पोषण व औषधि की दोहरी भूमिका निभाते हैं शाक वर्गीय पौधे

पोषण व औषधि की दोहरी भूमिका निभाते हैं शाक वर्गीय पौधे

पोषण की दृष्टि से शाक-सद्ब्रिजयों का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है, चिकित्सक बीमारी के दौरान इनके उपयोग पर जोर देते हैं तो पोषक विशेषज्ञ सदैव शाकीय आहार पर जोर देते हैं। यही नहीं प्रकृति इनका भरपूर उत्पादन भी करती है। हर मौसम में अलग-अलग प्रकृति के शाकों से बाजारें सजी रहती हैं। हम उन्हें शाक के नाम पर ग्रहण करते हैं, पर उनके गुणों से अनभिज्ञ रहते हैं।

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चौलाई, पालक, पोई एवं चंचु

चौलाई का शाक शीतवीर्य, रूक्ष, रस एवं विपाक में मधुर और लघु होता है। यह मदविकार (मदात्य), पित्तविकार, विषविकार और रक्तविकार (विशेषकर रक्तप्रदर) को शांत करता है। यह वात-पित्तशामक, शीतवीर्य, गुरु, मधुर और अत्यंत शुक्रवर्धक होता है। पालक व उपोदिका (पोय) का शाक गुरु सर मदनाशक होता है। चंचु शाक का गुण पालक के समान होता है, परन्तु यह मलभेदक के बजाय मल-संग्राही होता है।

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विदारीकंद एवं जीवन्ती शाक के गुण

विदारीकंद का शाक वात-पित्तनाशक, मूत्रल, रस में मधुर, शीतवीर्य, जीवनीय, बृंहणीय, गुरू, वृष्य और रसायन होता है। जीवन्ती का शाक चक्षुष्य, त्रिदोषशामक, मधुर और शीतवीर्य होता है। विदारीकंद की लताएं काफी लंबी होती है। इसके कंद कद्दू के समान काफी बड़े-बड़े होते हैं, इसलिए लोक में इसे भुईकोंहड़ा भी कहा जाता है। यह खाने में प्रारंभ में अत्यंत मधुर लगता है, किन्तु इसका अनुग्रह कसैला होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में इसे जाड़े का मेवा भी कहते हैं। वर्षभर बाद भी इसका स्वाद खराब नहीं होता।

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कलक्वबादि शाक के गुण

कदम्ब या करेमू, मरसा, वनबथुआ और द्रोणपुष्पी, गुग्गुल शाक, तृणधान्य-विशेष, जीवन्ती, चकवड़, छोटे पत्तों वाली चिल्ली या जौ के कोमल पत्ते, हुलहुल तथा सभी प्रकार के दाल बनाये जाने योग्य सभी शिम्बीधान्य की फलियों एवं पत्रों के शाक रस में मधुर, रू क्ष, किंचित लवण, वात-कफकारक, गुरु, शीतवीर्य, मल-मूत्र प्रवर्तक और प्राय: देर से पचने वाले होते हैं। इन शाकों को उबालकर इनका रस निचोड़कर घी, तैल आदि में भलीभांति पकाकर खाया जाए तो ये अधिक दोषकारक नहीं होते। जबकि छोटे पत्तों वाली चिल्ली शाक का गुण धर्म बथुआ के समान होता है। चिल्ली शाक दो प्रकार के होते हैं- 1. बड़े पत्तों वाला और 2. छोटे पत्तों वाला। जबकि अरणी और वरुण का शाक मधुर एवं किञ्चित तिक्तरस वाला कफ-वातशामक होता है। इसी प्रकार श्वेतरक्त पुनर्नवा कालशाक किंचति क्षारयुक्त, रस में कटु एवं तिक्त, अग्निदीपक, मलभेदक और गरविष, शोफ तथा कफ-वातशामक होता है। इसके विपरीत अंकुर का शाक अग्निवर्धक, कफ-वातरोगनाशक और रोचक होता है। शतावरी के अंकुरका शाक तिक्त रस वाला, वीर्यवर्धक और त्रिदोषनाशक होता है। बांस के अंकुर का शाक रूक्ष, विदाहारक और वात-पित्तकारक होता है। इसी क्रम में महत्वपूर्ण शाक है मत्स्याक्ष या जलपिप्पली। जलपिप्पली का शाक अग्निदीपक एवं रस में तिक्त होता है। यह प्लीहारोग, अर्शरोग एवं वात-कफविकारों को नष्ट करता है। कसौंदी का शाक, कृमिरोग एवं कफोत्क्लेद को नष्ट करने वाला और मलप्रवर्तक होता है।

