रोहिंग्या मुसलमान आतंकी हैं इसमें कोई शक?

रोहिंग्या मुसलमान  आतंकी हैं इसमें कोई शक?

रोहिंग्या मुस्लिम आतंकी हैं या शरणार्थी? अंतर्राष्ट्रीय हल्कों में यह चर्चा का विषय बना हुआ है। भारत में तो वह पहले से ही विवाद का विषय बना हुआ है। हजारों की संख्या में रोहिंग्या शरणार्थी म्यांमार से अलग अलग रास्तों से भागे हैं और बांग्लादेश गए हैं। मगर भारत के लिए रोहिंग्या मुस्लिमों का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे पहले ही  हजारों के तादाद में भारते में घुसपैठ करके यहां बस चुके हैं।

रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में शरण देने के मामले ने इसलिए तूल पकड़ा है क्योंकि कई राजनीतिक दल और एक तरफ मानवाधिकार संगठन भारत सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि इन शरणार्थियों को देश में ही रहने दिया जाए वहीं सरकार का मानना है कि रोहिंग्या मुसलमान अवैध प्रवासी हैं और इसलिए कानून के मुताबिक उन्हें बाहर किया जाना चाहिए। अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया है। सुप्रीम कोर्ट में रोहिंग्या शरणार्थियों की तरफ से दायर एक याचिका में कहा गया कि रोहिंग्या मुसलमानों का प्रस्तावित निष्कासन संविधान धारा 14 (समानता का अधिकार) और धारा 21 (जीवन और निजी स्वतंत्रता का अधिकार) के खिलाफ है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन के आंकड़ों के मुताबिक फिलहाल देश में 14,000 रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थी रहते हैं। इस पर सरकार का कहना है कि वह संयुक्त राष्ट्र की ओर से इन्हें शरणार्थी कहे जाने की बात के साथ नहीं है और इन्हें देश में घुसे अवैध लोगों के तौर पर देखती है। ऐसे में फॉरनर्स ऐक्ट के तहत सरकार इन्हें हिरासत में लेने, गिरफ्तार करने सजा देने और प्रत्यर्पण करने का अधिकार रखती है। रोहिंग्या मुस्लिमों को वापस म्यांमार भेजने की योजना पर केंद्र सरकार ने 16 पन्नों का हलफनामा दायर किया है। इस हलफनामे में केंद्र ने कहा कि कुछ रोहिंग्या शरणार्थियों के पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों से संपर्क का पता चला है। ऐसे में ये राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से खतरा साबित हो सकते हैं। भले ही केंद्र सरकार इन लोगों को देश से बाहर निकालने का प्रस्ताव तैयार करने में जुटी है, लेकिन यह इतना आसान भी नहीं होगा। म्यांमार इन लोगों को आधिकारिक तौर पर अपना नागरिक नहीं मानता और इन्हें बंगाली करार देता है, तो बांग्लादेश इन्हें अपना मानने को तैयार नहीं है। प्रधानमंत्री शेख हसीना ने संयुक्त राष्ट्र में कहा रोहिंग्या लोग स्वदेश लौट नहीं पाएं इसके लिए म्यांमार ने सीमा पर बारूदी सुरंगें बिछा दी है।

आखिर कौन है रोहिंग्या? वे अपना देश छोडऩे को क्यों मजबूर हैं? रोहिंग्या शरणार्थियों की समस्या  म्यांमार के बौद्ध और मुस्लिमों के संघर्ष का नतीजा है। मुस्लिम म्यांमार में अल्पसंख्यक है मगर बौद्ध बहुसंख्यकों के साथ उनकी पटरी नहीं बैठती।  नतीजतन रोहिंग्या कट्टरतावाद और अलगाववाद के रास्ते पर चल पड़े। इस आतंकवाद और अलगावाद ने रोहिंग्याओं को बहुसंख्यक बौद्धो, म्यांमार सरकार और सेना के मिलेजुले कोप का निशाना बनाया। उन्हें म्यांमार छोड़कर भागने के लिए मजबूर कर दिया। कोई भी पड़ोसी देश उन्हें शरण देना नहीं चाहता। म्यांमार की यह कहानी भारत में भी इसलिए गूंज रही है क्योंकि हजारों की संख्या में रोहिंग्या शरणार्थी के रूप में भारत में आने से यह मुद्धा भारतीय राजनीति में भी अहम मुद्धा बन गया है। इसके इर्दगिर्द राजनीति हो रही है। जनमत दो हिस्सों में बंटता जा रहा है। एक तबका मानता है कि रोहिंग्याओं को मानवीय आधार पर शरण दी जाए तो दूसरा तबका मानता है कि रोहिंग्याओं के रिश्ते आतंकी संगठनों से है। उन्हें शरण देना देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक होगा। वैसे ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो मानते हैं कि मानवीयता के नाम पर हर शरणार्थी की मदद करके देश को धर्मशाला नहीं बनाया जा सकता।

