स्वामी चिदानंद सरस्वती: धर्म का नया क्षितिज

स्वामी चिदानंद सरस्वती:  धर्म का नया क्षितिज

भारतीय संस्कृति का कण-कण आध्यात्मिक संतपुरुषों के अवदानों से अभिसिंचित है और महक रहा है। अपने प्रेरक एवं त्यागमय जीवन से लोकजीवन को ऊंचा उठाने का हिमालयी प्रयत्न इन महापुरुषों ने किया है। ऐसे ही एक महान आध्यात्मिक गुरु, कीर्तिधर ऋषि, आध्यात्मिक राजदूत एवं महान साहित्यकार हैं स्वामी चिदानंद सरस्वती। उनके जीवन का एक ही उद्देश्य है ”मानवता और ईश्वर की सेवा”। मानवता और ईश्वर की सेवा करने के लिए बहुत ही कम उम्र में उन्होंने अपना घर त्याग दिया था। उन्होंने हिमालय पर ही अपनी युवावस्था बितायी और वहीं गहन मौन, ध्यान और तपस्या की। नौ वर्ष के अखंडित साधना और मौन के बाद 17 वर्ष की आयु में वे वापस आए और अपने गुरु के कहने पर उन्हीं के समान अकादमिक शिक्षा प्राप्त की। आध्यात्मिकता के साथ-साथ शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, गंगा शुद्धि अभियान, जीवन में नैतिकता, राष्ट्र में आदर्श मूल्यों की स्थापना, साहित्य सृजन, अंतर्राष्ट्रीय जगत में हिन्दू धर्म की प्रतिष्ठा, स्वच्छता अभियान, शौचालय निर्माण, शुद्ध जल के प्रति जागरूकता- वस्तुत: इन सबसे अनुस्यूत स्वामी चिदानंद सरस्वती की जीवन गाथा आश्चर्यों की वर्णमाला से आलेखित एवं गुथित एक कालजयी अभिलेख है। उसे पढ़कर मनुष्य नये उच्छवास, नयी प्रेरणा और नई प्रकाश शक्ति का अनुभव करता है।

कुछ व्यक्ति जीवन मे पूर्वाद्र्ध में उदित होते हैं, उत्तराद्र्ध में निस्तेज हो जाते हैं। कुछ व्यक्ति जीवन के पूर्वाद्र्ध में निस्तेज रहते हैं और उत्तराद्र्ध में उदित हो जाते हैं। कुछ व्यक्ति जीवन के पूर्वाद्र्ध में भी निस्तेज रहते हैं और उत्तराद्र्ध में भी निस्तेज होते हैं। किन्तु कुछ व्यक्ति जीवन के पूर्वाद्र्ध में भी उदित होते हैं और उत्तराद्र्ध में भी उदित होते हैं। स्वामी चिदानंद सरस्वती का व्यक्तित्व इसी कोटि का है। मैंने देखा-स्वामीजी का जीवन उत्तरोत्तर उदित होता रहा है। प्रारंभ से अब तक का जीवन विलक्षण से भी विलक्षण रहा है। उनकी चेतना उदात्त होती गई और विलक्षणता बढ़ती गई है। पुरुषार्थ की इतिहास परम्परा में इतने बड़े पुरुषार्थी पुरुष का उदाहरण कम ही है जो अपनी सुख-सुविधाओं को गौण कर मानव कल्याण के लिए जीवन जी रहा है। उनका जन्म और जीवन दोनों विशिष्ट अर्हताओं से जुड़ा दर्शन है जिसे जब भी पढ़ेंगे, सुनेंगे, देखेंगे, कहेंगे, लिखेंगे और समझेंगे तब यह प्रशस्ति नहीं, प्रेरणा और पूजा का मुकाम दिखाई देगा। आपका भविष्य मानवता के अभ्युदय का उजला भविष्य है। इससे जुड़ी है मानवीय एकता, सार्वभौम अहिंसा, विश्व मानवता, पर्यावरण जागृति, सर्वधर्म सद्भाव, गंगा शुद्धि एवं भारतीय संस्कृति की चेतना।

विश्व का हर कण शक्ति का अक्षय भंडार है और असीम स्रोत है। विश्व का दीप वह बनता है जो इस सत्य को अभिव्यक्ति देता है और दूसरों में अनुभूति की क्षमता जागृत करता है। हर युग हजारों संभावनाओं को लिए हुए हमारे सामने प्रस्तुत होता है। युग का नेतृत्व वह करता है जो उन संभावनाओं को वर्तमान का परिधान दे पाता है। वर्तमान युग संघर्षों का युग है। आज का प्रबुद्ध मनुष्य प्राचीन मूल्यों के प्रति आस्थावान होकर नए मूल्यों की स्थापना के लिए कृत-संकल्प है। युग का प्रधान वही हो सकता है जो इस संकल्प की पूर्ति में योग दे सकता है। स्वामी चिदानंद सरस्वती विश्वदीप हैं, युग नेतृत्व के सक्षम आधार हैं एवं नये धर्म के प्रवत्र्तक हैं।

