राहुल गांधी: बिना सल्तनत का युवराज

राहुल गांधी: बिना सल्तनत का युवराज

कांग्रेस नेताओं के शब्दकोश की मात्रा काफी सीमित है, इन नेताओं को केवल जी मैडम जी और जी राहुल जी करने ही आता है। एक बार सोनिया गांधी ने राहुल गांधी से पार्टी के उपर अधिक ध्यान देने के लिये कहा। राहुल गांधी उत्तेजित हो गये और उन्होने तुरन्त  पुछा ”मम्मी कौन सी पार्टी?’’

इस प्रकार के कुछ व्यंग्य हमारे राहुल गांधी के विषय में इंटरनेट पर चल रहे हैं। संभवत: यह व्यंग्य कुछ हद तक सत्य है, जिसे कोई भी व्यक्ति मना नहीं कर सकता है। 122 वर्ष पुरानी राजनीतिक दल, जो इस देश के आजादी आंदोलन में भी सबसे आगे रही और आजादी के बाद इसने बिना किसी विरोध के दो दशक से अधिक समय के कार्यकाल तक इस देश पर अपना आधिपत्य जमाये रखा। ऐसा लगता है कि अब यह किनारे पर जा चुकी है।

90 के दशक में जिस कांग्रेस के पास 26 में से 18 राज्यों पर अपना अधिकार था, आज की स्थिति ऐसी है कि कर्नाटक, मेघालय, हिमाचल प्रदेश, मिजोरम और पंजाब जैसे 6 राज्यों में ही इसका अधिकार है। इन राज्यों में मात्र दो ही राज्य ऐसे हैं जिसका राजनीतिक रूप से बड़ा प्रभाव है। कांग्रेस अब अपनी राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह से खो चुकी है और इसके पास उस प्रकार की नेतृत्व क्षमता भी नहीं रही जो गिरते कांग्रेस को बचा सके।  कांग्रेस की हालत इस प्रकार है कि यह अपने अस्तित्व को बचाने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस के पुराने नेता और गांधी परिवार के करीबी जयराम रमेश भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि कांग्रेस जो कभी इस देश की वास्तविक पार्टी हुआ करती था, अब इसका अस्तित्व खतरे में है। । जयराम रमेश ने हाल ही में अपने दिये गये बयान में कहा ”यह बिल्कुल सत्य है कि कांग्रेस की स्थिति काफी बदहाल है।’’ किसी भी दल के इतने पुराने और वफादार व्यक्ति द्वारा इस प्रकार का बयान देना, यह साफ बतलाता है कि कांग्रेस का भविष्य खतरे में है। उन्होंने कहा ”कांग्रेस 1996 से लेकर 2004 तथा आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में चुनावी संकट से गुजरी लेकिन इस समय की हालात पर यही कहा जा सकता है कि कांग्रेस इस बार किसी चुनावी संकट से नहीं बल्कि अपने अस्तित्व बचाने के खतरे से गुजर रही है।’’ 2014 में हुए आम चुनाव में मोदी ने कांग्रेस द्वारा की गई तिजोरी में बंद घोटालों को लोगों के समक्ष रखा और उन्होने कांग्रेस मुक्त भारत करने का निर्णय लिया। उसके बाद से ही मोदी और भाजपा ने एक के बाद एक कांग्रेस शासित राज्यों को अपने पाले में ले लिया। जैसा कि जयराम रमेश ने कहा कि कांग्रेस के पास भाजपा से एक-एक हाथ करने के लिये न तो कोई विकल्प है और ना ही किसी भी प्रकार का साहस।

