नौकरशाही का मकडज़ाल

नौकरशाही का मकडज़ाल

भारत के संस्थापकों ने एक ऐसे देश का स्वप्न देखा था, जहां दूध की नदियां बहती हों। लेकिन देश के पास इसके लिए संसाधन नहीं थे और सरकार के पास इसे साकार करने के लिए कोई विजन नहीं था। वर्ष 1952 जैसे शुरूआती वक्त में ही दुग्ध सहकारिता खत्म हो चुकी थी और योजनाकारों एवं राजनीतिज्ञों ने सफलता के सांचे को तब तक स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जब तक कि वर्गीज कुरियन ने उन्हें ‘एक अरब लीटर के विचार’ को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं कर दिया और इस विचार ने ही दुग्ध क्रान्ति को जन्म दिया। दुग्ध उत्पादन आहार की गुणवत्ता से लेकर पशुओं की गुणवत्ता तक कई कारकों पर निर्भर करता है। पूरे भारत में पशुओं की गुणवत्ता कभी भी खराब नहीं रही है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय देश के पास अपनी एक-तिहाई आबादी को भी पर्याप्त दूध देने की क्षमता नहीं थी। लेकिन आज की स्थिति में हम दूध उत्पादन के क्षेत्र में पूरे विश्व में सबसे ऊपर की श्रेणी में आते हैं।

उन्नत भारत

लेखक                    : शंकर अय्यर

प्रकाशक                : प्रभात प्रकाशन

मूल्य                      : 600 रु.

पृष्ठ                        : 320

लेखक आगे लिखते है कि स्वतंत्रता के समय भारत ने जो सपना देखा था, उसे भारत लगभग पूरा करने में सफल भी रहा। कई लोगों के पतन को झुठलाते हुए भारत में लोकतंत्र न केवल अपना अस्तित्व बचा पाया है, बल्कि आगे की ओर तेजी से अग्रसर भी हुआ है। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। जटिल क्षेत्रों में भी भारत की सफलता यह विश्वास जगाती है कि भारत आने वाले भविष्य में पूरे विश्व को अपनी शक्ति का एहसास करा सकता है। भारत के पास अभी कई सारी समस्याएं है किसे भारत को जिससे भी स्थिति में पार पाना होगा। अंतरिक्ष और आण्विक कार्यक्रमों में सफलता इस विफलता पर पर्दा नहीं डाल सकती कि देश अपनी विशाल आबादी के एक काफी बड़े हिस्से को सर्वाधिक मूलभूत सुविधाएं भी मुहैया नहीं करा पाया है। संसार के सबसे अधिक गरीब और निरक्षर भारत में ही रहते हैं। प्रत्येक 10 में से 3 लोग पढ़ नहीं सकते हैं और हरेक 10 में से 4 लोगों को दो वक्त की रोटी भी नहीं मिल पाती है। हर लगभग 10 लाख बच्चे पांच वर्ष  के होते-होते मर जाते हैं। इन सभी हालातों में सुधार लाने के लिए प्रशासन को पतन से बचाने के लिए नौकरशाही में व्यवस्थागत सुधारों की जरूरत है। नौकरशाही राजनीतिक नेतृत्व का संपूरक होती है। इसी पर प्रशासन का ढ़ांचा कायम रहता है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए और देदीप्यमान भारत के लिए राजनीतिक नेताओं को निजी लाभ से नहीं, बल्कि सार्वजनिक भलाई की भावना से काम करना होगा। इसी में इस भारत रूपी देश की भलाई है।

शंकर अय्यर जो उन्नत भारत नामक इस पुस्तक के लेखक हंै, उन्होंने आजादी के बाद से देश के विकास में लिये गये सारे कदमों को गहराई से समझाने का प्रयास किया है। लेखक ने इस पुस्तक में बिना किसी राजनीतिक झुकाव के अपने बातों को रखा है । लेखक ने किसान संबन्धित बातों से लेकर दूध उत्पादन के क्षेत्र में की गई दुग्ध क्रांति जैसी बातों को सुव्यवस्थित ढंग में रखा है। यह पुस्तक आज के युवा वर्ग जो देश के आर्थिक विकास से परिचित नहीं हैं, उनके लिये यह लाभकारी है। अत: यह पुस्तक पाठकों के ज्ञान-वर्धन में सहायक होगी।

 

रवि मिश्रा

 

 

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