कांग्रेस का  ढहता गढ़

कांग्रेस का  ढहता गढ़

जब इंदिरा गांधी को उनके बॉडीगार्डों ने 31 अक्टूबर 1984 को गोली मारकर हत्या की थी  तब गांधी परिवार में केवल जन्म लेने के अघोषित भारतीय नियम के अनुसार राजीव गांधी का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय हो गया था। इंदिरा गांधी की हत्या की सहानुभूति का फायदा उनके बेटे राजीव को मिलना तय था।

भारत की लौह महिला की हत्या के तीन दशक बाद अब कांग्रेस के सदस्यों के द्वारा यह प्रश्न उठने लगा है कि क्या अब भी हमलोग नेहरू -गांधी के छत्रछाया में ही रहेंगे या इससे बाहर भी निकलेंगे।

2014 आम चुनाव की हार के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस लगातार कई राज्यों में अपनी सता गवाती जा रही है-इसके  जनाधार  का ग्राफ लगातार गिरता ही जा रहा है। एक कांग्रेसी का कहना है कि इंदिरा गांधी कांग्रेस पार्टी की वास्तविक जनाधार वाली नेता थीं जो पार्टी को सफलता की नई ऊचाई पर ले गईं। उनकी यह योग्यता थी कि पूरे देश की जनता तक अपनी बात को कैसे पहुंचाई जाये और फिर उसको कैसे वोट बैंक में बदली जाये। यह पहली बार ऐसा हुआ है कि कांग्रेस पूरी तरह अब गांधी परिवार पर निर्भर हो गयी है और गांधी परिवार कांग्रेस की  नाकामी पर।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश जो कि पांचवी बार राज्यसभा सीट के लिए चुनें जाने के लिए संघर्ष करते नजर आ रहे हैं का कहना है कि अबतक के कांग्रेस इस समय अपनी स्थापना के समय से सबसे बुरे दौर से गुजर रही है और  अभी भी ऐसा व्यवहार कर रहे हैं मानों कि अभी भी हम सुल्तान हैं जबकि सल्तनत कब की जा चुकी है। कांग्रेस की पकड़ अभी भी देश की बड़ी आबादी पर है, आम जनता का प्यार अभी भी हमारे ऊपर है परन्तु अब वे पुराने कांग्रेसी के विचार,नजरिये से ऊब चुके हैं। वो एक नई कांग्रेसी सिद्धांत, नई विचार, नई पीढ़ी वाली नेतृत्व की ओर आशा भरी निगाहों से देख रही है। यह हमलोगों के लिए एक नई चुनौती है और हमें इस चुनौती से पार होना होगा, तब जाकर ही हमारा अस्तित्व टिका रह पाएगा।

भारत की आजादी के 70 वर्षों के इतिहास में 50 वर्ष से भी ज्यादा समय तक देश की सता पर काबिज रहने वाली कांग्रेस का नेतृत्व ज्यादा समय तक नेहरू-गांधी परिवार के हाथों में ही रही है। इंदिरा गांधी के पिताजी पंडित नेहरू इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री रहें जो कि 1947 से लेकर 1964 तक इस पद पर आसीन रहें। नेहरू के देहांत के 2 साल बाद ही इंदिरा गांधी 1966 से 1977 तक इस पद को संभाली और इसके बाद 1980 से पुन: राजीव गांधी सत्ता पर काबिज हुए।

राजीव के 1991 में हत्या होने के बाद पूरे देश की गजब की सहानुभूति कांग्रेस के प्रति उमड़ी और अपने सबसे स्वर्णिम काल में कांग्रेस पहुंच गयी। राजीव गांधी के 1991 में हत्या के बाद इटालियन मूल की विधवा सोनिया गांधी ने पार्टी को 2004 के आम चुनाव में सफलता दिलवाई।