कांग्रेस की नेतृत्व में इस प्रकार की भ्रांति ने ही इसको इस भयानक मोड़ पर धकेल दिया है। जैसा की राहुल गांधी कहते हैं कि उनको नीतीश कुमार के दल-बदली के विषय में पहले से ही जानकारी थी। लेकिन इसके बावजूद भी नीतीश कुमार का भाजपा के साथ चले जाना उल्टे कांग्रेस के उपर ही प्रश्न खड़ा करता है। यदि कांग्रेस की नेतृत्व को इस प्रकार की जानकारी थी तो क्या वे असहाय थे?  इसी प्रकार गोवा में भी अच्छा प्रदर्शन और सबसे अधिक सीट लाने के बावजूद भी कांग्रेस  तब-तक प्रतीक्षा करती रही जब-तक इसके विधायक भाजपा की ओर नहीं चले गये। अंत में वहां भारतीय जनता पार्टी की ही सरकार बनी। इन सभी स्थिति को गौर से देखा जाय तो इसमें कोई मना नहीं कर सकता कि कांग्रेस का अस्तित्व खतरे में है और कांग्रेस की इस प्रकार की तबाही ने भूतकाल में देश में शासन करने वाली पार्टी को झकझोर कर रख दिया है। नरेन्द्र मोदी का तेजी से हुआ उदय ही कांग्रेस के  घटते कद का मुख्य कारण है। कांग्रेस के नीचे जाने में राहुल गांधी का घमंड तथा यूपीए-2 के कुछ नेताओं द्वारा घोटालों का तांडव फैलाना था। इन नेताओं को यह लगता था कि वे कुछ भी कर लेंगे लेकिन वे सत्ता से बाहर नहीं होंगे और भाजपा दूसरे पायदान की पार्टी होगी। कांग्रेस पार्टी के  ग्राफ में गिरावट और लोगों का गांधी परिवार से उठता विश्वास नरेन्द्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश करने से पहले ही हो चुका था। यूपीए-2 के काल में भ्रष्टाचार अनियंत्रित था। औसतन हर महीने किसी ना किसी प्रकार के घोटाले लोगों के समक्ष आते थे। जैसे-जैसे एक के बाद एक भ्रष्टाचार लोगों के सामने आते गये लोगों का कांग्रेस परिवार और मां-बेटे के प्रति विश्वास खत्म होता गया। लोगों का कांग्रेस के प्रति अलगाव उस समय अधिक हो गया जब राहुल गांधी अपने आप को दूसरे नेताओं की अपेक्षा बुद्धिमान नेता के रूप में मानना आरंभ कर दिये। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का स्वतंत्रता आंदोलन में प्रशंसनीय योगदान पर अभी तक गांधी परिवार ने घमंड  करें कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यह राहुल का वरिष्ठ नेताओं से ढिला बर्ताव ही था कि असम में कांग्रेस को मोदी के हाथों हार का सामना करना पड़ा। मोदी पर वरिष्ठ लेखक प्रताप भानु मेहता लिखते हंै कि भाजपा को उत्तर प्रदेश में जीत मिलने के बाद ऐसा माना जा रहा था कि मोदी ने अब अपनी प्रतिद्वंदिता कम कर दी है लेकिन उन्होंने प्रत्येक बार अपने उपर किये गये भविष्यवाणी को गलत सिद्ध किया है। कोई भी पारंपरिक ज्ञान मोदी के उपर लागू नहीं होती। मोदी अभी भी विपक्ष को उसके इतिहास में किये गये घोटाले और भ्रष्टाचार पर घेरकर थकाते हैं। लोग आज भी मोदी के ऊर्जावान, साफ, आशावान् होने के कारण उनमें अभी भी विश्वास करते हैं। यह कोई मतलब नहीं रखता कि आप राजनीति में कहा पर खड़े हैं। इन राजनीतिक तथ्यों को स्वीकार न करना बेवकूफी होगी। जयराम रमेश का गांधी परिवार के ऊपर दिया गया यह बयान कि कांग्रेस के पास अब न तो कोई प्रभावशाली नेता रहा है और ना ही अब उस प्रकार की कार्यक्षमता बची है जो कांग्रेस के विचारधारा को आगे बढ़ा सके। कांग्रेस की गरीबों के हित वाली विचारधारा को भी भाजपा ने अधिग्रहण कर लिया है और अब वह इसके माध्यम से अपने आप को देश की इकलौती सर्वोच्च दल के रूप में स्थापित कर रही है। कांग्रेस को अपनी विचारधारा बदलने की आवश्यकता है। कांग्रेस में अब दक्षिणपंथी विचार वाले लोगों को भी स्थान देने की आवश्यकता है। यही कुछ मुख्य बाते हैं जिसके माध्यम से पूरे देश में हो रहे भाजपा के फैलाव को रोका जा सकता है। लेकिन प्रश्न यह खड़ा होता है कि इन सभी चीजों को कौन हासिल करेगा?

