रोहिंग्या घुसपैठ आ बैल मुझे मार

रोहिंग्या घुसपैठ  आ बैल मुझे मार

25 अगस्त को म्यांमार के रखाइन प्रांत में उस समय भयानक हिंसा फैली, जब रोहिंग्या समुदाय से जुड़े आतंकियों ने म्यांमार के सैनिकों पर हमला कर, म्यांमार के लगभग 71 सैनिकों को मार डाला। इसी प्रकार का हमला पिछले वर्ष अक्टूबर में भी इन आतंकियों ने म्यांमार की सीमा सुरक्षा पुलिस पर किया, जिसमें 9 सैनिकों की मृत्यु हो गई थी। 25 अगस्त को म्यांमार के सैनिकों पर हुआ यह हमला इस विश्व के समक्ष आरकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी जैसे आतंकी संगठन को लाया। आरकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी का प्रमुख अता उल्लाह है, जो कराची में पैदा हुआ और मक्का में पला बढ़ा। लेकिन इस उग्रवाद का पाकिस्तान से सम्बंध केवल यही खत्म नहीं होता। म्यांमार, बांग्लादेश और भारत की सुरक्षा एजेंसियों की मानें तो पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकवादी संगठनों के सभी आका बांग्लादेश के शरणार्थी कैंपों से इन रोहिंग्याओं को अपना रंगरूट बनाने में लगे हैं। इन संगठनों की सुची में हाफिज सईद की लश्कर-ए-तैयबा सबसे उपर है।

इस पृष्ठभूमि में भारत में अवैध प्रकार से घुसपैठ किये हुए 40 हजार रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजना न सिर्फ आवश्यक हो जाता है, बल्कि यह समझदारी भरा कदम होगा। क्योंकि वर्तमान परिस्थिति में समाजिक, आर्थिक और सुरक्षा के संदर्भ में रोहिंग्या मुसलमानों को देश में रखना भारत के हित में नहीं है। यदि भारत इस संदर्भ में अभी कोई निर्णय नहीं लेता है तो आगे के लिये इस मामले को  हल करना कठिन हो जायेगा। ऐसा माना जाता है कि केवल म्यांमार में कुल 10 लाख रोहिंग्या रहते हैं, बाकी इतनी ही संख्या में रोहिंग्या शरणर्थी बाहर के देशों में रहते हैं। इन रोहिग्याओं में मुस्लिम बहुल तथा हिंदू अल्पसंख्यक हैं। संयुक्त राष्ट्र ने 2013 में इन रोहिंग्याओं को पूरे विश्व में सबसे अधिक उत्पीडि़त समुदाय बताया। म्यांमार की 1982 के नागरिक कानूनों के अनुसार रोहिंग्याओं को नागरिकता हासिल नहीं है। यही कारण है कि म्यांमार की 1823 के बाद से ब्रिटिश भारतीय प्रवासियों को कोई नागरिकता नही दी जाती है। आकड़ों की मानें तो लगभग 4 लाख रोहिंग्याओं ने अभी तक बांग्लादेश में शरण ली है। भारत सरकार का मानना है कि इन रोहिंग्या मुसलमानों की आतंकी समूहों द्वारा लुभाने की आशंका के  मद्देनजर, ये देश की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकते हैं।  गृह मंत्रालय का मानना है कि पिछले कुछ दशकों में शरणार्थियों का आतंकवाद में अधिक संख्या में लिप्त होने के कारण इन्हें किसी भी देश के लिए सुरक्षा की दृष्टि से शरण देना कठिन हो गया है। इस संदर्भ में म्यांमार आर्मी पर प्रश्न-चिन्ह खड़ा करना गलत होगा। संभवत: म्यांमार ने आतंक के खात्मे के लिये दूसरे देशों से सीख ले ली है।  भारत ने कुछ समय पहले ऐसी ही एक भूल की थी, जिस पर  समय रहते कार्यवाही होनी चाहिए थी। मुझे दुख इस बात का है कि इस समस्या का हल शांतिपूर्ण हो सकता था। लेकिन कुछ परिस्थितियों में विषय को हल करने के लिये हिंसा का मार्ग अपनाना पड़ता है। भले ही अल्प समय के लिये हम अपने इन कठोर कदमों के लिये बुरे कहे जाएं, लेकिन इससे हमारा भविष्य अंधकार में तो नहीं जायेगा।