कहने को तो देश की बागडोर 2004 -2014 तक डॉ. मनमोहन सिंह के हाथों में रही पर वास्तविक लगाम पर्दे के पीछे से सोनिया गांधी के हाथों में रही। 2014 के आम चुनावों में राहुल गांधी का प्रभावहीन नेतृत्व कांग्रेस की लुटिया डूबा दी। कुछ कांग्रेसी सदस्य दबे हुए जबान से इस परिवार के खिलाफ बोलने की कोशिश तो करते है मगर विश्लेष्कों का कहना है कि खुद गांधी परिवार अभी नेतृत्व किसके हाथों में दें, सही निर्णय कर पाने की स्थिति में नहीं है। जैसे कि एक समय राजीव और सोनिया भी राजनीति में नहीं आना चाहते थे पर दोनों ने पार्टी का कुशल नेतृत्व किया और कांग्रेस को बुलंदी के शिखर पर लेकर गए। प्रियंका गांधी को भी विरासत में ऐसा ही नेतृत्व करने का कौशल प्राप्त हुआ है परन्तु प्रियंका का अपने बच्चों के प्रति जिम्मेदारी और अपने पति का विवादित जमीन सौदे के आरोप प्रत्यारोप के छवि को ध्यान में रखकर, इन सबसे दूरी ही बनाने में ही भलाई देख रही हैं।

राहुल गांधी ने एक बार एक अमेरिकी  प्रतिनिधिमंडल को बताया था कि वो भारतीय राजनीति में अपने आपको एक शून्य की भांति देखते हैं और न ही वे इसके लिए ज्यादा चिंतित ही हैं। वो भी तब जब उनकी मां के हाथों में ही कांग्रेस की बागडोर है। बीजेपी का विजयी रथ दनादन आगे बढ़ता ही चला जा रही है और कांग्रेस का स्तर लगातार गिरता ही चला जा रहा है। देश की सबसे पुरानी पार्टी के पास कोई भी ऐसा नेता नजर नहीं आ रहा है जो इसके डूबते जहाज को बचा सके। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बुरी पराजय के बाद कांग्रेस को गोवा और मणिपुर राज्यों में सबसे बड़ी पार्टी होने के वावजूद भी सरकार न बना पाने के कारण से लगातार नेता और कार्यकर्ता इस संगठन को छोड़ कर बीजेपी में चले गए जिससे कि इसका मनोबल और भी गिरता चला गया।

अभी हाल ही में वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं पूर्व विदेश मंत्री एस एम कृष्णा कर्नाटक में पार्टी को छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए। 23 कांग्रेसी ईटानगर नगर निगम के सदस्य भी पार्टी छोड़ बीजेपी में चले गए। जिस तरह से लगातार कार्यकर्ता इस पार्टी का दामन छोड़ कर जा रहे हैं, वो दिन भी ज्यादा दूर नहीं रहेगा जब राहुल गांधी अकेले ही बच जाएंगे …आत्मंथन के लिए पर तबतक बहुत देर हो चुकी होगी।

पिछले चार दशकों में कांग्रेस का राजनीतिक कद स्तर गिराने में नेहरू -गांधी के परिवार ने अहम भूमिका निभायी है। इस समय के दौरान नेहरू -गांधी परिवार का करिश्मा भी धुंधलाता चला गया। इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद बहुत बड़ी संख्या में वोटरों का इस संगठन से जुड़ाव हुआ था। 30 साल के नीचे के वोटर के जेहन में अब इंदिरा के पिता की छवि धुंधली होती जा रही है। इनके लिए अब पंडित नेहरू की लोकतान्त्रिक भारत बनाने में अहम भूमिका निभाने या इंदिरा की सफल नेतृत्व  में बांग्लादेश के रूप में एक नए राष्ट्र का निर्माण हो या राजीव गांधकी लोकप्रिय छवि, कोई मायने नहीं रखता है। युवा वोटर का यह ट्रेंड है कि वो अपनी अनुभव के आधार पर नेहरू -गांधी परिवार को तौलतें हैं। वे यह नोट करते हैं कि भ्रष्टाचारी यूपीए  की बागडोर सोनिया के हाथों में ही थी, जो कि अभी भी कांग्रेस की प्रमुख हैं।