रोहिंग्याओं को बिना देश का बेबस नागरिक कहा जाता है। इसकी अजीब दास्तान है। म्यांमार में करीब 8 लाख रोहिंग्या मुस्लिम रहते हैं और वे इस देश में पिछली कुछ सदियों से रहते आए हैं, लेकिन बर्मा के लोग और वहां की सरकार इन लोगों को अपना नागरिक नहीं मानती, बांग्लोदेशी मानती है। बिना किसी देश के इन रोहिंग्या लोगों को म्यांमार में दमन का सामना करना पड़ता है। बड़ी संख्या में रोहिंग्या लोग बांग्लादेश और थाईलैंड की सीमा पर स्थित शरणार्थी शिविरों में अमानवीय स्थितियों में रहने को विवश हैं।  मगर वे खुद भी अपनी इस स्थिति के लिए कम दोषी नहीं हैं क्योंकि उन्होंने कभी मेलजेल का नहीं अलगाव का रास्ता चुना और उसके शिकार हो गए। वे बौद्धों से ही नहीं हिन्दुओं से भी दुश्मनी रखते थे जो वहां के अल्पसंख्यक थे। म्यांमार की सेना ने दावा किया है कि हिंसाग्रस्त क्षेत्र रखाइन स्टेट से 28 हिंदुओं की सामूहिक कब्र मिली है। सेना के दावों के मुताबिक रोहिंग्या मुस्लिम आतंकियों ने इन हिंदुओं का कत्ल किया है। पोस्ट के मुताबिक रखाइन राज्य में अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (एआरएसए) के आतंकियों ने काफी क्रूर और हिंसक तरीके से इन हिंदुओं की हत्या की है। म्यांमार सरकार का दावा है कि एआरएसए समूह ने पुलिस चौकियों पर हमले किये, जिसके बाद सेना ने इतना बड़ा अभियान चलाया कि संयुक्त राष्ट्र का मानना है मुस्लिम अल्पसंख्यकों का सफाया हुआ है। एक महीने के भीतर ही इस क्षेत्र से 430000 से ज्यादा रोहिंग्या शरणार्थी के रूप में बांग्लादेश भागने के लिए मजबूर हुए हैं। इलाके में रहने वाले करीब 30000 हिंदू और बौद्ध भी विस्थापित हुए। इनमें से कुछ का कहना है कि रोहिंग्या आतंकवादियों ने उन्हें डराया-धमकाया। सेना ने कहा है कि सुरक्षा अधिकारियों को कब्रों में 20 महिलाएं और आठ पुरुषों के शव मिले हैं। इनमें से छह लड़कों की उम्र दस साल से कम थी।

रोहिंग्याओं की कहानी अलगाववाद और उग्रवाद की लंबी दास्तान है। बौद्ध धर्म की महायान शाखा को मानने वाला म्यांमार भारत, थाईलैंड, लाओस, बंग्लादेश और चीन से घिरा हुआ देश है। बर्मा में भी मुस्लिम कन्वर्जन के साथ संसार के अन्य सभी देशों में होने वाली उथल-पुथल शुरू से है। मगर इसकी स्थिति द्वितीय विश्व युद्ध के काल में विस्फोटक हुई। रोहिंग्या मुसलमानों ने  शक्ति और संख्या बढ़ते ही इस्लामी राष्ट्र के निर्माण के लिए जेहाद छेड़ दिया। 28 मार्च 1942 के रोहिंग्या मुसलमानों ने म्यांमार के मुस्लिम-बहुल उत्तरी अराकान क्षेत्र में करीब 20,000 बौद्धों को मार डाला था।

भारत विभाजन से पहले म्यामार के रोहिंग्या मुस्लिम नेताओं ने भारत के मोहम्मद अली जिन्ना से संपर्क किया और मायू क्षेत्र को पूर्वी पाकिस्तान में शामिल कराने के लिए उनकी सहायता मांगी। इसका उद्देश्य भी अराकान के सीमांत जिले मायू को पूर्वी पाकिस्तान में मिलाना था लेकिन बर्मा सरकार ने मायू को स्वतंत्र इस्लामी राज्य बनाने या उसे पाकिस्तान में शामिल करने से इनकार कर दिया।

इस पर उत्तरी अराकान के मुजाहिदों ने बर्मा सरकार के खिलाफ जिहाद की घोषणा कर दी। मायू क्षेत्र में लूट, हत्या, बलात्कार एवं आगजनी का भयावह खेल शुरू हो गया और कुछ ही दिनों में इन दोनों शहरों से बौद्धों को या तो मार डाला गया अथवा भगा दिया गया।

