बनारस में हंगामा यूं बरपा

बनारस में हंगामा यूं बरपा

एक बहुत छोटी सी घटना ने न केवल बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के कुलपति प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी की प्रशासनिक क्षमता, कुशलता और सोच से पर्दा उठा दिया, बल्कि इससे उपजे आंदोलन की आंच दिल्ली के रायसीना हिल तक पहुंच गई। यह एक ऐसा मामला है जहां इंसाफ और सुरक्षा मांगने वाला पीडि़त पक्ष न्याय पाने की बजाय प्रताडि़त हुआ।

बात रात 21 सितंबर की है। इसके ठीक अगले दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने संसदीय क्षेत्र बनारस जाने वाले थे। देर शाम एक छात्रा पुस्तकालय से अपने हॉस्टल जा रही थी। बीएचयू में भारत भवन के सामने अचानक तीन लड़के आए। उन्होंने छात्रा को छेड़ते हुए उसके कपड़े के भीतर हाथ डाल दिया। इस पर छात्रा ने शोर मचाया तो लड़कों ने कहा कि वह अपना बलात्कार करवाएगी या सीधे हॉस्टल जाएगी?

अपने साथ हुई इस छेड़छाड़ से छात्रा के मन पर आघात पहुंचना स्वाभाविक था। विश्वविद्यालय परिसर में छात्रा के कुछ गिने चुने अभिभावक होते हैं। पहला कुलपति, दूसरा संकाय अध्यक्ष और प्रॉक्टर, तीसरा हॉस्टल का वार्डन और फिर सीनियर्स। जाहिर है यहां सबसे बड़ा अभिभावक प्राक्टर और वार्डन ही थे। वह उनके पास गई। प्राक्टर को अपनी पीड़ा बताई तो उल्टे उस छात्रा से ही सवाल पूछ लिए गए। उससे जानने की कोशिश हुई वह हॉस्टल से बाहर क्यों थी? इसके बाद उसे शांत रहने और प्रधानमंत्री मोदी के दौरे का हवाला दिया गया।

वार्डन का व्यवहार

प्रॉक्टर के बाद छात्रा सीधे हास्टल के वार्डन के पास पहुंची। उनसे भी दु:ख दर्द कहा। वार्डन ने सब सुनने के बाद उसे संयम बरतने की सलाह दी। जब छात्रा ने अपने दर्द को और साझा करना चाहा तो वार्डन ने कह दिया हाथ ही तो डाला है। इससे क्या हो गया? छात्रा के पास वार्डन के इस तरह से प्रतिक्रिया देने का कोई जवाब नहीं था। इससे एक ही अर्थ निकल रहा था कि तुम छेड़छाड़ झेलती रहो। क्योंकि उसे न तो प्रॉक्टर से राहत मिली और न ही वार्डन से। वह तमतमायी अपमान से खीजती हॉस्टल लौट आई। लेकिन तबतक इस घटना की खबर हॉस्टल में फैलनी शुरू हो गई। देर रात होते-होते एक आंदोलन की पृष्ठभूमि बनने लगी।

अगली सुबह हॉस्टल की छात्राएं गेट पर आ जमीं। उन्होंने हास्टल में अपने छेड़छाड़ का मुद्दा उठाते हुए सुरक्षा की मांग शुरू कर दिया। छात्राओं की मांग भी बहुत छोटी सी थी। वह हॉस्टल के बाहर सीसीटीवी कैमरा लगवाने, भारत भवन जैसे अन्य अंधेरे वाले स्थान पर स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था किए जाने, सुरक्षा गार्ड की तैनाती की ही मांग कर रही थी। क्योंकि आए दिन मनचले लड़के हॉस्टल के आस-पास मंडराने लगते थे। वह अश्लील फब्तियां, छेड़छाड़ या अश्लील हरकतें करते थे। छात्राएं केवल इस तरह की स्थितियों पर विश्वविद्यालय प्रशासन को संवेदनशील बनाना चाह रही थी, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन की लापरवाही ने इस आग में खुद ही घी डालना शुरू कर दिया।