आज का युवा मतदाता अपने खुद के अनुभव के आधार पर नेहरू-गांधी परिवार को जांचने-परखने में लगा है। उसके लिए सोनिया गांधी वही है जो भ्रष्टाचारी यूपीए सरकार की नेतृत्वकर्ता थीं। और इसी यूपीए की बागडोर इनके बेटे राहुल को दी गई है जो अभी तक के राजनीतिक कैरियर में फेल साबित हुए हैं। राहुल संसद में भी कम ही उपस्थिति दर्ज कराते हैं और कभी आते भी हैं तो इनके द्वारा दिए गए भाषण में आर्थिक-राजनितिक या फिर किसी भी मामले में कोई तार्किक विचार नहीं होता है। वह अपने पिता-माता या अपनी दादी की प्रशंसा के अलावा और कुछ भी नहीं कह पाते हैं।

राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति में कांग्रेस के पतन का कारण इसका अप्रभावी नेतृत्व रहा। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के तुलना में राहुल के पास कोई भी अपना विचार नहीं है  कि कैसे आमलोगों को अपने साथ जोडऩे में कामयाब हो सके। एक राजनेता के रूप में राहुल ने निराश ही किया है जबकि दूसरे राजनेता बहुत ही मेहनती और अपनी कार्य के प्रति गंभीर रहते हैं। इन्हीं सब कारणों से ही राहुल का आम जनता से जुड़ाव नहीं हो पाया, ऐसा सर्वे से पता चला है। इनके पूर्वजों की मेहनत से बनाई गयी संगठन का अब राहुल की अयोग्यता के कारण पतन होता जा रहा है।


 

कांग्रेस का घटता प्रभाव


 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 2012 से ही देश में अपने प्रभाव और पहुंच से दूर होती चली जा रही है। 2014 लोकसभा के चुनाव में इस पार्टी को गोवा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ ने पूरी तरह से निरस्त कर दिया। आम चुनाव के बाद से यह अपना प्रभाव लगातार खोती ही चली गयी। महाराष्ट्र, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और झारखण्ड सभी जगह या तो इस पार्टी की सरकार चली गयी या फिर इन राज्यों के क्षेत्रीय पार्टियों जैसे कि AIDMK या फिर जद(यू) ने अपनी स्वतंत्र सरकार बनाई या फिर भाजपा के साथ मिलकर गठबंधन की सरकार।                                                                            कांग्रेस के पतन के पीछे सबसे प्रमुख कारण इसकी अपनी कोई विचारधारा को राष्ट्र से न जोड़ पाने का रहा। नेहरूवादी युग के सामाजिक स्तर से यह पार्टी केवल अब नेहरू -गांधी परिवारवाद तक ही सिमट कर रह गयी है। यह परिवर्तन 1986 में प्रणव मुखर्जी जो कि लंबे समय तक इस पार्टी के नेता रहे और राजीव गांधी जिनके नाम गांधी परिवार का तमगा रहा, के बीच की प्रतिस्पर्धा के चलते इसका पतन होता चला गया। राजीव गांधी के बाद से तो कांग्रेस केवल गांधी परिवार तक ही सिमट कर रह गयी-न तो इसका कोई राजनीतिक विचार और न ही इसका कोई नजरिया ही आम जनता के बीच  प्रभाव छोड़ पाने में सफल हो पाई।

rahul copyऐसा नहीं है कि भारत में वंशवाद या परिवारवाद के आधार पर खड़ी होने वाली पार्टियों का अस्त्तित्व नहीं टिकता है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी दोनों ही पार्टियां क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दोनों ही स्तर पर खूब लोकप्रिय और सफल साबित हुई। इस तरह की सफल पार्टियों के पास करिश्माई, जमीन से जुड़े और आम जनता के बीच मजबूत पकड़ वाला नेतृत्व है।

