मिट्टी चिकित्सा

मिट्टी चिकित्सा

मिट्टी ऐसा सर्वसुलभ साधन है, जिसका उपयोग कर जीव-जन्तु, पौधे आदि जैविक पदार्थ जीवनी शक्ति प्राप्त करते हैं। मनुष्य, पशु और वनस्पती जगत का अस्तित्व मिट्टी में ही सन्निहित है। हमारे शरीर का सृजन जिन पांच महातत्वों से हुआ है, उनमें मिट्टी का स्थान सर्वोपरि है। हमारे स्थूल शरीर के निर्माण में पृथ्वी तत्व की प्रधान भूमिका है, इसलिये शारीरिक रोगों में वैज्ञानिकों ने मिट्टी का प्रयोग विशेष लाभदायक माना है। जीवन से सम्बन्धित सभी प्रकार से खाद्य तथा भौतिक संसाधन का उद्गम स्त्रोत तो मिट्टी ही है।

मिट्टी के रोगाणुनाशक गुणों के संदर्भ में विश्व के महान वैज्ञानिक डॉ. शेल्मन ए. वाक्समैन ने अपनी प्रयोगशाला में खोज की कि मिट्टी में असंख्य जीव होते हैं जो कभी बैक्ट्रियां तो कभी फफूंदी जैसा आचरण करते हैं। इन प्रतिरक्षी जीवों को ‘एक्टिनोमासिटेस’ कहतें हैं, सोंधी-सोंधी गन्ध इन्हीं जीवों की कुछ जातियों से उन्होंने ‘स्ट्रेपटामाइसिन’ तथा ‘नियोमाइसिन’ औषधियों की खोज की। इसी खोज पर उन्हें नोबल पुरस्कार मिला। ‘प्रिन्सिपल्स ऑफ सॉयल माइक्रो-बायलौजी’ के लेखक डॉ. वाक्समैन 1932 ई. में अपने प्रयोग के दौरान यह देखकर दंग रह गये कि क्षय रोग के कीटाणुओं को मिट्टी में दबा देने से वे पूर्णरूपेण समाप्त हो जाते हैं। तभी उन्होंने घोषणा की कि विश्व की महानतम औषधि मिट्टी ही है। उन्हीं के शब्दों में, ‘हमने दस हजार मिट्टी के माइक्रोबों को अलग कर उनकी आश्चर्यजनक रोगाणुसंहार क्षमता की खोज की। उनमें दस प्रतिशत माइक्रोबों में रोगाणुसंहार की अद्भुत प्रबल क्षमता है।‘ मिट्टी में यक्ष्मा के कीटाणुओं के संहार करने की अद्वितीय क्षमता की जानकारी वैदिक कालीन ऋषियों को भी मिली थी। इस संबंध में अथर्ववेद कहता है-

उपस्थास्ते अनमीवा अयक्ष्मा सन्तु पृथिवी प्रसूता:

दीर्घम न आयु प्रतिबुध्यनामा वयं तुभ्यं बलिहृत स्याम।।

अर्थात स्वास्थ्य सम्वद्र्धन तथा रोग-निवारक गुणों से सम्पन्न हे मां काश्यपि, तुम्हारी स्वास्थ्यदायिनी गोद हमें राजरोग यक्ष्मा से निवृत्त करें तथा अन्य शारीरिक और मानसिक रोग और यातनाओं से मुक्ति दिलाकर आरोग्य प्रदान करें। शस्यश्यामला उर्वरा हे मां धरती! ऐसा पयार बहा कि वात्सल्य व स्नेह-सिंचित तेरी गोद में सोने से सभी दु:खों से मुक्ति पाकर दीर्घायु जीवन प्राप्त करें। यही नहीं हम भी अपनी ओर से हवि और यज्ञादि से तुम्हारी जीवनपर्यत्न सेवा करते रहें।

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मेरी लेण्ड हॉन हापकिन्स जैसे वैज्ञानिकों ने मिट्टी में पाये जाने वाले एक सूक्ष्म माइक्रो आर्गेनिज्म का जेनेटिकली परिवद्र्धन कर उन्हें कैंसर के लिये जिम्मेदार कोशिकाओं को खाकर नष्ट करने के लिये तैयार कर लिया था। इसी परिवद्र्धित खास प्रकार के बैक्टीरिया का नाम ‘क्लोस्अीडियम नोवी’ जो कैंसर को फैलाने वाली कोशिकाओं को खा-पीकर चट कर जाते हैं। प्रयोग से ज्ञात हुआ कि कैंसर कोशिकाएं शरीर के अलग-अलग अंगों में जाकर स्वस्थ कोशिकाओं को भ्रष्ट कर अपनी जैसी कैंसर कोशिकाओं में बदल देती हैं, उन्हें भी यह विशेष बैक्टिरियां पस्त, ध्वस्त एवं नष्ट कर देते हैं। यह खास बैक्टिरियां क्लोस्टीडियम नोवी सिर्फ कैंसर ग्रस्त कोशिकाओं को ही अपना आहार बनाते हैं। उन्हें नष्ट करते हैं, जबकि स्वस्थ कोश्किाओं को तो बिना कोई नुकसान पहुंचाये सुरक्षा प्रदान करते हैं। मिट्टी के सूक्ष्म बैक्टिरिया द्वारा कैंसर के उपचार की इस नई प्रभावी तकनीक का नाम वैज्ञानिकों ने कोबाल्ट थैरेपी यानी बैक्टीरियॉलाइटिक थैरेपी दिया है, जो अत्यन्त कारगर है।

