3 तलाक की कथा शाहबानो से लेकर शायरा बानो तक

3 तलाक की कथा  शाहबानो से लेकर शायरा बानो तक

तीन तलाक को लेकर देश में काफी अरसे से बबाल मचा हुआ था। जिन लोगों का इस्लाम में विश्वास है, उनका मानना है कि वहां पुरुषों को केवल तीन बार तलाक तलाक तलाक कह देने से अपनी विवाहिताएं पत्नी से छुटकारा मिल जाता है। पुराने जमाने में इतना जरुर ध्यान रखा जाता था कि तीन बार तलाक अपनी पत्नी के सामने कहना पड़ता था। लेकिन जब से आधुनिक तकनीक विकसित हुई है तब से मॉडर्न टेक्नोलोजी के शौकीनों ने व्हाटसअप से भी तलाक देना शुरु कर दिया। जिनको व्हाटसअप का प्रयोग नहीं आता, वे एस एम एस से ही यह काम निपटाने लगे। मुसलमानों में से भी अधिकांश लोग इसका विरोध करते थे। लेकिन मौलवियों का कहना था कि मजहब और शरीयत की व्याख्या करने पर उनका एकाधिकार है और उनकी व्याख्या स्पष्ट है। उनके अनुसार मर्दों को तीन तलाक का उपयोग करने का अधिकार है। मुस्लिम समाज की औरतें इस अमानवीय प्रथा का विरोध अपने बलबूते काफी लम्बे अरसे से करती रही हैं। कुछ दशक पहले शाहबानो ने तलाक की इस प्रथा को न्यायालय में चुनौती दी थी। उसके पति मोहम्मद अहमद खान ने, जो स्वंय भी इन्दौर में एक जाना पहचाना वकील था, ने 1978 में तलाक के अपने तथाकथित मजहबी अधिकार का प्रयोग किया और उसे सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया था। वह अपने पति से गुजारा भत्ता माँग रही थी। पति उसकी इस मांग को भी इस्लाम विरोधी ही मान रहा था। अन्तत: 62 साल की शाहबानो न्याय की माँग करते हुए न्यायालय पहुंच गई। यह लड़ाई देश के उच्चतम न्यायालय में पहुंच गई। उच्चतम न्यायालय में वह अपनी ऐतिहासिक लड़ाई जीत गई। उच्चतम न्यायालय ने 23 अप्रेल 1985 को उसके पक्ष में निर्णय दिया कि चाहे शाहबानो एक मुस्लिम औरत है लेकिन उसे भी देश की अन्य तलाकशुदा महिलाओं की तरह अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता पाने का हक है। इतना ही नहीं, उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि सरकार को समान सिविल कोड बनाना चाहिए। चाहे शाहबानो को न्याय पाने के लिए दस साल अदालतों के चक्कर काटने पड़े लेकिन उसे सुकून था कि अन्तत: वह जीत गई है।

अब सरकार को शाहबानो के पक्ष में यह निर्णय लागू करवाना था। शाहबानो को भी और आम मुसलमानों को भी विश्वास था कि इस मानवीय लड़ाई में देश की सरकार उनके साथ होगी। लेकिन इसे इतिहास की त्रासदी ही कहना होगा सरकार ने निर्णय की घड़ी में आम मुसलमानों का साथ न देकर मौलवियों का ही साथ दिया। कांग्रेस के राजीव गांधी उस समय देश के प्रधानमंत्री थे। उनके बारे में कहा जाता था कि वे प्रगतिशील होने के साथ साथ रूढियों के खिलाफ थे। लेकिन उनकी सरकार ने शाहबानो को न्याय दिलवाने की बजाय, न्यायालय के फैसले को निरस्त करने के लिए 1986 में  संसद में एक नया कानून बना दिया। जिन प्रावधानों के तहत शाहबानो को गुजारा भत्ता मिलना था, नए कानून में यह व्यवस्था की गई कि वे सभी प्रावधान मुसलमान औरतों पर लागू नहीं होंगे बल्कि तलाक की सूरत में मुसलमान औरत को केवल इद्दत काल में, जो इस्लाम मजहब के अनुसार 90 दिन का होता है, उसके अपने रिश्तेदारों से या फिर वक्फ बोर्ड से गुजारा भत्ता मिलेगा। उस समय की सरकार ने पीडि़त मुसलमान समाज के साथ खड़ा होने की बजाए मुस्लिम समाज के सामन्तवादी मौलवी समुदाय के साथ खड़े होना ही अपने राजनीतिक लाभ के लिए श्रेयस्कर समझा। सरकार की गद्दारी के कारण शाहबानो जीत कर भी हार गई थी। वह इस सदमे को बर्दाश्त न कर सकी और पांच साल बाद वह इसी गम में चल बसी। शाहबानो के साथ अन्य लाखों मुसलमान औरतों को इससे सचमुच ही वेदना हुई। राजीव गांधी द्वारा बनाए गए इस कानून के खिलाफ मुसलमानों की युवा पीढि़ में इतना गुस्सा था कि राजीव गांधी मंत्रिमंडल के एक मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने तो मंत्रिमंडल से ही त्यागपत्र दे दिया था। लेकिन सरकार के भी मौलवियों के साथ चले जाने के बाबजूद मुस्लिम समाज की औरतें निराश नहीं हुईं। उन्होंने अपनी लड़ाई नहीं छोड़ी।