स्वामी चिदानंद सरस्वती आध्यात्मिक जगत के विशुद्ध नेता हैं। उन्होंने भौतिकता के वातावरण में अध्यात्म की लौ जलाकर उसे तेजस्वी बनाने का उल्लेखनीय उपक्रम किया है। उनकी दृष्टि में अपने लिए अपने द्वारा अपना नियंत्रण अध्यात्म है। उन्होंने अध्यात्म साधना को परलोक से न जोड़कर जीवन से जोडऩे की बात कही है। यही कारण है कि उनका जीवन आध्यात्मिकता के साथ-साथ अनेक रचनात्मक एवं सृजनात्मक जीवनापयोगी कार्यक्रमों से जुड़ा हुआ है। विलक्षण जीवन और विलक्षण कार्यों के माध्यम से उन्होंने अध्यात्म को एक नई पहचान दी है। वे कई मानवीय और पर्यावरण संगठनों के संस्थापक या सह-संस्थापक हैं जो व्यक्ति, समाज, राष्ट्र की सेवा में तत्पर हैं, जिनमें शामिल हैं- गंगा एक्शन परिवार जो गंगा नदी और इसकी सहायक नदियों को संरक्षित और सुरक्षित करने के लिए प्रयासरत हैं। वे अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से जुड़े हुए हैं जिनमें भारत हेरिटेज रिसर्च फाउंडेशन (आईएचआरएफ) प्रमुख हैं, जो शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, युवा कल्याण, और व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करता है। दिव्य शक्ति फाउंडेशन भी एक है जो विधवा और गरीब महिलाओं और बच्चों को शिक्षा और सहायता प्रदान करता है, साथ ही भारत में गलियों में आवारा घूमने वाले जानवरों की रक्षा करता है, जिनमें गाय और कुत्ते प्रमुख हैं। ग्लोबल इंटरफेथ वाश एलायंस (जीआईडब्ल्यूए) के द्वारा सुरक्षित पीने के पानी और उचित स्वच्छता की उपलब्धता प्रदान की जाती है। यही संगठन अपने विविध प्रोजेक्ट के माध्यम से लंबी अवधि के पुनर्वास के लिए आपदा के समय में विभिन्न मानवतावादी और पर्यावरण संगठनों को एक साथ लाता है। इसके माध्यम से इंटरफेथ वार्ताएं आयोजित होती हैं और एलियास इंटरफेथ संस्थान के लिए विश्व धार्मिक संगठनों को जोड़ता है। इन सब गतिविधियों में स्वामी चिदानंद सरस्वती की सक्रिय सहभागिता उन्हें विश्व धर्मगुरु के रूप में प्रतिष्ठापित करती है। क्योंकि आपकी करुणा में सबके साथ सहअस्तित्व का भाव है, विकास की यात्रा में सबके अभ्युदय की अभीप्सा है और आपका जीवन मानवीय मूल्यों का सुरक्षा प्रहरी है।

स्वामी चिदानंद सरस्वती परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष एवं आध्यात्मिक मुखिया हैं। इसकी स्थापना 1942 में सन्त सुकदेवानन्द जी महाराज (1901-1965) ने की थी। ऋषिकेश में स्थित यह आश्रम हिमालय की गोद में गंगा के किनारे स्थित है। यह ऋषिकेश का सबसे बड़ा आश्रम है। इसमें 1000 से भी अधिक कक्ष हैं। आश्रम में प्रतिदिन प्रभात की सामूहिक पूजा, योग एवं ध्यान, सत्संग, व्याख्यान, कीर्तन, सूर्यास्त के समय गंगा-आरती आदि होते हैं। इसके अलावा प्राकृतिक चिकित्सा, आयुर्वेद चिकित्सा एवं आयुर्वेद प्रशिक्षण आदि भी दिए जाते हैं। आश्रम में भगवान शिव की 14 फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित है। आश्रम के प्रांगण में ‘कल्पवृक्षÓ भी है जिसे ‘हिमालय वाहिनीÓ के विजयपाल बघेल ने रोपा था। यह आश्रम विश्व धर्म एवं अध्यात्म का अनूठा संगम स्थल है। जिसमें हर दिन आध्यात्मिक समागम लगा रहता है जिनमें देश और दुनिया के प्रतिष्ठित संत, विभिन्न धर्मो के धर्मगुरू, केन्द्र सरकार के मंत्री, फिल्मी सितारे, हास्य कलाकार, यूएनओ के प्रतिनिधि, यूनिसेफ के वरिष्ठ अधिकारी, पर्यावरणविद्, वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ, उद्योगपति, समाजसेवी, शिक्षाविद् एवं शोध छात्र सहभागी बनते हैं। स्वामीजी की दिव्य प्रेरणा और नेतृत्व के कारण यह आश्रम दुनिया के लोगों के लिए एक आध्यात्मिक अभ्यारण्य बन गया है, जहां कृपा, सौंदर्य, शांति और सच्चे दिव्य आनंद का अनुभव किया जा सकता है। यह एक आध्यात्मिक स्वर्ग है, जो एक नये जीवन का अनुभव देता है।

