क्यों न ईश्वर ही बन बैठू?

क्यों न ईश्वर ही बन बैठू?

मैं बहुत शर्मिंदा हूं कि मैं जीवन में अभी तक कुछ नहीं कर पाया हूं। शर्म की बात तो यह है कि मैं राजनीति में भी जम नहीं पाया हूं। निकम्में से निकम्में लोग भी नाम, पैसा और शोहरत लूट बैठते हैं जो कहीं भी सफल नहीं हो पाते। एक चपरासी की नौकरी भी पा लेने में असमर्थ रहा हूं जिस में कुछ करना नहीं है। बस बॉस के कार का और आफिस के कमरे का दरवाजा खोलना है, नत्थिया एक कमरे से दूसरे कमरे में पहुंचानी हैं। और कभी-कभी कोई बक्शीश दे दे तो झुक कर कबूल कर धन्यवाद देना होता है। इसमें पढ़ा-लिखा होने की भी क्या आवश्यकता है, यह मुझे समझ नहीं आया। पर किसी ने मुझे इस काबिल भी नहीं समझा। उनकी नासमझी पर पर मैं क्या कह सकता हूं?

पर मैं तो अपना कर्तव्य नहीं भूला हूं। मुझे तो कुछ कर बैठना है। अपना पेट पालना है। विवाह के बंधन में भी बंधना है जिस बंधन से कोई बच नहीं सका है। अपने वंश को भी आगे बढ़ाना है।

भूखा क्या नहीं करता ? वैसे तो मैं चाह रहा था कि कुछ और नहीं मिलता तो एक बाबा ही बन जाता हूं। यहां मेरा सिक्का जम जायेगा – ऐसी मुझे पूरी उम्मीद थी। पर अब बाबे कुछ बदनाम हो गए हैं। यहां मेरी बात जम नहीं पाएगी। मेरे पांव उखड़ जायेंगे। इसलिए सोच रहा हूं क्यों न सीधे परमात्मा ही बन जाऊं?

ईश्वर भी परमात्मा ही तो है – परम+आत्मा= परमात्मा। मुझ में भी तो आत्मा है विशुद्ध शुद्ध, पवित्र, पावन, छल कपट से दूर। यदि ऐसा न होता तो मैं किसी न किसी स्थान पर कामयाब तो हो ही जाता। मुझे तो लगता है कि लोगों ने मुझ में ईश्वरीय गुण पहचान लिए थे और इसी कारण उन्होंने कहीं स्थान नहीं दिया। ईश्वर को कौन अपने साथ रखना चाहेगा। उसके तो सारे पोल ही खुल जायेंगे।

जिन अन्य विभूतियों को हम सब साक्षात् ईश्वर से कम नहीं मान रहे थे उनके पास कौन सी यूनिवर्सिटी की डिग्रियां हैं। किसी ने पूछा है कभी जो मुझ से पूछेंगे?

इस काम के लिए मेरी पृष्ठभूमि भी बहुत अच्छी है। मेरा धर्मज्ञान तो बहुत ही श्रेष्ठ व विस्तृत है।आज तक जितनी भी धार्मिक व पौराणिक फिल्में बनी हैं, वह सब मैंने देखी हैं। एक बार नहीं कई-कई बार। मुझे तो उनके डायलॉग भी ज़ुबानी याद हो गए हैं।

जब मैं स्कूल में पढता था, पांचमीं-सातवीं में तो मेरे सहपाठी मुझ से सलाह लेने आते थे। मैंने जो उन्हें सलाह दी वह तो सब पर ठीक बैठी। वह तो तभी कह देते थे – भई, तू तो बड़ा धार्मिक आदमी है। तेरी सलाह तो सदा ठीक बैठती है। तुम तो जानीजान हो, भविष्यवक्ता।

मैं अपनी मातृभाषा अच्छी तरह बोल लेता हूं, लिख लेता हूं, पढ़ लेता हूं और समझ लेता हूं। ईश्वर के लिए तो मैं समझता हूं इतना ही बहुत है। वह तो जानिजान है, सब जानता है, सब समझता। फिर मुझे तो ईश्वर बनना है, कोई छोटे-मोटे दफ्तर का क्लर्क तो नहीं जिसके लिए मैट्रिक या दस-प्लस दो की आवश्यकता हो। फिर जिन बाबाओं के चरणों में नाक रगड़ते रहे, उनके पांव की धूल चाटते रहे उनसे कभी उनकी शैक्षणिक योग्यता पूछी है जो मुझसे पूछोगे?