परन्तु कांग्रेस सिर्फ गांधी परिवार तक ही सिमटती चली गयी। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के पास ऐसे नेताओ की कमी है बल्कि इस संगठन के पास तो ऐसे नेताओं की एक विशाल फौज है,पर यह पार्टी केवल नेहरू -गांधी तक ही सिमित रही है। अभी कुछ समय से राहुल गांधी ने कांग्रेस का नेतृत्व करना प्रारम्भ किया है परन्तु राहुल गांधी क ा आम जनता से जुड़ाव नहीं कर पाना, इस संगठन को लगातार पतन की ओर ले जा रहा है। राहुल गांधी न तो आम नागरिको के बीच अपनी पहुंच बना पाने में ही सफल हो रहे हंै और न ही कोई सिद्धांत या विचार को पहुंचाने में जनता तक कामयाब हो रहे हैं।

इस पार्टी के गिरते स्तर का एक और मुख्य कारण है -भ्रष्टाचार और घोटालों में लिप्त अपने नेताओं को बचाना और उनकी पैरवी करना है। राष्ट्रमंडल खेल 2010 घोटाला हो या दूरसंचार घोटाला या फिर स्विस बैंकों में जमा कालाधन या फिर राबर्ट वाड्रा का डी एल एफ  सौदा या फिर वोट के बदले नोट में अपने फंसे हुए नेताओ को पार्टी से नहीं निकालना, इस संगठन को बहुत महंगा पड़ा।

एक कारण सीधे-सीधे कांग्रेस के गांधी परिवार पर  भी घोटाला का आरोप लगना -जैसे कि बोफोर्स घोटाला में सीधे राजीव गांधी का नाम आना या फिर रॉबर्ट वाड्रा का डी एल एफ  के साथ जमीन का सौदा या फिर गांधी परिवार का बहुत बड़ी मात्रा में स्विस बैंको में जमा काला धन।

और पार्टियों या संगठनो में जैसे ही उसके किसी नेता पर किसी भी प्रकार का कोई भी आरोप लगता है तो उसे तुरंत ही पार्टी से निकाल बाहर कर दिया जाता है और पार्टी की प्राथमिक सदस्य्ता से भी बर्खास्त कर दिया जाता है। पर कांग्रेस ऐसे मौकों पर अपने नेताओं को शुरू से अंत तक बचाव करती रहती रही है। ऐसा करने से गांधी परिवार की छवि राष्ट्रीय स्तर और आम जनता के बीच गलत बनती चली गई।

इस तरह से बीजेपी को कांग्रेस ने बहुत बड़ा मौका दे दिया -विपक्ष के रूप में मजबूत पकड़ बना कर सता पर काबिज होने देने के लिए। और देखते ही देखते बीजेपी ने धीरे धीरे अपनी मजबूत पकड़ बनती चली गयी। बिहार -ओडिसा और तमिलनाडु जैसे राज्यों में जहा पर बीजेपी न के बराबर ही खड़ी थी -अब वह धीरे-धीरे सीधे या फिर राज्य स्तरीय पार्टियों की मदद से कांग्रेस को राजनीतिक पतन की ओर ले जा रही है। बीजेपी का लगातार उभार होने देने में कांग्रेस का अपना स्वंय का कोई राजनीतिक सिद्धांत और विचारधारा का आम जनता तक न पहुंचा पाना ही मुख्य कारण रहा। राजनीतिक रूप से भी और सैद्धांतिक रूप से भी।

आकाश कश्यप


कांग्रेस का निर्माण आज से बहुत ही पहले सन 1885 में हुआ था। कुछ समय से तो अब इस कांग्रेस का परिवर्तन एक पारिवारिक पार्टी के रूप में हो गया है। यदि शास्त्री जी 5 साल और प्रधानमंत्री बने रहते तो इंदिरा गांधी कभी भी प्रधानमन्त्री नहीं बन पाती। उस समय उनके बेटे संजय और राजीव दोनों ही जिंदा थे पर पार्टी से इन दोनों का कोई जुड़ाव नहीं था।

