पन्द्रहवीं राजस्थान विधानसभा के लिये उल्टी गिनती शुरू

पन्द्रहवीं राजस्थान विधानसभा के लिये उल्टी गिनती शुरू

वसुंधरा सरकार का कार्यकाल पूरा होने में लगभग पन्द्रह माह शेष है बावजूद इसके पन्द्रहवीं राजस्थान विधानसभा के चुनाव के लिये उल्टी गिनती शुरू हो गई है। पिछले दो दशक से प्रदेश में बारी-बारी से भाजपा एवं कांग्रेस के सत्तारूढ़ होने के इतिहास की तर्ज पर कांग्रेस अपनी बारी के लिये अधीर है वहीं भाजपा नेतृत्व ने दो सौ सदस्यीय सदन में 180 सीटें जीतने के लक्ष्य और एक बारगी सभी दो सौ सीटें जीतने की बात कहकर संसदीय लोकतंत्र में प्रतिपक्ष के अस्तित्व तथा इसकी अहमियत पर ही सवालिया निशान खड़े कर दिये हैं। दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर संभावित चुनाव नतीजों के कयास को लेकर चर्चा जोर पकडऩे लगी है।

जुलाई माह के अंतिम सप्ताह में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के संगठनात्मक दौरे से दो दिन पूर्व कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की बांसवाड़ा में आयोजित किसान आक्रोश रैली को चुनाव अभियान का श्री गणेश माना गया है। वहीं सत्तारूढ़ दल भाजपा ने उदयपुर में 29 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 25-30 हजार करोड़ लागत की सड़क परियोजनाओं के उद्घाटन एवं शिलान्यास कार्यक्रम में मेवाड़ अंचल से जुटाई जाने वाली भीड़ के बहाने चुनावी शंखनाद के रूप में प्रचारित किया है। इन योजनाओं में वर्षों से लम्बित साढ़े पांच सौ किलोमीटर लम्बी किशनगढ़-उदयपुर-अहमदाबाद, सिक्स लेन सड़क परियोजना शामिल है। उदयपुर सात जिलों की सीमा से जुड़ा है जिसकी सभी सात लोकसभा सीटों तथा 37 विधानसभा सीटों में से 35 सीटों पर भाजपा का कब्जा है। सिक्स लेन सड़क परियोजना गुजरात चुनाव के लिहाज से भी राजनीतिक लाभ का सौदा है। गौरतलब यह है कि मेवाड़ क्षेत्र से अधिकाधिक सीट जीतने वाली पार्टी ही प्रदेश में सरकार बनाती रही है। इस राजनीतिक टोटके के मद्देनजर दोनों प्रमुख दल मेवाड़ की चुनावी राजनीति को तरजीह देते रहे हैं।

इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने परिपक्व राजनैतिक चातुर्थ से दिये गये बयान से प्रदेश की चुनावी राजनीति को गरमाने का प्रयास किया है। गहलोत ने भाजपा के कांग्रेस मुक्त भारत की तर्ज पर वसुंधरा मुक्त राजस्थान का मुद्दा उठाकर एक तीर से दो शिकार वाली कहावत को चरितार्थ किया है। उन्होने मुख्यमंत्री वसुंधरा के नेतृत्व को खुली चुनौती देने वाले भाजपा के कद्दावर नेता विधायक घनश्याम तिवाड़ी की मुहिम की आग में घी डालने का प्रयास किया है। वहीं सत्ता की आस लगाये बैठे कांग्रेसजनों में आत्मविश्वास का जज्बा जगाने की कोशिश के साथ यह संदेश भी दिया है कि पड़ोसी राज्य गुजरात के प्रभारी महासचिव होने के बावजूद वह राजस्थान की राजनीति से अलग थलग नहीं है।

