जेलों का वातावरण सुधारवादी कैसे बने?

जेलों का वातावरण सुधारवादी कैसे बने?

जेल की अवधारणा मूलत: अपराधी को दण्डित करने के विचार के साथ जुड़ी है। वैसे तो जेल की सजा अपने आपमें एक दण्ड ही है। व्यक्ति को उसके परिवार और पूरे समाज से अलग करके एकांकी जीवन के रूप में दण्ड दिया जाता है, परन्तु जेल के अन्दर पहुंचकर कोई भी कैदी एकाकी जीवन जी नहीं पाता, उसे भिन्न-भिन्न प्रकार के कैदियों के साथ एक नये समाज के रूप में रहना पड़ता है। ऐसे वातावरण में अन्य अपराधियों के किस्से कहानियां उसे लगातार प्रभावित करते रहते हैं। अपराधिक घटनाओं से जुड़े व्यक्तियों के बीच रहकर लगातार उन्हीं किस्सों को सुनते रहने से एक स्वाभाविक प्रभाव हर कैदी के मन पर पड़ता है। इस वातावरण में वह जब भी बाहर के समाज की कल्पना करता है तो उसे महसूस होता है कि समाज को उसके अपराध की जेल सजा से संतुष्टि नहीं हुई बल्कि समाज ने स्थाई रूप से उसे एक अपराधी मान लिया है। समाज की यह सोच उस अपराधी के लिए ही नहीं अपितु बाहर बैठे उसके परिजनों के लिए भी रोज-रोज के मानसिक बोझ का विषय बन जाती है। जेल में बैठा अपराधी यह कल्पना नहीं कर पाता कि सजा काटने के बाद उसे समाज में वही पुराना सम्मान और जीवन-यापन का वातावरण प्राप्त हो पायेगा, उसे कोई अच्छी नौकरी मिल पायेगी या एक सामान्य व्यवसाय में समाज उस पर विश्वास कर पायेगा। इन सभी प्रश्नों के उत्तर की कल्पना उसे नकारात्मक ही दिखाई देती है। ऐसे विचारों के बीच उसके लिए एक ही मार्ग दिखाई देता है कि वह भी अन्य अपराधियों की तरह अपराध को ही अपने जीवनयापन का एक साधन मानने लगता है।

केवल जेल सुधार के कुछ नियमों या व्यवस्थाओं को बदलने से यह सारा वातावरण सुधर जायेगा इसकी शत-प्रतिशत संभावना नहीं है। वास्तव में जब सारे समाज को अपराध की मनोवैज्ञानिकता से जुड़े सभी पक्षों पर एक निश्चित दिशा समझाई जायेगी और उसका क्रियान्वयन सर्वप्रथम जेल के अन्दर से ही होगा तो स्वाभाविक रूप से व्यापक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होगा।

इसके लिए सबसे पहला बीज सुझाव तो यही है कि जेल प्रशासन को अपराध के पीडि़त व्यक्ति, परिवार, समाज, पुलिस और न्यायव्यवस्था की मानसिकता से पूरी तरह अलग एक ऐसे महान व्यक्तित्व के रूप में तैयार किया जाये जिसे प्रत्येक अपराधी एक गंभीर चुनौती के साथ सौंपा जा सके, इस आशा और विश्वास के साथ की जेल प्रशासन का वह मुखिया अपने अधीन सारे प्रशासन तन्त्र को उस अपराधी के पूर्ण कायाकल्प के लिए झोंक देगा। जेल प्रशासन मुखिया को सैद्धान्तिक रूप से ऐसा मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञ होना चाहिए जो यह दावा कर सके कि मुझे एक अपराधी प्रवृत्तियों से ग्रस्त व्यक्ति सौंपा जा रहा है जिसकी शिक्षा, मन और बुद्धि की अवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए उसकी सजा अवधि के दौरान ही मुझे उस अपराधी को एक सामाजिक और हो सके तो उच्च आध्यात्मिक व्यक्ति के रूप में परिवर्तित करना है। यदि जेल प्रशासन को इस प्रकार के लक्ष्य के लिए तैयार किया जा सके तो यह असंभव नहीं होगा कि जेल में प्रवेश करने वाला प्रत्येक अपराधी अपनी सजा अवधि के बाद समाज को एक देवता, परोपकारी, त्यागी, ईमानदार और अहिंसक व्यक्ति के रूप में प्राप्त होगा। यदि जेल प्रशासन इतने महान कार्य को जेल दिनचर्या का मूल सिद्धान्त बना सके तो नि:संदेह समाज भी ऐसे प्रशासन द्वारा तैयार किये गये व्यक्तियों को पुन: एक सामान्य नागरिक की तरह स्वीकार करने में संकोच नहीं करेगा।

ऐसे जेल प्रशासन मुखिया को कैदी के प्रति उन सभी भावनाओं से मुक्त रखा जाना चाहिए जो भावनाएं जेल में प्रवेश करने से पहले उसके विरुद्ध पीडि़त, पुलिस और न्यायाधीशों के मन में विद्यमान थी।