एक अनुसंधान के अन्र्तगत यूनिवर्सिटी ऑफ साउथेम्पटॉन के इम्यूनोफार्मेकोलाजी के प्रोफेसर स्टीफेट होलगेट ने अफ्रीकन मिट्टी में रहने वाले बैक्टीरिया से दमा के रोगियों का एक टीका तक बनाया। इम्यून प्रतिक्रिया पैदा करने वाला यह बैक्टीरिया आज अस्थमा रोगियों के लिये रामबाण सिद्ध हो रहा है। अस्थमाग्रस्त 24 विद्यार्थियों पर डॉ. स्टीफेन होलगेट ने अफ्रीकन मिट्टी से बने टीके का सफल प्रयोग किया है। डॉ. होलगेट ने प्रयोगों के दौरान पाया कि जो लोग अपने पालतू पशुओं तथा मिट्टी के सम्पर्क में ज्यादा समय तक रहते हैं, उनमें एलर्जी संबंधी दमा या अन्य एलर्जिक रोग, मिट्टी के संपर्क में नहीं रहने वालों की अपेक्षा 60 प्रतिशत तक कम होता है।

मिट्टी के अन्य विविध प्रयोग

नंगे पैर चलना: स्वच्छ धरती तथा स्वच्छ वायुमण्डल में दीर्घ श्वास-प्रश्वास (8:16 सेकेण्ड) करते हुए टहलें। इससे प्रात: की शांत बेला में सृजनात्मक विचारों का नवप्रस्फुटन होता है। प्रकृति के साथ समरस होने की अवस्था में ही यह भाव उत्तपन्न होते हैं।

मिट्टी पर नंगे बदन सोना: साफ तथा स्वच्छ जगह पर सीधे धरती के संपर्क में सोने से भी स्वास्थ्य सम्वद्र्धन होता है। शरीर विधुत का सुचालक होने के कारण पृथ्वी से विधुत-चुम्बकीय प्राण शक्ति का संचार शरीर की तरफ तीव्रतर गति से होने लगता है। प्ररम्भ में सोने में कठिनाई के बावजूद भी शक्ति एवं शांति महसूस होती है।

मिट्टी पर नंगे पैर चलना: स्नयुदौर्बल्य, रक्तचाप, अनिद्रा, डिप्रेशन, दुश्चिन्ता, मनस्ताप, मन:श्रान्ति, क्षोभेन्माद, स्मरण शक्ति का ह्रास, रक्तहीनता आदि अनेक मानसिक एवं शारीरिक रोगों में यह प्रयोग उपयोगी है।

सूर्य-तप्त रेत स्नान: व्यक्ति की लम्बाई-चौड़ाई के अनुसार साफ-सुथरा गड्ढा बनाकर उसमें रेत भर दें। सूर्य की रोशनी में इसे गर्म होने दें। तत्पश्चात रोगी को उसमें लिटा कर तप्त बालू से ढक दें। बालू की गर्मी रोगी के सहने योग्य अवश्य होनी चाहिये। सिर पर गीला तौलिया बांध कर बराबर सिर पर डालते हुए 15 से 30 मिनट तक स्नान लेने के पश्चात ठण्डे पानी का स्नान लेने के पश्चात ठण्डे पानी का स्नान कर पूर्ण विश्राम करें।

उत्तप्त वाष्पित रेत स्नान: इसमें तीक्ष्ण सूर्यप्त गडढ़े में 15 से 20 लीटर पानी सर्वत्र छिड़क दें। रोगी को एक गिलास पानी पिला दें। सिर पर गीला तौलिया बांधें। 30 से 45 मिनट स्नान देने के बाद शीतल जल से स्नान करा दें। सभी प्रकार की वातज-व्याधि, स्नायु दौर्बल्य, अनिद्रा, तीव्र ज्वर, आर्थराइटिस, न्यूराइटिस, श्वेत कुष्ठ, रतिरोग, शीतपित, पोलियों, एक्जीमा, तम्बाकू व शराब की विषाक्तता, जलोदर, एक्जीमा, जीवनशक्ति का हा्रस, सर्पदंश तथा विभिन्न मानसिक बीमारियों में उपर्युक्त दोनों स्नान लाभदायक साबित होते हैं।

(लेखक पतंजलि योगग्राम के निदेशक हैं)   साभार: योग संदेश

डॉ. नागेन्द्र कुमार ‘नीरज’

 

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