राम-रहीम को   सजा राजनीति को कथित धार्मिक समर्थन पर चोट

राम-रहीम को   सजा  राजनीति को कथित धार्मिक समर्थन पर चोट

डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम इंसान अब सलाखों के पीछे हैं। उच्च न्यायपालिका से उन्हें राहत मिलने के आसार कम हैं, इसलिए अब यह मान लेना चाहिए कि उनकी बाकी जिंदगी के ज्यादातर दिन जेल में ही गुजरेंगे। अपनी ही अनुयायी दो साध्वियों के बलात्कार केस में पंचकूला की सीबीआई अदालत ने उन्हें दस-दस साल की सजा सुना दी है। आजाद भारत के न्यायिक इतिहास में यह पहला मौका है, जब किसी सजायाफ्ता के खिलाफ दो सजाएं अलग-अलग चलेंगी। अब तक दो सजाएं साथ-साथ चलाने का चलन रहा है। राम रहीम ने इंसान बनने या इंसान का दिखावा करने की तमाम कोशिशें कर लीं, लेकिन उनके खिलाफ अदालत दयाभाव नहीं दिखा पाई। उनके खिलाफ इंसाफ का डंडा चला और जमकर चला।

रहीम के खिलाफ सजा के बाद सोशल मीडिया से लेकर चर्चाओं के तमाम अड्डों पर राम रहीम की बढ़ती ताकत को लेकर राजनीतिक दल सवालों के घेरे में हैं। हालांकि सबसे ज्यादा सवाल भारतीय जनता पार्टी पर है, जिसके महासचिव कैलाश विजयवर्गीय की पहल पर राम रहीम से भाजपा के आला नेताओं की हरियाणा विधानसभा चुनावों के दौरान मुलाकात हुई। 1990 में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख बनने के बाद से राम रहीम की ताकत और लोकप्रियता में जबर्दस्त इजाफा हुआ है। राम रहीम ने खुद ही एक टीवी साक्षात्कार में कहा था कि साल दर साल उनके डेरा के अनुयायियों की संख्या में इजाफा होता जा रहा है। बलात्कार के मामले में सजा सुनाए जाने से पहले तक राम रहीम की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 90 सदस्यीय हरियाणा विधानसभा की 28 सीटों पर डेरा सच्चा सौदा का प्रभाव माना जाता रहा है। माना जाता है कि हरियाणा के 9 जिलों और पंजाब के मालवा क्षेत्र में 13 जिलों की करीब पांच दर्जन विधानसभा सीटों पर डेरा सच्चा सौदा का असर माना जाता है। हरियाणा में सिरसा, हिसार, फतेहाबाद, कैथल, जींद, अंबाला, यमुनानगर और कुरुक्षेत्र जिले ऐसे हैं, जहां डेरा सच्चा सौदा का पूरा असर महसूस किया जा सकता है।

हालांकि डेरा सच्चा सौदा खुद सीधे राजनीति में हस्तक्षेप से इनकार करता रहा है। लेकिन हरियाणा के विपक्षी दल इंडियन नेशनल लोकदल ने आरोप लगाया था कि पिछली बार हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान डेरा सच्चा सौदा ने अपने दस हजार अनुयायियों की बैठक बुलाई थी और भाजपा का समर्थन किया था। इतना ही नहीं, गद्दी संभालने के बाद पहली बार राम रहीम ने मतदान भी किया। चुनाव नतीजों के बाद इंडियन नेशनल लोकदल के हरियाणा के नेता दिग्विजय सिंह चौटाला ने भी स्वीकार किया है कि आइएनएलडी की हार में डेरा भी एक बहुत बडा फैक्टर है। डेरा अनुयायियों वोटरों के बीजेपी के पक्ष में जाने से जहां एक ओर बीजेपी को करीब 40 सीटों पर फायदा हुआ है। वहीं आइएनएलडी को कम से कम 25 सीटों, कांग्रेस को 15 सीटों, विनोद शर्मा की पार्टी एचजेपी को दो सीटों और एचजेसी को 3 सीटों पर भारी नुकसान उठाना पड़ा है।

