किसानों को मिले उसका हक

किसानों को मिले उसका हक

भारत किसानों का देश है यह पूरे विश्व का मानना है। सच्चाई तो यह है कि इस देश का किसान भूखे पेट फसल उगाने पर विवश है। शहर में बैठकर किसानों के हक के बारे में बात करना काफी सरल है। मगर जमीन पर किसानों की हालत उस प्रकार नहीं है, जो अन्य कार्य करने वाले लोगों की है। किसानों की ये हालात देश के स्वतंत्र होने के समय से हैं, जिसमें सबसे बड़ा हाथ इस देश को साठ वर्षो तक चलाने वाले नेहरू-गांधी परिवार का है। भारत में निजी संस्थाओं में काम करने वाले लोग अपने भविष्य को आसानी से देख लेते है, वहीं एक साधारण किसान जो दिन-भर अपने खेत में मेहनत करता है उसके भविष्य का कोई पता ठिकाना नहीं है। किसानों की बदहाली तो इस प्रकार है कि वे मजबूरन अब शहर की ओर मुंह मोड़ रहे हैं। देश के लगभग 80 प्रतिशत किसान, उनके परिवार के सदस्यों के द्वारा शहर से भेजे जाने वाले धन पर आश्रित हो चुके हैं। आज गांवों की स्थिति इस प्रकार है कि धीरे-धीरे गांव के गांव खाली होते जा रहे हैं। इन सभी समस्याओं की जड़ है किसान को उसकी फसल का उचित मूल्य न मिलना।

यह सत्य है कि 2014 में केन्द्र में भाजपा की सरकार बनते ही नरेन्द्र मोदी ने ग्रामीण और कृषि क्षेत्र को महत्व देते हुए बजट में बढ़ोत्तरी की। कई सारी परियोजनाएं लागू की और इस पर सरकार अभी भी काम कर रही है। किंतु सच्चाई तो यह है कि इन सभी परियोजनाओं से किसान की फसल में बढ़ोत्तरी हो सकती है न की उसकी आय में। आज एक तरफ गांव में जो टमाटर पांच रूपये प्रति किलो के भाव से बिकता है दूसरी तरफ वही टमाटर शहर में आकर पच्चास से सौ रूपये प्रति किलो के भाव से बिकता है। आखिर अन्न-दाता को इतना घाटा क्यों सहना पड़ता है? क्या यह किसानों के प्रति घोर अपराध नहीं है? एक बात गौर करने वाली है कि देश में बिकने वाली प्रत्येक वस्तु की कीमत एक समान है। एक टेलीविजन की कीमत जितनी गांव में है उतनी ही कीमत शहर में। लेकिन जब बात फसल की आती है तो यह समानता विलुप्त हो जाती है। क्या किसानों के प्रति इस प्रकार का दुव्र्यवहार उचित है? एक सर्वे के अनुसार देश की लगभग 35 प्रतिशत भूमि पर 5 प्रतिशत लोगों का अधिकार है। किंतु जो बचे हुए छोटे किसान है उनके पास औसतन एक एकड़ जमीन है, जो बढ़ते बेरोजगारी के कारण उसी में अपना जीवन-यापन करने को मजबूर हैं। इनमें से कुछ किसान जो फसल की मार को नही झेल पाते वे आत्महत्या कर लेते हैं। वैसे किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या का कारण केवल फसल को ही नहीं ठहराया जा सकता है। आज भी देश में ऐसे किसान हैं जो बड़े-बड़े जमींदारों को लगान देकर खेती करते हैं। फसल की सही उपज न होने तथा सही मूल्य न मिलने के कारण ये किसान डर जाते हैं और आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते है। यहां प्रश्न यह उठता है कि आखिर ये आत्महत्या करने वाले भूमिहीन किसान कर्जमाफी के दायरे में कैसे आते हैं? क्या उन भूमिहीन किसानों की ओर भी राज्य सरकारों की नजर है? क्या सरकार किसानों को उचित मूल्य दिलाने के लिए कोई कठोर कदम उठा रही है?