अनेक साल बाद उत्तराखंड की छत्तीस वर्षीय शायरा बानो एक बार फिर तीन तलाक़ का विरोध करने के लिए और न्याय की पुकार लगाते हुए न्यायालय में पहुंच गई। उसके पति ने चि_ी में ही तीन बार तलाक लिख कर सम्बंध खत्म कर दिया था। उसकी देखादेखी कुछ और मुसलमान औरतें तीन तलाक को चुनौती देते हुए  न्यायालय आ गईं। शायरा बानो के अतिरिक्त दूसरी याचिकाकर्ता 21 वर्षींय, पश्चिम बंगाल की इशरतजहां थी। उसके पति ने अप्रैल 2014 में दुबई से ही टेलीफोन पर तीन बार तलाक का उच्चारण करके विवाह सम्बंध विच्छेद कर दिया था । उत्तर प्रदेश की 30 वर्षीय गुलशन प्रवीण को उसके पति ने दस रुपए के स्टाम्प पेपर पर उस समय तलाकनामा लिख कर भेज दिया, जब वह अपने पिता के घर आई हुई थी। 28 वर्षीय आफरीन रहमान को उसके पति ने स्पीड पोस्ट से तीन बार तलाक लिख कर भेज दिया। सहारनपुर की अतिया साबरी के पति ने एक कागज के टुकड़े पर तलाक लिखा और अतिया के भाई के कार्यालय में भेज दिया। मामले उच्चतम न्यायालय पहुंच गए और यहां तक पहुंचते पहुंचते याचिकाओं की संख्या भी पाँच हो गई। भारतीय समाज में पांच को शुभ भी माना जाता है। उच्चतम न्यायालय ने इन सभी याचिकाओं को एक साथ नत्थी कर दिया और इनके निपटाने के लिए पांच न्यायाधीशों की पीठ गठित कर दी। इस पीठ में मुख्य न्यायाधीश जे एस खेहर के अतिरिक्त न्यायाधीश अब्दुल नजीर, कुरियन जोसेफ,  आर एफ नारीमन और उदय उमेश ललित थे। मीडिया में यह भी प्रचार प्रसार हुआ कि इस पीठ में सिक्ख मत, इस्लाम, मसीही मत, पारसी यानी जरद्रुष्टा सम्प्रदाय और हिन्दू, इत्यादि पांचों आस्थाओं के न्यायाधीश

शामिल हैं। वैसे न्यायालय को मोटे तौर पर विधि की व्याख्या करनी होती है, न्यायाधीश का कौन सा मजहब है, इसका इससे कोई ताल्लुक नहीं है। परन्तु पिछले 70 साल से जिस प्रकार देश की राजनीति में हर सवाल को हिन्दू मुस्लिम नजरिए से ही देखा जाने लगा है और उसी नजरिए के चलते राजीव गांधी सरकार ने संसद में अपनी पार्टी के बहुमत के बलबूते शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को पलट दिया, उसी पृष्ठभूमि में मीडिया की इस व्याख्या को देखा जा सकता है।

