…गुरु:साक्षात् परम्ब्रह्म  तस्मै श्रीगुरवे नम:

…गुरु:साक्षात् परम्ब्रह्म   तस्मै श्रीगुरवे नम:

भारतीय संस्कृति बहुत व्यापक है। इस संस्कृति की हर चीज हमारे जीवन पर प्रभाव डालती है। पूजापाठ, धर्मग्रंथ इन समस्त चीजों पर ध्यान दें तो यह आसानी से समझ में आता है कि हमारी जीवन-शैली को अथपूर्ण बनाने के लिए इन समस्त चीजों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इन सभी चीजों में हमारी संस्कृति गुरू-परंपरा को बहुत अधिक महत्व देती है। गुरू एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें हम अपनी संस्कृति की धरोहर कहें तो गलत नहीं होगा। हमें अपनी संस्कृति और मानवीय मूल्यबोध से अवगत कराने वाले व्यक्ति गुरू ही हैं। वह केवल ज्ञान ही नहीं प्रदान करते हैं, बल्कि हमारे जीवन को उन्नति के रास्ते पर ले जाते हैं। हमारे पूर्वज इसी गुरू-परंपरा को श्रेष्ठ मान कर अपने जीवन को संतुलित बना पाते थे। कोई भी आदमी कितना भी ज्ञानी क्यों ना हो, बगैर गुरू के वह अपूर्ण होता है। भारतीय संस्कृति के अतीत में जायें तो अनेक महान गुरूओं के बारे जानकारी पा सकते हैं। किस प्रकार एक महान व्यक्तित्व बनने में वे सक्षम हो पाए। उनका साधारण जीवन समाज में असाधारण परिवत्र्तन ला सका यह जान पायेंगे।

गुरू बनना अथवा किसी को गुरू मानना कोई आसान बात नहीं होती है। जब हम किसी से कोई भी शिक्षा ग्रहण करते हैं, उसी क्षण उसे अपना गुरू मानना चाहिए। प्रकृति में विद्यमान जड़ या निर्जीव समस्त चीजें अपनी गतिविधि और कार्यकलाप के माध्यम से हमें शिक्षा प्रदान करने का प्रयास करते हैं। उन समस्त चीजों को भी अपना गुरू मानना गलत नहीं होगा। जब हम किसी को अपना गुरू मानने लगते हैं, उन्हें अपने सामने श्रेष्ठ मानकर अपने आप को उनके सामने लघु मानना चाहिए। इससे हमारे अंदर रहने वाले अहंकार का विनाश होता है। ईश्वर को पाने का सर्वप्रथम उपाय अपने अहंकार का त्याग करना है। अपने आप को अहंकार मुक्त करना वाकई में बहुत कठिन कार्य है, इसीलिए इस प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए हमें एक गुरू को मानना नितांत आवश्यक है। जब एक बार हम किसी को गुरू बना लेते हैं, तो हमारे सीखने की इच्छा द्विगुणित हो जाती है। इस प्रकार हम अधिक से अधिक ज्ञान अर्जित कर पाते हैं। गुरू को सम्मान देने के माध्यम से हमारे अन्दर शालीनता बढ़ती है। इसी प्रकार हमारा परिवर्तीत व्यवहार हमें अनेक स्थानों पर सफल बनाने में सहयोग करता है। गुरू एक ऐसा व्यक्ति है जिनसे केवल हमें कुछ मिलता है। लेकिन यह हम पर निर्भर करता है हम कितना अधिक ज्ञान ग्रहण कर पाते है, और कैसे ग्रहण करते हैं। हर व्यक्ति के अंदर ऊर्जा का श्रोत होता है और गुरू हमें सही राह दिखाते हैं। गुरू हमें हमारी ही शक्तियों से परिचित कराते हैं।

आजकल नए युग के लोगों को यह आसानी से समझ में नहीं आता है कि जो शिक्षा देते हैं उन्हें शिक्षा का मोल चुकाने के बाद भी उनके प्रति आदर-सम्मान रखना चाहिए। एक छोटे बालक में कुछ माता-पिता गुरू के प्रति आदर और भक्तिभाव लाने का प्रयास नहीं करते हैं। उनके बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं, उनके मन में अपने गुरू के प्रति और गुरू स्तर के अन्य सभी जनों के प्रति आदर भाव नहीं रहता है, यहां तक कि अपने माता-पिता के प्रति भी उतनी सद्भावना नहीं रहती है। गुरू बनाना एक व्यक्ति की इच्छा होनी चाहिए। जब हम बाहरी दुनिया से किसी व्यक्ति को गुरू बनाने में सक्षम नहीं हो पाते हैं, तब अपने अंदर रहने वाले विवेक को गुरू मानना चाहिए। यह गुरू सदैव हमें सही दिशा दिखा सकता है।

उपाली अपराजिता रथ

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