एक लिहाज से तो मेरा दावा और भी मजबूत है। ईश्वर तो बस ईश्वर है, मैं तो साथ में प्राणी भी हूं। पर ईश्वर बनना इतना आसान काम भी नहीं है। मुझे समस्त प्राणीमात्र से ऊपर उठना होगा। अपने आप को सब से बड़ा मानना होगा। मुझे क्या बाल, क्या वृद्ध और क्या मेरी उम्र का, सब को बच्चा कहना और मानना होगा। सब को बच्चा कहकर ही पुकारना होगा। अपनी उम्र से दो गुणा व तीन गुणा प्राणियों को भी बेटा-बेटी कह कर पुकारने में शुरू-शुरू में मुझे कुछ हिचकिचाहट तो होगी पर मैं शीघ्र ही इस पर काबू पा लूंगा। तभी तो लोग मुझे ईश्वर मानेंगे। वह जानते हैं कि ईश्वर के लिये सारी सन्तान बराबर है। वह सब को एक नजर से देखता है। किसी में भेदभाव नहीं रखता।

देवता सब को कुछ देते ही हैं, लेते नहीं। वरन् तो वह देवता नहीं, लेवता बन कर रह जायेंगे। मैं भी यही करूंगा। मैं भी अपने भक्तों को दूंगा ही – वरदान्, शिक्षा और उपदेश। और मैं समझता हूं यही काम आसान भी है।

जब कोई विद्यार्थी या किसी पद का प्रत्याशी मेरा आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मेरे चरण छुएगा तो मैं उसके सिर पर हाथ रखकर कहूंगा, ‘जा बेटा, परिश्रम कर, सफलता तेरे चरण चूमेगी’।

तब वह तन मन और धन से मेरी सेवा करने लगेगा। मैं भी प्रसन्न होकर उसे रोज बड़ी से बड़ी दुआएं दूंगा।

80-90 प्रतिशत लोग तो कामयाब होंगे ही। सब मुझे ही इसका श्रेय देंगे, अपने परिश्रम और भाग्य को नहीं। मेरी तारीफ के पुल बांध देंगे। मेरे करिश्मों का प्रचार-प्रसार करेंगे।

पर जब मैं एक दिन अपने एक भक्त को मायूस मुंह लटकाये मेरी ओर आते देखूंगा तो मैं पहले ही समझ जाऊंगा कि मेरे आशीर्वाद के बावजूद वह सफल नहीं हो पाया है। आखिर मैं  ईश्वर हूं, अंतर्यामी। इस से पहले कि वह कुछ बोले, मैं पहले ही बोल उठूंगा, ‘बेटा, मुझे दु:ख है। पर तुमने भी तो परिश्रम नहीं किया जितना कि करना चाहिए था’।

वह चकित हो उठेगा कि उसके ईश्वर ने बिन बताये ही कैसे जान लिया कि मैं फेल हो गया हूं। हो सकता है कि वह फिर भी यह कहने की धृष्टता कर ही बैठे, ‘नहीं, मेरे भगवान्, मैंने तो परिश्रम किया था’।

तब भी मैं बड़े संयम और शांतभाव से बोलूंगा, ‘उतना नहीं बेटा, जितना चाहिए था।’’ और तब मैं उसके सिर को एक बार फिर प्यार से सहलाते हुए कहूंगा, ‘जा बेटा, जा। एक मन से एक बार फिर दिन-रात परिश्रम करो। साथ में भगवत गीता का उपदेश भी याद रखना  – कर्म करो, फल की इच्छा मत करो। वह स्वयं ही मिलेगा। फिर देखना अगली बार उछलते-कूदते मेरा धन्यवाद करने आओगे।’’ मेरे पांव छूकर एक बार फिर आश्वस्त हो कर खुशी-खुशी घर लौटेगा।

कई दम्पति मेरे पास आएंगे बड़ी उम्मीद लेकर – अपनी गोद हरीभरी करने के लिए, पुत्र-रत्न प्राप्त करने के लिए। मैं सब को पुत्र-रत्न का आशीर्वाद-वरदान दूंगा तो तेजस्वी होगा, भाग्यशाली, पराक्रमी एवं कुल की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला।

मुझे यह भी पता है कि न तो सब की गोद ही भरेगी न सबको पुत्र-रत्न ही जो उनके आंगन को किलकारियों से भर देगा, पर मुझे विश्वास है कि मेरे भक्तों के मन में मेरे प्रति आस्था कम नहीं होगी। वह अपने भाग्य को ही कोसेंगे। मुझ में श्रद्धा लगातार बनाये रखेंगे। वह उम्रभर इसी आशा में जीते रहेंगे कि एक दिन  ईश्वर अवश्य उनपर कृपा करेंगे। उनकी मनोकामना पूरी करेंगे।

यदि कभी-कभार कोई इक्का-दुक्का कोई भ्रम की बात करने की हिमाकत कर भी बैठे, तब भी मैं शांत रहूंगा। मैं भगवान हूं, इंसान तो नहीं। मैं कह दूंगा कि लगता है मेरे भक्त का मन कुछ भटक गया है। मुझ पर आस्था की कमी आ रही है। बेटा, जब विश्वास नहीं तो परिणाम कैसे सकारात्मक निकलेगा?

