अच्छे स्वास्थ्य का दिव्य आधार सात्विक अन्न व शाकाहार

अच्छे स्वास्थ्य का दिव्य आधार सात्विक अन्न व शाकाहार

मानवीय गुणों के अभाव मेंमनुष्य और पशु में विशेष अन्तर नहीं होता। दया, करूणा, मैत्री, सेवा, परोपकार, नैतिकता, सहानुभूति, कर्तव्य पालन का विवेक मानवता का प्रतीक है। इन गुणों से शून्य मनुष्य स्वार्थी एवं अनैतिक जीवण ही जीता है। जिस व्यक्ति के दिल में प्राणियों के प्रति दया, प्रेम नहीं होता वह परमात्मा का प्रेम नहीं पा सकता। भले ही वह व्यक्ति मंदिरों में पूजा-पाठ, गुरूद्वारे में गुरू ग्रन्थ साहब के गुणगान, मस्जिद में नमाज और गिरजाघरों में जाकर कितनी ही प्रार्थना ञ्चयों करे और ऐसे व्यक्ति से स्वास्थ्य मीलों दूर रहता है।

 

कच्चे घड़े में यदि अमृत भर दिया जाए तो घड़ा और अमृत दोनों नष्ट हो जायेंगे। घर में गंदगी का ढेर पड़ा रहा हो और वहां चाहे जितनी अगरबतियां जला दी जायें तो भी बदबू दूर नहीं होगी। ठीक उसी प्रकार जब तक शरीर और आत्म तत्व में विकार बढाने वाले कारणों से न बचा जायेगा, तब तक दीर्घकालीन पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति संभव नहीं हो सकती। अहिंसक आहार इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

जिस प्रकार यंत्रों की क्षमता उसके ईंधन की गुणवता और परिणाम पर निर्भर करती है। ठीक उसी प्रकार मनुष्य का जीवन और स्वास्थ्य उसके द्वारा किए जाने वाले भोज्य पदार्थों से प्रभावित होता है। चूंकि शरीर के विभिन्न अवयवों का निर्माण भोजन में उपलब्ध रासायनिक तत्वों से होता है। इसलिए भोजन के माध्यम से जो-जो तत्व शरीर में जायेंगे, शरीर पर उसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा। शराब और जहर यह नहीं देखते कि ग्रहण करने वाला व्यक्ति कौन है? अत: बुद्धिमान व्यक्तियों को आहार के बारे में स्वाद के साथ-साथ हितकर-अहितकर, सुपाच्य, संतुलित-असंतुलित का ध्यान रखकर तथा मौसम और शारीरिक अवस्था के अनुकूल जो भोजन शरीर को स्वस्थ,मन को मजबूत और आत्मा को पवित्र, शुद्ध एवं सात्विक बनाये, ऐसे आहार का ही सेवन करना चाहिए। पर आज के दौर में प्राकृतिक अन्न, फल आदि को छोड़ कर मांसाहार की बढती प्रवृति राष्ट्रीय प्रवृति को भी नकारात्मक बनाती है। मनुष्य को रोगग्रस्त भी करती है क्योंकि वैज्ञानिक तथ्य है कि मनुष्य केवल अन्न-फल आदि के लिए ही बना है।