भारतीय जनता पार्टी पर डेरा रामरहीम का समर्थन लेने का आरोप लगाने वाला इंडियन नेशनल लोकदल भी अतीत में बाबा राम रहीम से समर्थन लेने से नहीं हिचकता रहा। 24 अक्टूबर 2002 को सिरसा के पत्रकार रामचंद्र छत्रपति पर जानलेवा हमले में सीधे-सीधे डेरा पर आरोप लगा। तब हरियाणा में ओमप्रकाश चौटाला की सरकार थी। उनके बेटे अजय चौटाला भिवानी से सांसद थे। सरकार में इन्हीं दो लोगों की चलती थी। तब खुलेआम आरोप होने के बावजूद हरियाणा पुलिस ने रामचंद्र छत्रपति का बयान तक नहीं लिया था। बाद में उनका दिल्ली के अपोलो अस्पताल में छत्रपति का सरकार ने पत्रकार संगठनों के दबाव और बदनामी के भय से इलाज तो कराया, लेकिन डेरा के खिलाफ कार्रवाई करने में कोई दिलचस्पी दिखाई ही नहीं। इतना ही नहीं, 1999 के विधानसभा चुनावों में डेरा सच्चा सौदा का समर्थन भी हासिल किया था। 2007 में डेरा सच्चा सौदा ने पंजाब में कांग्रेस के लिए अपील की थी। कांग्रेस तो हार गई लेकिन डेरा के प्रभाव में कांग्रेस को सीटें मिली थी। कांग्रेस हार गई तो राम रहीम ने भी सुर बदल लिया और अकाली के साथ हो लिए।

दिलचस्प यह है कि जिस डेरा सच्चा सौदा ने पिछले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को समर्थन दिया था, उसी डेरा सच्चा सौदा ने पंजाब के 2007 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को समर्थन दिया था। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम के बेटे की शादी भठिंडा के पूर्व एमएलए हरमिंदर सिंह जस्सी की बेटी से हुई है। इनके सभी बच्चों की पढ़ाई डेरे की ओर से चल रहे स्कूल में हुई है। 2007 के विधानसभा चुनाव में डेरा सच्चा सौदा ने पंजाब में कांग्रेस का समर्थन कर मालवा क्षेत्र में इस पार्टी को बढ़त दिलाई थी। एक अनुमान के मुताबिक हरियाणा में 15 से 20 लाख अनुयायी डेरा सच्चा सौदा से जुड़े हैं। यही वजह है कि तमाम आरोपों के बावजूद डेरा सच्चा सौदा के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई से सरकारें डरती रही हैं। उन्हें राजनीतिक नुकसान का डर सताता रहता है।

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लोकतंत्र के तमाम गुणों के बावजूद उसका भीड़तंत्र में तब्दील होना उसका बड़ा अवगुण है। बेशक राम रहीम के समर्थन हासिल करने को लेकर राजनीतिक दल कठघरे में हैं। लेकिन यह भी सच है कि वोट हासिल करने के लिए राजनीतिक दलों का ऐसे बाबाओं का समर्थन हासिल करना मजबूरी भी है। इस पर रोक तभी लग सकती है, जब सभी दलों में आम राय बने कि वे किसी बाबा या मठ या मस्जिद से वोटों का समर्थन मांगने नहीं जाएंगे। जब कोई राजनीतिक दल जामा मस्जिद और उसके इमाम से समर्थन मांगेगा तो सत्ता हासिल होने की स्थिति में उसे इमाम और मस्जिद की जायज-नाजायज मांगों के सामने झुकना ही पड़ेगा। इसी तरह अगर वह किसी मठ या महंथ या धार्मिक सत्ता केंद्र से समर्थन हासिल करेगा तो उसकी भी मांग उसे चुकानी पड़ेगी ही। वैसे भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे समर्थनों को हासिल करने का चलन पुराना है। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस पर आरोप लगा कि वह अल्पसंख्यकों का समर्थन हासिल करने के लिए धर्मगुरूओं का समर्थन लेती रही है। उत्तर पूर्व और केरल जैसे राज्य में चर्च तक हस्तक्षेप करता रहा है। जिस देश में ऐसा चलन हो, वहां मठों और डेराओं से समर्थन हासिल करना राजनीतिक मजबूरी बनी रहेगी। इसलिए जरूरी है कि सभी राजनीतिक दल इस मुद्दे पर साथ आएं।

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख को सजा, संत रामपाल या आसाराम को जेल लोकतांत्रिक परंपराओं की मजबूती की दिशा में प्रस्थान बिंदु साबित होने जा रहा है। शुरू में आसाराम या रामपाल को पुलिस कार्रवाई के दौरान जो समर्थन मिला, वह उनके जेल जाते ही कम हो गया। उसी तरह अब डेरा सच्चा सौदा के समर्थकों का भी राम रहीम से मोहभंग होना शुरू हो जाए तो हैरत नहीं होनी चाहिए। जब ये तथाकथित धार्मिक ताकतें कमजोर होंगी, राजनीतिक दल भी उन्हें भाव नहीं देंगे। फिर इन शख्सियतों की हकीकत सामने आने के बाद अब राजनीतिक दलों के सामने उनका समर्थन हासिल करने को लेकर बड़ा सवाल खड़ा होगा। उनके लिए यह जग हंसाई की भी बात होगी। इसलिए अब वे ऐसी ताकतों से मिलने और राजनीतिक ताकत हासिल करने की कोशिश से बचेंगे।

 उमेश चतुर्वेदी

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