सारे देश में लगभग 1300 से कुछ अधिक जेलों के लिए ऐसे जेल प्रशासन मुखियाओं का चयन नव-नियुक्त भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई.ए.एस.), भारतीय पुलिस सेवा (आई.पी.एस.), भारतीय राजस्व सेवा (आई.आर.एस.), भारतीय विदेश सेवा (आई.एफ.एस.) की तरह एक अलग वर्ग के रूप में किया जा सकता है। जिस प्रकार प्रशासनिक अधिकारियों या पुलिस अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्र का प्रशिक्षण दिया जाता है उसी प्रकार जेल प्रशासनिक मुखिया के रूप में एक नया क्षेत्र निर्धारित करना होगा जिसका नाम भारतीय प्रिजन प्रशासनिक अधिकारी अर्थात् आई.पी.ए.एस. रखा जा सकता है। इस क्षेत्र में नियुक्त अधिकारी को जेल प्रशासन के सुधारात्मक पक्ष के बारे में विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जा सकता है। ऐसे जेल प्रशासन मुखियाओं में मानवतावाद, सामाजिकता और आध्यात्मिकता के उच्च सिद्धान्तों के प्रति लगाव सर्वोच्च महत्त्व का लक्षण होना चाहिए। ऐसे लक्षणों से सुसज्जित आई.पी.ए.एस. अधिकारियों को जब देश की जलों का प्रमुख नियुक्त किया जायेगा तो स्वाभाविक रूप से एक दशक के अन्दर ही इसके सुन्दर परिणाम भी सामने आने लगेंगे।

जेल सुधार के अनेकों महत्वपूर्ण विषयों पर असंख्य आंकड़े और शोध आदि उपलब्ध हैं। जेल सुधार के नाम पर कैदियों की अनेकों भौतिक आवश्यकताओं के लिए आवाज उठाई जाती है, परन्तु जेल सुधार के इस बीज मन्त्र पर आज तक किसी विद्वान शोधकर्ता ने गहरी गंभीरता के साथ विचार प्रस्तुत नहीं किया। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने भी जेल सुधार के नाम पर अनेकों भौतिक आवश्यकताओं के साथ-साथ सुधारवादी प्रयासों को सूचीबद्ध किया है। परन्तु जेल प्रशासन के मुखिया के रूप में एक उच्च मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विशेषज्ञ को नियुक्त किया जाये जो एक अपराधी व्यक्ति में से राक्षसी प्रवृत्तियों को उखाड़कर बाहर फेंकने और उस अपराधी व्यक्ति में सामान्य मानवीय, सामाजिक और आध्यात्मिक प्रवृत्तियों का उदय करने में सक्षम हो, आत्मविश्वास से परिपूर्ण हो और इस प्रकार के अचम्भे प्रस्तुत करना उसके लिए सामान्य दैनिक प्रक्रिया का अंग बन जाये, ऐसी कल्पना अभी विश्व के किसी भी देश या संयुक्त राष्ट्रसंघ के संज्ञान में भी नहीं लाई जा सकी।

मैंने स्वंय दिल्ली की तिहाड़ जेल सहित पंजाब की 7 जेलों में दौरे करके कैदियों को ‘जल बचाओ अभियान’ से जोडऩे का प्रयास किया। इस अभियान के कुछ समय बाद जब मैंने इन जेलों से कैदियों में परिवर्तन की रिपोर्ट मांगी तो मुझे पता लगा कि बहुत बड़ी संख्या में कैदी ‘जल बचाओ अभियान’ के लगभग सभी महत्वपूर्ण निर्देशों को क्रियान्वित करने लगे हैं। इससे मुझे यह अनुभव हुआ कि कैदियों को भी यदि किसी अच्छी और लाभकारी बातों की तरफ आकृष्ट किया जाये तो वे ऐसे विचारों को अवश्य ही स्वीकार करते हैं और उन्हें जीवन में उतारने लगते हैं। पंजाब मानवाधिकार आयोग का सदस्य होने के नाते भी मैंने अनेकों बार जेलों में जाकर कैदियों की समस्याएं सुनने और उनकी हर संभव मदद करने के लिए प्रयास किये। उससे भी मेरा यही अनुभव रहा कि जेल के अन्दर बीतने वाला जीवन भी अपने भविष्य के सुधार के प्रति उतना ही सचेत और अनुसरण करने वाला होता है जितना जेल के बाहर रहने वाला सामान्य नागरिक।

इस बीच भारतीय रेडक्रास सोसाइटी निकट भविष्य में भारत की जेलों में सजा काट रहे अपराधियों में से कुछ को उनकी योग्यता के अनुसार चुनकर प्राथमिक चिकित्सा (फस्र्ट एड) का प्रशिक्षण देने की व्यापक योजना पर भी विचार कर रही है। यदि यह योजना क्रियात्मक रूप से सामने आ पाई तो यह भी अपने आपमें कैदियों को सामाजिक मानसिकता में ढालने का एक सुन्दर प्रयास होगा। जो कैदी प्राथमिक चिकित्सा में प्रशिक्षित होंगे उनका कार्य जेल के अन्य साथियों को आवश्यकता पडऩे पर चिकित्सा सहायता के साथ-साथ एक सामान्य स्वास्थ्य कार्यकर्ता की तरह भी विकसित किया जा सकेगा।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी के उपाध्यक्ष हैं)

अविनाश राय खन्ना

 

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