यहां यह ध्यान देने योग्य बात है कि जो 10 हजार रोहिंग्या जम्मू में रह रहे हैं, उसके पीछे एक गंभीर साजिश की बू आती है। भाजपा जम्मू में पूर्ण बहुमत के साथ है, जबकि पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस का वर्चस्व घाटी में है। यदि रोहिंग्याओं को जम्मू में रहने के लिये अनुमति दे दी जाती है तों इससे जम्मू में जनसांख्यिकीय बदलाव होंगे, जो भाजपा के भविष्य के लिये अच्छा नहीं होगा। यही कारण है कि अल्पसंख्यक समूह और उनके समर्थक कांग्रेस का इन रोहिंग्याओं के वापस भेजने के निर्णय को लेकर विरोध है। आगे यहां यह भी सोचना होगा कि उस समय की कांग्रेस की सरकार ने इन्हें जम्मू और लद्धाख क्षेत्र में ही क्यों शरण दी, यह जानते हुए भी कि घाटी से कश्मीरी पंडितों को बलपूर्वक बाहर कर इन्हे अपने ही देश में शरणार्थी बना दिया गया था? आखिर क्या कारण है कि हुर्रियत के लोग भी सरकार के रोहिंग्याओं के  वापस भेजे जाने के निर्णय का विरोध कर रहे हैं? इसका उत्तर है, रोहिंग्याओं को लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद द्वारा अपने संगठन में शामिल करने का प्रयास करना। यहां भारत को यूरोप के देशों से सीखने की आवश्यकता है, जहां मुस्लिम शरणार्थी आतंकवाद सहित कई कानूनी समस्याएं खड़ी कर रहे हैं। इसी क्रम में हमारे सेक्युलर ब्रिगेड से यह प्रश्र पूछना आवश्यक हो जाता है कि आखिर यही लोग तसलीमा नसरीन को एक शरणार्थी के रूप में भारत में स्थान देने के लिये क्यों नही तैयार होते? इसका साधारण उत्तर है कि तसलीमा नसरीन के पक्ष में जाने से अल्पसंख्यक वोट बैंक खतरे में पड़ सकता है। इन लोगों को रोहिंग्या के लिये अब घडिय़ाली आंसू बहाना बन्द करना चाहिए और सरकार को गलत माध्यम से भारत में घुसपैठ कर रहे इन रोहिंग्या घुसपैठियों को कभी भी शरण नहीं देनी चाहिए। जब-जब भारत ने इन बाहरियों को शरण दिया है, भारत के साथ क्या-क्या हुआ है, इसका इतिहास गवाह रहा है। इनको भारत में स्थान देने से वही होगा जो बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्यों में हो रहा है। जहां समाज और देश विरोधी ताकतें बड़ी तेजी से खड़ी हो रही हैं। भले ही हम सरकार को दोषी ठहरा सकते हैं, लेकिन इन सभी मुश्किलों में कहीं ना कहीं इन ढ़ोंगी सेक्यूलरों का हाथ होता ही है, जो हमेशा सरकार का विरोध कर असामाजिक तत्वों को बढने में सहायता करते हैं। लेकिन ये सेक्युलर उन तत्वो को अच्छे प्रकार से समझ नहीं पाते, जो अपने आपको लोगों के समक्ष असहाय साबित कर दूसरे देशों में प्रवेश कर लेते हैं और प्रवेश करने के पश्चात वहां आतंक फैलाने लगते हैं, इसका त्वरित उदाहरण वे यूरोप के देश हैं जो पिछले कुछ वर्षो से इस प्रकार की घटनाओं का सामना कर रहे हैं। अत: भारत में हमें किसी शरणार्थी की आवश्यकता नहीं है। हमारे पास पहले से ही कश्मीरी पंडितों को उन्हें सम्मान-पूर्वक उनको उनके घर वापस पहुंचाने का मुद्दा पड़ा हुआ है।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

 

 

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