चीनी माल खरीदना यानि नाग को दूध पिलाना!

चीनी माल खरीदना यानि नाग को दूध पिलाना!

आजकल सावन का महीना चल रहा है। सावन में नागपंचमी के दिन नाग की पूजा देश के कई हिस्सों में की जाती है। परन्तु प्रकृति के साथ तादातम्य बिठाने के इस कार्य को हमने कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया है। हम नाग तक ही सीमित रहते तो ठीक था। हम तो शत्रुभाव रखने वालों की झोली भर रहे हैं। नहीं तो हमसे लगातार दुश्मनों सा व्यवहार करने वाले चीन का माल खरीद कर हम उसकी अर्थव्यवस्था को हम इतना मजबूत नहीं करते? हम हर साल चीन से कोई 63 अरब डॉलर का सामान खरीदते हैं। भारतीय रूपये में ये कोई 4 लाख 25 हजार करोड़ रूपये बैठता है। चीन से आने वाली चीजों में शामिल हैं- खिलौनें, फर्नीचर, टायर, मकान बनाने का सामान, इलैक्ट्रोनिक वस्तुएं, बल्ब, बिजली का सामान, जूते, साइकिल और यहां तक की त्योहारों पर इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं जैसे राखियां आदि।

क्या ये वस्तुएं ऐसी हैं कि जिनके बिना देश का काम चल ही नहीं सकता? देश के किसी भी कारखानेदार से मिलिए, वह आपको बताएगा कि इस चीनी माल के कारण उसका धंधा कितना मंदा हुआ है। सिर्फ धंधा कम ही नहीं हुआ है बल्कि हजारों कारखाने बंद तक हो गए है। इससे हजारों लाखों मजदूरों की नौकरी चली गयी है। और तो और अब हम आर्थिक क्षेत्र में चीन के प्रति नरमी दिखाते-दिखाते हम इतने नरम हो गये है कि अब कई लोग तो भारतीय सेना की क्षमता पर ही शक करने लगे हैं। अगर यकीन नहीं होता तो सोशल मीडिया पर पोस्ट्स को पढि़ए या फिर कुछ पत्रकारों की टिप्पणियां देखिये।

1962 में चीन ने अक्साई चिन में हमारी  38,000 वर्ग किलोमीटर जमीन हड़प ली। उसके बाद भी पिछले सालों में वह लगातार हमारी सीमा में घुसपैठ करता रहा है। इन घुसपैठों के जरिये वह इंच-इंच करके हमारी कई महत्वपूर्ण जगहों और सामरिक दृष्टि से नाजुक ठिकानों पर कब्जा कर चुका है। अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर भी उसका व्यवहार मित्र राष्ट्र का नहीं है। एन एस जी में भारत का प्रवेश हो, या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा  परिषद की सदस्यता, लखवी को आतंकवादी घोषित करना हो या मौलाना मसूद अजहर को वांछित अपराधियों की सूची में शामिल करना- चीन ने हमेशा भारत विरोधी रूख ही लिया है।

इसके बाद भी हैरानी होती है कि कई कथित बुद्धिजीवी और टीकाकार चीन के सामने झुक जाने की सलाह ही देते नजर आते हैं। चीन के साथ युद्ध कोई नहीं चाहता। मगर क्या चीन की हरकतों पर चुप रहकर सहते जाना भारत के सामरिक-आर्थिक हित में है? चीन जब अभद्र भाषा में लगातार आपको सबक सिखाने की धमकी दे रहा है तो क्या हमें डरकर चुप बैठ जाना चाहिए? ये सही है कि गाली का जवाब गाली नहीं हो सकता और भारत ने चीन के सामने शालीनता बनाए रखकर अच्छा ही किया है। मगर एक बात साफ है कि यदि मामला आर-पार की हद तक पहुंचता है तो सरकार और देश को ऐसी परिस्थिति निपटने का मन अभी से बनाना जरूरी है।

सही है कि चीन हमसे ज्यादा समृद्ध है, उसकी सेना भी हमसे ज्यादा है और दुनिया में कई जगहों पर उसकी आर्थिक-सामरिक दादागिरी चल रही है। मगर 2017 का  भारत भी वो भारत नहीं है जिसकी गरदन कोई भी मरोड़ दे। 1965, 1971 और कारगिल के युद्ध भारत की सेना ने लड़े और जीते हैं। भारत की सेना की युद्ध का जो अनुभव है वह चीन की सेना को नहीं है। यह भी ध्यान रखने की बात है कि यही चीन वियतनाम में मुंह की खा चुका है। वैसे भी युद्ध हथियारों से नहीं हौसलों से जीते जाते हैं। बंदर भालुओं की सेना लेकर वनवासी श्रीराम अपने साहस और हौसले के बल पर शक्तिशाली रावण को परास्त कर देते हैं। ‘सवालाख ते एक लड़ाऊं, तौ गोविन्द सिंह नाम कहाऊं।’ यह  इसी धरती के महान सपूत गुरू गोविन्द सिंह ने सिर्फ कहा ही नहीं था बल्कि करके दिखाया था।

युद्ध कोई नहीं चाहता। लेकिन शांति के लिए अगर युद्ध करना पड़े तो उसकी पूरी तैयारी होनी चाहिए। सेना तो जो तैयारी करेगी- वो करेगी ही। हमें भारत की सेना पर गर्व ही नहीं बल्कि भरोसा भी है कि वो किसी भी स्थिति का सामना कर सकती है। परन्तु क्या आम भारतीय की इसमें कोई भूमिका नहीं? क्या वह बाजार से चीन आधिपत्य को तोडने के लिए कुछ नहीं कर सकता? क्या वह दोयम दर्जे का चीनी माल सिर्फ इसलिए खरीदता रहेगा क्योंकि वह दो पैसे सस्ता है? हमें समझना होगा कि चीन की हेकड़ी का असल तोता उसकी अर्थव्यवस्था है। क्या जरूरी है कि हम चीनी माल खरीदकर इस तोते को दाना देते रहें? भारत के लोग चाहें इस तोते के पंख कतर सकते हैं।

मैं समझता हूं कि दोक्लाम में चीन की सेना के सामने चट्टान की तरह खड़े हुए सेना  के जवान ही नहीं बल्कि भारत की एक-एक गृहिणी और एक-एक बच्चा जब चाहेगा तो इस अभिमानी तोते की हेकड़ी निकाल देगा। लेकिन अब ये सिर्फ कहने का नहीं बल्कि कर गुजरने का वक्त है। सिर्फ बोलने से काम नहीं चलने वाला। इसका एक उदाहरण हमें राम चरित मानस में मिलता है। राम-रावण युद्ध में जब मैदान में आकर रावण बार बार अपनी वीरता का बखान करता है तो राम एक बात कहते हैं।

सूर समर करनी करहिं, कह जनावहिं आप।

विद्यमान रिपु पाहि रण, कायर करहिं प्रलाप।।”

यानि युद्ध के मैदान में कायर ही बढ़ चढ़कर बोलते है। वीर लोग बोलते नहीं, बल्कि करके दिखाते हैं। भारत के सैनिकों ने तो दोकलम में चीन की फौज को रोक कर अपना दमखम दिखा दिया है। सवाल है कि भारत के नागरिक अपना आर्थिक गांडीव उठाकर कब निशाना साधेंगे?

उमेश उपाध्याय

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