ना शरण ना वरण

ना शरण ना वरण

आज कल पूरे देश में एक बहस छिड़ी हुई है की म्यांमार से भाग कर आये रोहिंग्या मुसलमानों को शरण दी जाये या नहीं? चारों तरफ ऐसा माहौल बनाया जा रहा है की जैसे यह भारत की जिम्मेदारी है की वह इन मुसलमानों को शरण दे और इनके भरण-पोषण की व्यवस्था करें। कई मानवाधिकार संगठन भारत सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि इन शरणार्थियों को देश में ही रहने दिया जाए वहीं सरकार का मानना है कि रोहिंग्या मुसलमान अवैध प्रवासी हैं और इसलिए कानून के मुताबिक उन्हें बाहर किया जाना चाहिए। अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया है। गृह मंत्रालय कह चुका है कि वह रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में शरण नहीं देगा, बल्कि उन्हें वापस लौटा देगा।  इसके साथ ही भारत-म्यांमार सीमा पर चौकसी बढ़ा दी गई है। सीमा पर सरकार ने रेड अलर्ट जारी किया है। भारत में करीब 40 हजार रोहिंग्या मुसलमान हैं, जो जम्मू, हैदराबाद, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में मौजूद हैं। चूंकि भारत ने शरणार्थियों को लेकर हुई संयुक्त राष्ट्र की 1951 शरणार्थी संधि और 1967 में लाए गए प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं इसलिए देश में कोई शरणार्थी कानून नहीं हैं।

अपनी हालत के लिए खुद जिम्मेदार

रोहिंग्या मुसलमान बहुत गरीब हैं, वक्त के मारे हुए हैं, भूख, कुपोषण और रोगों के शिकार हैं, दाने-दाने को मोहताज हैं। इनकी व्यथा को जितना अनुभव किया जाए, उतना कम है। ये दुनिया के सबसे सताए हुए लोग हैं, इस बात को संयुक्त राष्ट्र संघ भी कह चुका है किंतु म्यांमार, बांग्लादेश, इण्डोनेशिया, थाईलैण्ड तथा भारत कोई भी देश इन लोगों को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। आखिर क्यों? मानवाधिकार वादी बुद्धिजीवी चाहे कितना ही विधवा विलाप क्यों न कर लें किंतु वास्तविकता यह है कि रोहिंग्या मुसलमान अपनी बुरी स्थिति के लिए स्वयं ही जिम्मेदार हैं। ये लोग मूलत: बांग्लादेश के रहने वाले हैं तथा जिस तरह करोड़ों बांग्लादेशी भारत में घुस कर रह रहे हैं, उसी प्रकार ये भी रोजी-रोटी की तलाश में बांग्लादेश छोड़कर म्यांमार  में घुस गए। 1962 से 2011 तक म्यांमार  में सैनिक शासन रहा। इस अवधि में रोहिंग्या मुसलमान चुपचाप बैठे रहे किंतु जैसे ही वहां लोकतंत्र आया, रोहिंग्या मुसलमान बदमाशी पर उतर आए।

जून 2012 में म्यांमार  के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों ने एक बौद्ध युवती से बलात्कार किया। जब स्थानीय बौद्धों ने इस बलात्कार का विरोध किया तो रोहिंग्या मुसलमानों ने संगठित होकर बौद्धों पर हमला बोल दिया। इसके विरोध में बौद्धों ने भी संगठित होकर रोहिंग्या मुसलमानों पर हमला कर दिया। इस संघर्ष में लगभग 200 लोग मारे गए जिनमें रोहिंग्या मुसलमानों की संख्या अधिक थी। तब से दोनों समुदायों के बीच हिंसा का जो क्रम आरम्भ हुआ, वह आज तक नहीं थमा। रोहिंग्या मुसलमानों ने नावों में बैठकर थाइलैण्ड की ओर पलायन किया किंतु थाइलैण्ड ने इन नावों को अपने देश के तटों पर नहीं रुकने दिया। इसके बाद रोहिंग्या मुसलमानों की नावें इण्डोनेशिया की ओर गईं और वहां की सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों को शरण दी।

रोहिंग्या मुसलमानों ने म्यांमार में रोहिंग्या रक्षा सेना का निर्माण करके अक्टूबर 2016 में म्यांमार के 9 पुलिस वालों की हत्या कर दी तथा कई पुलिस चौकियों पर हमले किए। अब यह तो सभी जानते है की पुलिस वाले की हत्या हो जाने के बाद उसके साथी अपराधियों  को कितनी बेरहमी से निपटाते  हैं। वही हुआ, और रोहिंग्या मुसलमानो को भागने के लिए मजबूर होना पड़ा।