Rohingya people fled from oppression in Myanmar

अपनी जीत से उत्साहित होकर सन 1947 तक पूरे देश के प्राय: सभी मुसलमान एकजुट हो गये एवं मुजाहिदीन मूवमेंट के नाम से बर्मा पर मानों हमला ही बोल दिया गया। यहां से हो रही लगातार देशविरोधी गतिविधियों ने पूरे देश को परेशान कर रखा था। आखिरकार बर्मा सरकार ने इस इलाके में सीधी सैनिक कार्रवाई शुरू कर दी। विश्व के लगभग सभी मुस्लिम राष्ट्रों ने बर्मा सरकार के इस अभियान की निंदा की।

दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति और 1962 में जनरल नेविन के नेतृत्व में तख्तापलट की कार्रवाई के दौर में रोहिंग्या मुस्लिमों ने अराकान में एक अलग रोहिंग्या देश बनाने की मांग रखी, लेकिन तत्कालीन बर्मी सेना के शासन ने रंगून पर कब्जा करते ही अलगाववादी और गैर राजनीतिक दोनों ही प्रकार के रोहिंग्या लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की। सैनिक शासन ने रोहिंग्या लोगों को नागरिकता देने से इनकार कर दिया और इन्हें बिना देश वाला (स्टेट लैस) बंगाली घोषित कर दिया।


 

बौद्ध बनाम मुस्लिम


 

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अमेरिकी लेखक सेमुअल हटींगटन ने कहा था भविष्य में राजनीतिक विचारधाराओं के बीच नहीं  सभ्यताओं या धर्मों  के बीच संघर्ष होगा। दक्षिण एशिया में यही हो रहा है। रोहिंग्या शरणार्थियों की समस्या म्यांमार के बौद्ध और मुस्लिमों के संघर्ष का नतीजा है। मगर यह संघर्ष केवल म्यांमार तक ही सीमित नहीं है बल्कि श्रीलंका और थाइलैंड में भी बौद्ध लोग धर्म के नाम पर मुसलमानों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। इन सभी देशों में मुस्लिम अल्पसंख्यक है मगर बौद्ध बहुसंख्यक उनके खिलाफ अभियान छेड़े हुए हैं। इस अभियान की बागडोर उग्रवादी बौद्ध संगठनों और उसके सूत्रधार शांतिप्रिय और ध्यान में निमग्न रहनेवाले बौद्ध भिक्षुओं के हाथों में है। बौद्ध भिक्षुओं का नाम आता है तो लगता है कोई धीर गंभीर, सरल सीधा साधु महात्मा होगा, बोलता होगा तो मुख से हर वक्त शांति, प्रेम और सद्भाव की बातें झरती होंगी। मगर म्यांमार (बर्मा) के बौद्ध भिक्षु अशीन विराथू, श्रीलंका के गनसारा और विथानागे पर ये सब बातें लागू नहीं होतीं। वो जहर उगलते हैं।  इसलिए यह सवाल उठ रहा है कि बौद्ध भिक्षु क्यों शांति और अहिंसा के बजाय क्रांति पर उतर आए हैं? क्यों वो मुसलमानों के खिलाफ आग उगल रहे हैं।

कई लोगों को समझ नहीं आ रहा है कि इतना सहिष्णु और अहिंसक बौद्धधर्म अचानक से क्यों गुस्से में है। यह सब हो रहा है बर्मा और श्रीलंका में जो एकदूसरे से करीब एक हजार मील दूर हैं। कारण यह है कि यहां के बौद्ध और बौद्धभिक्षु बौद्ध देशों में बढ़ते इस्लामी विस्तारवाद के खिलाफ हैं। इनका मानना है एक समय था जबकि संपूर्ण एशिया में बौद्ध धर्म सत्ता के शिखर पर था। लेकिन इस्लाम के उदय के बाद बौद्ध धर्म ने दक्षिण एशिया के बहुत से राष्ट्र खो दिए।…विराथु कहते हैं कि उनका धर्म खतरे में है। उनका कहना है ‘इस्लाम पहले ही इंडोनेशिया, मलेशिया, अफगानिस्तान और पाकिस्तान को जीत चुका है। यह सब बौद्ध देश थे। इसी तरह इस्लाम दूसरे बौद्ध देशों को भी जीत सकता है।’ यह शिकायते उन्हें मुस्लिम विरोधी बनाती है। वे नही चाहते कि यह इतिहास उनके देश में दोहराया जाए। इसलिए मुस्लिम विरोधी अभियान छेड़े हुए हैं।

