बिहार की राजनीति में उलट पलट

बिहार की राजनीति में उलट पलट

लालू यादव, नितीश कुमार और रामविलास पासवान, ये तीन ही आज बिहार की राजनीति के मुख्य बिंदु रहे हैं। इन तीनों नेताओं के उभार से पहले बिहार की राजनीति में उच्च जातियों (ब्राहा्रण-भूमिहार-राजपूत) से आने वाले नेताओं का ही बोलबाला था। देश की आजादी से लेकर 1990 तक बिहार में ज्यादा समय तक इन्हीं तीनों जातियों से संबंधित नेता ही बिहार के मुख्यमंत्री पद पर काबिज रहे। आजादी से 1990 तक बिहार में केवल कांग्रेस पार्टी का ही बोलबाला था। कांग्रेस पार्टी में उच्च जाति से जुड़े हुए नेताओं की ही तूती बोलती थी। बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डा. श्रीकृष्ण सिंह से लेकर डॉ. जगन्नाथ मिश्रा, सभी कांग्रेसी, उच्च जाति के नेताओं के हाथों में ही सता की बागडोर रही। बीच में कुछ समय के लिए दरोगा प्रसाद राय व कर्पूरी ठाकुर जैसे पिछड़े जाति के नेता मुख्यमंत्री के पद पर आसीन रहे। 1990 का दशक पिछड़े जाति के नेताओं लालू, नीतीश और रामविलास पासवान के उभार के नाम रहा। लालू जहां यादव जाति से, तो नीतीश कुमार वहीं कुर्मी जाति से और रामविलास दलित जाति से बिहार की राजनीति में जोरदार तरीके से उभरें। उस समय से अभी तक इन्हीं नेताओं के हाथों में बिहार की सता की बागडोर रही।

1990 में लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने। बिहार के गोपालगंज जिले के फुलवरिया गांव के एक साधारण किसान परिवार कुंदन राय और मरछिया देवी के यहां 11 जून 1948 को दूसरे सुपुत्र के रूप में लालू यादव का जन्म हुआ। लालू यादव 1990-1997 तक मुख्यमंत्री पद पर आसीन रहे। चारा घोटाले में नाम आने के बाद 1997 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और लालू ने अपनी धर्मपत्नी राबड़ी देवी को अपनी जगह मुख्यमंत्री बनाया। 1997 से लेकर 2005 तक राबड़ी देवी लगातार इस पद पर आसीन रहीं। इस तरह से 15 वर्षों तक लगातार लालू यादव का बिहार की सता पर कब्जा रहा। 7 पुत्रियों और 2 पुत्रों की पिता लालू ने धीरे-धीरे अपनें पुत्रों को भी राजनीतिक जड़ मजबूत बनाने में लग गए। इसी कड़ी में लालू यादव ने 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन बनाया, जिसमें इनकी पार्टी राजद, नीतीश की पार्टी जद यू और कांग्रेस ने बहुमत से ज्याादा सीट हासिल की। नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में सरकार बनी। लालू यादव के दोनों बेटे इस चुनाव में विधायक बनने में कामयाब रहे और इन्हें नीतीश कुमार की सरकार में महत्वपूर्ण विभागों वाले मंत्री पदों पर बैठाने में लालू यादव कामयाब हो गए। बड़े बेटे तेजप्रताप यादव को स्वास्थ्य मंत्री तो छोटे बेटे तेजस्वी यादव को बिहार के उपमुख्यमंत्री जैसे अहम पद पर बैठाया। लालू के उपमुख्यमंत्री बेटे तेजस्वी यादव अब बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं। तेजस्वी लगातार जोरदार तरीके से लालू के अंदाज में विपक्ष को हमलावर और ताकतवर बनाने की जुगत में भिड़ गए हैं, पर क्या वे बिहार की जनता के बीच में अपने पिता की ही तरह जुड़ाव बनाने में कामयाब हो पायेंगे या नहीं, इस यक्ष प्रश्र का जवाब भविष्य के गर्भ में ही छिपा है।