यह हम सभी को स्वीकार कर लेना चाहिये कि राहुल गांधी में कांग्रेस को एक संरचना देने की क्षमता नहीं है। विपक्ष का हौसला पस्त है जो नेरन्द्र मोदी और अमित शाह की निर्दयी रणनीति से कुचली जा चुकी है। अमित शाह और मोदी की जोड़ी ने एक के बाद एक चुनाव जीत कर राजनीतिक पंडितों के द्वारा की गई प्रत्येक भविष्यवाणियों को गलत सिद्ध किया है। इन्होंने न केवल अपने विरोधियों को आशाहीन बना दिया है बल्कि मीडिया को भी गलत सिद्ध किया है जो कभी मोदी को गलत स्थापित करने में पीछे नहीं हटती थी। मोदी ने दूसरे विपक्षी दलों को उनके द्वारा किये गये भ्रष्टाचार को बार-बार लोगों के समक्ष लाकर अभी भी उन्हें लोगों की नजर में भ्रष्टाचारी सिद्ध कर रहे हैं। इसलिये लोग आज भी भाजपा को अपना समर्थन दे रहे हैं।

मेहता ने मोदी के राजनीतिक वर्चस्व को सामाजिक वर्चस्व से जोड़ते हुए लिखा है कि यह मोदी का सामाजिक वर्चस्व ही है जिससे भाजपा को सामान्य वर्ग से अधिक पिछड़े और दलित वर्ग का सहयोग मिला।

मेहता और अन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह भाजपा के राजनीतिक वर्चस्व का एक असाधारण काल चल रहा है। अत: यह कांग्रेस के लिये कठिन घड़ी है जो अपने आप को 2019 के आम चुनाव में अपने वर्चस्व को बचाये रखना चाहती है।

सोनिया गांधी जो राहुल के विषय में किसी भी व्यक्ति के परामर्श की उपेक्षा करने के लिये जानी जाती है, एक के बाद एक चुनाव तथा देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश को हारने के पश्चात उन्हें भी यह पता चल गया कि कांग्रेस बड़े बुरे दौर से गुजर रही है और ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले कुछ समय में पार्टी लोगों से भी अलग हो जायेगी। इस खराब दौर में कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त विपक्ष को 2019 में कांग्रेस द्वारा संचालन करने के निर्णय को सोनिया गांधी इसे भगवान द्वारा भेजा गया अवसर मानती हंै।

मोदी के रथ द्वारा 2019 के आम चुनाव में कुचल दिये जाने के भय से ममता बनर्जी, मायावती, लालू यादव और अखिलेश यादव जैसे नेताओं ने ही मोदी को रोकने के लिये कांग्रेस और सोनिया गांधी के नेतृत्व में संयुक्त विपक्ष बनाने का निर्णय लिया है, जिससे मोदी को हराया जा सके।


 

कांग्रेस की गिरती साख, भाजपा का बढता वर्चस्व


 

भाजपा और जनता दल (यू)  के साथ हुए गठबंधन के कारण एक बार फिर भाजपा का बिहार की सत्ता में वापसी हुई है। बिहार को लेते हुए देश के 18 राज्य अब भाजपा के शासन में है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में मिली जीत के साथ ही भाजपा अब पूरे देश में अपने पैर पसार चुकी है।

गोवा, मणिपुर और असम में सरकार बनाते ही भाजपा राजनीतिक रूप से सबसे मजबूत दल के रूप में उभरी है। इन सभी बदलावों में एक बदलाव सबसे अधिक नजर आता है, वह है कांग्रेस का तेजी से नीचे की ओर आना। 24 वर्ष पूर्व 1993 में कांग्रेस का 18 राज्यों पर शासन था लेकिन आज देश के 30 राज्यों में से 18 राज्य में या तो भाजपा का शासन है या फिर इसके सहयोगी दलों की सरकारें हैं। भाजपा के पास सबसे अधिक 48 सहयोगी दल हैं। यदि कांग्रेस पर नजर डाले तो कांग्रेस  कर्नाटक, पंजाब, मिजोरम, मेघालय, हिमाचल प्रदेश और पंडिचेरी जैसी राज्यों पर ही शासन कर रही है।

दिसम्बर 1993 में जब देश के 26 राज्यों में चुनाव हुए तो कांग्रेस अकेले 15 राज्यों में विजयी रही। एक राज्य में इसकी गठबंधन की सरकार बनी। दो राज्यों में सीपीएम की सरकार थी जों कांग्रेस को केन्द्र में बाहर से सहयोग कर रही थी।