पिछले विधानसभा चुनाव में 163 सीटें जीतने के कीर्तिमान के साथ भाजपा ने लोकसभा की सभी 25 सीटों पर भी अपना परचम फहराया था। लेकिन विधानसभा की चार सीटों पर उपचुनाव में कांग्रेस ने तीन सीटें जीतकर सत्तारूढ़ भाजपा को जोर का झटका दिया। स्थानीय निकाय चुनावों में मत प्रतिशत में वृद्धि को कांग्रेस ने अपनी लोकप्रियता बढऩे का संकेत माना और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट कांग्रेस राजनीति में अपने पैर जमाने के अभियान में जुट गये। राहुल गांधी के करीबी इस नेता के लिये अजमेर संसदीय उपचुनाव अग्नि परीक्षा सिद्ध होगा। वह पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के सांवरलाल जाट से एक लाख 71 हजार मतों से पराजित हुये थे। केन्द्र में राज्यमंत्री बनाये गये सांवरलाल ने स्वास्थ्य कारणों से मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया था। उन्हें राज्य किसान आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के जयपुर दौरे के समय बैठक में अचानक तबीयत खराब होने पर सांवरलाल को अस्पताल ले जाया गया। इलाज के दौरान दिल्ली एम्स में उनका निधन हो गया। अब रिक्त हुये अजमेर संसदीय क्षेत्र में उपचुनाव होना है। सत्तारूढ़ भाजपा के लिये भी यह उपचुनाव प्रतिष्ठा का सबब बन गया है। इस उपचुनाव की हार जीत पब्लिक के मूड का पैमाना बनेगी। भाजपा दिवंगत सांवरलाल जाट के किसी परिजन को टिकट देकर सहानुभूति लहर का लाभ उठाने के प्रयास में है। वहीं कांग्रेस के समक्ष यह गंभीर संकट है कि वह प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट को उनके पुराने निर्वाचन क्षेत्र में पुन: दाव पर लगाये या नहीं। पायलट भी यह जानते हैं कि अगर वह उपचुनाव में पराजित हो गये तो खुद उनका राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। बहरहाल उपचुनाव की घोषणा के बाद स्थिति स्पष्ट होगी कि चुनाव दंगल में कौन उतरेगा।

कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकार में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्यकाल में सितम्बर 2011 में जोधपुर के बोरूंदा की एएनएम भंवरी देवी के अपहरण व हत्या के प्रकरण में अहम कड़ी इन्द्रा विश्नोई की मध्य प्रदेश के देवास में नर्मदा तट स्थित मंदिर से गिरफ्तारी ने कांग्रेस को सियासी संकट में डाल दिया है। करीब साढ़े पांच साल से फरार इन्द्रा पूर्व मंत्री स्व. रामसिंह विश्नोई की पुत्री और कांग्रेस के पूर्व विधायक मलखान सिंह की बहन है। भंवरी कांड में विश्नोई के साथ पूर्व मंत्री महिपाल मदेरणा सहित लगभग एक दर्जन लोग गिरफ्तार किये जा चुके हंै। इस मामले की जांच कर रही सी.बी.आई. तीन चार्जशीट प्रस्तुत कर चुकी है और इन्द्रा विश्नोई की गिरफ्तारी और पूछताछ में नये खुलासे से चौथी चार्जशीट भी पेश की जा सकती है। इस कांड ने मारवाड़ की राजनीति में भूचाल ला दिया था। पश्चिमी राजस्थान में जाट समुदाय से राजनैतिक हैसियत रखने वाले मदेरणा परिवार तथा विश्नोई समुदाय से रामसिंह विश्नोई के परिवार का राजनीतिक भविष्य अंधकारमय हो गया। इस प्रकरण से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति भी गरमाएगी। गहलोत के कार्यकाल में ही तत्कालीन जलदाय मंत्री महिपाल मदेरणा एवं कांग्रेस विधायक मलखान सिंह विश्नोई की गिरफ्तारी हुई थी और इस प्रकरण की जांच सी.बी.आई. को सौंपी गई थी। वसुंधरा सरकार के कार्यकाल में गहलोत समर्थक कई नेता जांच एजेंसियों की गिरफ्त में आ चुके हैं। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर में भर्ती घोटाले में पूर्व विधायक एवं प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रहे जुगल काबरा गिरफ्तार हुये थे। पिछले दिनों उनका निधन हो गया था। जोधपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष रहे राजेन्द्र सोलंकी भी भ्रष्टाचार मामलों में गिरफ्तार होकर उच्चतम न्यायालय से जमानत लेकर प्रदेश से बाहर रहने को मजबूर है।

Layout 1लगातार दूसरी बार सत्ता पर काबिज होने के प्रयास में संगठन को चुस्त दुरूस्त बनाने में जुटी भाजपा को करीब आठ साल बाद प्रदेश संगठन महामंत्री नसीब हो गया। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के संगठनात्मक जयपुर दौरे के बाद पार्टी हाईकमान ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय संगठन मंत्री चन्द्रशेखर को राजस्थान भेजनेे का निर्णय लिया है। उत्तर प्रदेश चुनाव में शाह की विश्वसनीय टीम के अहम सहयोगी चन्द्रशेखर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़े हुये हैं। संघ के प्रचारक रहे ओम प्रकाश माथुर 1989 से 2002 तक प्रदेश में संगठन महामंत्री रहने के अलावा प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। अभी वे राजस्थान से राज्यसभा के सदस्य हंै। माथुर के बाद संघ प्रचारक प्रकाशचन्द्र ने 2009 तक संगठन महामंत्री पद का दायित्व संभाला। भाजपा के बार-बार के आग्रह के बावजूद संघ ने इस पद के लिये किसी को नहीं भेजा। अगले वर्ष के आखिर में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर संगठन महामंत्री का पद भरा गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि आगामी चुनाव में टिकट वितरण में संघ की भूमिका अहम रहेगी। उत्तर प्रदेश पार्टी के कद्दावर नेता के निकटवर्ती सूत्रों के अनुसार पिछले विधानसभा चुनाव में संघ सूत्रों के सर्वे में शामिल लोगों को टिकट देने में प्राथमिकता दी गई थी। यह भी दिलचस्प तथ्य है कि पिछले दिनों केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह की जयपुर यात्रा में उनकी संघ के क्षेत्रीय प्रचारक दुर्गादास से भेंट की बात कही गई थी। लेकिन गृहमंत्री के आगमन से पहले ही दुर्गादास जयपुर से बाहर चले गये।

