कब कोई बच्चा स्कूल में फेल नहीं होगा?

कब कोई बच्चा स्कूल में फेल नहीं होगा?

उस सुबह प्रोफेसर मुरारीलाल आते ही तपाक से बोले: मैंने  सुना है कि इधर  एक नया निर्णय लिया गया है जिसके अनुसार कक्षा आठ तक बच्चों की परीक्षा न लेने की नीति बदल दी गई है।  अब उन्हें कक्षा पांच में सालाना परीक्षा देनी होगी, उसके बाद भी उन्हें ऐसी ही स्थिति से हर वर्ष गुजरना पड़ेगा? इस बदलाव की क्या आवश्यकता थी? बच्चों पर वैसे ही बस्ते का भारी बोझ है, परीक्षा का भय उन्हें कितनें दबाव में डालता है यह तो आप और हम सभी जानते हैं। एक प्रगतिशील कदम को फिर से पीछे क्यों धकेल दिया गया है? शिक्षा में तो न जानें कितनें ही सुधार होने हैं, ऐसे में जो एक सुधार बच्चों, अभिभावकों तथा अध्यापकों यानी तीनों को स्वीकार्य था उसमें बिघ्न डालने की आवश्यकता क्यों पड़ गई?

शिक्षा को तनाव-मुक्त बनाने के स्थान पर फिर से एक पुरानी दकियानूसी सोच को आधार बनाकर बच्चों पर तनाव बढ़ा दिया गया है। मैंने उनको पहले कुछ जानकारी देने का प्रयास किया; यह सही है कि परीक्षा का तनाव हम सब नें महसूस किया है, बच्चे उससे बच सकें तो सभी को प्रसन्नता ही होगी। मगर हम सब यह भी जानते हैं कि परीक्षा से कब तक बचा जा सकता है? परीक्षाओं से जीवन पर्यन्त गुजरना तो मनुष्य की नियति है। यह प्रोफेसर साहेब को पसंद नहीं आया, वे बोले: देखिये, यह तो आप मुझे  दर्शन शास्त्र में उलझाने का  प्रयास कर रहे हैं। मुझे लगा कि वे भी उन प्रगतिशील शिक्षाविदों की तरह काफी अप्रसन्न हैं जो भारत की शिक्षा व्यवस्था को कुछ नामी-गिरामी निजी स्कूलों को ध्यान में रखकर ही देखते हैं। जो  भारत के गांवों, जनजातीय इलाकों, पहाड़ों तथा झुग्गी झोपडिय़ों में चलने वाले स्कूलों से  केवल समाचार पत्रों द्वारा ही जानकारी लेते हैं और वास्तिवकता के कई पक्षों से अनभिज्ञ रहकर ही शिक्षा सुधारों पर व्याख्यान देते रहते हैं।

यद्यपि प्रोफेसर साहेब की पृष्ठभूमि तो ऐसी नहीं रही है। मैंने उनका ध्यान इसी पर दिलाया, अब वह समय नहीं रहा है जब सरकारी स्कूलों की साख हर तरफ सम्मान के साथ चर्चित होती थी। जब अध्यापक अपने कर्तव्य में कोताही को ‘पाप’ मानता था, जब उसे लगता था कि वह ईश्वर-प्रदत्त कार्य कर रहा है, सैकड़ों हजारों बच्चों के जीवन को दिशा दे रहा है। इसे से अधिक पुण्य-कर्म क्या हो सकता है? मैं और प्रोफेसर साहेब जब पढ़ते थे तब सरकारी स्कूल ही सबसे अधिक सराहनीय माने जाते थे। उस स्थिति में यदि वे आज भी होते तो मैं भी अध्यापकों के ऊपर ही बच्चों की उपलब्धियों का मूल्यांकन करने का भार छोडऩे से सहमत हो जाता। आज सब कुछ बदल गया है। अब अध्ययन, अध्यापन तथा अध्यापक में पहले वाली बात नहीं रही है।’ अब वहां मानव मूल्यों को आचार विचार व्यवहार में देख पाना असंभव है।

मैंने उनके सामने प्रश्न रखा – क्या आप नहीं जानते हैं कि आज स्कूलों में पाप-पुण्य पर चर्चा करना सांप्रदायिक माना जाता है? हम लोगों ने स्कूलों में कितनी ही बार सुना होगा कि ‘ईश्वर सब देख रहा है’! आज ऐसा कहने वाले को शंका की दृष्टि से देखा जाएगा? क्या उन लोगों की हंसी नहीं उड़ाई जाती है जो बच्चों से कहते हैं ‘आप सब भाई बहन हैं’! अनेक प्रकरणों, प्राचीन ग्रंथों, सूक्तियों, कविताओं, कहानियों इत्यादि को शिक्षा के पाठ्यक्रम से बहिष्कृत केवल इस लिए कर दिया गया है कि कहीं (राजनीतिक) ‘धर्मनिरपेक्षता पर आंच न आ जाय! इस  परिवर्तन का प्रभाव आज स्कूलों में अनेक प्रकार से दिखाई देता है। आज वह माहौल नहीं है जिसमें अध्यापक बच्चे को बिना  पढाये तब तक ”छोड़ता नहीं था’ जब तक उसे विश्वास न हो जाए कि सिखाने के उसके प्रयास पूरी तरह सफल हो गए हैं। क्योंकि  बच्चे के सीखने या न सीखने से अध्यापक की अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगती है।