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फिर भी आज के परिदृश्य में 1993 के मुकाबले में बहुत अधिक बदलाव आ चुके है। पहला, यह गठबंधन का समय है। एक ओर जहां भाजपा की नेतृत्व वाली राजग है तो दूसरी तरफ कांग्रेस की नेतृत्व वाली यूपीए।

1993 में राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन उस प्रकार से व्यापक नहीं थे। लेकिन आज के परिप्रेक्ष्य में देखे तो 2006 में  कांग्रेस की नेतृत्व वाली यूपीए के पास 17 राज्यों में अपनी सरकारें थी।

भाजपा का विस्तार, 1993 की कांग्रेस की तुलना में कही अधिक है। भाजपा का आज देश के 18 राज्यों में सरकारें हंै। कुछ स्थानों पर भाजपा अपनी सहयोगी दल के साथ है। लेकिन कुल मिलाकर देखे तो भाजपा जिन राज्यों में शासन कर रही है वो देश के बड़े राज्य हैं और इन सभी राज्यों से देश के 66 प्रतिशत सांसद चुनकर आते हैं।


कहीं ऐसा तो नही कि निराश विपक्ष को यह लगता है कि जैसे कांग्रेस 1979 और 2004 में उभरी वैसे ही इस बार भी सोनिया गांधी के नेतृत्व में टूटी हुई बैशाखी के सहारे एक बार फिर उभरेगी।

लेकिन निराश करने वाली बात तो यह है कि विपक्ष के  साथ ऐसा कुछ नहीं होने वाला है। बिहार कांग्रेस ने यह मांग की है कि लालू यादव के साथ में जिस प्रकार का भी गठजोड़ है उसे तुरंत तोडऩा चाहिये। उसी प्रकार पश्चिम बंगाल कांग्रेस की यूनिट ने अपने दिल्ली नेतृत्व से कहा है कि कांग्रेस का ममता बनर्जी के साथ में किसी भी प्रकार का गठजोड़ नहीं होना चाहिये। ये दोनो परामर्श कांग्रेस के भविष्य के लिये अच्छे हैं और यह कांग्रेस को आने वाले समय में सहयोग कर सकते हैं। ये  हारे, थके और निराश विपक्ष के नेता अपनी सारी राजनीतिक टकरावों को भुलाते हुए एक चादर से अपना मुंह ढ़कना चाहते हैं, जो भविष्य में उन्हीं की हार का कारण बन सकती है। अब यह देखना है कि क्या इस विपक्ष का गठजोड़ अगले दो वर्षों तक चल सकता है? क्या ये विपक्ष के नेता अगले दो वर्षों तक एक रह सकते हैं?

उदाहरण के तौर पर देखे तो क्या लालू यादव अगले दो वर्षो तक इस विपक्ष के साथ में रह पायेंगे? लालू यादव और उनके परिवार के खिलाफ कई सारे मामले अदालत में चल रहे हैं और सर्वोच्च न्यायालय ने इन सभी मामलों पर 6 से 9 महीनों के अंदर निर्णय देने को कहा है। यदि यादव परिवार को कोर्ट द्वारा सजा दी जाती है या यादव परिवार इन मामलों में उलझा रहता है तो राष्ट्रीय जनता दल का संयुक्त विपक्ष में रहना कठिन हो जायेगा। कोई भी निश्चित हो सकता है कि 2019 चुनाव से पहले मुलायम यादव जो कभी इस मुहिम में सबसे आगे हुआ करते थे वो भी अपने पुत्र से बदला लेने के लिये धक्का अवश्य देंगे।

मायावती के भविष्य का भी कोई पता ठिकाना नहीं है और इसका कारण है उनके दल के लोगों के द्वारा दलित और हरिजनों के नाम पर अलग पार्टी बनाने की योजना। यही कारण है कि मायावती अपने नेताओं से समझौता करने में काफी व्यस्त हैं। अत: वो भी किस ओर जायेंगी किसी को पता नहीं है।


 

राहुल के लिए सारे रास्ते बन्द


 