गुर्जरों सहित पांच जातियों को विशेष आरक्षण की सुविधा से जुड़ा मुद्दा फिर गरमा गया है। आंदोलन पर उतारू गुर्जर समुदाय के प्रतिनिधियों से आठवें दौर की बातचीत में सरकार ओबीसी कोटा 21 से बढ़ाकर 26 फीसदी करके गुर्जरों व अन्य जातियों को आरक्षण देने पर सहमत हुई है। ओबीसी कोटे के वर्गीकरण हेतु अलग से नोटिफिकेशन किया जाएगा। इसके लिये विधानसभा के आगामी सत्र में विधेयक लाया जाएगा। गौरतलब है कि एसबीसी आरक्षण हेतु पिछले दशक में तीसरी बार विधेयक लाया जाएगा। राज्य में अभी 49 फीसदी आरक्षण सुविधा है लेकिन 5 फीसदी एसबीसी आरक्षण से यह 54 प्रतिशत हो जाएगा। पचास प्रतिशत से अधिक आरक्षण सीमा पर अदालत रोक लगा देती है। भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने भी इसे सरकार की बदनीयती तथा वंचित वर्ग को आरक्षण नहीं देने की मंशा बताया है। राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जसराज चैपड़ा का कहना है कि आरक्षण से लाभान्वित आबादी के 50 प्रतिशत से अधिक होने संबंधी सर्वे की पुष्टि पर ही अदालत इसे मंजूरी देगी। यह भावी सर्वे से जुड़ा मसला है।

प्रदेश में विकास को लेकर सत्तारूढ़ दल के दावों तथा प्रतिपक्ष कांग्रेस द्वारा पूर्ववर्ती सरकार की विकास योजनाओं को ठप करने के आरोपों प्रत्यारोपों को लेकर कश्मकश जारी है। एक ओर जनहित से जुड़े मुद्दों के निस्तारण में ढिलाई पर उच्च न्यायालय की सरकार को कड़ी फटकार और अब स्वंय मुख्यमंत्री को विकास योजनाओं की निगरानी के लिये मजबूर होना पड़ा है। हकीकत यह है कि पिछले तीन सालों में पानी, बिजली, सीवरेज अथवा जनहित से जुड़ी करीब सात सौ परियोजनायें सरकारी मशीनरी की जकड़ में अटकी हुई है। विधानसभा में विशेष उल्लेख के तहत उठाये गये लोकहित के मुद्दों पर नियमानुसार सात दिवस में जवाब नहीं मिलने पर कई विधायकों ने अधिकारियों के खिलाफ नाराजगी जताते हुये विधानसभा अध्यक्ष को लिखित शिकायत दर्ज की है। नौकरशाही की इस मनमानी के पीछे एक कारण सचिव एवं उच्च स्तर के आई.ए.एस. अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) भरने की प्रक्रिया में मंत्रियों की भूमिका खत्म कर दी गई है। लिहाजा मंत्रियों की अनदेखी में इजाफा हुआ है। कई मंत्रियों तथा अधिकारियों के विवाद तो सार्वजनिक चर्चा में है। वहीं जनप्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज मामलों की जांच अवधि हनुमान की पूंछ बन गई है।

इस माहौल में गुटबाजी में फंसी कांग्रेस संगठनात्मक चुनाव में धांधली की शिकायतों के चलते राहुल गांधी की कवायद पर बूथ प्रबंधन और सोशल मीडिया के माध्यम से चुनावी वैतरणी पार करने की जुगत में है। कांग्रेस कथित सरकार विरोधी माहौल से जुड़े मुद्दों को भुनाने में कामयाब नहीं हो पायी है। सत्तारूढ़ भाजपा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक करिश्में की बदौलत सत्ता की चैखठ तक पहुंचने की दावेदारी को लेकर मचे अंदरूनी घमासान और अपने ही हमसफर रहे वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी की भावी रणनीति क्या चुनावी गुल खिलाएगी, इसका सभी को इंतजार रहेगा।

जयपुर से गुलाब बत्रा

 

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