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आद्र्रिका, लहसुन, पलाण्डु एवं  गृञ्जनक के गुण

हरी धनिया रस में तिक्त एंव मधुर तथा मूत्रल होती है, यह पित्तकारक नहीं होती। लहसुन कन्द अत्यधिक तीक्ष्ण, उष्णवीर्य और रस एवं विपाक में कटु होता है। यह मल-प्रवर्तक, ह्द्य, केश्य, गुरु, वृष्य, स्निग्ध, रुचिकारक और दीपनीय होता है। यह टूटी हुई अस्थियों को जोडऩे वाला, बल्य और रक्त-पित्त को दूषित करने वाला होता है। यह किलास, कुष्ठ, गुल्म, अर्श, प्रमेह, कृमिरोग, कफरोग, वातरोग, हिक्का, पीनस एवं कास को नष्ट करता है। अत: यह एक रसायन है। जबकि प्याज-लहसुन के समक्ष गुण वाला एवं कफकाकर होता है, यद्यपि यह अधिक पित्तकारक नहीं होता है। लहसुन कफ-वातविकारों में तथा अर्शरोग में लाभकारी होता है। व्रणशोथादि में इसका लेप लगाकर स्वेदन किया जाता है। इसका शाक तीक्ष्ण एवं ग्राही होता है, पर पित्त प्रकृति वालों एवं पित्त-विकारों में यह अहितकार होता है। जबकि जिमीकन्द अग्निदीपक, रुचिकारक, कफनाशक, पिच्छिलता रहित एवं लघु होता है। यह अर्श के रोगियों के लिए हितकर होता है। वहीं भूकन्द का शाक अत्यधिक दोषकारक होता है।

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कूष्माण्डादि एवं वल्ली शाक के गुण

कूष्माण्ड अर्थात् कद्दू व पेठा, लौकी तरबूज, खरबूजा, ककड़ी, टिंडा, छोटा खीरा, चीना-ककड़ी, चिर्भट (फूट) इन सभी के शाक, कफ-वातकारक मलभेदक, विष्टम्भि, अभिष्यन्दी, गुरु और रस एवं विपाक में मधुर होते हैं। लता फलों में कूष्माण्ड (कद्दू) सर्वोत्तम है। यह वात-पित्तनाशक, वस्तिशोधक और वृष्य होता है। जबकि खीरा, कूष्माण्ड आदि से अधिक मूत्रल होता है। लौकी अधिक रूक्ष और ग्राही होती है। तरबूज, ककड़ी और चिर्भिट (फूट) जब कच्चे रहते हैं, तब पित्तनाशक और शीतवीर्य होते हैं तथा पक जाने पर पित्तवर्धक और उष्णवीर्य हो जाते हैं।

वस्तुत: कूष्माण्ड, कालिंग, एर्वारु और चिर्भिट आदि के फल शीर्णवृन्त हो जाने पर (डंठल के गल जाने पर) किञ्चित् क्षारयुक्त, पित्तकारक, कफ-वातशामक रुचिकारक, अग्निदीपक, ह्द्य, अष्ठीला एवं आनाहनाशक लघु हो जाते हैं।

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मूली शाक के गुण

शाकवर्ग में मूली महत्वपूर्ण घटक है। कच्ची मूली अव्यक्त रस वाली किञ्चित क्षारयुक्त, तिक्त, त्रिदोषशाम, लघु एवं किञ्चित उष्ण होती है। यह गुल्म, क्रास, क्षय, श्वास, व्रण, नेत्ररोग, कण्ठरोग, स्वरभेद, अग्निमान्द्य, उदावर्त और पीनसरोग को नष्ट करती है। जबकि पकी मूली रस और विपाक में कटु, वीर्य में उष्ण, त्रिदोषकारक, गुरु और अभिष्यन्दी होती है, किन्तु यही मूली स्निग्ध द्रव्यों से सिद्ध करने पर वातनाशक हो जाती है। सूखी मूली वात-कफ-नाशक होती है और कच्ची मूली त्रिदोषकारक होती है।

साभार: योग संदेश

डॉ. राजेश मिश्र

 

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