केंद्र में और राज्य स्तर पर अभी भी कांग्रेस के पास कुशल और योग्य नेताओं की कमी नहीं है। आज भी बड़ी संख्या में मतदाताओं का जुड़ाव इस संगठन से है क्योंकि यह राष्ट्रीय स्तर की एक ऐसी पार्टी है जिसकी एक अलग ही लोकप्रियता है। राहुल के आने से कांग्रेस में कुशल और योग्य नेताओ को चाहे वो पुरुष हो या महिला, इनकी योग्यता के अनुसार पद नहीं मिला। इनके 9 साल के कैरियर में किसी भी इनके बराबर वाले उम्र के नेताओ को कैबिनेट मंत्री का दर्जा नहीं दिया गया।

ऐसा प्रतीत होता है की कांग्रेस के अंदर राहुल के रूप में एक भस्मासुर आ गया है जो अपनी ही पार्टी को तहस-नहस करने में लगा है। पश्चिम बंगाल में वामपंथी के साथ कांग्रेस का गठबंधन हुआ था, जिसमे दोनों ही पार्टी बूरी तरह पराजित हुए और यही हाल तमिलनाडु में डीएमके के साथ भी रहा।

यूपीए अपनी जब सफलता की चरम पर था, फिर भी उस समय वैसी सफलता हासिल नहीं किया जैसे कि बीजेपी ने 2014 के आम चुनाव में। 2010 के बिहार चुनाव में कांग्रेस को मात्र 3 सीट मिली और 2016 के यूपी चुनाव में भी कुछ इसी तरह का परिणाम रहा। कांग्रेस के विलुप्ता अवस्था में जानें के लिए राहुल गांधी ही पूरी तरह जिम्मेदार हैं।

देश में क्षेत्रिय पार्टियों के उदय का मूलरूप से कांग्रेस ही जिम्मेदार रहा। शक्तिशाली नेहरू के समय बहुत सारे क्षेत्रीय कांग्रेसी नेताओं की प्रतिभा को दबा कर रखा गया,जिससे  दूसरे प्रतिभाशाली नेताओं को भी लगा की इस संगठन में हमारा भविष्य नहीं है। और इसलिए कुछ ने अपना एक अलग प्रांतीय स्तर पर पार्टी बना ली जो की कांग्रेस के बंटवारा का मुख्य कारण बना और उनका अपना ही वोट बैंक बिखरता चला गया।

इस तरह से समय-दर-समय, समय का पहिया ऐसा घुमा कि एक बड़े वृत का रूप ले लिया। 2 दशक पहले से ही कांग्रेस इस तरह के क्षेत्रीय नेताओं के ऊपर निर्भर बनता चला गया और आज देश में ऐसा कोई भी राज्य नहीं है जहां कोई कांग्रेसी नेता बहुत बड़ी सफलता हासिल कर सके।

एनडीटीवी के द्वारा बीजेपी नेता हेमांता विश्वास शर्मा के द्वारा दिये गये इंटरव्यू से यह साफ हो गया कि असम में भाजपा के शक्तिशाली रूप से उभरने में और वहां कांग्रेस की लुटिया डुबोने के लिए साफ तौर पर राहुल गांधी जिम्मेदार हैं। पिछले 3 बार से कांग्रेस मंत्री और विधायक भी राहुल गांधी को ही इस हार का जिम्मेदार मानते हैं, क्योंकि वह पार्टी के कार्यकर्ता को अपने नौकर की तरह वयवहार करते हैं।

वास्तव में कांग्रेस एक ऐसी राष्ट्रीय पार्टी है जो कि अब विलुप्त होने के कगार पर आ चुकी है। इसकी इस स्थिती के लिए पूरी तरह से नेहरू-गांधी परिवार जिम्मेदार है। परिवार ने कांग्रेस को अपनी मिल्कियत समझते हुए इसका बंटाधार करने में कोई कसर नही छोड़ी है और अब स्थिती यह है कि ना ही पार्टी राष्ट्रीय स्तर की रह गयी है, ना ही मुख्य विपक्षी पार्टी के अपने रोल को निभा पा रही है।

 

नीलाभ कृष्ण

 

 

 

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