इन बौद्ध भिक्षुओ में सबसे चर्चित और उग्र है म्यांमार के अशिन विराथु। कोई उन्हें ‘आग उगलता बौद्ध भिक्षु’ कहता है तो कोई ‘बौद्ध आतंकवाद का चेहरा’ तो कोई ‘बौद्ध बिन लादेन’ म्यांमार में जब रोहिंग्या अलगाववाद ने उग्र रूप ले लिया तो पूरे देश में बौद्धों पर हमले होने लगे। ऐसे में सामने आये मांडले के बौद्ध भिक्षु अशीन विराथु जिन्होनें अपने प्रभावशाली भाषणों से जनता को ये एहसास कराया कि यदि अब भी वो नहीं जागे तो उनका अस्तित्व ही मिट जाएगा। इसी दौरान कुछ हिंसक झड़पें हुईं कई बौद्ध मारे गये। आखिर लोग भड़क उठे। यहां तक कि बौद्ध भिक्षुओं ने भी हथियार उठा लिये। अशीन विराथु चर्चा में तब आए जब वे 2001 में कट्टर राष्ट्रवादी और मुस्लिम विरोधी संगठन ‘969’ के साथ जुड़े। वो अब इसके संरक्षक हैं। यह संगठन बौद्ध समुदाय के लोगों से अपने ही समुदाय के लोगों से खरीदारी करने, उन्हें ही संपत्ति बेचने और अपने ही धर्म में शादी करने की बात करता है। ‘969’ के समर्थकों का कहना है कि यह पूरी तरह से आत्मरक्षा के लिए बनाया गया संगठन है जिसे बौद्ध संस्कृति और पहचान को बचाने के लिए बनाया गया है। विराथु भाषणों में जहर उगलते हैं। कई बार उनके भाषणों से ही दंगे-फसाद हो जाते हैं। उनके निशाने पर रहते हैं रोहिंग्या मुसलमान। एक बार जब विराथु से पूछा गया कि क्या वे ‘बर्मा के बिन लादेन’ हैं, तो उन्होंने कहा कि वे इनकार नहीं करेंगे। विराथू की शोहरत 2013 को टाइम मैगजीन तक पहुंच गई। मैगजीन के फ्रंट पेज पर उनकी तस्वीर छपी। हेडिंग  थी- बुद्धिस्ट आतंकवाद का चेहरा। उन्होंनें बौद्धों से साफ कहा कि अब यदि हमें अपना अस्तित्व बचाना है तो अब शांत रहने का समय नहीं रहा। देश से बौद्धों का सफाया हो जाएगा और बर्मा मुस्लिम देश हो जायेगा..।

मुस्लिमों के खिलाफ आग उगलनेवाले विराथु का कहना है कि मुस्लिम अल्पसंख्यक बौद्ध लड़कियों को फंसाकर शादियां कर रहे हैं एवं बड़ी संख्या में बच्चे पैदा करके पूरे देश के जनसंख्या-संतुलन को बिगाडऩे के मिशन में दिन रात लगे हुए हैं, जिससे बर्मा की आन्तरिक सुरक्षा को भारी खतरा उत्पन्न हो गया है। इनका कहना है कि मुसलमान एक दिन पूरे देश में फैल जाएंगे और बर्मा में बौद्धों का नरसंहार शुरू हो जाएगा। विराथू का कहना है, ”पहले धर्म और जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता था। हम भाईचारे के साथ रहते थे, लेकिन मुसलमानों के मास्टर प्लान के बारे में पता चलने के बाद हम और अधिक चुप नहीं रह सकते।’’

विराथु ने अपने देश से हजारों मुसलमानों को भागने पर मजबूर कर दिया। मंडाले के अपने मासोयिन मठ से लगभग दो हजार पांच सौ भिक्षुओं की अगुआई करने वाले विराथु के फेसबुक पर हजारों फालोअर्स हैं। उनके प्रवचन इस खास शैली में शुरू होते हैं, ‘आप जो भी करते हैं, एक राष्ट्रवादी के तौर पर करें।’ ये ऑनलाइन पब्लिश होते हैं और इनका व्यापक प्रचार होता है। उनके उपदेशों में वैमनस्यता की बात होती है और उनका निशाना मुस्लिम समुदाय ही होता है, खासकर रोहिंग्या लोग। उन्होंने ऐसी रैलियों का भी नेतृत्व किया जिनमें रोहिंग्या मुसलमानों को किसी तीसरे देश में भेजने की बात कही गई। म्यांमार के अधिकांश बौद्ध आत्मरक्षा के लिए अब हिंसक तौर-तरीका अपनाने में भी कोई परहेज नहीं कर रहे हैं। विराथु उन्हें बतला रहे हैं कि  यदि हम आज कमजोर पड़े, तो अपने ही देश में शरणार्थी हो जाएंगे।