लेकिन इस बार एक नई बात हुई। निर्णय देने से पहले न्यायालय ने केन्द्र सरकार से पूछा कि आप बताइए कि आप इस पूरे मामलें में किस के साथ हैं? आपका तीन तलाक के बारे में क्या कहना है? इस सवाल से पूरे मुस्लिम समाज में सन्नाटा छा गया। मुसलमान औरतों के लिए तो यह उनके स्वाभिमान का प्रश्न था। क्या सरकार एक बार फिर मौलवियों का साथ देगी और मुस्लिम महिलाओं के साथ विश्वासघात करेगी? उनके पुराने घाव अभी भरे नहीं थे। लेकिन भीतर ही भीतर मुस्लिम महिलाओं को आशा थी कि यह सरकार तो न्याय का साथ देगी और उनके साथ खड़ी रहेगी। मुख्य न्यायाधीश ने अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी  से पूछा था कि यदि तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया जाए तो मुसलमान पुरुषों के पास तलाक लेने का कौन सा तरीका बचेगा? केन्द्र सरकार की ओर से रोहतगी ने स्पष्ट किया कि तीन तलाक असंवैधानिक तो है ही साथ ही मुसलमान औरतों के साथ अन्याय करता है। मुस्लिम समुदाय में उनकी हैसियत पुरुषों से नीची रहती है। देश की अन्य औरतों की तुलना में उनके साथ भेदभाव होता है। दरअसल यदि कोई मजहबी समुदाय कुछ परम्पराओं को व्यक्तिगत विधि के अन्तर्गत मानता है तो भी वे परम्पराएं देश के संविधान के विपरीत नहीं होनी चाहिए। रोहतगी ने कहा देश में संविधान ही सबसे बड़ा है। जो विधि या परम्परा संविधान के विपरीत है, उसे जाना ही चाहिए। केन्द्र सरकार की इस स्पष्टता से सभी ने राहत की सांस ली। मुस्लिम महिलाओं को पहली बार लगा कि देश की सरकार उनके साथ है  अब तक तो उन्होंने सरकार को मुल्ला मौलवियों के पास चक्कर काटते ही देखा था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो अपने पन्द्रह अगस्त के भाषण में भी स्पष्ट किया कि सरकार मुसलमान महिलाओं के साथ है और उन्हें आशा है कि उन्हें तीन तलाक की हरदम लटकती तलवार से निजात मिलेगी। मुसलमान औरतों का सरकार पर विश्वास और भी गहरा हुआ। लेकिन अभी एक नदी उन्हें और पार करनी थी ।

