लालू बन गए लल्लू

लालू बन गए लल्लू

हम भारतीय अपनी स्वतंत्रता की 70वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस के दिन हम सभी भारतीय हर वर्ष की भांति भारत के उन सभी वीर सपूतों का स्मरण करते हैं जिन्होंने भारत माता की स्वतंत्रता के लिए अपने जीवन को न्यौछावर कर दिया। इस पवित्र दिन के माध्यम से, वर्षों से हम अपनी आने वाली पीढ़ी को अपने स्वतंत्रता सेनानियों के बहुमूल्य बलिदान की याद दिलाते हुए उनके अंदर देशभक्ति की आग प्रज्जवलित करते हैं। नई पीढ़ी के अधिकतर बच्चे जो निजी स्कूलों के माध्यम से अपनी शिक्षा ग्रहण करते है, वे तो अब धीरे-धीरे अपनी बहुमूल्य परंपरा को भूलते जा रहे हैं और इसका कारण बच्चों द्वारा उन पुस्तकों का अध्ययन करना है, जो भारत के गौरवान्वित इतिहास, परंपरा और हमारे वीर सपूतों को गलत प्रकार से दिखाते हैं। सभी धर्मों की रक्षा और सम्मान करना भारत की परंपरा सदियों से रही है। हम दूसरों की भांति कभी भी स्वार्थी नहीं रहे हैं। हमारे वीर सपूतों ने हमेशा से भारत के विकास के लिए अपनी जान दी। दास प्रथा, बांटने वाली मानसिकता और विदेशी मनोदृष्टि तो इस देश में विदेशी शासकों के द्वारा षडयंत्र के तहत थोप दी गई। इन दुराचारियों ने हमारी बहुमूल्य संस्कृति को समाप्त करने का कोई प्रयत्न नहीं छोड़ा। इन विदेशियों ने गैरपारंपरिक विचारों को लोगों के अंदर भर कर भारत की वर्षों पुरानी एकजुटता और अहिंसा के सिद्धांतों को भी भस्म करने का पूरा प्रयास किया।

सत्तर वर्ष पूर्व 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली, लेकिन भ्रष्ट मानसिकता से हमें अभी भी छुटकारा नहीं मिला। कांग्रेस पार्टी जिसने इस देश पर लगभग साठ वर्षों तक अपना आधिपत्य जमाये रखा, उसके कई नेताओं ने अपने भ्रष्टाचार से इस देश को लूटा और सबसे ध्यान देने वाली बात यह है कि गांधी परिवार भ्रष्टाचार को बढ़ाने में समान रूप से संलिप्त रहा। बोफोर्स घोटाले का भूत तो आज भी गांधी परिवार का पीछा कर रहा है। सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा द्वारा  किये गये जमीन के सौदे और उनका व्यापार भी जांच के घेरे में है। यदि कोई देश में हुए भ्रष्टाचार के ऊपर किताब लिखना चाहे तो कांग्रेस पार्टी उसमें सबसे प्रथम स्थान पर होगी।

हाल के दिनों में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और देश के पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव एक बार फिर भ्रष्टाचार के पोस्टर बॉय बनकर उभरे हैं। लालू यादव ने अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान नियमों को ताक पर रखते हुए भ्रष्टाचार में लिप्त रहे जो अब खुलकर लोगों के सामने आ रहा है। अब तो भ्रष्टाचार के चपेटे में लालू यादव का पूरा परिवार आ चुका है। लालू यादव अपने युवा बच्चों को बेनामी संपति और भ्रष्टाचार के माध्यम से पैसा बनाने की कला सिखा रहे लगते हैं। यह कितना दुखद है कि चारा घोटाले के मामले में रांची के कारावास में रह चुके लालू यादव आज भी अपनी करतूतों और राजनीति का बचाव करने में कभी पीछे नही हटते। ध्यान-पूर्वक देखें तो पूरे देश में केवल लालू प्रसाद ही होंगे जो अपने बच्चों को अनैतिक माध्यम को अपनाने की परामर्श देते हैं। भारत जैसे देश में एक पिता अपने बच्चों को इस प्रकार का ज्ञान कभी भी नहीं दे सकता। हमारे शास्त्र भी ”पितृ देवो भव: ” के माध्यम से पिता का अनुसरण करने की परामर्श देते हैं। क्योंकि एक पिता का उसके बच्चों में नैतिक गुणों का निर्माण करने में सर्वोत्तम स्थान होता है। हालांकि यहां यह स्मरणीय है कि लालू यादव के लाख भ्रष्टाचार में लिप्त रहने के बावजूद बिहार की जनता ने पिछले विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी राजद को अधिकतम सीटें दी।

लालू वास्तव में एक विचित्र नेता हैं, जिनको पता है कि लोगों के समक्ष कब, क्या और कैसे बोलना है। वो लोगों के समक्ष उनकी अपनी भाषा में बात करने की कला जानते हैं। लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए लालू यादव आम बिहारी की तरह कुर्ता-बनियान पहनना, दही-चूड़ा खाने जैसे नाटक करते हैं। कभी-कभी तो लालू यादव अपनी पत्नी राबड़ी देवी के साथ गायों के साथ भी फोटो लेते है और होली में आम नागरिकों के साथ देहाती तरीके से होली खेलते हैं। इन सबका केवल एक ही अर्थ निकलता है कि लालू यादव लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने की कला में परिपूर्ण हैं।  लेकिन अब वो आकर्षण के दिन खत्म हो गये हैं। अब लोग अपने उम्मीदवारों का सावधानी-पूर्वक चयन करते हैं। वो दिन लद गये जब लोग जाति, धर्म और भाषा के नाम पर अपना मतदान करते थे। कोई भी राजनेता या राजनीतिक दल कितना ही मजबूत क्यों न हो, लेकिन अब उन्हे सावधान होने की आवश्यकता है। आम जनता अब अपना मत देने से पहले राजनीतिक दलों का तुलनात्मक अध्ययन करती है। पूर्व में कांग्रेस की सरकार पर सीबीआई को अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिये दुरूपयोग करने के आरोप लगे और अब वही आरोप भाजपा की नेतृत्व वाली राजग सरकार पर लग रहे हैं। पहले लालू प्रसाद की राजद और कांग्रेस ही जातिगत राजनीति के लिये प्रसिद्ध थे लेकिन अब तो इस प्रकार की राजनीति हरेक दलों के द्वारा की जा रही है। अपने आप को सेक्यूलर कहने वाले राजनीतिक दल, संप्रदायिक राजनीति करने में सबसे आगे हैं। यहां पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के द्वारा दिये गये शब्द ”राज-धर्म” के अनुसार देखे तो हमारी शासन करने वाली सरकारें अपना ”राज-धर्म” निभा रही है या नहीं, इसका आकलन करने की आवश्यकता है।

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