म्यामार में 989 सक्रिय है तो श्रीलंका  ने  इस्लाम को हराने और बौद्धधर्म के उत्थान  के लिए  बोदु बल सेना (बीबीएस) कार्यरत है इसके नेता दो बौद्धभिक्षु गनसारा और विथानागे है जिसे चरमपंथी सिंहली बौद्ध राष्ट्रवादी संगठन माना जाता है। श्रीलंका में पशुओं को हलाल करने का मुद्दा प्रमुख बन गया। बौद्धों के संगठन बोदु बाला सेना के सदस्य बौद्ध भिक्षुओं के नेतृत्व में रैलियां निकाली गई, मुसलमानों के खिलाफ सीधी कार्रवाई का आह्वान किया गया और उनके व्यापारिक प्रतिष्ठानों के बहिष्कार की अपील की गई। कुछ अर्से पहले हुए संगठन के अधिवेशन में 100 बौद्ध भिक्षु जुलूस का झंडा लेकर नेतृत्व करते थे। और लोगों को धर्म रक्षा की शपथ दिलाते थे। यह संगठन पिछले वर्षों में श्रीलंका में मुसलमानों पर हुए खूनी हमलों के लिए जिम्मेदार माना गाया है। संगठन का कहना है कि बौद्ध धर्म की रक्षा के लिए इसका गठन हुआ। विथानागे मानते हैं कि श्रीलंका में भी बौद्धों पर धर्मांतरण का खतरा मंडरा रहा है। मुसलमान बौद्ध महिलाओं से विवाह करते हैं, उनसे बलात्कार करते हैं और वे बौद्धों की भूमि भी हड़पना में लगे हैं। सिंहली परिवारों में एक या दो बच्चे हैं, जबकि अल्पसंख्यक आधा दर्जन या इनसे ज्यादा बच्चे पैदाकर आबादी का संतुलन बिगाड़ रहे हैं। बोडू बाला सेना को रक्षा मंत्री गोताबाया राजपक्षे का समर्थन हासिल है। राजपक्षे महिंद्रा राजपक्षे के भाई हैं।

बौद्ध बहुल थाइलैंड में भी सेना को तीन प्रांतों में मुस्लिम अलगाववादियों से भिडऩा पड़ा है। बताया जाता है कि सेना ने बौद्ध मंदिरों में हथियार और असलहे जमा किए हैं. दूसरी तरफ इस्लामी अलगावादी बौद्ध भिक्षुओं को निशाना बनाते रहते हैं। नतीजतन भिक्षुओं को पुलिस, संरक्षण में भिक्षा मांगने का धार्मिक कार्य करना पड़ता है।वे कहते है हमारे पास कोई रास्ता नहीं है हम अब बौद्धधर्म को बंदूक से अलग नहीं रख सकते।

डा. बाबासाहेब अंबेडकर तो हमेशा अपने भाषणों में कहते रहे कि मुस्लिम आक्रमणों के कारण बौद्धधर्म को बहुत नुक्सान पहुंचा। उनका कहना था- ‘बौद्ध धर्म का नाश होने के पीछे प्रमुख कारण है मुसलमानों के आक्रमण। मुसलमानों ने आक्रमणों के दौरान मूर्तियां तोड़ीं। बौद्ध धर्म पर पहले आक्रमण उनके कारण हुए। उनके आक्रमणों से डर कर बौद्ध भिक्षु गायब हुए। कोई तिब्बत गया, कोई चीन, और कोई कहीं यहां-वहां गए।

विदेशी आक्रमणकारियों में से मुसलमानों के द्वारा बौद्ध धर्म का बेहद नुकसान हुआ। मुसलमान प्रतिमा और मूर्तियों के विरोधी थे। उन्होंने बौद्ध मूर्तियों को तहस-नहस किया और भिक्षुओं को मार डाला। नालंदा के विशाल विश्वविद्यालय को सैनिक किला समझकर उस पर हमला किया और चीवरदारी भिक्षुओं को सैनिक मान कर उनका संहार किया। जो भिक्षु उस भीषण रक्तपात से बचे वे नेपाल, तिब्बत, चीन आदि देशों में भाग गए।

नालंदा के विशाल ग्रंथालय में ताडपत्र और भोजपत्रों पर लिखे दो लाख ग्रंथ थें। हजारों वर्षों का ज्ञान उसमें सम्मिलित था। बख्तियार खिलजी ने उनमें आग लगा दी। और वहां पढ रहे छह हजार छात्रों में से कुछ छात्रों की हत्या की और कुछ को जबरदस्ती मुसलमान बनाया। बौद्ध मूर्तियों की तोड़-फोड़ की। मुसलमान आक्रमणकारी जहां जहां भी गए वहां वहां उन्होंने बौद्धों को या तो मार गिराया या फिर मुसलमान बनाया और बौद्ध मूर्तियों की तोड़-फोड़ की। ग्रंथालय जलाए और विहार नष्ट किए। मेरे कुछ हिंदू मित्र मुझसे पूछते हैं कि मुसलमान आक्रमणकारियों ने हिंदू मंदिर और हिंदुओं की मूर्तियों को भी तहस-नहस कर दिया है ना? इस पर मेरा जवाब यह है कि न्होंने बौद्ध धर्म का जितना नुकसान किया उतना हिंदू धर्म का नहीं किया। इसकी वजह यह है कि लगभग सभी ब्राह्मण गृहस्थ थे और वे अपने परिवार के साथ अपने ही घरों में रहते थे इसलिए उनकी अलग पहचान नहीं थी। परंतु, बौद्ध भिक्षु मात्र परिवारविहीन, चीवरधारी थे और विहारों में रहते थे। उन्हें पहचानना आसान था। इसलिए, हिंदुओं के प्रसिद्ध मंदिरों में भले मुसलमानों द्वारा तोड़-फोड़ की गई हो लेकिन उनके धर्मगुरुओं और पुरोहितों को कोई हानि नहीं पहुंची थी।’


