देश एक चुनाव एक

देश एक चुनाव एक

पिछले साल के मई महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के समृद्धि, सामाजिक व आर्थिक विकास के लिए, कम समय लगने के साथ-साथ, कम मेहनत में ज्यादा काम होने के साथ-साथ और भी बहुत सारे फायदों के लिए भी लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने का एक प्रस्ताव रखा था। भारत में हम लोग त्रिस्तरीय लोकतंत्र के चुनाव के रुप में देखते हैं, जिसमें एक जिला स्तरीय एक राजकीय स्तरीय तो एक राष्ट्र स्तरीय। हमारे देश में एक भी साल ऐसा नहीं होता है जब उस साल कहीं न कहीं चुनाव न हुआ हो। अब वो समय आ गया है कि देश में चली आ रही चुनाव के परांपरिक पद्धति में पूरी तरह नई नजरिए के साथ एक नई चुनाव पद्धति लागू किया जाए जिससे की देश को आर्थिक फायदे के साथ-साथ कानून व्यवस्था के तहत साफ-सुथरा चुनाव कराने में भी मदद मिलेगी।

एक बार फिर से  एक राष्ट्र-एक चुनाव पर बयानबाजी  तेज हो गई है।  क्या अगले लोकसभा आम चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव भी कराए जाएंगे? चुनाव  आयोग का काम चुनावी प्रक्रिया और उसकी तैयारियों का है। इसके लिए कानून में बदलाव और इससे जुड़ी बातें तो संसद को ही  तय करनी  है, ऐसे में एक  बात यह भी ध्यान देने  वाली है कि क्या सरकार अपने हिस्से में आने वाली जिम्मेदारियों को लेकर उतनी ही मुस्तैद है, जितना कि चुनाव आयोग। चुनाव आयोग का कहना  है कि वह साल भर के अंदर  इस स्थिति में हो जायेगी  कि देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाई जा सके। चुनाव  आयोग के इस बयान से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस अभियान को बल मिला है, जिसमें उन्होंने कई बार कहा है कि हमें रोज-रोज चुनाव के चक्कर से बचने के लिए ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिसमें  कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाई जा सके। इस पर  कई मंत्रालयों से राय सुझाव भी मांगी गई थी,तो वे भी इसके समर्थन में खुलकर सामने आए थे तो वहीं कुछ नागरिक संगठन तो दशकों से यह मांग करते रहे हैं, लेकिन उनकी बात को  अनसुनी ही की जाती रही है। अब उन्हें भी इसके प्रति उम्मीद बंधती नजर आ रही है। राजस्थान के पूर्व  मुख्यमंत्री और भारत के उपराष्ट्रपति रहे दिवंगत भैरोसिंह शेखावत ने भी उपराष्ट्रपति रहते हुए कई  बार लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाने की एक प्रकार से इस मुहिम की  शुरूआत  की थी और उस समय इस पर बहस भी शुरू हो गई थी। उपप्रधानमंत्री रहते हुए लालकृष्ण आडवाणी ने भी इसका खुलकर समर्थन किया था। उस समय स्व. शेखावत की इस   मुहिम को बल मिला था और अनेक गैर सरकारी संगठनों ने भी उनकी इस बात का दिल खोल कर इसका समर्थन किया था। भैरोसिंह  शेखावत के मृत्यु के बाद इस पर बहस थोड़े समय के लिए बंद हो गई थी, पर अब एक बार फिर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इससे सम्बंधित बयान के बाद इस बहस ने एक बार फिर से जोर पकड़ लिया है। देश की  आजादी के बाद 1952 से 1967 तक केंद्र और राज्यों में कांग्रेस एक बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में  स्थापित थी। इसी कारण  केंद्र और राज्यों के  चुनाव एक साथ होते थे। इसके बाद 1967 में जब दूसरे राजनीतिक संघठन सत्ता में आये  और मिली-जुली सरकारे बनाने की चलन की शुरुआत हुयी तो उनके सामने एक बड़ी चुनौती यह थी कि कैसे वे लगातार पांच साल तक सत्ता में बने रह सके? पिछले पांच दशको यानी कि 50 सालों में हमने देखा है  कि केंद्र और राज्यों की कई सरकारें अपना कार्यकाल पूरा भी नहीं कर पायी  और समय से पहले ही भंग हो गई।