बहुत से रोहिंग्या मुसलमानों ने भागकर बांग्लादेश में शरण ली किंतु भुखमरी तथा जनसंख्या विस्फोट से संत्रस्त बांग्लादेश रोहिंग्या मुसलमानों का भार उठाने की स्थिति में नहीं है, इसलिए इन्हें वहां भोजन, पानी रोजगार कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ और हजारों रोहिंग्या मुसलमानों ने भारत की राह पकड़ी। सबसे बड़ी बात तो यह है की अब तो  बांग्लादेश को ही अपने देश की सुरक्षा सताने लगी है। बांग्लादेश को इस बात का डर सता रहा हैं कि कही पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई रोहिंग्या मुस्लिमों की मदद से उनके देश में मुश्किलें बढ़ा सकती हैं।

सूत्रों की मानें तो सरकार को डर है कि आईएसआई अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी का इस्तेमाल कर सकती है। इस संगठन के जरिए देश में आतंकी गतिविधियां शुरू करवा सकती है। म्यांमार में रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर सयुंक्त राष्ट्र ने कहा है कि राखिन इलाके में रह रहे करीब 40 फीसदी लोग बांग्लादेश जा चुके हैं। रोहिंग्या मुसलमानों पर हो रही हिंसा जायज नहीं हैं, इस तरह की हिंसा की पुरजोर निंदा सामूहिक तौर पर की जानी चाहिए। परन्तु इंदिरा गांधी ने बंगलादेशी मुसलमानों को भारत में शरण देकर जो गलती की थी उसका खामियाजा भारत को आजतक आतंकी गतिविधियों से चुकाना पड रहा हैं। भारत का पूर्वी क्षेत्र पहले से ही बांग्लादेश से आए मुस्लिम शरणार्थियों से भरा हुआ है, अत: भारत नई मुस्लिम शरणार्थी प्रजा को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है।

यहां सवाल यह उठता है की दंगा म्यांमार में हो रहा है, रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश, इंडोनेशिया और थाइलैंड की ओर भाग रहे हैं। समस्या भी बांग्लादेश और म्यांमार के बीच की है, लेकिन इस प्रकरण में भारत को खलनायक के तौर पर पेश करने की कोशिश हो रही है। ये कोशिश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हो रही है और देश के भीतर भी।


 

बस ऐसे ही


 

3

पुराने जमाने में राजा महाराजा अपने साथ एक भाट (कवि) अवश्य रखते थे, जो हमेशा उनके साथ मौजूद रहते थे। उनका काम था राजा की प्रशंसा में कविता लिखना। इससे होता कुछ नहीं था बस राजाओ के अहम् को संतुष्टि मिलती थी। इसके एवज में उन्हें बेशुमार दौलत मिलती थी। उस इनाम के लालच में ये भाट लोग (फैंकबाज) कुछ भी फेंक देते थे।

मान लो किसी युद्ध में राजा का घोड़ा गिर पड़ा तो ये भाट लोग ये नहीं कहेंगे कि घोड़ा थक गया उसे भोजन या पानी की जरूरत है वो ये कहते थे ‘वाह वाह सम्राट जी आपका स्टेमिना तो देखो ये घोड़ा मर गया आप अभी तक नहीं थके। वाह सम्राट वाह। और ‘सम्राट’ जिनके पास मुश्किल से १० हजार एकड़ की जागीर होती थी खुश होकर गले के हार तोड़ कर दे दिया करते थे।

कालांतर में ये साइकोलॉजी की एक कला बन गई। जिससे आपको काम निकलवाना हो उसकी प्रशंसा कीजिये। खुद को उससे निर्बल और बेसहारा बताइए। और आसानी से अपना काम निकलवा लीजिय।

इस ट्रिक का बेस्ट उदाहरण ‘अल्लामा इकबाल’ हैं। उन्होंने जितना मूर्ख इस देश के मूल निवासियों को बनाया उतना शायद ही किसी ने बनाया हो। उन्होंने कहा ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’.. हमारे पूर्वज एकदम फलैट हो लिए। बोले ‘सही बात है भिया भोत सई कै रिये हो मियां। तुमाये जैसे आदमी की भोत जरूरत ए इतै’ …

फिर इकबाल ने कहा’

‘राम है इमाम-ए-हिन्दोस्तां’ तो हमारे पूर्वज और फूल के कुप्पा हो गए। बोले ‘जे बन्दा तौ है भिया खुदा का भेजा हुआ चराग … सारे हिन्दोस्तां में जे फैलाएगा अम्न की रौशनी’। और ले ले के पहुंच गए मट्टी का तेल  के इस चराग को अब बुझने न देंगे।

तब तक भैया इकबाल ने बोल दिया ‘यूनान मिस्त्र रोमां सब मिट गये जहां से… कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी …’ बस इत्ते में हमारे पूर्वज फूल के फट गए। इकबाल को तुरंत गंगा जमना तहजीब का फटा हुआ तहमद घोषित कर दिया गया। वो तो बलास्फेमी का डर कायम था काफिरों में वरना उनका बस चलता तो पैगम्बर ही बना के छोड़ते अल्लामा को।

