आत्मचिंतन से परमात्मा प्राप्ति

आत्मचिंतन से परमात्मा प्राप्ति

मनुष्य एक चिन्तनशील प्राणी है यह हमें ज्ञात है। अपनी चिन्तन शक्ति का उपयोग करके हम क्या से क्या नहीं कर सकते हैं। यही चिन्तन अथवा सोच कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक होती है। किन्तु अधिक से अधिक समय हमारा नकारात्मक सोच में ही व्यतीत हो जाता है। हमारी गलत सोच ही दिन-प्रतिदिन हमारे दिमाग को पंगु बना देती है। धीरे-धीरे हमारी चिन्तन शक्ति गलत दिशा में भटक जाती है। इसीलिए हम हमारे दिमाग को जितना अधिक सत्चिन्तन एंव सत्कार्यों में लगाकर रखेंगे उतना अधिक हमारे सोचने की क्षमता बढ़ेगी। देखा जाए तो हमारे जीवन का संपूर्ण विकास हमारी सोच पर ही निर्भर करता है। हमारा मन एक ऐसी चीज है जो हमें ईश्वर से जोड़कर रखता है। हमारे अंदर रहने वाला चैतन्य हमें मनुष्य होने का अहसास दिलाता है। यही चिन्तन शक्ति मनुष्य को नियंत्रित करती है। जब सोच गलत होती है तो मानव से दानव बन जाता है और वहीं सोच अच्छी होने से हम इंसान बन जाते हैं। और अधिक अच्छी सोच रखने वाले व्यक्ति ईश्वर सदृश हो जाते हैं। हमारा मन ही हमें ईश्वर से जोड़कर रखता है। इसलिए अपने मन पर नियंत्रण रखना नितांत आवश्यक है।

अनेक समय हमारे कार्य इतने सात्विक होते हैं कि हमें खुद पता नहीं होता। हमारे अंदर रहने वाला विवेक ही हमें सही और गलत की पहचान कराता है। हमारा हर कार्य कितना सफल होगा उसका आभास हमारे विवेक को होता है। विवेक को यदि हम अपना गुरु मानें तो गलत नहीं होगा। अगर उसकी जानकारी से और इच्छा से हम कोई भी कार्य करते हैं तो वह अवश्य ही सफल होगा। हम सबके अंदर विवेक मौजूद रहता है लेकिन हम उसका उपयोग नहीं कर पाते हैं। देखा जाए तो हमारा अस्तित्व ही विवेक के अंदर छुपा होता है। बाकी जितना कार्य हम करते हैं वह दूसरों से प्रभावित होकर करते हैं–हमें क्या अच्छा लगेगा, वह हम नहीं करते हैं। हमारे साथ रहने वाले लोगों को क्या अच्छा लगेगा, हम वह करते हैं। सभी का जीवन अलग-अलग रास्तों पर चलता है। किन्हीं दो आदमियों का जीवन एक जैसा नहीं होता है। फिर हम दूसरों को देखकर क्यों अपनी कार्यशैली तैयार करते हैं। जब हम खुद ही अपने अस्तित्व से बाहर हो जाते हैं तो हमारे कार्य कैसे अच्छे हो सकते हैं? यह तो बस एक नकल करने वाले बंदर के जैसा परिणाम हो जायेगा।

बाहरी दुनिया से कहीं अधिक अपने अंदर की दुनिया है। इसी अंदर की दुनिया में जाकर कुछ क्षण अपने आप को ढ़ूंढने से हम एक उत्तम मनुष्य की खोज कर बाहर ला सकते हैं, जो केवल अपने अंदर की बात को सुनते हैं। इसी प्रकार अपने अंदर की और यात्रा करने के माध्यम से परमात्मा का आशीर्वाद मिल सकता है।

उपाली अपराजिता रथ

 

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