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कुलपति का दोष

छात्राओं के विश्वविद्यालय के गेट पर बैठने की खबर मीडिया को लग चुकी थी। प्रधानमंत्री मोदी का दौरा भी था। ऐसे में एक चटपटा मामला था। विश्वविद्यालय में कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी के विरोधियों की भी कमी नहीं है। उनकी नियुक्ति भी आरएसएस के एक सह सर कार्यवाह के वीटो तथा सिफारिश के बाद हुई थी। इसलिए आंदोलन की दिशा भटकाने वाले भी वहां पहुंच चुके थे। इस बीच विश्वविद्यालय प्रशासन ने खबर भिजवाई की कुलपति छात्राओं से मिलना चाहते हैं। छात्राएं तैयार भी हो गई। कुलपति ने महिला विद्यालय में मिलने की सूचना भिजवाई, कुछ छात्राएं उठकर कुलपति से मिलकर अपनी बात रखने की योजना में लग गयीं। वह कुछ एक मीडिया कर्मियों के साथ कुलपति से मिलने जाना चाहती थी, लेकिन कुलपति की तरफ से केवल विश्वविद्यालय की छात्राओं से ही मिलने की सूचना आई। जबकि छात्राएं इसके लिए तैयार नहीं हुई। क्योंकि इससे पहले कुलपति के पहले की तरह अपने वादे से मुकर जाने का खतरा था।

कहा जाता है कि कुलपति की कुछ आदतें छात्राओं को परेशान कर रही थी। मसलन् कुलपति का उनपर तंज कसना। व्यंगात्मक लहजे में बात करना। छात्राओं की मांग पर संवेदनशील होकर ध्यान न देना। बताते हैं इस तरह की घटना पहले हो चुकी थी। दूसरे कुलपति के बारे में आम है कि वह छात्र-छात्राओं को उनकी मांग पर आश्वासन दे देते हैं, लेकिन बाद में उनपर अमल नहीं होता। कुल मिलाकर कुलपति छात्र-छात्राओं की मांग को न केवल हल्के में लेते हैं, बल्कि एक तानाशाही भरा व्यवहार भी करते हैं। इसलिए छात्राओं ने कुलपति से महिला विद्यालय में मिलने से दूरी बनाई। वहीं कुलपति ने भी इसके समाधान की दिशा में कुछ नहीं किया। जैसे कि अभी भी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर में जहां छेड़छाड़ की यह घटना हुई थी, अभी भी वहां शाम ढलते ही अंधेरा छा जाता है। कोई इंतजाम नहीं हुआ है।

कुलपति की मंशा

दरअसल कुलपति चाह रहे थे किसी तरह छात्राएं एक बार शांतिपूर्वक हॉस्टल में चली जाएं। इसके बरअक्स उन्होंने दो बार मिलने की मंशा जताई लेकिन वादे से मुकरते भी दिखाई दिए। उनके दिमाग में प्रधानमंत्री का दौरा भी था। जब एक बार छात्राएं हॉस्टल में चली जाती तो विश्वविद्यालय सुरक्षा कर्मियों और सुरक्षा बलों के सहारे उन्हें काबू में कर लिया जाता। उन्हें हॉस्टल से बाहर आने से रोक लिया जाता। इसे कुछ सीनियर छात्राएं समझ रही थी। इसलिए उन्होंने अपने विवेक का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। वह त्रिवेणी छात्रावास का शंकुल गेट तोड़कर बाहर आ गई।