इससे पहले यह देखना है कि लालू परिवार सी.बी.आई. के चंगुल से कैसे अपने आप को बचाव करने में कामयाब हो पाता है? लालू की पूरे परिवार पर लगभग सी.बी.आई. ने विभिन्न धाराओं के अंतर्गत केस दर्ज किया है, जिसके कारण ही नीतीश कुमार ने महागठबंधन से नाता तोड़कर भाजपा के साथ गठजोड़ करने में कामयाब रहें।

यह कोई जरूरी नहीं कि पिता यदि एक सफल और लोकप्रिय नेता हों तो उसके पुत्र भी उतना ही सफल और लोकप्रिय साबित हों, यह बात सभी क्षेत्रों में समान और तार्किक ढंग से लागू होती है, कुछ अपवादों को छोड़कर, जिसमें कभी-कभी पुत्रों ने अपने पिता से भी ज्यादा सफलता और लोकप्रियता हासिल किया हो! खासतौर से राजनीति के क्षेत्र में तो यह बात और भी कारगर साबित होती है। भारत की राजनीति में केवल नेहरू-गांधी परिवार को छोड़कर शायद ही दूसरा परिवार उतना सफलता पाया जितना की इस परिवार ने। पंडित नेहरू स्वंय भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बनें, इनके बाद इनकी पुत्री इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। इंदिरा गांधी के बाद फिर इनके पुत्र राजीव गांधी भी प्रधानमंत्री बनें और फिर इनकी पत्नी सोनिया गांधी भी लगातार 10 वर्षों तक सता को अपने हाथों में रखीं। परंतु यही राजनीतिक रूपी पारिवारिक सफलता बिहार के तीन बैकवर्ड जाति से संबंधित नेता लालू यादव-नीतीश कुमार-रामविलास पासवान के परिवारों पर सफल होती नहीं दिख रही!!

पहले बात करते हैं बिहार के पिछड़े जातियों के सबसे प्यारे-दुलारे-न्यारे और लोकप्रिय राजनेता लालू प्रसाद यादव की। 1990 से 2005 तक लगातार 15 वर्षों तक एकछत्र राज्य करने वाले लालू यादव के 7 पुत्रियां और 2 पुत्र हैं। कुल 9 बच्चों के पिता लालू के 3 बच्चें मुख्य रूप से राजनीति में सक्रिय हैं, जिन्में अपनें सभी 9 भाई-बहनों में सबसे बड़ी डॉ. मीसा भारती, अभी राज्यसभा की सांसद हैं। मीसा भारती अपनी मां राबड़ी देवी की मुख्यमंत्रित्व काल में भी पर्दे के पीछे से सता की बागडोर अपने हाथों में रखने के लिए जानी जाती थीं। उस समय लालू के दोनों बेटें तेजप्रताप और तेजस्वी छोटे थें और उन्हें राजनीति का क-ख-ग भी नहीं पता था, पर उस समय मीसा भारती उम्र में सबसे बड़ी और अनुभवी होने के कारण राजनीति में काफी सक्रिय रहती थीं, इसका कारण था अपनी मां का अशिक्षित होना और अपने पिता का चारा घोटाले के मामले में जेल से अंदर-बाहर होते रहना। मीसा भारती उस समय बिहार के सारे प्रशासनिक और पुलिस सेवाओं के अधिकारियों के तबादलें की कमान अपने हाथों में ही रखती थीं। अभी हाल ही में सी.बी.आई., प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग ने राबड़ी देवी, मीसा भारती,लालू के छोटे बेटे तेजस्वी और खुद लालू यादव पर भी शिकंजा तेज करता जा रहा है और विभिन्न धाराओं में केस भी दर्ज की है। वर्तमान में  लालू के परिवार के सभी सदस्यों पर सी.बी.आई. का शिकंजा कसता ही जा रहा है, शिवाय लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव को छोड़कर। लालू यादव, राबड़ी देवी, मीसा भारती और तेजस्वी यादव सभी को सी.बी.आई. और आयकर विभाग ने पूछताछ के लिए नई सम्मन जारी किया है और कुछ मामलों में तो केस दर्ज करके चार्जशीट भी दाखिल कर दिया है। लालू के पूरे परिवार पर गिरफ्तारी की तलवार लटकती नजर आ रही है।  केवल लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव को छोड़कर बाकी लालू के परिवार के राजनीति में सक्रिय सभी सदस्यों जिनमें खुद लालू यादव, पत्नी राबड़ी देवी, पुत्री मीसा भारती और पुत्र तेजस्वी, सभी किसी न किसी मामले में अभियुक्त बन गए हैं।

