट बड़ी सुन्दर ढग़ से प्रस्तुत करती है, जिसके कुछ भाग इस लेख में विद्मान है।

पहला, चुनाव आयोग द्वारा आचार संहिता लगाये जाने के कारण राज्य की आर्थिक विकास और शासन ठप हो जाता है। आचार संहिता चुनाव में प्रयोग किया जाने वाला वह कानून है जिसे चुनाव के समय सभी राजनीतिक दल मानने के लिये बाध्य हो जाते है। जिस समय चुनाव आयोग द्वारा  चुनाव की घोषणा कर दी जाती है उसी समय से यह आचार संहिता चुनाव के खत्म हो जाने तक लागू कर दी जाती है। यदि राज्य में विधानसभा का चुनाव हो रहा है तो यह पूरे राज्य भर में लागू कर दी जाती है। इस आचार संहिता के लागू होने से विकास नीति, लोगों के हित से जुड़ी योजनाएं और अन्य कामकाज तब तक ठप्प रहते है जब  तक आचार संहिता उस क्षेत्र में कार्यरत रहता है।

संसदीय स्थायी कमिटी की 79वीं रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकला कि इस आचार संहिता के लागू होने से न केवल विकास और चुनावी राज्य वाली सरकार के कामकाज ठप हो द्यजाते हंै बल्कि  उस राज्य का छोटा से छोटा शासन पद्धति भी ठप हो जाता है। बार-बार चुनाव होने से बार-बार आचार संहिता लागू होती है, जो राज्य की शासन व्यवस्था को विध्वंस कर देती है।

देबराय और देसााई ने बताया है कि कैसे 2014 में देश के भिन्न-भिन्न स्थानों पर आचार संहिता लागू होने से लगातार 7 महीनों के लिये (लोक सभा चुनाव के लिए 3 महीने  पूरे देश भर में विधानसभा चुनाव के लिये दो-दो महीने झारखण्ड, जम्मू और कश्मीर, महाराष्ट्र और हरियाणा) देश का विकास  बाधित हो गया था। इसी प्रकार वर्ष 2015 में भी हुआ, जब बिहार और दिल्ली में तीन महीने के लिये आचार संहिता थोप दिया गया था।

औसतन आचार संहिता अभी देश में 2 माह के लिये होता है और देबराय और देसाई का मानना है कि आने वाले वर्षो में या 2021 तक यह चार माह का हो जायेगा। इसका मतलब आने वाले वर्षो में किसी भी प्रोजेक्ट का पूरा करने का एक तिहाई समय आचार संहिता के कारण ठप हो जाएगा।

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दूसरा, इस लागातार होने वाले चुनाव के कारण सरकार को अत्याधिक पैसे खर्च करने पड़ते है। प्रत्येक वर्ष केन्द्र और राज्य की सरकार को चुनावों के नियंत्रण के  खर्च सहन करने पड़ते है। सरकार को छोड़कर चुनाव लडऩे वाला उम्मीदवार और राजनीतिक दलों को भी काफी पैसे खर्च करने पड़ते हंै। जहां चुनाव लडऩे वाला उम्मीदवार अपना चुनावी खर्च  का लेखाजोखा उनके द्वारा की चुनावी प्रचार के आधार पर देते है, वही राजनीतिक दल अपना खर्च अपने प्रचारकों पर किये गये खर्च के आधार पर देती है।

जहां तक चुनावी खर्च की बात है तो लोकसभा चुनाव खत्म होने के पश्चात आने वाली सरकार देश भर में हुए चुनाव के खर्चे की जिम्मेदारी लेती है, इसी प्रकार से राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी होता है। यदि वर्तमान में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होते हैं तो सभी चुनावी खर्च केन्द्र और राज्य सरकार के द्वारा साझा किये जायेंगे। शुरूआती चुनाव खर्च को राज्य सरकार देगी और आडिट के पश्चात इसमें केन्द्र सरकार अपना सहयोग करेंगी।  चुनाव के कानून व्यवस्था में आने वाले खर्च को राज्य सरकार अकेले चुकायेगी, जबकि अन्य खर्चों में राज्य और केन्द्र की सरकार बराबर की साझेदारी करेगी।

जैसे-जैसे समय गुजर रहा है, चुनावी खर्च बढ़ते ही जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में कुल खर्च 1115 करोड़ का था, 2014 में वहीं चुनावी खर्च तीन गुना बढ़कर 3870 करोड़ हो गया। इस प्रकार की घटना विधानसभा चुनाव में हो रहा है।  2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में कुल 300 करोड़ का खर्च आया और अभी गुजरात में होने वाले चुनाव में 240 करोड़ रूपये खर्च होने की संभावना है। इस प्रकार देखा जाए तो यह लगातार होने वाला चुनाव देश के नागरिकों द्वारा सरकार को कर के रूप में दिये गये धन से खिलवाड़ है।  इस संदर्भ में देबराय और देसाई के आंकलन के अनुसार एक साथ चुनाव कराने से पूरा चुनावी खर्च 450024 करोड़ होगा। एक साथ चुनाव होने से चुनावी खर्च में भारी मात्रा में कमी आयेगी। एक साथ चुनावी खर्च से देश के करदाताओं के पैसे की बचत होगी। यह बचत राज्य और केन्द्र की सरकार देश के विकास कार्यों में लगा सकती है, जो देश के लोकतांत्रिक ढ़ाचे को मजबूत करेगा।