विपक्ष के सारे नेता 2019 के आम चुनाव में मोदी के रथ को रोकने के लिये एक होने का प्रयास कर रहे हैं और यही कारण है कि ये सारे के सारे घोटालेबाज सोनिया गांधी के अगल-बगल खड़े होते नजर आ रहे हैं। इन नेताओं को ऐसा लगता है कि 2019 में सोनिया गांधी ही इनकी बेड़ा को पार करवा सकती हैं। कांग्रेस के राजकु मार जो पप्पू के नाम से विख्यात हैं। वह, आपको सोनिया गांधी के विपक्ष के नेताओं से बात-चीत करते समय बगल में बैठे हुए दिखाई दे सकते हैं।

जब नीतीश कुमार और लालू यादव भी जब महागठबंधन के हिस्सा थे तो वे भी केवल सोनिया गांधी से ही बात-चीत करने में अपनी रूचि दिखाते थे और शरद यादव की राहुल गांधी से संबंध तो जगजाहिर ही है।

अभी कुछ दिन पहले ही सभी को टेलीविजन पर देखने को मिला कि फारूख अब्दुल्ला जब उप-चुनाव जीतकर लोकसभा में आये तो उन्होंने विपक्ष के सभी नेताओं से हाथ मिलाया लेकिन राहुल गांधी से हाथ नहीं मिलाये। जो हाथ मिलाने के लिए बड़ी तत्परता से खड़े थे।

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विपक्ष के कई नेता राहुल गांधी से वार्तालाप करने में हिचकते हैं। क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि राहुल गांधी उन सभी से काफी ऊंचें कद के नेता हैं। सोनिया गांधी जो चुनाव प्रचार के लिए हमेशा से राहुल गांधी को आगे रखती थी, उत्तर प्रदेश में मिली भयंकर हार के बाद अब उन्हें भी यह पता हो चुका है कि बिना विपक्ष के साथ में गये मोदी और अमित शाह की जोड़ी को नहीं रोका जा सकता है। इसी कारण सोनिया गांधी को अब विपक्ष के नेताओं की बात को अब ध्यान से सुननी पड़ रही है और यह बात कांग्रेस के उन नेताओं को सुहावनी लग रही है जिनका हमेशा से यह मानना था कि राहुल गांधी में नेतृत्व करने की क्षमता नहीं है।

गुजरात में अहमद पटेल की राज्यसभा में किसी भी प्रकार से मिली जीत के बाद कांग्रेस 1 सितम्बर को सरकार को घेरने के लिए सत्याग्रह आंदोलन करने जा रही है। इसके लिए बकायदा विपक्ष के नेताओं को कांग्रेस द्वारा बुलावा भेजा जा रहा है। लेकिन गुजरात में होने वाले इस सत्याग्रह से पहले 27 अगस्त को लालू द्वारा पटना में रैली बुलाई गयी। इस रैली के संदर्भ में लालू यादव ने सोनिया गाधी से कहा था कि यदि वह आने में असमथ्र्य हों तो वह अपने स्थान पर प्रियंका गांधी को भेजे। लालू यादव का सोनिया गांधी से यह निवेदन साफ-साफ बतलाता है कि विपक्ष ने राहुल गांधी को राजनीति में आसमथ्र्य खिलाड़ी ठहराना आरम्भ कर दिया है।

राहुल गांधी अपने जीवन के सबसे बुरे राजनीतिक दौर से गुजर रहे है और इसका कारण है, 2014 के बाद से कांग्रेस की लगातार पांच राज्यों में हुए विधानसभा में मिली पराजय। बिहार में भी कांग्रेस को सबसे कम सीटे मिली, भले यह गठबंधन में होने के कारण लालू और नीतीश की गठबंधन सरकार की हिस्सा रही।

हालांकि राहुल गांधी ने स्वंय ही बिहार में नीतीश कुमार का तेजस्वी पर लगे भ्रष्टाचार के  आरोप पर, तेजस्वी के इस्तीफे पर मांगी गई राय को नकार कर अपनी राजनीतिक आत्महत्या कर ली थी।  नीतीश कुमार ने यह सुनिश्चित किया था कि यदि तेजस्वी अपने पद से हट जाते तो वह अभी भी इस गठबंधन का हिस्सा होते। लेकिन राहुल गांधी ने नीतीश कुमार के बातों को बिल्कुल ही नकार दिया। राहुल गांधी यह भूल गये थे कि एक दिन पहले ही उनकी मां ने लालू यादव को नीतीश कुमार से गठबंधन में किसी भी प्रकार से बनाये रखने की बात कही थी, चाहे तेजस्वी को इस्तीफा ही क्यों न देना पड़े। नीतीश कुमार को सबसे बुरा तब लगा जब वह सोनिया गांधी से मिलना चाहते थे, लेकिन उनसे यह कह दिया गया कि बिहार के मामले में उनको राहुल गांधी से ही बात करनी चाहिये। भाजपा के साथ आते ही नीतीश कुमार ने अपने बयान में कहा कि वह इस गठबंधन के माध्यम से एक ताकतवर विपक्ष का रूप देना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस ने इस संदर्भ में अपनी कोई रूची नहीं दिखाई।