बर्मा के शासकों और सैन्य सत्ता ने इनके खिलाफ कई बार कड़ी कार्रवाई की, इनकी बस्तियों को जलाया गया, इनकी जमीन को हड़प लिया गया, मस्जिदों को बर्बाद कर दिया गया और इन्हें देश से बाहर खदेड़ दिया गया। ऐसी स्थिति में ये बांग्लादेश की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं, थाईलैंड की सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसते हैं या फिर सीमा पर ही शिविर लगाकर बने रहते हैं। 1991-92 में दमन के दौर में करीब ढाई लाख रोहिंग्या बांग्लादेश भाग गए थे। संयुक्त राष्ट्र, एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाएं रोहिंया लोगों की नारकीय स्थितियों के लिए म्यामार की सरकारों को दोषी ठहराती रही हैं, लेकिन सरकारों पर कोई असर नहीं पड़ता है। इनके मामले में म्यांमार की सेना ही क्या वरन देश में लोकतंत्र की स्थापना का श्रेय लेने वाली आंग सान सूकी का भी मानना है कि रोहिंग्या म्यांमार के नागरिक ही नहीं हैं।

Myanmar Two Child Policy

रोहिंग्या उग्रवादियों के रिश्ते पाकिस्तानी सैनिक गुप्तचर संगठन आईएसआई से भी रहे हैं। आईएसआई ने रोहिंग्या मुसलमानों को पाकिस्तान ले जाकर उन्हें अपने ट्रेनिंग कैंपों में उच्च स्तरीय सैनिक तथा गुरिल्ला युद्धशैली का प्रशिक्षण प्रदान किया। इसके बाद ये लड़ाई और भी हिंसक हो गयी। पूरे देश में बौद्धों पर हमले होने लगे। ये अवसर उन्हें 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के बंगलादेश के रूप में उदय के बाद फिर से मिला। बचे खुचे जिहादियों में फिर छटपटाहट शुरू हुई और 1972 में जिहादी नेता जफ्फार ने रोहिंग्या लिबरेशन पार्टी (आरएलपी) बनाई और बिखरे जिहादियों को इकट्ठा करना शुरू किया। हथियार बंगलादेश से मिल गए और जिहाद फिर शुरू हो गया। पाकिस्तानी सैनिक गुप्तचर संगठन आई़ एस़ आई़ ने रोहिंग्या मुसलमानों को पाकिस्तान ले जाकर उन्हें अपने प्रशिक्षण केन्द्रों में उच्च स्तरीय सैनिक तथा गुरिल्ला युद्धशैली का प्रशिक्षण प्रदान किया। इसके बाद ये लड़ाई और भी हिंसक हो गयी। रोहिंग्या उपद्रव कर रहे हैं को म्यांमार की सेना उनका दमन कर रही है।


 

रोहिंग्या को भारत में शरण नहीं: राजनाथ सिंह


 

New Delhi: Union Home Minister Rajnath Singh addresses during a programme organised on 80th birth anniversary of BKU founder Mahendra Singh Tikait in New Delhi, on Oct 6, 2015. (Photo: IANS)

ह्यूमन राइट्स का हवाला देकर अवैध शरणार्थियों को रिफ्यूजी बनाने की गलती नहीं की जानी चाहिए। वे म्यांमार से भारत में घुस आए हैं। रोहिंग्या रिफ्यूजी नहीं हैं, इस सच्चाई को हमें समझना चाहिए। इस मुद्दे पर केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर चुकी है। इसमें सरकार ने कहा था कि रोहिंग्या के पाकिस्तानी आतंकियों से रिश्ते हैं। इनके यहां रहने से देश की सिक्युरिटी पर गंभीर नतीजे हो सकते हैं। यूएन रिफ्यूजी डॉक्युमेंटेशन हो गया है।