वर्तमान सरकार किसानों की भलाई के लिए बड़ी तत्परता से कदम उठा रही है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, किसान समूहों को जैविक खेती के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए परंपरागत कृषि विकास योजना की शुरुआत, पूर्वोत्तर क्षेत्र में ऑर्गेनिक फार्मिंग और ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष योजना की शुरुआत, स्थाई आधार पर विशिष्ट फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए सॉइल हेल्थ कार्ड की पेशकश,  घरेलू उत्पादन और ऊर्जा दक्षता बढ़ाने के लिए नई यूरिया नीति की घोषणा तथा ग्राम ज्योति योजना का आरंभ किया गया है जो बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करेगी। सरकार के इन सभी कदमों से न सिर्फ किसानों का उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि कुटीर उद्योगों और शिक्षा सहित इनका किसानों के पूरे जीवन पर भी भारी असर होगा। ऐसी कई प्रकार की योजनाओं का आरंभ मोदी सरकार द्वारा किया गया है जिसके परिणाम आते दिख रहे हैं।

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उपरोक्त संदर्भ में  हाल ही में भारतीय किसान मोर्चा भाजपा, ने नई दिल्ली में  किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष शैलेंद्र सेंगर के नेतृत्व में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाई, जिसमें वर्तमान केन्द्रीय इस्पात मंत्री चौधरी बीरेन्द्र सिंह, किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीरेन्द्र सिंह मस्त, कर्नाटक से आने वाले लोकसभा के सदस्य सुरेश चन्नबसप्पा, राजस्थान से आने वाले लोकसभा सदस्य गजेन्द्र सिंह शेखावत जैसे नेताओं ने इस सम्मेलन में भाग लेकर भारत में कृषि को बढ़ावा देने से संबधित अपनी-अपनी बातें रखी। चौधरी बीरेन्द्र सिंह ने अपना सुझाव देते हुए कहा कि किसानों की स्थिति में बदलाव के लिए जल्द से जल्द कुछ कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है, किसानों की हालत इस प्रकार है कि वे अपना कर्ज भी नहीं चुका पा रहे है। माल्या जैसे लोग हजारों करोड़ के कर्ज लेकर भाग जाते हैं और वहीं जब हमारे किसान अपना कर्ज चुकाने में असफल हो जाते है तो उनके ट्रैक्टर और जमीन को कब्जे में ले लिया जाता है। अत: सरकार को किसानों को अत्यधिक मजबूत करने के लिए एक अलग बैकिंग प्रणाली आरंभ करनी चाहिए।

किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीरेन्द्र सिंह मस्त ने कहा कि देश के किसानों की दयनीय स्थिति का कारण परिवार का टूटना है, परिवार में होने वाले इस बिखराव के कारण किसानों के हिस्से में आने वाली जमीन छोटी होती जा रही है, जिससे खेती में आने वाली लागत भी बढ़ रही है। इसी संदर्भ में  राजस्थान से लोकसभा सदस्य गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि देश में किसानों की हालत सही नहीं है और इसका कारण किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य न मिलना है। उन्होंने कहा कि देश के कृषि क्षेत्र का व्यवसायीकरण करने की आवश्यकता है जिससे किसानों को उनका हक मिल सके। उन्होने विश्व व्यापार संगठन का हवाला देते हुए कहा कि आने वाले समय में ग्रामीण क्षेत्र से करोड़ों लोग शहर की ओर पलायन करेंगे जिसका एक मात्र कारण देश के किसानों की वार्षिक आय में शहर की अपेक्षा धीमी प्रगति होना है।

वर्तमान सरकार की विभिन्न परियोजनाओं को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि केन्द्र सरकार किसानों की समस्याओं को गंभीरता से ले रही है। लेकिन सरकार को अपनी योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए कुछ क्रांतिकारी कदम उठाने होंगे जिन्हें हमारे कम पढ़े-लिखे किसान भी आसानी से समझ सके। किसानों की सबसी बड़ी समस्या उनकी फसलों का उचित मूल्य न मिलना है, जिस पर आकलन करने की आवश्यकता है।

रवि मिश्रा

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