जब नीतीश कुमार की जनता दल (यू) और भाजपा ने बिहार में अपने गठबंधन की सरकार बनाई तों इस पर राहुल गांधी ने अपना बयान देते हुए कहा कि उनको भाजपा-जदयू की सरकार के बारे में पहले से ही जानकारी थी। राहुल गांधी के इस बयान पर लोगों ने यह प्रश्न उठाया कि आखिर क्यो राहुल गांधी जदयू को भाजपा की ओर जाने से नहीं रोक पाये? क्योंकि नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी के सबसे बड़े विरोधियों में से एक थे।

विपक्ष के कई सारे नेता राहुल गांधी से बात करने में हिचकते हैं। 2014 से लगातार कांग्रेस की हो रही हार ने न केवल राहुल गांधी के राजनीति को खराब किया है, बल्कि इससे विपक्ष में भी उनका प्रभाव कम हुआ है। दूसरी तरफ आज भी सोनिया गांधी के प्रति विपक्ष में सम्मान बचा है। यह सोनिया गांधी द्वारा जुलाई में बुलाई गई बैठक में साफ देखने को मिला। बैठक में सभी विपक्षी दल के नेता आये हुए थे। नीतीश कुमार ने भी जदयू की तरफ से शरद यादव को इस बैठक में भेजा था। यही नही सोनिया गांधी का राजनीतिक प्रबंधन देखने को मिला जब हाल ही में गुजरात में अहमद पटेल अपने सीट पर संघर्ष कर रहे थे, लेकिन जब निर्णय आया तों उसमें पाया गया कि एनसीपी और जदयू के सदस्यों ने भी कांग्रेस को अपना मत दिया था। ”शरद यादव, मुलायम सिंह यादव और ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी के साथ में काम करने के लिये अपनी स्वेच्छा दिखाई है, लेकिन जब बात राहुल गांधी पर आती है तो ये चुप हो जाते हैं।ÓÓ पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी की राजनीति पर अपना नजर डाले तो पश्चिम बंगाल में हुए चुनाव में राहुल गांधी ममता बनर्जी के साथ अपना गठबंधन करने में असफल रहे। उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में भी राहुल गांधी ने मुलायम सिंह यादव को नाराज कर दिया। महाराष्ट्र में भी शरद पवार की एनसीपी और कांग्रेस का गठबंधन टूट गया और चुनाव के बाद एनसीपी ने बिना किसी शर्त के भाजपा को अपना समर्थन देने की घोषणा भी कर दी। अब तो कांग्रेस के ही सदस्य उनके नेतृत्व पर प्रश्न खड़ा कर रहे हैं। जयराम रमेश और मणि शंकर अय्यर जैसे कांग्रेस के वफादार सिपाही भी अब राहुल गांधी के कार्यशैली पर प्रश्न-चिन्ह् खड़ा कर रहे हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह और कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया भी राहुल की जगह सोनिया गांधी के नेतृत्व को पसंद करते हैं।

अभी हाल ही में मंदसौर में राहुल गांधी की असफलता देखने को मिली जब वहां के किसान आवश्यक मुद्दों पर सरकार को घेरने का प्रयास कर रहे थे। राहुल गांधी मंदसौर गये और उन्होंने सड़को पर प्रदर्शन कर रहे किसानों को को अपना पूरा समर्थन देने के लिये आश्वासन दिया। लेकिन जबतक शिवराज सिंह चौहान ने इस मामले को गंभीरता से लेना आरंभ किया तबतक राहुल गांधी इस प्रदर्शन से अपनी दूरी बना चुके थे। इससे साफ होता है कि उन्होंने प्रश्न किया और जबतक उत्तर आता वह वहां से विलुप्त हो गये।