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कुछ मुसलमानों ने अपनी एक अलग  एन जी ओ बना रखी है जिसको वे आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड कहते हैं। इसका गठन इन गिने चुने लोगों ने आपस में मिल कर 1973 में किया था। इस एन जी ओ का कहना है कि तीन तलाक पर कचहरियों को दखलंदाजी करने का अधिकार नहीं हैं। यह इस्लाम का आंतरिक मामला है और इसको कोई नहीं हटा सकता। ताज्जजुब है 1985 में शाहबानो के मामले में भी यह एन जी ओ इसी प्रकार की दकियानूसी बातें करती थी। इस एन जी ओ ने कपिल सिब्बल को मैदान में उतारा हुआ था। कपिल सिब्बल छोटे मोटे आदमी नहीं हैं। वे मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में वरिष्ठ मंत्री रहे हैं। अभी भी वे सोनिया-कांग्रेस के नीति निर्माताओं का हिस्सा हैं। उन्होंने भी न्यायालय में अपना मोर्चा संभाला हुआ था। उन्होंने न्यायालय को एकदम स्पष्ट कर दिया कि व्यक्तिगत कानूनों में दखलन्दाजी करने का अधिकार किसी भी न्यायालय के पास नहीं है। उन्होंने कहा मुसलमान पुरुष  637 से तीन तलाक की प्रथा का उपयोग करते आ रहे हैं। इस प्रकार उनको इस सुविधा का प्रयोग करते हुए 1400 साल हो गए हैं। इसलिए हम इस प्रथा को अपने संविधान की कसौटियों पर परखने वाले कौन होते हैं? इस प्रथा में नैतिकता है या समानता है, इसका निर्णय करने का अधिकार हमें किसने दिया? यदि यह प्रथा महिलाओं से भेदभाव भी करती है तो भी हम उसमें दखलन्दाजी नहीं कर सकते क्योंकि यह इस्लाम में विश्वास का मामला है। न्यायालय आस्था के मामलों में घुसपैठ नहीं कर सकती। एक न्यायाधीश ने कहा भी कि हम किसी के मजहबी मामलों में दखलन्दाजी नहीं कर रहे, हम तो केवल यह जांच रहे हैं कि तीन तलाक से मुस्लिम महिलाओं से भेदभाव तो नहीं होता? सिब्बल के पास इसका भी जबाब था। उन्होंने कहा हिन्दू समाज में भी औरतों से भेदभाव होता है। सिब्बल यहीं नहीं रुके। उन्होंने कहा जिस प्रकार हिन्दुओं की राम के बारे में आस्था है, उसी प्रकार मुसलमानों की तीन तलाक में आस्था है। जाहिर है इससे हिन्दुओं के साथ-साथ मुसलमानों को भी हैरानी हुई। तीन तलाक सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा है। सबसे बड़ी बात थी कि कपिल सिब्बल कह रहे थे कि तीन तलाक की यह प्रथा 1400 साल से प्रचलित है। शायद 1400 साल की यह गणना सिब्बल ने इस्लाम के जन्म के साथ जोड़कर की होगी। भारत में इस्लाम को मानने वाले अरब, तुर्क, अफगान इत्यादि आक्रमणकारी मोटे तौर पर 11वीं-12वीं शताब्दी में पांव जमाने में कामयाब हुए। उन्होंने हिन्दुस्तान के काफी हिस्से को जीत कर अपना राज्य यहां स्थापित कर लिया था। उन अरबों, तुर्कों, अफगानों में तीन तलाक की प्रथा विद्यमान रही होगी। लेकिन काफी बड़ी संख्या में हिन्दुस्तानियों को इस्लाम मजहब में मतान्तरित करने में उन्हें 100-200 साल तो लगे ही होंगे। अब इन मतान्तरित हिन्दुस्तानियों को अरबों, तुर्कों और अफगानों में व्याप्त तीन तलाक की छूत लगते लगते 100-50 साल तो लगे ही होंगे। इसका अर्थ हुआ कि हिन्दुस्तान के मतान्तरित मुसलमानों में इस कुप्रथा को प्रचलित हुए 500-600 साल से ज्यादा नहीं हुए। लेकिन सिब्बल इसे 1400 साल कह रहे थे।

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कपिल सिब्बल के इस स्टैंड से मुस्लिम महिलाओं में बैचेनी बढ़ रही थी, क्योंकि अभी तक इसी प्रकार के तर्कों के भरोसे तीन तलाक ने मुस्लिम औरतों की जिन्दगी को नर्क बना रखा था। यह ठीक है कि इस बार सरकार मुस्लिम महिलाओं के साथ थी लेकिन प्रतिक्रियावादियों ने हार नहीं मानी थी। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड की आड़ में वे इकठ्ठा हो गईं थीं। अब सभी की आंखें उच्चतम न्यायालय की ओर लगी थीं।