”देश में रिफ्यूजी स्टेटस लेने की एक प्रॉसेस होती है और इनमें से किसी ने इसे फॉलो नहीं किया है। रोहिंग्या मुस्लिमों को देश से बाहर करने का फैसला इंटरनेशनल लॉ का वॉयलेशन नहीं है, क्योंकि हमने 1951 के यूएन रिफ्यूजी कन्वेंशन पर साइन नहीं किए थे।’’

”लोगों के समझना चाहिए कि रोहिंग्या का गैरकानूनी तौर पर भारत में रहना राष्ट्रीय सुरक्षा से खतरा है। किसी भी रोहिंग्या ने भारत में शरणार्थी बनने के लिए अप्लाई भी नहीं किया है।’’ 18 सितंबर को केंद्र सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में 16 पन्नों का हलफनामा दाखिल कर कुछ कारण बताए थे। जो भी फैसला होगा वो कोर्ट के मुताबिक होगा। हमें फैसले का इंतजार करना चाहिए। कोर्ट 3 अक्टूबर को इस मामले की सुनवाई करेगा।

 

रोहिंग्या को ना रखने की वजह

             केंद्र ने अपने एफिडेविट में कहा है कि रोहिंग्या मुस्लिम म्यांमार से भारत में गैरकानूनी तौर पर घुसे हैं। लिहाजा, वो इलीगल इमिग्रेंट्स हैं।

  • नेशनल सिक्युरिटी के लिए खतरा: सरकार का कहना है कि रोहिंग्या मुसलमानों का यहां रहना देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे पैदा कर सकता है। इनके पाकिस्तान में मौजूद आतंकी गुटों से रिश्ते हैं।
  • फंडामेंटल राइट्स इनके लिए नहीं: हलफनामे के मुताबिक- फंडामेंटल राइट्स सिर्फ देश के नागरिकों के लिए होते हैं, ताकि वो भारत में जहां चाहें सेटल हो सकें। इलीगल रिफ्यूजी सुप्रीम कोर्ट के सामने जाकर इन अधिकारों को पाने का दावा नहीं कर सकते।
  • खतरा क्या? सीलबंद लिफाफे में बताएगी सरकार: हलफनामे में सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों से पैदा होने वाले खतरों पर ज्यादा तफसील से कुछ नहीं बताया है। तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वो नेशनल सिक्युरिटी को होने वाले खतरों के बारे में एक सीलबंद लिफाफे में तमाम जानकारी देंगे।
  • स्टेटस ऑफ रिफ्यूजी कन्वेंशन का हिस्सा नहीं है भारत: हलफनामे में कहा गया है कि भारत स्टेटस ऑफ रिफ्यूजी कन्वेंशन (1951 और 1967) का हिस्सा नहीं है। ना ही इस पर भारत ने दस्तखत किए हैं। लिहाजा, इससे जुड़े कानून या शर्तें भी मानने के लिए भारत मजबूर नहीं है।

पश्चिमी म्यांमार में हिंसा के चलते पिछले कुछ दिनों में हजारों लोग नौका या पैदल बांग्लादेश पहुंचे हैं। म्यांमार के सुरक्षा अधिकारी और अल्पसंख्यक रोहिंग्या के उग्रवादी एक दूसरे पर राखाइन प्रांत में गांवों को जला देने और अत्याचार करने का आरोप लगा रहे हैं। सेना ने कहा है कि करीब चार सौ लोग सशस्त्र संघर्ष में मारे गए हैं, जिनमें ज्यादार उग्रवादी हैं। हिंसा के चलते बड़ी संख्या में लोग सीमा पार कर बांग्लादेश पैदल चल कर पहुंच रहे हैं। इसलिए संयुक्त राष्ट्र उन्हें शरणार्थी मानता है। मगर दूसरी तरफ म्यांमार इन्हे अपने देश का ही नही वरन आतंकी मानता है।

2012 में म्यांमार में बौद्धों और रोहिंग्या मुस्लिमों के बीच सांप्रदायिक दंगे हुए थे पिछले साल अक्टूबर में भी म्यांमार के रखाइन प्रांत में उग्र संघर्ष हुआ। इसके बाद म्यांमार सेना की कार्रवाई में करीब 87 हजार रोहिंग्या मुसलमानों को बांग्लादेश भागने के लिए मजबूर होना पड़ा था। संयुक्त राष्ट्र संघ ने सेना की इस कार्रवाई को मानवता के खिलाफ अपराध बताया था।