खैर हमारे पूर्वज अल्लामा को ‘सेकण्ड सन ऑफ गॉड’ घोषित करने ही वाले थे कि इतने में खबर आ गई कि अल्लामा तो पाकिस्तान लेकर हिन्दोस्तां से अलग हो गये और ‘जाहिल हिन्दोस्तानियों को उन्होंने १५ लाख काफिरों की लाशें तोहफे में भेजी हैं’। जो कहते थे कि ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’ ‘वही लोग हमारे जिगर के टुकड़े लाहौर, कराची से हमारी हस्ती मिटा चुके थे’। आज भी वहां हमारी कौम के मरे हुए वाशिंदे अपनी रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार तक के लिए मरहूम हैं।

ईरान से सिकुड़ती हुई हमारे महान मुल्क की सीमायें राजस्थान के बॉर्डर पर आकर सिमट गई क्यों? क्योंकि हमें हमारे चारण भाटों की बातों का विश्वास हो चला था कि हमारी हस्ती तो कभी मिट ही नहीं सकती। जो भगवा कभी गांधार पर फहरा करता था आज उसे हम काश्मीर में भी नहीं फहरा सकते। क्यों? क्योंकि ‘सेकुलरिज्म का काला चश्मा पहन हम इतने अंधे हो गये कि सच को नंगी आखों से देखने के बाबजूद हम उसे झुठलाते रहे’।

आज हम फिर वही गलती कर रहे है। दुश्मन हमारी सीमा पर ही नहीं बल्कि हमारे घर के अन्दर तक घुस चुका है। ४० हजार से ज्यादा आतंकी हमारे देश का अन्न जल और तमाम सुख सुविधाएं भोग रहे हैं और हम शान्ति के मसीहा गौतम बुद्ध बने बैठे हैं। वो आतंकी चेहरे पर पीडि़त होने का नकाब ओढ़ हमसे हमारी हमदर्दी ले रहे हैं और हमारे ही घर जला रहे हैं। प्रतिकार में जब हम उन्हें यहां से निकाल रहे हैं तो हमें ही हमारे वसुधैव कुटुम्बकम और अहिंसा परमो धर्मं का पाठ पढ़ा रहे हैं।

मित्रों जहाज सुन्दरी सिर्फ एक बात बहुत प्यार से समझाती है। ‘इन स्टेट ऑफ पेनिक प्लीज वेर योर मास्क फस्र्ट एंड देन असिस्ट दि अदर पर्सन।’ हमारे खुद के छोटे से देश में १३० करोड़ लोग पहले से मौजूद हैं। साला शाम तक सांस लेने तक में दिक्कत होने लगती है। राजस्थान के लोग वैसे ही प्यासे मर रहे हैं। केरला में वामपंथी कत्ल कर देते हैं। बंगाल में दीदी चैन से सोने नहीं देती। कश्मीर की तो बात करना ही बेकार है। ऐसे हालत में पहले अपनी फटी जेब में पहले टांके लगवायें या इनकी सहलायें?

मित्रों एक चीज क्रिस्टल के माफिक साफ है। आपको पुन: वसुधैव कुटुम्बकम जैसे नारों के साथ मूर्ख बनाने की पूरी तैयारी है। फिर से इकबाल का गाना शुरू हो चुका है और फिर से आपके हाथ में पाकिस्तान नाम का लल्ला थमा दिया जायेगा। बेहतर है इस बार आप जग जाए। और जो शरण मांगने के लिए बांग दे उसके ओद्योगिक क्षेत्र पर जोर से लात लगाकर बोलें …

जर्रे जर्रे में शामिल है

हमारे लहू के कतरे

हां हिन्दोस्तां हमारे

पुरखा का ही है …

साभार: ब्रिजेश कुंतल के फेसबुक वॉल से


समस्या मानवीयता का  नहीं राजनीतिक

दरअसल भारत में अवैध रूप से घुस आए चालीस हजार रोहिंग्या मुसलमानों को केंद्र सरकार वापस उनके देश भेजना चाहती है, लेकिन देश के भीतर तथाकथित सेक्युलर जमात इसे धार्मिक रंग दे रहा है। ये मुद्दा जिस तरह से राजनीतिक शक्ल अख्तियार कर रहा है वह कम से कम मानवीयता का मामला तो किसी भी कोण से नहीं है। ऐसे में सवाल यह है कि पहले से बढ़ती आबादी और संसाधनों पर बढ़ रहे बोझ से चिंतित भारत रोहिंग्या मुसलमानों को अपने यहां क्यों रखे? वह भी तब जब भारत की आंतरिक सुरक्षा भी इससे खतरे में पड़ जाती हो।