स्वामी चिदानंद सरस्वती पिट्सबर्ग में हिंदू जैन मंदिर के संस्थापक और आध्यात्मिक प्रमुख भी हैं। विश्व की आध्यात्मिक शक्तियों को संगठित करने की दृष्टि से स्वामीजी के प्रयत्न उल्लेखनीय हैं। अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित स्वामीजी को ब्रिटिश पार्लियामेंट के हाउस आफ लार्डस में एनआरआइ इंस्टीट्यूट ने आपको विशेष सम्मान प्राइड ऑफ इंडिया अवार्ड- 2017 से सम्मानित किया गया। इसके अलावा कैलिफोर्निया-अमेरिका के भक्ति फेस्ट के संस्थापक श्रीधर ने आपको मानवतावादी ‘कर्मयोग’ पुरस्कार से सम्मानित किया।

स्वामी चिदानंद सरस्वती की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है- हिन्दू धर्म का विश्वकोश यानी एनसाइक्लोपीडिया ऑफ हिन्दूज्म। सन् 2012 में 11 खण्डों में प्रकाशित हिन्दू धर्म एवं उससे संबंधित अनेकानेक विषयों का विश्वकोश हैं। यह विश्वकोश 7184 पृष्ठों में हैं जिसमें मन्दिरों, धार्मिक स्थानों, विचारकों, कर्मकाण्डों एवं त्यौहारों का विवरण रंगीन चित्रों के साथ दिया हुआ है। यह ग्रंथ स्वामीजी की प्रेरणा एवं सतत पुरुषार्थ से 25 वर्षों तक 2000 से अधिक विद्वानों के योगदान से निर्मित हुआ है। यह विश्वकोश केवल हिन्दू धर्म तक ही सीमित नहीं है बल्कि भारतीय कला, इतिहास, भाषा, साहित्य, दर्शन, राजनीति, विज्ञान तथा नारी विषयों को भी इसमें स्थान दिया गया है।

स्वामी चिदानंद सरस्वती के जीवन पर प्रकाशित पुस्तक गॉड्स ग्रेस को दुनिया के नंबर एक पुस्तक विक्रेता अमेजन डाट कॉम ने हिंदू धर्म पर आधारित 17 हजार पुस्तकों में नंबर एक का दर्जा दिया है। अन्य वर्ग की पुस्तकों में भी यह पुस्तक शीर्ष सौ में शामिल हैं। अधिकृत तौर पर यह पुस्तक अब नंबर एक बेस्टसेलर हो गई है।  गॉड्स ग्रेस हाल ही में अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित पब्लिशिंग कंपनी मंडला पब्लिशिंग द्वारा प्रकाशित और लोकार्पित की गई है। 300 पृष्ठ की इस पुस्तक की प्रस्तावना दलाई लामा ने लिखी है। इस पुस्तक में स्वामीजी के भारत के जंगलों में साधना करते हुए बीते बचपन से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ के पोडियम तक पहुंचने की यात्रा का वर्णन है।

स्वामी चिदानंद सरस्वती भारतीय संस्कृति के मूर्तरूप एवं जीवंत आदर्श हैं। उनका मानना है कि जिस राष्ट्र ने अपनी संस्कृति को भूला दिया, वह राष्ट्र वास्तव में एक जीवित और जागृत राष्ट्र नहीं हो सकता। उनकी दृष्टि में भारतीय संस्कृति का अर्थ है- ऊंची संस्कृति, त्याग की संस्कृति और अध्यात्म की संस्कृति। वे भारत की इस विराट संस्कृति से दुनिया को अवगत कराने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। विश्व आध्यात्मिक धर्मगुरु के रूप में वे विभिन्न आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शक्तियों को संगठित करने के लिए भी प्रयासरत हैं। वे व्यष्टि और समष्टि को त्राण और प्राण देने में समर्थ हैं।

 

ललित गर्ग

 

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