म्यांमार के ये विवादित और हिंसक रोहिंग्या मुस्लिम पिछले कुछ दिनों से भारत में भी घुसपैठ करने के कारण विवादों में आ गए है। भारत में बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या सुलझी नहीं है मगर अब रोहिंग्या मुस्लिमों का मुद्दा उभर रहा है। कुछ समय पहले गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अफसरों के मुताबिक फॉरनर्स ऐक्ट के तहत इन लोगों की पहचान कर इन्हें वापस भेजा जाएगा। बौद्ध बहुल देश म्यांमार में जारी हिंसा के बाद से अब तक करीब 40,000 रोहिंग्या मुस्लिम भारत में आकर शरण ले चुके हैं। ये लोग समुद्र, बांग्लादेश और म्यांमार सीमा से लगे इलाके के जरिए भारत में घुसपैठ करते हैं। बांग्लादेश में फिलहाल 3 लाख रोहिंग्या शरणार्थी रह रहे हैं। अनुमान है कि रोहिंग्या शरणार्थी असम, पश्चिम बंगाल, केरल, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर सहित भारत के विभिन्न हिस्सों में रह रहे हैं ।

अकेले जम्मू में ही 6000 की संख्या में रोहिंग्या शरणार्थी बसे हुए हैं। पिछले दिनों केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में हुई मीटिंग में भारत में अवैध रूप से बसे रोहिंग्या मुस्लिमों की पहचान, गिरफ्तारी और उन्हें देश से बाहर भेजने पर काम करने की रणनीति पर चर्चा की गई। सरकार का यह फैसला महत्वपूर्ण है। यदि देश में इसी तरह अवैध घुसपैठिए आकर बसते रहे तो यह देश धर्मशाला बन जाएगा और जिससे देरसबेर सांप्रदायिक तनाव पैदा होगा।

रोहिंग्या मुस्लिमों को शरण देना भारतीय राजनीति में एक हम राजनीतिक मुद्दा बन गया है। अफसोस की बात है कि रोहिंग्या लोगों के दुख-दर्द की कहानी को घुमाकर ‘दुनिया में मुसलमानों पर हो रहे जुल्म’ की कहानी के रूप में पेश किया जा रहा है और इसका इस्तेमाल मुस्लिम नौजवानों के मन में यह बात बैठाने के लिए हो रहा है कि मुसलमान सताए जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने रोहिंग्या मुसलमानों का खुलकर समर्थन किया है। ममता बनर्जी ने कहा है कि रोहिंग्या इंसान हैं आतंकवादी नहीं और केन्द्र सरकार को उनकी मदद करनी चाहिए। एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदउद्दीन ओवैसी कहते है कि अगर तिब्बत, बांग्लादेश और श्रीलंका के शरणार्थी भारत में रह सकते है तो म्यांमार के रोहिंग्या मुस्लिम क्यों नहीं रह सकते। म्यांमार के हिंसाग्रस्त रखाइन प्रांत से भागे रोहिंग्या पर रुख लेकर सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा, ‘अपना सब कुछ खो चुके उन लोगों को क्या वापस भेजना मानवता है। यह गलत है।’ दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य इन्द्रेश कुमार ने रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में शरण देने के मुद्दे पर कहा कि ये अराजकतावादी और अपराधी हैं। उन्हें कोई भी देश अपनाने को तैयार नहीं है।

म्यांमार में हिंसा के चलते बांग्लादेश पलायन करने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों की संख्या 1 लाख 23 हजार हैै। हजारों की संख्या में लोग हर दिन जंगलों और धान के खेतों से होते हुए बांग्लादेश में सुरक्षित पहुंच रहे हैं। अन्य लोग दोनों देशों के बीच स्थित नदियों को पार कर रहे हैं। हालांकि, इस कोशिश में कई लोग डूब भी गए हैं। रोहिंग्या समुदाय का ताजा पलायन 25 अगस्त को शुरू हुआ जब रोहिंग्या उग्रवादियों ने म्यांमार की पुलिस चौकियों पर हमला किया, जिसके बाद सुरक्षा बलों को इसके जवाब में अभियान चलाना पड़ा। म्यांमार में साल 2002 में हुई हिंसा के बाद एक लाख से अधिक रोहिंग्या बांग्लादेश के शिविरों में रहने को मजबूर हैं। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर केंद्र सरकार का रुख साफ कर दिया  है। उन्होंने कहा कि किसी भी रोहिंग्या को भारत में शरण नहीं मिलेगी। म्यांमार से घुसे लोग शरणार्थी नहीं हैं।

आज दुनिया की हालत ऐसी है कि कई देशों से शरणार्थी आ सकते है यदि सबके लिए दरवाजें खोल दिए जाएं तो देश धर्मशाला बन जाएगा। देश में कई तरह के तनाव पैदा हो सकते है। मानवीयता के नाम पर देश अपनी सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं कर सकता। रोहिंग्या मामलों के जानकारों का कहना है कि रोंहिंग्या शरणार्थी नहीं जिहादी प्रवृति के लोग हैं जो भारत के लिए सिरदर्द साबित हो सकते हैं और यहां सांप्रदायिक माहौल को बिगाड़ सकते हैं।

 

सतीश पेडणेकर

 

 

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