भारत सरकार के सामने 40 हजार रोंहिग्या मुस्लिमों की रोजी-रोटी से कहीं बड़ा सवाल देश की सुरक्षा का है। दरअसल सरकार को ऐसी खुफिया जानकारी मिली है कि पाकिस्तान से संचालित आतंकवादी समूह इन्हें अपने चंगुल में लेने की साजिश में लग गए हैं। रोहिंग्या मुसलमान आईएसआई और आईएसआईएस के भी संपर्क में हैं। ऐसे में इनका भारत में रहना पूरे देश के लिए खतरनाक है। जाहिर है सरकार भारत में रह रहे 40 हजार रोहिंग्या शरणार्थियों को 40 हजार बारूद के ढेर के संभावित खतरे के तौर पर देख रही है।

अभी हाल ही में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख जाएद राद अल हुसैन ने रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस भेजने के निर्णय को लेकर भारत सरकार के रुख की निंदा की। लेकिन क्यों? हालांकि हुसैन का यह नजरिया उनके खुद मुसलमान होने और दूसरे अन्य मुस्लिम देशों से भारत पर दबाव डालने की मांग की वजह से हो सकता है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र जैसी जिम्मेदार संस्था ने भारत के आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे को क्यों नहीं समझा? क्या इस तरह का दुष्प्रचार भारत की छवि बिगाडऩे की कोशिश नहीं है? संयुक्त राष्ट्र  इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों से क्यों नहीं कह पा रहा है कि वह रोहिंग्या मुसलमानों को अपने यहां शरण दे?

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी इस मामले में पीएम से दखल की अपील की है। लेकिन यह तो सभी जानते हैं कि एमनेस्टी इंटरनेशनल  एक भारत विरोधी संस्था है और यह भारत के हितों के खिलाफ काम करती रही है। दरअसल भारत अपनी ‘एक्ट ईस्ट’ पालिसी के तहत सभी पूर्वोत्तर के पड़ोसी देशों के साथ अपने संबंध सुधारने में लगा है तो म्यामांर से साथ रिश्ते सुधारना भी उसकी प्राथमिकता है। अब ऐसे में हम म्यांमार के आतंरिक मामलो में दखल क्यों दें?

भारत सरकार के रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजने का फैसला इस आधार पर भी देखा जाना चाहिए कि यह देश के संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पैदा करेंगे जो देश के मूल नागरिकों के अधिकारों का हनन होगा। वहीं बड़ा सवाल जनसांख्यिकीय परिवर्तन का भी है। बांग्लादेशी शरणार्थियों के कारण जिस तरह पश्चिम बंगाल, असम और बिहार की आबादी का समीकरण बिगड़ा है वह पूरा देश देख समझ रहा ही है। बंगाल के कम से कम 18 जिले ऐसे हैं जहां हिंदू अल्पंख्यक होने की कगार पर हैं। तीन जिले तो ऐसे हैं जहां हिंदू अल्पसंख्यक हो चुके हैं।

इसके अलावा भारत म्यांमार के सैन्य अधिकारियों के साथ अच्छे रिश्तें बनाना चाहता है क्योंकि उसे उम्मीद है कि ऐसा करने से भारत के पूर्वोत्तर इलाकों में सक्रिय चरमपंथियों के खिलाफ उसे मदद मिलेगी क्योंकि इनमें से कई म्यांमार के जंगलों में रहते हैं। रिश्तों को और मजबूत बनाने के लिए भारत वहां से रखाइन स्टेट में पोर्ट और वाटरवे प्रोजेक्ट तैयार कर रहा है।  जल्द ही सितवे को भारत के मिजोरम में जिरिनपुरी से सड़क के रास्ते जोडऩे की प्रक्रिया भी पूरी हो जाएगी। भारत सक्रियता के साथ ज्यादा से ज्यादा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना तैयार करने पर

ध्यान कर रहा है ताकि ‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी को कामयाब बनाया जा सके। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने साल 2014 में ही इसे रेखांकित किया था।

इस योजना के तहत भारत दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में अपना असर बढ़ाना चाहता है ताकि इस इलाके में लगातार बढ़ते चीनी प्रभुत्व का मुकाबला किया जा सके। ऐसे में रोहिंग्या मुसलमानो का मुद्दा देश के लिए हर कोण से खतरा भरा है। और देश को सिर्फ मानवीयता के नाम पर खतरे में डालना कभी श्रेयस्कर नहीं होगा। मानवीयता के साथ साथ अपने मूल नागरिको के अधिकारों और सुरक्षा को सुनिश्चित करना भी सरकार का काम है और वह वही कर रही है।

 

 नीलाभ कृष्ण

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.