केंद्र में भी अस्सी के दशक में कई सरकारें बनी और जल्द ही गिर भी गई। अल्पमत वाली सरकारें भी केंद्र में बनी पर अल्पमत में होने के कारण जल्द ही गिर भी गई। कोई सरकार एक डेढ़ साल  चली तो एक सरकार तो 13 दिन में ही गिर गई थी। 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मृत्यु  के बाद हुए आम चुनाव में उनके छोटे  पुत्र स्व. राजीव गांधी को दो तिहाई से ज्यादा सीटें उस समय  मिली और स्पष्ट बहुमत मिला। लेकिन 1989 के बाद पिछले 30  सालों  तक केंद्र में किसी भी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और गठबंधन सरकारें ही बनती रहीं । 2014 के आम चुनाव  में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लड़े गए लोकसभा के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को पहली बार लोकसभा में स्पष्ट बहुमत मिला। अब प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने की बात कही है।  देश में एक साथ लोकसभा और विधानसभा के चुनावों को एक साथ कराने के मुद्दे पर इसके पक्षधरों और विरोधियों के अपने-अपने तर्क हैं, जहां इसके समर्थक कहते हैं कि इससे चुनाव कराने के खर्च में करीब-करीब 50 फीसदी तक की कमी आ सकती है, वहीं देश में विकास को और भी ज्यादा रफ्तार मिल सकेगी। वर्तमान समय में  देश के किसी न किसी हिस्से में चुनाव हमेशा होते रहते हैं। ऐसे में सांसदों और विधायकों का ध्यान अपने कार्य या क्षेत्र से हटकर चुनावों की ओर ही ज्यादा रहता है। चुनावों के चलते आचार संहिता लागू होने से भी विकास के कार्यों को  बाधित होने की भी संभावना पूरी की पूरी बानी रहती है। वहीं इस व्यवस्था के विरोधियों का तर्क यह भी  है कि उम्मीद कुछ ज्यादा ही  होगी, इससे लोकतंत्र हमारे देश में कमजोर हो जाएगी। जहां पर राष्ट्रपति शासन होगा, वहां तो चुनाव कब होना  चाहिए, इसका फैसला केंद्र सरकार पर निर्भर होगा, लेकिन जिस राज्य  में कोई सरकार बहुमत के साथ शासन चला रही हो और उसका कार्यकाल छह माह से ज्यादा बाकी हो तो  वहां पर संवैधानिक समस्या पैदा हो सकती है, जिससे निपटना आसान नहीं होगा। मान लिया जाए  कि  सारे देश में एक साथ लोकसभा और विधानसभा के चुनाव करा दिए जाएंगे, लेकिन यदि किसी राज्य में किसी भी दल या गठबंधन को बहुमत नहीं मिला या साल दो साल बाद वहां दोबारा चुनाव कराने की नौबत आ पड़ी तो उस स्थिति से  कैसे निपटा जा सकता है ।

कोई भी दल या गठबंधन जब जानादेश लेकर पांच साल के लिए सत्ता में आया हो तो आप उससे पहले चुनाव कराने के लिए कैसे कह सकते हैं। सीधी सी बात है, ऐसे में लोकसभा-विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का समर्थन करने वालों के सामने राजनीतिक चुनौती तो होगी ही साथ ही साथ संवैधानिक पेचों से भी उसे निपटना होगा। लोकसभा और विधानसभा दोनों सदनों के लिए यदि एक साथ चुनाव हुए तो क्षेत्रीय दलों के सामने एक साथ समस्या खड़ा हो सकती है। किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों को वोट दे दिया तो उनके अस्तित्व के लिए खतरा पैदा तो  हो ही सकता है। हमारे देश में जितने भी राजनीतिक दल हैं, मुख्य रूप से विचारधारा, क्षेत्र और भाषा पर आधारित हैं। सिर्फ दो दलों भाजपा और कांग्रेस को ही हम राष्ट्रीय दल कह सकते हैं, क्योंकि बाकी सभी दल किसी न किसी प्रदेश या एक सीमा तक ही सीमित हैं। ऐसे में एक साथ चुनाव कराने के समर्थकों के लिए इन छोटे और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को अपने पक्ष में करना बहुत ही ज्यादा कठिन कार्य  है।