लालू जैसी आम जनता के बीच पकड़, लोकप्रियता, गांव-गवईं वाली ठेठ देहाती अंदाज, उनकी जैसी प्रभावशाली भाषण जो जनता से सीधे तौर पर जुड़ाव कायम  कर पाने में कामयाब रहते हैं, लालू के दोनों पुत्रों में कहीं से भी देखनें को नहीं मिलती है। बड़ा बेटा तो लालू यादव के लोकप्रिय छवि को धूमिल ही करता नजर आ रहा है। हां यह बात और है कि इनके छोटे बेटे तेजस्वी में जरूर अपने पिता की छवि को कुछ हद तक बचाने में जरूर कामयाब होते दिख रहें हैं। और यही कारण था कि छोटे पुत्र होने के बावजूद भी तेजस्वी को बड़े भाई तेजप्रताप पर प्राथमिकता देते हुए बिहार का उपमुख्यमंत्री बनाया गया था।

अब आते हैं हम बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के परिवार के राजनीतिक विरासत पर। इनका एक ही पुत्र है- निशांत कुमार , जिसे राजनीति से कुछ भी लेना-देना नहीं है। निशांत कुमार भारत के टॉप 10 में आने वाले इंजीनियरिंग कॉलेज बी.आई.टी. मेसरा, जो कि झारखंड राज्य की राजधानी रांची के पास स्थित है, का छात्र हुआ करते थे। किन्तु अपनी मां के अचानक मृत्यु हो जाने के कारण मानसिक अवसाद का शिकार हो जाने के कारण अपनी पढाई बीच में ही छोड़ दी। अभी निशांत कुमार एक आम नागरिक के जैसा जीवन व्यतीत कर रहे है, जिसे कि राजनीति से दूर-दूर तक कुछ भी लेना-देना नहीं है। कभी-कभार निशांत अपने पिता के साथ नजर आ जाते हैं, वो भी गैर-राजनीतिक कार्यक्रम में ही। अर्थात नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत इनके बाद शून्य ही है।

और अब अंत में बात करते हैं लोक जनशक्ति पार्टी सुप्रीमों और केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान की। दलित राजनीति में रामविलास पासवान एक बड़े राजनेता के रूप में जाने जाते हैं। बी.जे.पी. की नेतृत्व वाली गठबंधन एन.डी.ए. हो या कांग्रेस की नेतृत्व वाली यू.पी.ए. की सरकार हो, सभी में ही यह दलित नेता अपनी केन्द्रीय मंत्री की एक सीट पर कब्जा जमाने में कामयाब हो ही जाता है, चाहे परिस्थितियां कैसी भी क्यों न हो। रामविलास पासवान की दूसरी पत्नी से एकमात्र पुत्र है, चिराग पासवान। चिराग मोदी लहर में बिहार के जमुई संसदीय क्षेत्र से 2014 के लोकसभा चुनाव में जीत हासिल कर पहली बार सांसद बनने में कामयाब हो गए। चिराग अभी लोजपा के संसदीय दल के अध्यक्ष भी हैं। 2014 के आम चुनाव में लोजपा को कांग्रेस-राजद के साथ छोड़कर मोदी लहर के साथ चलने में ही भलाई है, का सुझाव चिराग पासवान का ही था। चिराग का यह सुझाव लोजपा और रामविलाास की डूबती राजनीतिक नैया को बचाने में कामयाबी मिल गयी। लोजपा के अभी 4 लोकसभा के सांसद हैं, जबकि 2009 के आम चुनाव में तो लोजपा अपना खाता भी नहीं खोल सकी थी। और तो और खुद रामविलास पासवान भी रिकार्ड मतों से चुनाव जीतने वाला अपनी पसंदीदा सुरक्षित संसदीय क्षेत्र हाजीपुर से चुनाव हार गए थें। रामविलास पासवान के परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढाने का जिम्मा वैसे तो चिराग पासवान के कंधों पर ही है, और चिराग इस जिम्मेदारी को निभाने का पूरा प्रयास भी कर रहें हैं। परंतु चिराग में भी अपनी पिता की तरह आम जनता के बीच गहरी पैठ जमाने की क्षमता का अभाव ही नजर आ रहा है। वैसे तो रामविलास के दो छोटे भाई भी राजनीति में सक्रिय हैं, जिनमें एक भाई रामचंद्र पासवान अभी लोकसभा में सांसद हैं तो वहीं छोटे भाई पशुपति कुमार पारस लोजपा के बिहार प्रदेश अध्यक्ष हैं, बिहार विधान परिषद् के सदस्य होने के साथ-साथ अभी हाल में ही नवगठित बिहार सरकार में मंत्री बनने में भी कामयाब हो गए।

