अमेरिका में राहुल की गप्पबाजी

अमेरिका में राहुल की गप्पबाजी

जिन दिनों सोनिया कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी अमेरिका में गए हुए थे। वहां वे अमेरिका के विश्वविद्यालयों में जाकर भारत में दरपेश समस्याओं के बारे में कम और नरेन्द्र मोदी के बारे में ज्यादा बोल रहे थे। पिछले दिनों वे बर्कले स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के छात्रों को विश्व में दरपेश समस्याओं के समाधान के बारे में बताने के लिए वहां गए थे। वैसे यह अभी भी रहस्य बना हुआ है कि ऐसे जटिल विषय पर बोलने के लिए उन्हें वहां किसने और क्यों निमंत्रित किया? लेकिन यहां हमें इस रहस्य की गुत्थियां समझाने की जरुरत नहीं है क्योंकि यह रहस्य उन वैश्विक समस्याओं से भी ज्यादा गहरा है जिनका समाधान बताने के लिए राहुल गांधी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय गए थे। वहां उन्होंने अमेरिका के विद्यार्थियों से जो गप्पबाजी की वह भारत में चर्चा और मनोरंजन का विषय बन गई है। उन्होंने कहा कि विश्व की सबसे बड़ी समस्या तो अब यह बन गई है कि भारत में दलित और अल्पसंख्यकों का जीवन खतरे में पड़ गया है। उनके साथ भेदभाव तो किया ही जा रहा है, उन्हें मारा भी जा रहा है। उनका कहने का तरीका और मंशा यही थी कि जब से भारत में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आ गई है तब से यह सब कुछ होना शुरु हुआ है और भारत अपना पंथ निरपेक्ष चरित्र खोता जा रहा है। कैलिफोर्निया में इस बात को लेकर राहुल गांधी बहुत दुखी दिखाई दे रहे थे। उनके चेहरे से चाहे वे भाव प्रकट नहीं हो रहे थे लेकिन उनकी भाषा से यही भाव निकल रहा था। वैसे उनकी गप्पबाजी सुन कर वहां बैठे कुछ भारतीय छात्रों को यह भय सताने  लगा था कि कहीं राहुल गांधी वहां के छात्रों और युवा वर्ग से यह अनुरोध न कर दें कि उन्हें अमेरिका में भारतीय अल्पसंख्यकों और दलितों के अधिकारों के पक्ष में एक जबरदस्त आन्दोलन चलाना चाहिए। भारतीय छात्रों का यह डर कुछ सीमा तक सच्चा भी था क्योंकि एक बार सोनिया कांग्रेस के ही दो मोटे सलाहकार (गुजराती में बड़े को मोटे कहते हैं) सलमान खुर्शीद और मणिशंकर अय्यर पाकिस्तान जाकर यह गुहार लगा चुके हैं कि भारत से मोदी सरकार को हटाने के लिए पाकिस्तान को सहायता करनी चाहिए। डर था कि राहुल गांधी अमेरिका में भी

छात्रों से यह अपील कर सकते थे। यही कारण था कि राहुल गांधी जितना देर बोलते रहे, भारतीय छात्र उतनी देर असहज स्थिति में बैठे सुनते रहे।

उसके बाद राहुल गांधी ने अमेरिका के छात्रों को अपने और अपने वंश के बारे में बताया। यह एक प्रकार का उनका अपना दुखद रोना ही था। उन्होंने गोरे छात्रों को बताया कि भारत में लोग मेरे पीछे पड़े रहते हैं कि मैं राजनीति में अपने वंश के कारण हूं, अन्यथा मुझ में कुछ योग्यता नहीं है। इसका उन्होंने जोरदार खंडन किया। उनका कहना था कि अकेले मुझे ही क्यों घेरा जाता है? अमिताभ बच्चन का बेटा अभिषेक बच्चन भी तो अपने बाप के कारण ही फिल्म इंडस्ट्री में डटा हुआ है। मुलायम सिंह का बेटा अखिलेश यादव भी तो अपने पिता के कारण ही मुख्यमंत्री बना। तो फिर मुझे ही निशाना क्यों बनाया जाता है। राहुल गांधी ने उन्हें बताया कि हिन्दुस्तान में तो इसी प्रकार वंशवाद चलता आया है। अमेरिका के वे छात्र जो भारतीय इतिहास में रुचि रखते हैं वे तो अपने टर्म पेपर लिखते हैं कि भारत दुनिया का सबसे पुराना देश है जिसके अनेक भागों में सहस्रों साल पहले गणतंत्रों की परम्परा थी और राहुल गांधी बता रहे थे कि भारत की सत्ता  में वंश परम्परा का चलन रहा है। गोरे छात्र बेचारे सकते में हैं। राहुल गांधी अपने एक ही प्रवास से उनकी सारी मेहनत पर पानी फेर गए। उन्होंने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में मुझसे एक ही गुण ज्यादा है कि वह अच्छा बोलते हैं। बाकी कुछ नहीं।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में पढ़ रहे भारतीय छात्रों को राहुल गांधी की इस गप्पबाजी से एक और संकट का सामना करना पड़ रहा है। कैलाफोर्निया विश्वविद्यालय में पहले ही गोरे छात्र भारतीय छात्रों को यह कह कर चिढ़ाया करते थे कि हिन्दुस्तान तो सांपों का देश है, मदारियों का देश है, अब राहुल गांधी की इस गप्पबाजी से उनका नाम भी इस लिस्ट में जुड़ गया है। भारत तो राहुल गांधी जैसे युवाओं का देश है। भारतीय छात्रों को यह समझाने में अत्यन्त कठिनाई आ रही है कि भारत केवल राहुल गांधी जैसे युवाओं का देश नहीं है, वह करोड़ों मेधावी युवाओं से भरा पड़ा है। वैसे भी अब राहुल गांधी भी युवा नहीं है, वे भी खुदा के फजल से लगभग अधेड़ होने की उम्र तक पहुंच गए हैं। राहुल गांधी तो अपनी गप्पबाजी करके वापिस भारत आ गए, लेकिन कैलाफोर्निया विश्वविद्यालय में वे भारतीय छात्रों को संकट में डाल आए हैं। लोगों के प्रश्नों का उत्तर देते देते वे थक गए हैं।