विवि और जिला प्रशासन में टकराव

मामला विश्वविद्यालय का था लेकिन उसे विश्वविद्यालय ठीक से हैंडल नहीं कर रहा था। जिला प्रशासन के लिए भी यह परेशानी भरा सबब रहा। पूरे मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन और जिला प्रशासन के बीच तालमेल का आभाव साफ दिखाई दिया। छात्र-छात्रा त्रिवेणी छात्रावास से धरना देने आ रहे थे। रास्ते में वीसी लॉज की तरफ कुलपति जाते दिखाई दिए। छात्र-छात्राओं ने उन्हें घेर लिया, लेकिन तभी विश्वविद्यालय के सुरक्षा कर्मियों ने लाठियां भाजनी शुरू कर दी। कुछ छात्राओं को चोटें आई। यह खबर तेजी से विश्वविद्यालय में फैलने लगी। एक तरह आग लगनी शुरू हो गई। इसकी तेज प्रतिक्रिया आनी शुरू हुई। क्योंकि पीडि़त को इंसाफ की जगह सजा दी जाने लगी। यह शायद पहला ऐसा वाकया था जब सुरक्षा बलों ने छात्राओं की पीड़ा को लेकर चल रहे विरोध पर उन पर लाठियां बरसाई।

लाठी चार्ज के बाद भगदड़ मचने लगी। छात्र-छात्रा हॉस्टल की तरफ भागने लगे और पुलिस दौड़ा कर ल_ मारने में जुट गई। बिड़ला छात्रावास तक पीछा किया। कुछ छात्रावासों में सुरक्षा कर्मी घुस गए। अफसोसनाक यह है कि इसके बाद विश्वविद्यालय परिसर में डैमेज कंट्रोल के उपाय की बजाय प्रतिक्रियावादी क्रियाओं ने जोर पकड़ लिया। यह प्रक्रिया तबतक जारी रही जब तक कि केन्द्र की तरफ से हस्तक्षेप शुरू नहीं हो गया। मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने खुद पहल नहीं की। प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से मामले में गंभीरता नहीं दिखाई गई। हालांकि तबतक प्रधानमंत्री का बनारस का दौरा खत्म हो चुका था।

क्या करते वीसी?

कुलपति यदि प्रशासनिक क्षमता और व्यवहार कुुशलता के भिज्ञ होते तो यह हालात पैदा नहीं होते। वह विश्वविद्यालय में सबसे बड़े अभिभावक होते हैं। लड़कियों की मांग जायज थी। वह केवल छेड़छाड़ का विरोध कर रही थी। यह उनका अधिकार भी है। कुलपति उनकी पीड़ा को सुनते, प्रॉक्टर इसके निराकरण की दिशा में कदम उठाते, वार्डन सांत्वना देते। यह सब तभी संभव भी था जब विश्वविद्यालय प्रशासन में आपस में भी एक बेहतर तालमेल होता। वैसे भी कुलपति विश्वविद्यालय का सर्वोच्च कमांडर होता है। उसकी अनुमति के बगैर सुरक्षा बल की एक हरकत नहीं हो सकती, लेकिन आधुनिक शिक्षा पद्धति के सहारे उच्चस्तरीय शिक्षा देने वाले इस विश्वविद्लाय ने यहां बेहद रुढि़वादी, परंपरागत और अव्यावहारिक तरीके से इसे निबटाने की प्रक्रिया अपनाई। पूरी किरकिरी होने के बाद उसी कुलपति प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी को छात्राओं में बेटियां नजर आ रही हैं। अब वह छात्र-छात्राओं और मीडिया से भी मिल रहे हैं। पूरे घटनाक्रम को अपने खिलाफ साजिश बता रहे हैं। रह रहकर अब भी उनका दंभ सामने आ जा रहा है।

खैर, यह बनारस है। महाकाल के त्रिशूल पर टिकी नगरी में हमेशा पाखंड, अन्याय विरोधी पहराई है। कलकल कर बहती गंगा के पेटे में इतनी पवित्रता है कि ऐसी घटनाएं उनकी उदारता में बह जाया करती हैं।

रंजना

 

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