अमृतवाणी या देवी सर्वभूतेषु

अमृतवाणी या देवी सर्वभूतेषु
आधुनिक दुनिया में रहने वाले मनुष्य धीरे-धीरे पुराणों के ऊपर से अपना विश्वास खोते जा रहे हैं। इनमें पुराणों को सुनने अथवा पढऩे की इच्छा जैसे धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। कुछ पीढिय़ों के बाद पुराणों की कहानियां भी मिलना मुश्किल हो जायेगा। हम में से बहुत  से लोग हैं, जो दुर्गा पूजा के बारे में जानते जरूर हंै लेकिन विशेष ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाएं हैं। जब धरती पर राक्षसों के उपद्रव बढऩे लगता है, उसका विनाश करने के लिए भगवान स्वयं किसी भी रूप में आते हैं। जब महिषासुर नाम का राक्षस ब्रह्म देव से वरदान पाकर अनेक दुष्कर्म करने लगता है तो सारे देवता परेशान होकर भगवान विष्णु के शरण में जाते हैं। उन सभी देवताओं के क्रोधान्गा से नारी रूप में एक प्रचण्ड शक्ति का जन्म हुआ था। दुर्गति से रक्षा करने के भाव से उनका नाम दुर्गा हो गया। तत्पश्चात समस्त देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र प्रदान करके जैसे विष्णु ने परमायुध चक्र से चक्रास्व, देवों के देव महादेव त्रिशूल, यमदेव कालपास, वरूण देव गदा इस प्रकार विभिन्न अस्त्र धारण करके सिंह के ऊपर विराजमान होकर परम प्रतापी महिषासुर से लडऩे के लिए तैयार हो गए। साथ में अस्त्र सहचरो, कालिका, चंडिका, चामुण्डा, मातन्मी वासेलि, उग्रतारा, भैरवी, धुमावती को सहचरी बनाए थे। सर्वप्रथम रन्त गौरी पर्वत के शिखर पर विराजमान हुए थे।
दैत्यराज महिषासुर रतनागीरी में वास करता था। देवी ने छल और बलपूर्वक राक्षस राज के अनेक सेनाओं को परास्त कर दिए थे। शुंभ, निुशुम्भ जैसे भयंकर राक्षस, चडण, मुडण, जैसे राक्षस देवी दुर्गा से बच नहीं पाए थे। इस प्रकार महिषासुर के मन में भय का दीप प्रज्जवलन कर दिए थे। रानी विद्यावती के अनेक निवारण के पश्चात व्यव्य राज स्वयं दुर्गा के साथ लडऩे के लिए निकल पड़ा था। एक नारी के आगे हार मानना उसके स्वभाव के खिलाफ जा रहा था। महिषासुर देवी के अपूर्व सौंदर्य से विमुग्ध हो गया। दोनों के बीच में युद्ध शुरू हो गया। अनेक बार देवों के त्रिशूल से आघात पाकर भी महिषासुर जीवित रहा, उसी क्षण उसे आभास हुआ ब्रह्म देव के वर के अनुसार नारी का दिगम्बर रूप देखकर ही उसका मृत्यु घट सकती है। समग्र धरती को शांति प्रदान करने के लिए उसी रूप में आ गये थे। उसी क्षण महिषासुर के वक्ष पर त्रिशुल से आघात करने से उसका मृत्यु हो गया। उसके वध के पश्चात देवी दुर्गा प्रचंड रूप धारण कर ली थी। उस क्षण कोई भी देवता को उन्हें शांत करने का सामथ्र्य नहीं था। महादेव जमीन पर उनके सामने लेट गए। जब उनके पांव महादेव के छाती पर पड़ा तब उनको अहसास हुआ और शर्मिंदा होकर अपने शांत रूप में परिवर्तन कर लिए। उसी प्रकार पूरे धरती पर पुन: खुशी छा गया, इसलिए कहा जाता है-
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
उपाली अपराजिता रथ

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