तब वह सौ बार मुआफी मांगेगा। कहेगा – मेरे कहने का यह मतलब नहीं था। मैं उसे क्षमादान दे दूंगा। मैं कह दूंगा – चिंता मत करो, तुम्हारा कल्याण ही होगा।

प्रारम्भ में मैं कुछ शिष्य बनाऊंगा। उनके घर से ही अपने चमत्कार दिखाने शुरू करूंगा। मेरे पास कोठी है कहां? होती तो मैं फिर  ईश्वर बनने का कष्ट ही क्यों सहता? क्यों इतने बेलन बेलता? यह भक्त ही मेरे करिश्माई व्यक्तित्व का बखान करेंगे। चर्चा करेंगे। मेरी शोहरत बढ़ाएंगे। फिर मेरे भक्तों और अनुयायियों की संख्या दिन दुगनी रात चौगनी छलांग लगाएगी।

महिलाएं ही मेरी सब से बड़ी प्रचारक-प्रसारक होंगी। वह अपने पतियों को मेरे पांव  में डालकर ही दम लेंगी। मोहल्ले की एक भी औरत मेरे पास पहुंच गयी तो समझो सारा मोहल्ला ही आ गया। मोहल्ले की कोई औरत दूसरी से पीछे रह जाना नहीं चाहेगी।

मैं सोचता हूं, काम ऐसे भी नहीं चलेगा। छोटी-मोटी कुटिया से तो कोई भी साधु-महात्मा काम चला लेता है। अपने दो-चार शिष्य-शिष्याओं के भरसक प्रयत्नों के बावजूद उनके पास कोई नहीं आता। अपना पेट भरने के लिए हाथ में भीख का कटोरा लेकर उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। पर मैं तो हूं परमात्मा,  ईश्वर। उनसे कहीं उच्च। मुझे तो कोई करिश्मा कर दिखाना है। कर दिखाऊंगा।

जब मेरा कोई भक्त मेरे पास आकर बताएगा कि उसे तेज बुखार चढ़ा हुआ है लेकिन फिर भी वह मेरे दर्शन करने आ गया है तो मैं दया से उसके सिर पर हाथ फेर दूंगा और कह दूंगा – जा, कल प्रात: तेज बुखार उतर जायेगा। घर जाकर वह डाक्टर से एक गोली लेाकर सो जायेगा। प्रात: उसका बुखार छूमंतर। भागा-भागा वह मेरे पास आएगा और मेरे बार-बार कहने के बावजूद अपना सिर मेरे पावन चरणों से न उठाएगा।

इसी प्रकार मैं किसी को दो पुडिय़ां दे दूंगा। किसी को दो घूंट पानी पिला दूंगा। किसी के सिर पर केवल हाथ ही फेर दूंगा। किसी को कोई तावीज पहनें को दे दूंगा। किसी को इसे पानी में धोकर पीने के लिए कह दूंगा। किसी के शरीर के उस हिस्से पर अपने पवित्र हाथ फेर दूंगा जहां उसे बहुत पीड़ा हो रही होगी। बहुतों के लिए तो मेरे हाथ से पिलाये दो पानी के घूंट भी अमृत बन जायेंगे। बस मेरे चमत्कार के चर्चे गांव-गांव, शहर-शहर फैल जायेंगे। मेरे पास श्रद्धालुओं का तांता बंध जायेगा। मुझे फिर किसी प्रचार-संचार साधन एवं विज्ञापन की आवश्यकता न रहेगी।

वैसे भी कोई चिंता की बात नहीं है। हाल ही में इंडियन मेडिकल कौंसिल ने बताया कि 85 प्रतिशत रोग अपने आप ही ठीक हो जाते हैं। केवल 15 प्रतिशत मैं ही उपचार करना पड़ता है। तो इस प्रकार 85 प्रतिशत की कामयाबी की गारंटी तो मेरी पक्की है।

