आखिर कौन दे रहा है रेपिस्टों को संरक्षण?

आखिर कौन दे रहा है  रेपिस्टों को संरक्षण?

अखबार के पन्ने पलटते वक्त एक खबर पर नजर ठहर सी गयी। खबर थी- 7 साल की बच्ची के साथ रेप। न्यूज उत्तर प्रदेश के शाहजहा़ंपुर जिले के बंथरा गांव से थी। हालांकि अखबार में आये दिन ऐसी खबरें प्रकाशित होती रहती है। लेकिन, जब छोटी बच्चियों के साथ दुष्कर्म का कोई भी मामला प्रकाशित होता है तो मन उद्वेलित हो उठता है। अजीब सी उलझन, टिस, क्रोध, तिरस्कार, असंतोष, घृणा जैसे भाव से दिल का कोना-कोना छलनी हो उठता है। कई सारे सवालों से घिरा दिल बेचैन होकर पूछता है कि क्या आज मनुष्य इस हद तक गिर चूका है कि मासूम बच्चियों को भी नहीं बक्श रहा। ऐसे में  देश- समाज और उसमे रह रहे लोग, सभी दोषी नजर आने लगते है।  मैं खुद को भी दोषी समझने लगती हूं। ऐसे लगता है मानो आज संवेदना और नैतिकता शून्य हो चुकी हो।

आखिर सूचना और टेक्नोलॉजी के इस युग में इस तरह के घटनाओं को रोकना और इस सम्बन्ध में जागरूकता फैलाना क्या इतना मुश्किल है कि दशकों से ऐसी खबरें आ रही है और आती ही चली जा रही है। व्हाट्सप्प, फेसबुक के साथ रिलायंस जिओ के आज भारत में करोड़ो उपभोक्ता है और इनके आगे भी बढ़ते जाने की पूरी सम्भावना है। सोशल साइटों की पहुंच जब बढ़ सकती है तो इस तरह के घिनौने काम को रोका क्यों नहीं जा सकता है, कानून का डर पैदा क्यों नहीं किया जा सकता है, जागरूकता कैसे नहीं फैलाई जा सकती है?

ऐसी घिनौनी घटनाओं के बढऩे का एक महत्वपूर्ण कारण है हम सब की मौन स्वीकृति। जब हम ऐसी खबरों को देख कर या पढ़ कर पन्ने पलट देते है तो हमसब ऐसी घटनाओं के लिए मौन स्वीकृति दे रहे होते है। राह चलते किसी अनजान बालिका के साथ हो रहे जोर-जबरदस्ती देख, जब हम मुंह घुमा कर चल देते है तब भी हम मौन स्वीकृति दे रहे होते हैं। जब घर या पड़ोस में किसी पुरुष द्वारा महिला को दबाया जा रहा होता है या हिंसा किया जाता है और हम फलां-फलां कारण बता कर बीच में पडऩे से मना कर देते है तब भी हम मौन स्वीकृति दे रहे होते है। स्कूल-कॉलेजों तथा दफ्तरों में किसी लड़की के साथ छेडख़ानी या मानसिक दबाव को झेलते देख जब हम मुस्कुरा कर निकल जाते है या उसे चुप रहने की सलाह देते है तब भी हम मौन स्वीकृति दे रहे होते है। ऑटो-बस में रोज उनको असहज होते देख हमारा शांत रह जाना एक तरह से हमारी मौन स्वीकृति ही है ऐसी घटनाओं के प्रति।

अगर ठान लिया जाये तो कुछ भी मुश्किल नहीं होता। जब देश में पोलियो जैसी बीमारी को पूरी तरह से खत्म किया जा सकता है तो बलात्कार और दुष्कर्म जैसी खतरनाक बीमारी को क्यों नहीं? जैसे कोई भी बीमारी फैलकर एक परिवार से दूसरे परिवार को संक्रमित करती है और नुकसान पहुंचाती है। वैसे ही बलात्कार जैसी बीमारी तो पूरे समाज और मानवता को नुकसान पहुंचाती है। यह तो उन बीमारियों में से है जिससे समाज की आधी आबादी के अस्तित्व पर ही खतरा उत्पन्न हो सकता है।

अत: कब तक फालतू के कारण बता कर ऐसे शर्मनाक कारनामों को संरक्षण दिया जाता रहेगा। देश की आम जनता हो या देश का नेता, बलात्कार जैसे मामलों में उनकी ना तो गम्भीरता झलकती है और ना ही संजीदगी। आलम यह है कि कानून के रक्षक ही ऐसे कारनामों में संलिप्त देखे गए है। आज जब आएपीएस महिला अधिकारी को असुरक्षा और अश्लील हरकतों का शिकार होना पड़ता है तो ऐसे में आम महिलाओं की वस्तुस्थिति को बखूबी समझा जा सकता है। अगर थोड़ी और तत्परता सरकार, जनता या कानून के जरिये दिखाई गयी होती तो दामिनी जैसे रेप केस के सालों बाद ऐसी घटनाओं में कमी आती दिखती, मगर अब तो नाबालिगों के साथ भी ऐसी घटनाये बढ़ती चली जा रही है।