तीसरा, कानून व्यवस्था के संदर्भ में बार-बार होने वाले चुनाव के कुछ और भी विपरीत कारण है। उदाहरण के तौर पर 16वें लोकसभा के चुनाव में 9,30,000 बुथों पर लगभग 1 करोड़ सुरक्षा बलों को देखभाल के लिये लगाया गया था। आंकलन करने पर औसतन एक बूथ पर 10.75 सुरक्षा बल होते है। अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये चुनाव आयोग सामान्यत: केन्द्रीय पुलिस बल की मांग करता है, इसका कारण केन्द्रीय बलों के द्वारा साधारण पुलिस की अपेक्षा अधिक सुरक्षा प्रदान करना है। ये सुरक्षा बल चुनाव होने के कई दिन पूर्व से ही इसकी तैयारी आरम्भ कर देते हैं। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यदि यह एक साथ चुनाव होते हैं तो इन सुरक्षा बलों को एक ही बार इस प्रकार की तैयारी करनी पड़ेगी, जिससे ये अपना बचा समय देश के सुरक्षा के कार्यो में लगा पायेंगे।

चौथा, एक साथ चुनाव न होने से और भी कुछ बूरे परिणाम  है, लगातार चुनाव होने से लोगों के सामान्य जीवन में भी कई प्रकार की कठिनाईयां आती हैं। संसदीय कमिटी की एक रिपोर्ट के अनुसार बार-बार चुनाव होने से आम जन मानस के दैनिक जीवन में विभिन्न प्रकार की कठिनाईयां आती हैं। उदाहरण के तौर पर  राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों द्वारा बार-बार रैलियां की जाती है, जिससे आम लोगों का कार्य बाधित होता है। अत: यदि एक ही बार सभी चुनाव कराये जाते हंै तो आम नागरिकों को इस प्रकार की कठिनाईयों का सामना लगातार नहीं करना पड़ेगा।

पूर्व चुनाव आयुक्त डॉ. एस. वाई. कुरैशी के अनुसार इस बार-बार चुनाव से राजनीतिक दलों के द्वारा जातिगत, सांप्रादायिक और भ्रष्टाचार जैसे मामले को सबसे अधिक हवा मिलती है। इस संदर्भ में यदि एक साथ चुनाव होते हैं तो इस प्रकार की सामाजिक बुराईयों पर लगाम लगेगी। अत: एक साथ चुनाव  इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। हालांकि भाजपा को छोड़कर कांग्रेस, तृणमूल, लेफ्ट, एनसीपी और मजलिस-ए-ईतेहदूल जैसे अन्य दल इस एक साथ चुनाव कराने के संदर्भ में संविधान का हवाला देते हुए इस पर प्रश्न खड़ा करते हैं।

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पहला, इस एक साथ चुनाव कराने को विपक्ष सत्ताधारी दल की मनसा पर प्रश्न खड़ा करते हुए, इसे एक राजनीतिक चाल बताती है। विपक्ष का कहना है कि एक साथ चुनाव होने से आम मतदाता राज्य स्तरीय चुनाव में भी देश पर आधारित मुद्दों से प्रेरित होकर विधानसभा चुनाव में भी केन्द्रीय मुद्दों पर अपना मत देगा, जिससे राज्यों के चुनावों में भी केन्द्रीय दल ही अधिक से अधिक विजयी होंगे और राज्य स्तर के राजनीतिक दल धीरे-धीरे विलुप्त हो जायेंगे। इन राजनीतिक दलों का मानना है कि यह देश के लोकतंत्र के लिये एक खतरा होगा।

दूसरा तर्क यह है कि आखिर किस प्रकार इस एक साथ चुनाव कराने के लिये देश के विभिन्न लोकसभा क्षेत्रों और विधानसभाओं को भंग किया जा सकता है? क्या एक साथ चुनाव कराने के लिये विभिन्न राज्यों के कार्यकाल को बढ़ाया या घटाया जाना संभव है?  यदि एक साथ चुनाव होते हैं तो उन राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार का क्या होगा जो भारी बहुमत से जीतकर अपनी सरकार बनायी हुई है? क्या चुनाव आयोग एक साथ चुनाव कराने के लिये सुरक्षा, मानव संसाधन और अन्य आवश्यक रूपों से तैयार है?