लेकिन इधर अपने वतन हिन्दुस्तान में सोनिया कांग्रेस के लोग राहुल गांधी की इस गप्पबाजी को विश्व के बौद्धिक जगत की महान उपलब्धि बताते नहीं थकते। उनके अनुसार राहुल गांधी ने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में अपनी बौद्धिक क्षमता का जो प्रकटीकरण किया है, उससे बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों ने दांतों तले उंगलियां दबा ली हैं। कईयों ने तो उत्साह में आकर इतने जोर से दबा लीं कि उंगली कट गई और खून रुकने का नाम नहीं ले रहा। उधर भाजपा के लोग डरे बैठे हैं कि उंगली से खून निकलने का दोषारोपण भी कहीं दिग्विजय सिंह उन्हीं पर न थोप दें। काफी देर चुप्पी रहने के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री भी उत्साह में आ गए हैं। वे भी राहुल गांधी की इस गप्पबाजी को उत्कृष्ट बता रहे हैं। गोवा के कांग्रेस अध्यक्ष ने तो यह स्पष्ट कर दिया है कि अब वक्त आ गया है कि राहुल गांधी को कांग्रेस की कमान सौंप दी जाए। उन्होंने यह कैलिफोर्निया की गप्पबाजी के उत्साह में आकर कहा है या अन्य किसी कारण से, यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया।

कैलिफोर्निया में वहां के लोगों का मार्गदर्शन करने के बाद वे न्यू जर्सी के प्रिंसटन विश्वविद्यालय पहुंचे। वहां भी उन्होंने हिन्दुस्तान की विदेश नीति की चर्चा की। उनका कहना है कि भारत और चीन को मिल कर काम करना चाहिए, जिससे पूरी दुनिया को लाभ होगा। भारत और चीन की आबादी मिल कर आधी दुनिया की रचना करती है। इसलिए इन दोनों देशों के आपसी गहरे सम्बंध जरुरी हैं। ये सभी तर्क बहुत पुराने हैं। इन तर्कों से कोई इन्कार नहीं कर सकता और कोई कर भी नहीं रहा है। राहुल गांधी के पिता जी के नाना, जो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे, वे भी यही तर्क सुनाते सुनाते बीजिंग तक गए थे। वे भी चीन को साथ लेकर पंचशील की साधना करना चाहते थे। लेकिन चीन को साथ मिल कर साधना की भी एक निश्चित इतिहास सम्मत पद्धति है। नेहरु ने वह पद्धति जानने बूझने की कोशिश तो नहीं की, अलबत्ता बिना पद्धति जाने साधना जरुर शुरु कर दी। उसका जो परिणाम हुआ उसे आजतक भारत भुगत रहा है। तिब्बत पर चीन का कब्जा हो गया, अक्साई चिन पर चीन ने कब्जा कर लिया, 1962 में चीन ने भारत पर हमला ही कर दिया। आज तक भी वह भारत के इलाके पर अपना जताता  रहता है। नेहरु के चले जाने के बाद भी लम्बे अरसे तक कांग्रेस का ही राज रहा। कांग्रेस का भी नहीं बल्कि नेहरु-गांधी खानदान का ही रहा। उस राज में भी कांग्रेस नेहरु की चीन नीति पर चलती रही। चीन को मत छेड़ो, वह कहीं नाराज न हो जाए। वह भारत की सीमा पर कोई छेड़छाड़ भी करता है तब भी चीन से दूर ही रहना चाहिए। भारत की इस नीति से चीन का उत्साह बढ़ता है लेकिन भारत आंखें बन्द किए रहता है। राहुल गांधी अभी भी न्यू जर्सी में बैठ कर नेहरु के जमाने की पद्धति से बांसुरी बजा रहे हैं। चीन के साथ सम्बंध जरुर अच्छे होंगे और होने भी चाहिए लेकिन उसके लिए बांसुरी डोकलाम की पद्धति से बनानी चाहिए। चीन उसी पद्धति को अच्छी तरह समझता है। नरेन्द्र मोदी यही कर रहे हैं।

इधर दिल्ली में एक और टिप्पणी घूम रही है। उसके अनुसार दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ के चुनावों में छात्रों ने राहुल गांधी के कैलिफोर्निया वाले भाषण को पढ़ कर ही उनकी पार्टी को विश्वविद्यालय के छात्र संघ के चुनाव में जिता दिया। अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो सका कि यह टिप्पणी गंभीरता से की गई है या चुटकुला समझ कर, क्योंकि आजकल चुटकुलों से गंभीर बातें कहीं जा रही हैं और और गंभीर बातों को चुटकुले बनाया जा रहा है।

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

 

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