सोचने वाली बात है कि 7 साल की बच्ची के साथ रेप करने वाले बच्चे महज 14-16 साल के बताये गए है। यानि रेप करने वाले भी नाबालिगों की श्रेणी में आते है। यानि इनपर कड़ी कारवाही नहीं हो सकेगी। लेकिन क्या यह विचारणीय प्रश्न नहीं है कि खेलने-कूदने और पढऩे की उम्र में बच्चे सेक्स जैसी विषयों के बारे में इतने गहराई से सोचते है कि वे ना सिर्फ दुष्कर्म जैसी घटनाओं को अंजाम देते है बल्कि समाज में पता चल जाने के भय से पीडि़ता की हत्या भी कर देते है?

भारतीय समाज में आज भी सेक्स सम्बंधित बातें वर्जित है, जबकि इंटरनेट पर इसकी भरमार है। इंटरनेट और यू ट्यूब जैसी जगहों पर उपलब्ध सेक्स सामग्रियों का इस्तेमाल आज बालिग तथा नाबालिग सभी कर रहे है। सही-गलत की फिक्र किये बिना और आधी-अधूरी जानकारी के साथ उत्तेजित लोग ऐसी घिनौनी कृत्यों को अंजाम देने के लिए हर तरह के तिकड़म और उपायों को आजमाते है। कोई गर्ल फ्रेंड बनाकर तो कोई दवाब डालकर तो कोई आस-पड़ोस की नाबालिग लड़कियों को बहला-फुसला कर इस काम को अंजाम देता है। ऐसे कामो में शिक्षित तथा अशिक्षित सभी संलिप्त देखे गए है। ये बात और है कि शिक्षित लोगो द्वारा इस काम को बड़ी चालाकी से अंजाम दिया जाता है। सालों के शोषण के बाद कहीं उनका अपराध बाहर आता है और कभी-कभी तो नहीं भी आ पाता।

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जरुरी है कि सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में जहां बच्चे सेक्स सम्बन्धी जानकारी इधर-उधर से इक्क_ा करते है, उन्हें परिवार में ही इसकी जानकारी दे दी जाये। साथ ही पाठ्यक्रम में भी सेक्स एजुकेशन को शामिल किया जाये।  देखा गया है कि एक उम्र के बाद, युवा घर-परिवार से दूर अकेले या दोस्तों के साथ रहना ज्यादा पसंद करने लगते है। मां-बाप से भी निजता या दूरी बना कर चलने लगते है। ऐसे में सबसे पहले परिवार का कर्तव्य है कि उसकी समस्या को नजरअंदाज ना करे और उनसे हर विषय पर खुल कर बातें करें। क्यों किसी भी बच्चे के बनने और बिगडऩे में परिवार की अहम् भूमिका होती है।

कल का परिवेश अलग था क्योंकि इंटरनेट जैसी सुविधा नहीं थी। सेक्स जैसे विषयों को गुप्त रखा जा सकता था, लेकिन आज का दौर अलग है। आज का युवा सूचनाओं से लदा हुआ है। उसको सही सूचना चुनने में और व्यवहारिक रूप में उसे निरूपित करने में परिवार और शिक्षक की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा अहम् है।

समाज में, महिला या पुरुष जो भी ऐसी घटनाओं को पौरुषतत्व के रूप में देखते है उन्हें भी अपना नजरिया बदल लेने की जरुरत है। महिलाओं की इसमें अहम् भूमिका होनी चाहिए, क्योंकि जब मां अपनी बेटी को सहनशील बना सकती है तो वह अपने बेटो को चरित्रवान क्यों नहीं बना सकती? बेटी को सीता तो बेटे को राम क्यों नहीं बना सकती?  स्त्रियों को अपने ऐसे बेटों जो दुराचार में किसी भी तरह संलिप्त है, उनका बचाव ना कर, ऐसी बीमारी से समाज को संक्रमित होने से बचाना होगा।

आज बच्चों को बेहतर नौकरी प्राप्त करने की शिक्षा के साथ-साथ आचरणशीलता, व्यवहारशीलता तथा नैतिकता की शिक्षा की जरुरत पहले से कही ज्यादा है। क्यूंकि आज का समाज सांस्कृतिक और सूचनात्मक प्रदूषण का शिकार है। हर तरफ से, हर किसी को अपने स्तर से प्रयास और योगदान करना होगा, ऐसी घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए और एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए। वरना ऐसी घटनाये रोज होंगी और किसी दिन आपके या हमारे परिवार की बच्ची इस घिनौने जुर्म की शिकार होगी। इसलिए समय रहते अपने परिवार से सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाइए। क्योंकि अब महज स्त्रियों को सक्षम व सशक्त बना देने से इसपर लगाम नहीं लगेगा जबतक कि संरक्षण देने वाला और ऐसा करने वाला यह ना समझ जाए की यह काम गलत है और यह एक अपराध है।

शालिनी श्रीवास्तव

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