डॉ. एस. वाई. कुरैशी के अनुसार हर पांच वर्षों में एक बार चुनाव होने से सरकारे भी अपना कार्य अच्छे ढ़ंग से करेंगी और राजनीतिक उम्मीदवार भी अपने कार्यो को भूमिगत रूप से करेंगे, जिससे आर्थिक रूप से आम लागों के जीवन में प्रगति आयेगी और नौकरियों के बढऩे के आसार भी काफी अधिक होंगे। जैसा कि देसाई और देबराय अपना तर्क देते हैं कि कोई भी उम्मीदवार हमेशा के लिये चुनकर नहीं आता, उसे प्रत्येक पांच वर्षो के पश्चात चुनाव में जाना ही पड़ता है। एक साथ चुनाव होने से सभी सरकारों का भी दायित्व बढ़ जाता है। कु रैशी द्वारा दिया गया तर्क कि एक साथ चुनाव  आर्थिक सुधार होने के साथ-साथ देश भर में नौकरी बढ़ाने में सहायक होगा, यह देश के आर्थिक हालात पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्तमान चुनाव आयुक्त ने इसका देशभर में क्रियान्वयन करने के बारे में विस्तृत रूप से बताया है। देश के वर्तमान चुनाव आयूक्त ओ पी रावत ने कहा है कि चुनाव आयोग एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में हमेशा से रहा है। एक साथ चुनाव कराने से देश में बार-बार आचार संहिता न लगने के कारण सरकार अपने कार्यो और योजनाओं पर सही ढ़ंग से करती है, जो लोगों के लिये लाभदायक होता है। लेकिन देश में एक साथ चुनाव कराने के लिये चुनाव आयोग अभी पूर्ण रूप से तैयार नहीं है।

रावत द्वारा दिया गया दूसरा वक्तव्य एक साथ चुनाव कराने के संदर्भ में थोड़ा कठिन प्रतीत होता है। क्योंकि वह जो तर्क दे रहे हैं, उसके लिये देश भर की राजनीतिक दलों की वैचारिक गठजोड़ की आवश्यकता होगी। एक साथ चुनाव कराने के लिये कानून में कुछ बदलाव करने पड़ेंगे, क्योंकि देश के कुछ विधानसभा के चुनाव 2018 के पहले होंगे तो कुछ 2021 में। इसका मतलब 2019 के लोकसभा चुनाव के साथ देश की अधिकतम विधानसभा के चुनाव नहीं होंगे। इसी संदर्भ में देबराय और देशाई ने अपना सुझाव देते हुए कहा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में 2018 में होने वाले विधानसभा के चुनावों को करा देना चाहिए, जिससे देश के आधे क्षेत्र का चुनाव एक साथ हो जायेगा। बाकि बचे आधे क्षेत्र के लिये 2021 में ढ़ाई वर्षों के पश्चात चुनाव करा दिया जायेगा। लेकिन देश में हर ढ़ाई वर्षो के बाद चुनाव कराने का निर्णय हम सभी को सोचने पर विवश करता है।

मेरे विचार से देश में एक साथ चुनाव कराने के लिये देश के कानून में बड़े बदलाव की आवश्यकता है। कानून में इस प्रकार के बदलाव करने की आवश्यकता है कि यदि किसी राज्य की सरकार किसी कारण भंग भी हो जाएं तो उसका कार्यकाल निश्चित हो तथा केन्द्र सरकार यह भी सुनिश्चत करे कि उस राज्य में राज्य सरकार के विरूद्ध में तब तक अविश्वास मत पारित न हो, जब तक किसी नये सरकार का विकल्प न आ जाएं। इसके लिये अनुच्छेद 365 को भंग करना पड़ेगा और इन सभी कार्यों को करने के लिये एक बड़े राजनीतिक गठजोड़ की आवश्यकता पड़ेगी, जो मेरी नजर में भविष्य में संभव नहीं दिखता है। मुझे ढ़ाई वर्ष के कार्यकाल वाले चुनाव से भी समस्या है, क्योंकि इससे कोई भी सरकार अपना कार्य सही ढग़ से नहीं कर पायेगी। दूसरी ओर देश में प्रत्येक 30 माह के बाद चुनाव हो, यह बिल्कुल बकवास है। पिछले तीस वर्षो में ऐसा कोई वर्ष नहीं रहा है, जिसमें चुनाव न हुए हो। बार-बार चुनाव होने से सरकार अपना कार्य सही ढंग से नहीं कर पाती है। मेरे विचार में यह बार-बार होने वाला चुनाव न केवल भ्रष्टाचार को जन्म देता है बल्कि इससे काले धन को भी अधिक बढ़ावा मिलता है। यदि सरकार के खर्चों को  भुला दिया जाएं तो राजनीतिक दलों के उम्मीदवार चुनाव आयोग के द्वारा निर्धारित राशि से अधिक पैसों का खर्च करते हैं। पूर्व चुनाव आयुक्त डॉ. एस. वाई. कुरैशी बिल्कुल सही हैं, जब वह कहते हैं कि यह बार-बार होने वाला चुनाव ही इस देश में भ्रष्टाचार को अधिक बढ़ावा देता रहा है। चुनाव जीतने के पश्चात नेता और नौकरशाह आपस में गठजोड़ कर निवेश के माध्यम से खूब पैसा बनाते है और यही से भ्रष्टाचार पनपता है। इसे स्पष्ट होता है कि एक साथ चुनाव कराना हमारे देश के हित में है और यदि इसे सही ढ़ंग से लागू किया जाता है तो इससे देश के चुनावी खर्चे में भी कमी आयेगी।

(prakash.nanda@hotmail.com)

प्रकाश नंदा

 

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