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मानव संरचना शाकाहार                                   

  • मांसाहार मनुष्य के लिए पूर्णत: अवैज्ञानिक है, क्योंकि उसकी प्रक्ृति इसके अनुरूप नहीं है। मनुष्य व हिंसक प्राणियों की शारीरिक संरचना को देखें तो मांसाहारी जीवों के दांत नुकीले व पंजे तेज नाखून वाले होते हैं। जिससे वह आसानी से अपने शिकार को चीर-फार कर खा सके। जबकि शाकाहारी जीवों के दांत चपटी दाढ वाले होते हैं व पंजे फल आदि आसानी से तोड़ सकने वाले ही होते हैं।
  • वहीं मांसाहारी जीवों के निचले जबड़े केवल ऊपर नीचे ही हिलते हैं, परिणामत: वे अपना भोजन बगैर चबाए ही निगलते हैं। जबकि शाकाहारी जीवों के निचले जबड़े उपर-नीचे, दाएं-बाएं सब ओर हिल सकते हैं क्योंकि वे अपना भोजन चबाने के बाद निगल सकें।
  • मांसाहारी प्राणियों की जीभ खुरदरी होती हैं, वहीं शाकाहारी प्राणियों की जीभ चिकनी होती है। मांसाहारी जीवों की आँते छोटी होने के कारण वे मांस के सडऩे व विषाक्त होने से पहले ही उसे शरीर से बाहर फेंक देते हैं, जबकि शाकाहारी जीवों की आंतों की लम्बाई अधिक होती है, अर्थात् करीब-करीब उनके शरीर की लम्बाई से चार गुनी व धड़ की लम्बाई से लगभग 12 गुनी होती हैं और वे सडऩ पर पदार्थ जल्दी बाहर नहीं फेंक पाते।
  • मांसाहारी जीवों के यकृतव गुर्दे भी अनुपात में बड़े होते हैं। शाकाहारी जीवों के अनुपात में छोटे होते हैं।
  • मांसाहारी जीवों के पाचक अंगों में शाकाहारियों के पाचक अंगों की अपेक्षा लगभग दस गुना अधिक हाइड्रोक्लोरिक एसिड होता है, जो मांस को आसानी से पचा देता है। जबकि शाकाहारी जीवों के पाचक अंगों में हाइड्रोक्लोरिक एसिड कम होने से मांस को आसानी से नहीं पचा पाता।
  • मांसाहारी जीवों की लार अम्लीय होती है। शाकाहारी जीवों की लार क्षारीय होती है।
  • मांसाहारी जीवों की सूंघने की शक्ति अत्यंत तीव्र होती है, आंखें रात्रि में चमकती हैं तथा वे रात में भी दिन की तरह देख पाते हैं। ये शक्तियां उसे शिकार करने में सहायक होती हैं। जबकि शाकाहारी जीवों में सूंघने की शक्ति उतनी तीव्र नहीं होती साथ ही रात में भी दिन की भांति देखने की शक्ति नहीं होती।
  • चूँकि मनुष्य शाकाहारी है, इसीलिए मनुष्य की शारीरिक रचना जैसे आंखों की पुतलियां, गर्दन एवं आंतों का अनुपात, रक्त की रासायनिक स्थिति, पसीने की प्रक्रिया, रात में देखने की शक्ति, पानी पीने का ढंग, जबड़ों के हलन-चलन का तरीका, नाखून, दांत और दाढों की रचना शाकाहारी जानवरों से मिलती-जुलती होती हैं।

वस्तुत: मनुष्य प्रकृति से शाकाहारी है और मंासाहार उसे अनुकूल नहीं। ऐसे में उसे अपनी प्रकृति अनुसार ही आहार पर ध्यान रखना चाहिए।

एक अन्य वैज्ञानिक तथ्य है कि किसी भी रोगी को जब रक्त की आवश्यकता होती है, तब डॉक्टर उस रोगी को उसके ग्रुप का ही रक्त देते हैं? जबकि मांसाहार से मांस के साथ शरीर में विपरीत गुण वाला रक्त एवं मांस शरीर में जाता है, जो शरीर को हानि भी तो पहुंचायेगा।

शोध के अनुसार मांसाहार पाचन संस्थान को अस्त-व्यस्त कर देता है। यह लार को क्षार से अम्ल बना देता है। अत: लार में भोजन को पचाने की क्षमता उसी अनुपात में कम हो जाती है और पाचन संस्थान की निष्क्रियता बढने लगती है। मुख्य बात यह भी है कि भोजन शरीर को जितना आवश्यक है,उससे भी ज्यादा उसका पाचन आवश्यक है। अत: हमारा खान-पान हमारे पाचन तंत्र के अनुकूल ही होना चाहिए।

वैसे भी मांसाहार से शरीर की प्रतिकारात्मक शक्ति घटती है। हड्डियां कमजोर होती हैं। स्मरण शक्ति घटती है, यह वैज्ञानिक तथ्य है।

मांसाहार की हानियां?