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अंत में हम कह सकतें है कि इन तीनों बिहारी दिग्गज नेताओं के पुत्रों में अपने पिता की जैसी लोकप्रिय छवि तो दूर की बात है, इनके आस-पास भी खड़े होने की भविष्य में कहीं कोई गुंजाइश नजर नहीं आती दिख रही है, बाकि भविष्य में क्या होगा…यह यक्ष प्रश्र है। मीडिया जगत के बड़े-से-बड़े दिग्गज पत्रकार भी लालू यादव का इंटरव्यू लेने या किसी अन्य मुद्दों पर ‘बाइट’ लेने जाने से पहले खुद को असहज महसूस करते हैं। इसका कारण है लालू यादव का बेबाक, सपाट, और बिना लाग-लपेट के बोलना। पत्रकारों का प्रश्र अभी खत्म भी नहीं होता है कि लालू यादव का जवाब हाजिर रहता है। लालू की हाजिरजवाबी का मीडिया भी दीवानी रहती है। बाकी नेताओं के समय मीडिया उनपर हमलावार रहती है पर लालू के समय खुद लालू ही मीडिया वालों पर हमलावर का रूख धारण कर उनपर चढ जाते हैं और ऐसा लगता है कि मीडिया वाले नहीं बल्कि खुद लालू ही उनका इंटरव्यू ले रहे हों।

लालू यादव- नीतीश कुमार- रामविलास पासवान, इन तीनों नेताओं की सफलता के पीछे का मुख्य कारण है कि इतने बड़े नेता हो जाने के बावजूद भी आम जनता और जमीन से जुड़ाव का नहीं छोडऩा। चुनाव के समय ये गांव-गांव, खेत-खलिहान, धूल-बारिश की परवाह न करते हुए किसानों गरीबों तक एकाएक पहुंच जाना। यह एक ऐसी वजह है जिससे बिहार की गरीब जनता पिछले चार-पांच सालों के विकास न कर पाने के बावजूद भी वहां की जनता इनके लिए अपना जी- जान लगा देते हैं और यही मुख्य कारण है इन तीनों की सफलता का, जो की इनके संतानों में कहीं से भी देखनें को नहीं मिलती है।

लालू और रामविलास के बेटे कीमती एक्सयूवी लग्जरी गाडिय़ों में सवार, गले में मोटे-मोटे सोने के सीकड़ -हाथ में मंहंगी ब्रेसलेट पहनकर, आम जनता के बीच जाते हैं। ये ज्यादातर मौकों पर तो अपनी लग्जरी ए.सी. लगी गाडियों से भी नहीं उतरते हैं कि गर्मी में ए.सी. से बाहर क्या निकलना और कहीं इनके मंहंगी पोशाकें धूल-धड़कण में कहीं गंदा न हो जाए। ऐसा करने से गरीब किसानों के बीच ये संदेश जाता है कि इनके बेटे हमलोगों की क्या सेवा करेंगे जो कि हमेशा भव्य हाई-परोफाईल जीवन जीने के आदि हैं, इन्हें हम गरीबों की दु:ख-दर्द की क्या एहसास?

 

आशुतोष कुमार

 

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