और अन्तत 22 अगस्त 2017  को उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायाधीशों की पीठ ने अपना फैसला दे दिया है। यह ऐतिहासिक फैसला है। न्यायालय ने तीन-दो के बहुमत से निर्णय दिया कि तीन तलाक़ यानि तलाक-ए-बिद्दत, संविधान विरोधी है और यह गैरकानूनी है। न्यायालय ने सरकार को यह भी कहा है कि वह 6 मास के अन्दर अन्दर इस विषय पर कानून बनाए। इस निर्णय में मुख्य न्यायाधीश जे एस खेहर और न्यायाधीश नजीर का निर्णय अल्पमत में था और अन्य तीन न्यायाधीशों जोसफ, नारीमन और ललित का निर्णय बहुमत का था। अत: नियमानुसार बहुमत का निर्णय उच्चतम न्यायालय का निर्णय माना गया। अल्पमत निर्णय में कहा गया कि तीन तलाक, हनफी स्कूल के सुन्नी मुसलमानों का व्यक्तिगत कानून है, यह उनकी आस्था का हिस्सा है और कम से कम 1400 साल से लागू है। हमारी नजर में तीन तलाक संविधान के अनुच्छेद 25 का किसी भी लिहाज से उल्लंघन नहीं करता। उन्होंने यह भी कहा कि तीन तलाक मुसलमानों के मज़हब का हिस्सा है, इसलिए इसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता। यह हैरानी की बात है कपिल सिब्बल और खेहर व नजीर तीनों यह मानते हैं कि यह प्रथा चौदह सौ साल से प्रचलित है, जबकि इस्लाम को हिन्दुस्तान में आए 1400 साल तो किसी भी लिहाज से नहीं हुए। यदि अरब लोग इसे 1400 साल से अपना भी रहे हैं तो उसका हिन्दुस्तान के मुसलमानों का क्या ताल्लुक है?

लेकिन दूसरे तीनों न्यायाधीश इन निष्कर्षों और व्याख्या से सहमत नहीं थे। उन्होंने कहा तीन तलाक को किसी मजहब का आन्तरिक अनिवार्य हिस्सा नहीं माना जा सकता । कोई प्रथा लम्बे समय से प्रचलन में है तो क्या इसीलिए उसे वैध ठहराया जा सकता है? इसलिए तीन तलाक की उम्र 1400 साल हो गई है, इसीलिए उसे मान्यता नहीं दी जा सकती। यह प्रथा संविधान विरोधी है। विधायिका को इस विषय पर अधिनियम बनाने का पूरा अधिकार है और उसे इस का प्रयोग करना चाहिए। न्यायाधीश नारीमन ने एक और बात कही। उनके अनुसार जब भी पति-पत्नी में कभी लड़ाई झगड़ा होता है और तलाक तक की नौबत आने लगती है तो इसके बीच दोनों पक्षों में समझौते का अन्तराल रहता है और न्याय की दृष्टि से यह रहनी भी चाहिए। लेकिन तीन तलाक में समझौते के लिए यह अन्तराल बिल्कुल उपलब्ध नहीं है। क्योंकि तीन तलाक प्रथा में तो एक बार गुस्से  में मुंह से तीन बार तलाक तलाक तलाक निकल गया, इसके साथ ही वैवाहिक सम्बंध सदा सर्वदा के लिए समाप्त हो गया। अब उसे पलटने का कोई रास्ता नहीं है। उनके अनुसार तीन तलाक प्रथा कुरान में नहीं है। खेहर और नजीर ने भी यह माना कि यदि सरकार चाहे तो लिंग भेद की इस प्रथा को समाप्त करने के लिए कानून बना सकती है। उन्होंने भी फिलहाल 6 महीने के लिए तीन तलाक को प्रतिबन्धित कर दिया और यह भी कहा कि यदि 6 महीने के अन्दर कानून नहीं बनता तो प्रतिबन्ध आगे के लिए भी जारी रहेगा ।

जाहिर है उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय से मुस्लिम समाज के प्रगतिशील क्षेत्रों में खुशी की लहर छा गई। यह भारत की मुसलमान औरतों का मुल्ला-मौलवियों के चंगुल से मुक्ति का पर्व है। मौलवियों हिन्दुस्तान में अरब देशों की क्रूर प्रथाएं इस्लाम के नाम पर लागू करना चाहते हैं। इस निर्णय पर मुसलमान औरतों ने मिठाइयां बांट कर अपनी खुशी का इजहार किया। आल इंडिया वीमन मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड है जो न्यायालय के निर्णय का स्वागत कर रही है। भारतीय मुसलमान महिला आन्दोलन ने इस निर्णय का स्वागत किया। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच खुल कर न्यायालय के निर्णय का स्वागत कर रहा है। लेकिन ओवैशी जैसे कुछ इक्का-दुक्का राजनीतिज्ञ खुल कर मौलवियों के पक्ष में बयानबाजी कर रहे हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि न्यायालय का यह निर्णय मुसलमान औरतों के लिए ताजा हवा का झोंका है।

 

कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

 

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