राहुल गांधी की तुलना यदि हम मोदी और अमित शाह से करे तों हम अवश्य पायेंगे कि मोदी और अमित शाह एक नगर-निगम चुनाव में जीत मिलने के बाद विजय मनाने से पहले अपने कार्यकर्ताओं को अवश्य ही इसका श्रेय देते हैं, वही दूसरी तरफ अहमद पटेल जैसे कांग्रेस के वरिष्ट नेता के संघर्षपूर्वक राज्यसभा का चुनाव जितने पर राहुल गांधी एक टवीट् भी नहीं करते हैं। अब तो यह बिल्कुल साफ हो चुका है कि राहुल गांधी में कोई नेतृत्व क्षमता नहीं बची है। उनकी मां द्वारा बनाई गई नयी संगठन को उनके जैसे नेता की कोई आवश्यकता नहीं है। यहा तक की उनके पार्टी के सदस्य भी पूरे जोर-शोर से यह सिद्ध करने में लगे हैं कि राहुल गांधी के बिना कांग्रेस सही प्रकार से चलेगी।

लेकिन राहुल के करीब रहने वाले लोगों का मानना है कि यदि कांग्रेस की नेतृत्व वाली विपक्ष की जीत होती है तो कोई और नहीं बल्कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिये। हालाकिं इस प्रकार की स्थिति का पनपना  आसान नहीं है। किसी को पता नहीं है कि नेशनल हेरॉल्ड मामले में किस प्रकार के निर्णय आयेंगे। साथ ही यह भी संभव नहीं लगता है कि इस चाटुकारिता करने वाले नेताओं से भरी विपक्ष कभी जीत सकती है।

यदि किसी प्रकार से विपक्ष की जीत भी हो जाती है तो सत्ता की बागडोर प्रियंका गांधी की ओर ही जायेगा। कोई भी बड़ी साधारणपूर्वक समझ सकता है कि राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के ख्याली पुलाव वाली सीढ़ी को उनकी ही मां के  द्वारा बनाये गये नये संगठन के द्वारा निरर्थक कर दिया गया है।

(अनुवादक : रवि मिश्रा)


यदि सोनिया गांधी को ऐसा लगता है कि नेशनल हेराल्ड से उनको कोई प्रभाव नहीं पडऩे वाला है तो वह इतना अवश्य समझ लें कि वह उनके साथ बंध जायेगी जो खुद इतिहास बन सकते हैं। वह कांग्रेस जैसी लोकप्रिय और जीवंत संगठन को खत्म कर देंगी। जल्द से जल्द सोनिया गांधी को पुत्र मोह से बाहर निकलकर नेहरू और इंदिरा के विरासत को बचाने के लिये राहुल गांधी के प्रतिस्थापन के बारे में विचार करना होगा।

दूसरी बात की सोनिया गांधी को अपने उन नेताओं से दूरी बनानी होंगी जो ‘जी मैडम जी’ से अधिक कुछ नहीं बोल पाते। अन्यथा कांगे्रस 2019 तक खत्म हो जायेगी। अभी कांग्रेस से लोग केवल पलायन ही कर रहे हैं, लेकिन 2019 के बाद यह पलायन धारा का रूप ले लेगी। यह भयानक होगा। ऐसा माना जाता है कि कांग्रेस लोगों की पहली पसंद रही है और इसके बिना विपक्ष का कोई अस्तित्व नहीं है।

यदि विपक्ष रहता है तो यह भाजपा के लिये अच्छा होगा। क्योंकि बिना विपक्ष के भारतीय जनता पार्टी में घमंड और  बढ़ जायेगा।  फिर भी यह तो साफ है कि कांग्रेस सहित अन्य दल के नेता भाजपा की ओर अपना झुकाव अधिक से अधिक बढ़ायेंगे, जो मोदी के राजनीतिक भविष्य के लिये शुभ संकेत है।

कांग्रेस का क्या होगा? वर्तमान की स्थिति को देखकर कांग्रेस के भविष्य के बारे में कुछ भी नहीं बोला जा सकता। क्योंकि वर्तमान की परिस्थितियों के अनुसार तो यही प्रतीत होता है कि लोग अब कांग्रेस को त्याग चुके  हैं।

विजय दत्त

 

 

 

 

 

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