रोहिंग्याओं से जनसांख्यिकीय बदलाव होने का खतरा

रोहिंग्याओं से जनसांख्यिकीय बदलाव होने का खतरा

”ये किस प्रकार की मानवता की बात कर रहे है। इनकी मानवता कहां चली गई थी जब लाखों पंडितों को कश्मीर से भागने पर मजबूर कर दिया गया था। कश्मीरी पंडितों के घर जला दिये गये, उनकी हत्या कर दी गई। तब इनकी मानवता कहां चली गई थी? 1941 में घाटी में पंडित कुल आबादी का 15 प्रतिशत थे जो पलायन के समय 5 प्रतिशत हो गये,’’ यह कहना है कश्मीरी पंडित और भास्कर फॉउन्डेशन के सीईओ संजय गांजू का उदय इंडिया के संवाददाता रवि मिश्रा से हुई  वार्तालाप के दौरान। प्रस्तुत हैं बातचीत के मुख्य अंश:

ऐसा कहा जा रहा है कि म्यांमार आर्मी रोहिंग्या मुसलमानों पर अत्याचार कर रही है, जिससे वे भारत में घुसपैठ कर रहे हैं। क्या उन्हें भारत में जगह दी जानी चाहिए?

रोहिंग्या, लश्कर-ए-तैयबा और अन्य आतंकी संगठनों से जुड़े हैं। यदि म्यांमार की फौज उनपर कार्यवाही कर रही है तो उस पर प्रश्न खड़ा करना गलत होगा। यदि भारत सरकार उनको जगह देती है तो यह भारत के लिए एक खतरा भरा निर्णय होगा। अत: मैं आशा करता हूं कि सरकार आतंक से जुड़े लोगों को भारत में कोई स्थान नहीं देगी।

अभी हाल ही में गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा है कि रोहिंग्या मुसलमानों को यहां से भेजा जाएगा। आप इस बयान को कैसे देखते हैं?

बिल्कुल, उन्हें अवश्य यहां से भेजना चाहिए। आतंकी संगठनों के अलावा इस समुदाय की हिंदू समुदाय से भी कटुता है। इसलिए हमें अपनी जांच एजेंसियों का अनुसरण करना चाहिए। हाल ही में रोहिंग्या द्वारा कई हिंदुओं के मारे जाने की भी खबर आ चुकी है।

सरकारी आंकड़ों की माने तो केवल जम्मू में 10 हजार रोहिंग्या रहते हैं। आप कश्मीर से आते हैं, इस पर आप क्या कहना चाहेंगे? 

आरंभ से आपको यह समझने की आवश्यकता है। जब लश्कर-ए-तैयबा की सहायता से इन रोहिंग्या ने म्यांमार आर्मी के ऊपर हमला किया तो म्यांमार के सैनिको ने भी इनका मुहतोड़ जबाब देना आरंभ किया, जिससे ये असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में घुसपैठ करने लगे। अब यहां प्रश्न यह उठता है कि ये पूर्वोत्तर से जम्मू पहुंचने में सफल कैसे हुए? मेरी जानकारी के अनुसार इन्हें कुछ संगठनों ने इन्हें जम्मू पहुंचाने में सहायता की। यह सभी घटना एक षडय़ंत्र की ओर इशारा करती है। यह सभी घटनाएं भौगोलिक बदलाव लाने के लिए किये जा रहे हैं। पूर्वोत्तर में पहले से ही तीस प्रतिशत घुसपैठियें रह रहे हैं जिससे धीरे-धीरे इन राज्यों की अपनी पहचान और संस्कृति खोती दिख रही है और यही कश्मीर के साथ होता प्रतीत हो रहा है।

संयुक्त राष्ट्र ने भारत से इन शरणार्थियों को शरण देने की मांग की है। 

मुझे तो संयुक्त राष्ट्र संघ के विश्वसनीयता पर ही संदेह है। क्या चीन को अपने देश में इन शरणार्थियों को स्थान नहीं देना चाहिए? सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य होने  के नाते, क्या चीन को इसमें हस्तक्षेप नही करना चाहिए? लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ चीन से इस विषय में चर्चा भी नहीं कर सकता। चीन स्वंय ही शिंजियांग प्रांत में उधर मुस्लिमों के ऊपर अत्याचार कर रहा है।

जैसा की सरकार ने रोहिंग्या को वापस  भेजने का निर्णय लिया है, इस संदर्भ में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने सरकार के इस कदम के विरूद्ध सर्वोच न्यायालय में याचिका दायर की है। 

कृपया आप यह न भूले कि याकूब मेनन जैसे आतंकी को बचाने के लिये सर्वोच्च न्यायालय को मध्य रात्रि में दरवाजे खोलने पर विवश किया था। इन लोगों को जम्मू में रह रहे पाकिस्तानी शरणार्थी, गोरखा और दलितों पर हो रहे अत्याचार नहीं दिखते हैं, जो राज्य में रहते हुए भी यहां के किसी योजना का लाभ नहीं उठा सकता है।

मुस्लिम समुदाय का कहना है कि मानवता के नाते इन शरणार्थियों की जगह दी जानी चाहिए।

ये किस प्रकार की मानवता की बात कर रहे हैं? इनकी मानवता कहा चली गई थी जब लाखों पंडितों को कश्मीर से भागने पर मजबूर कर दिया गया था। कश्मीरी पंडितों के घर जला दिये गये, उनकी हत्या कर दी गई। तब इनकी मानवता कहां चली गई थी? 1941 में  घाटी में पंडित कुल आबादी के 15 प्रतिशत थे जो पलायन के समय 5 प्रतिशत हो गये।

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