अध्यात्मवाद में कहां से आये कलंकित चेहरे

अध्यात्मवाद में कहां से आये कलंकित चेहरे

भारतवर्ष हमेशा से साधु-सन्तों की तपोभूमि रही है। इस पुण्यभूमि को आदिगुरू शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, तपोवनजी महाराज और स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती जैसी अनगिनत पुण्य आत्माओं ने   अपनी आध्यात्मिक चेतनाओं से प्रफुल्लित किया है। यह हमारे संतों की ही देन है कि भारत संपूर्ण विश्व में अपनी संपन्न संस्कृ ति, परंपरा और अपार ज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी रहा है। प्राचीन शास्त्र, वेद, उपनिषद्, गीता और भागवत इस देश के बहुमूल्य खजाने रहे हैं, जिनकी रचना हमारे महान तपस्वियों के द्वारा ही की गयी हैं। कभी-कभार कुछ आडंबर वाले व्यक्ति आध्यात्मिक गुरू होने का ढोंग करने लगते हैं। गुरमित राम रहीम इनमें से ही एक है, जिन्हे कोर्ट द्वारा उनके घिनौने कर्मों के लिये अपराधी सिद्ध किया गया है। लेकिन इसका मतलब कदापि यह नहीं हो सकता की हम सभी आध्यात्मिक गुरूओं पर संदेह करने लगें। गुरमित राम रहीम को जिस प्रकार सजा दी जानी चाहिये थी, वो कोर्ट द्वारा दी जा चुकी है। फिर भी न जाने कितने ऐसे ढ़ोंगी बाबा हैं जो अपने आपको कानून से ऊपर मानते हैं। गुरमित राम रहीम के समर्थकों द्वारा फैलाई गई हिंसा, जिसमें 38 लोगों की मृत्यु हुई, यह स्पष्ट दिखाती है कि ये लाखों समर्थक अंध-भक्ति के शिकार हैं। कुछ बाबा तो भगवान, योगी, बापू और संत होने का भी नाटक करते हैं। लेकिन जब नाटक का पटाक्षेप होता है तो ये सभी बाबा अन्तत: कारागार में दिखते हैं। हालाकि इस नाटक के बाजार को नियंत्रण करने की आवश्यकता है।

एलेक्जेंडर के समय से, भारत पश्चिम के देशों में अध्यात्म का स्रोत माना जाता रहा है। पाश्चात्य सभ्यता के लोगों का मानना है कि भारत वह पवित्र स्थान है जहां साधु-संत घने जंगलों, पहाड़ों और नदियों के उद्गम स्थलों पर समाधि लगाते है और अपने प्रभावशाली मंत्रों के द्वारा शेर व बाघों को अपने वश में कर लेते हंै। आम भाषा में बोला जाए तो भारत एक ऐसा देश है जहां संसार की सभी समस्याओं को हल करने का रहस्य है। लेकिन आज भारत की आध्यात्मिक शक्ति को कुछ कपटी, धार्मिक होने का नाटक करने वाले लोगों के द्वारा लगातार हानि पहुंचाई जा रही है। वैसे इस प्रकार के दुष्ट आचरण करने वाले लोग केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं है, बल्कि ये लोग सभी पंथों में अपना डेरा डाले हुए हैं। अपने आपको भगवान और देवी मानने वाले लोगों को पता है कि विश्वास और चेतना के बीच कोई लकीर नहीं है। स्थिति इस प्रकार है कि कोई मूर्ख बना रहा है या फिर कोई मूर्ख बन रहा है। इस पाखंड के माध्यम से मोटी रकम बनाई जा रही  है। हमारे राजनेताओं को भी पता है कि लोगों में अपनी पैठ बना चुके इन बाबाओं के पास जाने से लोगों  के मत को पाया जा सकता है। मुख्यत: आशाराम, गुरमित राम रहीम और रामपाल जैसे लोग तो स्वंय को कानून से भी ऊपर मानते हैं।

यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि इन समर्थकों में सबसे अधिक मूर्ख लोग होते हैं, जिन्हें समझाना काफी कठिन होता है। प्रत्येक वर्ष कई नकली बाबा बेनकाब होकर जेल जाते हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि ये तथा-कथित दैवीय-पुरूष किसी भी प्रकार का भला कार्य नहीं करते। इसके बाद भी इनके अंधे भक्तों का विश्वास कम नहीं होता।  गेरूए वस्त्र, ललाट पर चंदन का लेप और दाढ़ी वाले लोगों की सेख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। क्योंकि भारतीयों के लिये ये पवित्र और धार्मिक प्रतीक के रूप में जाने जाते हैं।

गुरमित राम रहीम एक फिल्म में रैंबो का किरदार निभाते है। राधे मां गले लगने, चुंबन और डांस थेरेपी में विश्वास करती है। निर्मल बाबा समोसे के साथ हरी की जगह लाल चटनी खाने जैसे परामर्श देकर करोड़ो रूपये कमाते हैं। ये सभी तथाकथित गुरू मीडिया को अपने फायदे के लिये प्रयोग करना अच्छे से जानते हैं। इन बाबाओं के ‘विलक्षण कार्य’ टेलीविजन के आध्यात्मिक चैनलों के माध्यम से करोड़ों लोगों के घरों में पहुंचते हैं। ये गुरू इन माध्यमों से दर्शकों के जीवन को प्रभावित करते हैं और श्रोताओं की इतनी बड़ी संख्या हमारे सभी राजनीतिक दलों के लिये वोट बैंक का काम करती है। इन राजनीतिक दलों को भी पता होता है कि पार्टी में एक-दो आध्यात्मिक नेताओं के बिना चुनावी राजनीति में सफल होना कठिन है। ये बाबा जाति, धर्म और बिरादरी के नाम पर मांगे जाने वाले वोट-बैंक की राजनीति से भी बढ़े माने जाते हैं। यहां ध्यान देने वाली बात है कि पहले के आध्यात्मिक गुरू अपने समर्थकों को आध्यात्मिक होने का परामर्श देते थे,  लेकिन आज के आडंबरी गुरू अपने समर्थकों को शक्तिशाली और साधन-संपन्न होने का परामर्श देते हैं। प्रचीन काल में भारत में गुरू और शिष्य की परंपरा एक पवित्र  संस्कृति के रूप में हुआ करती थी। एक गुरू ही था जो अपने शिष्यों को इस शत्रुतापूर्ण संसार में शरण देता था।

यहां कोई भी इस महान देश की ऋषि-मुनियों वाली प्राचीन परंपरा के विरूद्ध हो रहे षडय़ंत्र को सरलतापूर्वक भांप सकता है, जो हमारे समाज को सही रास्ते पर चलने का परामर्श देती रही है। वर्तमान में  भी इस भूमि पर कई ऐसे संत हैं जो अध्यात्म की प्रथा का अनुसरण करते हुए लोगों का मार्गदर्शन  करते हैं। अत: सही और गलत संतों को एक ही तराजू में तोलना सही नहीं होगा। सही संतों की अवहेलना कर प्राचीन मठों को गलत सिद्ध करना भी हमारे समाज के लिये खतरनाक होगा। किसी भी धर्म का उल्लेख न करते हुए, यह आशा करते है कि इंडियन पीनल कोड के तहत सभी पंथों में छिपे ढोंगियों को बेनकाब किया जाना चाहिये।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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