एक साथ चुनाव कराने का यह दायरा यदि  पंचायतों और नगर पालिकाओं तक बढ़ा दिया जाए तो यह और भी ज्यादा व्यापक हो जाएगा। जहां तक बात इसके फायदे की है तो निश्चित तौर पर अर्थव्यवस्था पर खर्च का बोझ तो  कम होगा ही साथ में  राजनीतिक दलों को भी एक बार में ही चुनाव प्रचार में खर्च करना होगा। साथ ही साथ  चुनाव के समय  बार-बार लगने वाली आचार संहिता के कारण विकास कार्यों में होने वाले अवरोधों से भी बचा जा सकता है। वहीं राज्यों के लिए लोक लुभावन वादों के ऐलान से चुनाव को प्रभावित करने के आरोपों से भी केंद्र सरकार अपने आपको बचाने में कामयाब हो सकेगी। यहां यह उल्लेखनीय है कि विधि आयोग ने अपनी 1999 में दी गई 170 वीं रिपोर्ट में व्यापक राजनीतिक, संस्थागत और चुनावी सुधार के लिए एक साथ चुनाव कराने की सलाह दी थी, अब समय आ गया है कि इस  पर भी काम किया जाए। साथ ही चुनावी चंदा और दलीय राजनीति के तौर तरीकों पर ईमानदारी से काम करने की भी  आवश्यकता है।  इसको  अमलीजामा पहनाने पर भाजपा को तात्कालिक फायदा जरूर से जरूर मिलेगा। कांग्रेस का इस मामले में विरोध इस कारण  भी है कि उसको तैयारी के लिए और वक्त चाहिए। लोकतंत्र में बदलाव की एक धीमी सी  प्रक्रिया होती  है।

ताकि हम  परेशानियों से बच सकें। तो वहीं तेज बदलाव हमेशा ही समस्याएं ही समस्याएं  पैदा करती हैं । इससे  बेहतर यही  होगा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बदलाव के लिए भी धीरे-धीरे कदम उठाया जाए । वैसे एक साथ चुनाव थोड़ी बहुत परेशानियों के बावजूद लाभदायक ही साबित हो सकता है। इसके लिए सभी दलों को इस मसले पर गंभीरता से आपसी सहमति दिखानी होगी। यह तो  आने वाला समय ही बताएगा कि आम सहमति कब तक बनती भी है या नहीं भी।

विशेषज्ञ अनुच्छेद 83 (संसद का कार्यकाल), 85 (संसदीय सत्र को स्थगित करना और खत्म करना), 172 (विधानसभा का कार्यकाल) और 174 (विधानसभा सत्र का स्थगत करना और खत्म करना) में संविधान संशोधन करने का सुझाव देते हैं ताकि प्रक्रिया को पटरी पर लायी  जा सके। किन्तु विशेषज्ञों का मानना है कि इसके लिए संविधान में संशोधन करने से ज्यादा सियासी इच्छाशक्ति की जरूरत है। इसके लिए खुद सरकार की ओर से  भी पहल की जा सकती है, जैसे कि बीजेपी शासित प्रदेशों  में एक साथ चुनाव कराना। इस साल के जून में जब विधि मंत्रालय ने अपनी राय जाहिर की थी तो चुनाव आयोग ने भी केंद्र और राज्यों  के चुनावों को साथ-साथ कराए जाने के विचार का समर्थन किया था। 2012 से 2015 के बीच चुनाव आयोग के अध्यक्ष रह चुके वीरावल्ली सुंदरम संपत का भी मानना है कि एक साथ चुनाव कराने का विचार तो अच्छा है, लेकिन यह तर्कसंगत नहीं है। उनका सुझाव है कि यह ज्यादा अच्छा होगा, ”अगर एक ही साल में होने वाले सभी विधानसभा चुनावों को साल के एक-चौथाई हिस्से में कराया जा सके ताकि बाकी के तीन हिस्से चुनाव से मुक्त हों।“ सुंदरम संपत को यह  भी लगता है कि इससे एक ही राजनैतिक दल, जैसे बीजेपी शासित राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव में उतरना आसान रहेगा।

निलाभ कृष्णा

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.