img_5950अब कार्य संस्कृति और मूल्य हर तरफ बदल गए हैं। क्या यह अपेक्षा करना तर्कसंगत होगा कि केवल अध्यापक ही आज के भौतिकवाद की दौड़ के समय भी आदर्शवादी बना रहे? एक बड़ी संख्या में अध्यापक अन्य कार्यों को  प्राथमिकता  देते हैं। जिसमें ट्यूशन कोचिंग, अपना अन्य कार्य शामिल हैं। फिर जब प्रशासन स्वयं ही उन्हें गैर-शैक्षिक कार्यों में लगा देता है तब वह अपने नैतिक उत्तरदायित्व से और भी  विमुख हो जाता है।  कुल मिलाकर दुष्प्रभाव तो बच्चे को हो झेलना पड़ता है! प्रोफेसर साहेब बोले- यह सब मैं मान भी लेता हूं मगर परीक्षा को फिर से बहाल करने से यह कैसे जुड़ता है? यह सरकारों का दायित्व है कि वे कमियों को पूरा करें। बच्चे पर फिर से परीक्षा का बोझ क्यों थोपा जाय? उनके लहजे में उदासीनता स्पष्ट   प्रतिबिंबित हो रही थी। होती भी क्यों न आखिर वर्तमान स्थिति से अपरिचित तो वे भी नहीं हैं? हमनें उस दिन फिर इस तथ्य को याद किया कि इस समय सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश के स्कूलों में ग्यारह लाख से अधिक अध्यापक अप्रशिक्षित हैं जिन्हें सरकार अब ओपन लर्निंग यानी दूरस्थ शिक्षा के द्वारा अगले दो वर्षों में प्रशिक्षण देनें की तैयारी कर चुकी है। प्रोफेसर साहेब की प्रतिक्रिया कुछ यों थी- यह तो उचित ही है कि इस दिशा में बड़ा कदम उठाया जा रहा है। परन्तु समस्या का विस्तार तो इसके काफी आगे-पीछे तक फैला है। राज्य सरकारें थोड़े से मानदेय पर अस्थायी नियुक्तियां कब बंद करेंगी? अध्यापन को इतना हल्के से क्यों आंका जाता है कि प्रशिक्षित युवाओं के उपलब्ध रहते हुए भी अप्रशिक्षित की नियुक्ति की जाती है? कई राज्यों में बड़े पैमाने पर हुई इस तरह की नियुक्तियों को दबाव में आकर नियमित कर दिया जाता है। यह संतोष का विषय है कि अब सर्वोच्च न्यायालय नें इस पर व्यवस्था दी है। आशा करनी चाहिए कि आगे से नियुक्तियों में बाहरी हस्तक्षेप तथा अनियमितताओं से मुक्ति मिल जायेगी।

कुछ देर में हमारी चर्चा फिर पास-फेल के आस-पास केन्द्रित हो गई। जब बच्चा फेल घोषित होता है तब उसके मानस पर जो प्रभाव पड़ता है और जिस हीन भावना से वह ग्रसित हो जाता है वह किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकती है। प्रोफेसर साहेब का स्पष्ट मत था कि बच्चा कभी फेल नहीं होता है, फेल होती है तो केवल व्यवस्था, प्रशासक, अध्यापक या नीतियां! इन सबकी असफलता का बोझ बच्चे पर डालना तो सरासर उसके साथ अन्याय है! इस स्थिति में शिक्षा के मूल अधिकार अधिनियम का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है। सिद्धांतिक रूप में उनका कथन शत-प्रतिशत उचित है और इस पर किसी मतभेद की संभावना नहीं है। मैंने उन्हें कहा कि अभी हाल में जो संशोधन आरटीआई एक्ट में हुआ है उसमें इस पक्षों को बहुत हद तक ध्यान में रखा गया है, सबसे बड़ी बात यह है कि नए संशोधनों को लागू करना या न करना राज्य सरकारों पर छोड़ दिया गया है। वे चाहें तो पहले की तरह  परीक्षा न लें। साथ ही  यह भी व्यवस्था है कि पहली परीक्षा कक्षा पांच में ही होगी, उसके पहले नहीं। वहां पर भी बच्चे  की कमियों को दूर कर पुन: एक अवसर देनें का प्रावधान किया गया है। एक संघीय व्यवस्था में जहां शिक्षा समवर्ती सूची में है, आरटीआई एक्ट का संशोधन बीस राज्य सरकारों के अनुरोध पर तथा लगभग सभी से विचार विमर्श करने के बाद लिया गया है। राज्यों को ऐसी स्थिति निर्मित करनी चाहिए कि छात्र-अध्यापक सम्बन्ध की गरिमा फिर से बहाल हो जाय। तब कोई फेल होगा ही नहीं और परीक्षा बोझ नहीं बनेंगी…

 

जगमोहन सिंह राजपूत

 

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