प्रश्न है कि कोई मनुष्य मांसाहार क्यों करता है? क्या मांसाहार स्वास्थ्य, आर्थिक, मानवीय, पर्यावरण, प्रकृति की दृष्टि से उत्तम है अथवा उसकी सोच, धारणायें, मान्यतायें बदलने के लिए विदेशी विज्ञापन, पूर्वाग्रह एवं अन्धा:नुकरण का सहारा लिया गया है? साथ ही मनुष्य जैसा बुद्धिमान प्राणी मांसाहार के लिए उन बेजुबान, निराश्रित, मूक प्राणियों का वध करें यह कहां तक उचित है? यह मानव के स्वार्थीपन व ताकत का दुरूपयोग ही तो है। मांसाहार स्वाद, ताकत और फैशन आदि में भी नहीं आता। मांसाहार से ताकत आती है, यह बिल्कुल मिथ्या धारणा है। शास्त्र वाक्य है कि युद्ध में हजारों योद्धाओं को जीतने वालों से अपने मन और आत्मा पर विजय पाने वाला ज्यादा शक्तिशाली होता है। ऐसे में मांसाहार जो मन को गुलाम बनाने और आत्मा को विकारी बनाने वाला है, वह मानव मन में विदेशियों द्वारा डाली गयी विकृत धारणा का ही परिणाम है।

जटिल संवेदनाओं का विज्ञान

तरंगों के प्रभाव से कौन परिचित नहीं है? टीवी, रेडियो से प्रसारित कार्यक्रमों की तरंगे क्षण मात्र में सारे विश्व में प्रसारित हो जाती हैं तथा हजारों मील दूर बैठा व्यक्ति उसी क्षण उस दृश्य को देख व सुन सकता है। डाऊजिंग पद्धति द्वारा शरीर के छोटे से छोटे अवयव, जैसे रक्त की बूंद, बाल, नाखून आदि से फोटो अथवा हस्ताक्षर की तरंगों के आधार पर संबंधित व्यक्ति के रोगों का निदान तथा प्रश्नों का समाधान भी ढूंढ लिया जाता है। इन सबसे स्पष्ट है कि किसी पदार्थ से निकलने वाली तरंगों का प्रभाव तुरन्त समाप्त नहीं होता। ऐसे में मांसाहार के कारण वध किये जाने वाले जानवरों की चीत्कार की तरंगें क्या प्रकृति में असंतुलन पैदा नहीं करेगी? वे विचार, हमारे रहन-सहन, मन को निश्चित रूप से विकृत करती हैं, जो शारीरिक, मानसिक रोगों का कारण बन रही हैं। अत: मांसाहार से मुक्ति आवश्यक है।

पोषक तत्व का भ्रम

आहार के संबंध में सर्वाधिक गलतफहमी है कि शाकाहार से शरीर को उतना पोषण प्राप्त नहीं होता, जितना मांसाहार से होता है। एलोपैथिक चिकित्सकों का भोजन में आवश्यक तत्वों की उपलब्धता संबंधी तालिकाएं भी यह भ्रम पैदा कर रही हैं। इस युग में अधिकांश व्यक्ति चमचमाती पैकिंग, ऊपर से डाली गई सुगन्ध एवं ब्राह स्वच्छता से भ्रमित हो गंदी, अशुद्ध, अनुपयोगी, हानिकारक वस्तुओं को स्वाद के कारण उपयोग करते हैं। इस विचार से वे कोसों दूर है कि इससे पाचन होगा अथवा नहीं, यह स्वास्थ्य के अनुकूल है या प्रतिकूल। बस स्वाद के वशीभूत भोजन एक रिवाज बन गया है। अधिकांश व्यक्ति जब इच्छा होती है, जो अच्छा लगता है, खाने लग जाते हैं। जो भविष्य में रोग का कारण बनते हैं। अत: जन्म और मृत्यु पर नियंत्रण अभियान से भी ज्यादा आज स्वाद पर नियंत्रण अभियान आवश्यक है।

साभार: योग संदेश

डॉ. चंचलमल चौरडिय़ा

 

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