तब मेरे भक्त स्वयं ही महसूस करने लगेंगे कि उनके छोटे से घर मेरे जैसी महान आत्मा के लिए उपयुक्त नहीं है। वह मुझे बिन बताये ही चंदा इक_ा करना शुरू कर देंगे। तब मैं किसी झील के किनारे एक रमणीक स्थान ढूंढ लूंगा जहां मेरे भक्त अपने ईश्वर के लिए  एक शानदार आश्रम बनवा देंगे जहां मैं तपस्या कर उनका कल्याण कर सकूं। यह आश्रम बड़े-बड़े महलों, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति व राजभवनों से अधिक आलीशान होगा। पर मेरे लिए तो मात्र वह एक साधारण कुटिया ही होगी।

जब मैं उसमें प्रवेश करूंगा एक शुभ दिन पर तो वहां एक बड़ा मेला लगेगा, बड़ा समारोह होगा, खुशियों का त्यौहार होगा। सब को भोजन मिलेगा। सब आनंद उठाएंगे। पैसा भक्तों का खर्च होगा, यशगान के चर्चे मेरे फैलेंगे।

इस भवन का छोटा-सा भाग, पर सब से आलिशान, मेरे लिए होगा जिसमें प्रवेश की अनुमति मेरे विशेष कृपालुओं को ही होगी। बाकी सब तो मेरे अनुयायियों-भक्तो के लिए उपलब्ध होगा। मेरा नाम तो बस कागजों में ही होगा, असली मालिक तो आम जनता ही होगी।

तब मेरी ख्याति देश-विदेश तक फैल जाएगी। देश से और विदेश से बड़े-बड़े पत्रकार तथा लेखक मेरे चरणों में आएंगे मेरा आशीर्वाद लेने, मुझसे प्रेरणा पाने। मेरे आश्रम पर, इसकी निर्माण कला पर विशेष लेख लिखेंगे। अतरंग रिर्पोट प्रस्तुत करेंगे। मेरी जीवनी लिखने की अनुमति मांगेंगे। विभिन्न मुद्राओं में मेरी फोटो खेंचेंगे दुनिया के जानेमाने फोटोग्राफर। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाएं और न्यूज चैनल मुझ से साक्षात्कार करेंगे।

इस प्रकार मेरी ख्याति भारत की सीमाओं को फांद कर दूर-दूर सात समंदर पर पहुंच जाएगी।

बस फिर क्या? विदेशों में धन-धान्य की बहुलता से त्रस्त जनता अपने भोग-विलास त्यागकर मेरे चरणों में आने के लिये व्याकुल हो उठेगी। तब मैं स्वयं ही उनको दर्शन देने के लिये कई बार विदेश चला जाऊंगा अपने चेले-चांटों के साथ। विश्व के कोने-कोने में पहुंच जाऊंगा सबके लिये शान्ति, सद्भावना और प्रेम का संदेश लेकर। भारत की उत्कृष्ठ संस्कृति का झण्डा ऊंचा करूंगा।

परन्तु एक बार दर्शन से ही विदेशों में बसने वाली जनता का भला हो सकेगा? तब विदेशों के लोग मेरे लिये सब बड़े शहरों में

आश्रम निर्मित कर देंगे। वहां मैं सर्वव्यापक बन जाऊंगा। वहां भी लोग मुझे ही खोजेंगे, मुझे ही पायेंगे।

मैं विदेश से लौटूंगा अपने ही निजि विमान से जो वहां के श्रद्धालुओं ने मेरी सुविधा के लिये भेंट किया होगा ताकि मेरा समय कारों में सफर में बर्बाद न हो और मैं अधिक से अधिक श्रद्धालुओं को दर्शन दे सकूं और उनका कल्याण कर सकूं। दिल्ली पहुंचने पर मेरे हजारों भक्त नई आलीशान गाडिय़ां लेकर मुझे लेने के लिये खड़े होगे। कोई कहेगा मेरी गाड़ी में बैठकर अपने चरणों से इसे पवित्र करो कोई कहेगा मेरी में। किसी एक को मैं निहाल कर दूंगा। वह फूला न समायेगा।

महिलों पर मैं विशेष कृपादृष्टी रखूंगा। साथ ही मैं सावधान भी रहूंगा ताकि वह स्थिति ओर मुसीबत न खड़ी हो जो आज के बाबाओं को जेल में ही धकेल रही है।

सभी देवताओं की तरह मैं भी तब अपनी घर-गृहस्थी बसाऊंगा। अनेकों प्रस्ताव आयेंगे प्रणयसूत्र में बन्ध जाने के लिये। वह धन्य हो जायेगी जो मेरी अर्धांगिनी बनने का सौभाग्य प्राप्त करेगी। मेरी संतान भी आगे मेरा स्थान लगी। यही तो नियति है।

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