महामंडलेश्वर दाती महाराज: भारतीय ऋषि परम्परा के सशक्तहस्ताक्षर

महामंडलेश्वर दाती महाराज: भारतीय ऋषि परम्परा के सशक्तहस्ताक्षर

भारतीय संस्कृति की आत्मा धर्म है। धर्म मानवीय जीवन की कुंजी है। इसका सामयिक और इहलौकिक ही नहीं, अपितु सार्वकालिक एवं सार्वदेशिक महत्व है। जितना धर्म का महत्व है उतना ही धर्मगुरुओं का भी महत्व है, जिन्होंने अपनी कठोर साधना एवं उद्देश्यपूर्ण जीवन जीकर जन-जन का कल्याण किया है। ऐसे ही मानव से महामानव बने तपस्वी एवं साधकपुरुषों में एक अलौकिक एंव दिव्य नाम है महामंडलेश्वर दाती महाराज। उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को जिस चैतन्य एवं प्रकाश के साथ जीया है, वह भारतीय ऋषि परम्परा के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। उन्होंने स्वयं ही प्रेरक जीवन नहीं जीया, बल्कि जन-जन के जीवन को ऊंचा उठाने का जो हिमालयी प्रयत्न किया है, वह भी अद्भुत, आश्चर्यकारी एवं प्रेरक है। उनकी मानवीय संवेदना ने पूरी मानवता को करुणा से भिगोया है। वे व्यक्ति नहीं, स्वयं में एक आन्दोलन है। वे धर्म, दर्शन, साहित्य, संस्कृति, सेवा, संस्कार एवं जीवन निर्माण के ऋषिपुरुष हैं। उनकी सारी सोच, संकल्प एवं सपने मानवीय मूल्यों के विकास एवं मानवता के अभ्युदय से जुड़े हैं।

मैं दाती महाराज को केवल श्रद्धा की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि तर्क की दृष्टि से भी देखता हूं, उनमें चैतन्य है, आध्यात्मिक विकास है, असंख्य व्यक्तित्वों का निर्माण है, साधना की अमाप्य ऊंचाइयां हैं।  वे महानिर्वाणी अखाड़े के महामंडलेश्वर हैं। ज्योतिष की दुनिया में उन्होंने काफी शोहरत पाई है। शनि का जीवन में महत्व स्थापित करके वे लोकप्रिय गुरु के तौर पर जाने जाते हैं। पर उनके जीवन में एक और पहलू है, जिससे कि कम लोग ही वाकिफ हैं। संतों के सार्वजनिक जीवन में कई कार्यक्रम होते रहते हैं, इनकी पहचान कई बार उनके सामाजिक सरोकार से बन जाती है। शक्ति के बिना शांति नहीं- उनकी साधना का सूत्र है, वही सेवा के बिना भी वे सत्संग को वे अधूरा मानते हैं। उनके तेजस्वी व्यक्तित्व के प्रति जन-जन की श्रद्धा प्रणत है क्योंकि उनके जीवन का हर पक्ष अपने-आप में एक सन्देश है, कर्तृत्व की हर दिशा भविष्य की उज्ज्वल संभावनाओं की दस्तक देती है, जिसकी अनुशासना एवं साधना का हर क्षण सबके आत्म-विकास का माध्यम बनती है।

दाती महाराज का जन्म 10 जनवरी 1950 को शौर्य एवं वीरता की धरती राजस्थान के पाली जिले के छोटे-से ग्राम अलवास में एक साधारण परिवार में हुआ। उन्होंने चार महीने की उम्र में अपनी मां को खो दिया और अपने शुरुआती वर्षों में कई मुश्किलों का सामना किया। मातृत्व प्रेम खोने के दर्द को महसूस करना आसान नहीं है। उन्होंने सात साल की उम्र में सर्वशक्तिमान की कृपा प्राप्त करने की खोज के लिए सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया। कठोर साधना, परिश्रम एवं लगन से उन्होंने दिव्य ज्ञान हासिल किया। उन्होंने संकल्प लिया कि जो भी ज्ञान  प्राप्त किया है, उसका लाभ अधिकतम लोगों तक पहुंचायेंगे। उनके जीवन की बड़ी उपलब्धियां हैं कि उन्होंने ज्योतिष एवं शनि भगवान को लेकर समाज में व्याप्त गलत धारणाओं एवं मिथ्या बातों का निराकरण करके इन्हें जन-जन के लिये उपयोगी सिद्ध किया।

दाती महाराज कहते हैं कि व्यक्ति शनि पीड़ा से ग्रसित नहीं होता बल्कि अपने कुकर्मों से ग्रसित होता है। महाराज सवाल करते हैं कि क्या गर्भ में बेटियों को मारने वालों को सजा नहीं मिलनी चाहिए? क्या देश के प्रति वफादार नहीं रहने वालों को दंड नहीं मिलना चाहिए? वे कहते हैं कि शनि की कृपा प्राप्त करनी है तो अपने राष्ट्र और माता-पिता के प्रति वफादार होना चाहिए। कुंडली में शनि की प्रतिकूल स्थिति पर वे कहते हैं कुंडली में शनि कभी प्रतिकूल नहीं होते। दरअसल, हमारे कर्म प्रतिकूल होते हैं। शनि तो सौहार्द, सुख और परम सौभाग्य के दाता हैं, भाग्य विधाता हैं, कर्म के दाता हैं, परम न्यायाधीश हैं। अत: उनसे डर कैसा? लोगों को इस भ्रम से बाहर आना चाहिए। इन्हीं उद्देश्यों एवं अपने ज्ञान के प्रकाश को फैलाने के लिए उन्होंने व्यापक प्रयत्न किये। दुखी चेहरे पर मुस्कुराहट लाने में उन्हें बहुत संतुष्टि और खुशी मिलती है, इसलिये वे  लाखों लोगों के लिए उम्मीद की किरण बने हैं।

शुद्ध आचार, विचार और व्यवहार से जुड़ी दाती महाराज की ऐसी अनेक चारित्रिक व्याख्याएं हैं जिनमें जीवन और दर्शन का सही दृष्टिकोण सिमटा हुआ है। उनमें जागतिक समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता है। मंत्र, तंत्र, यंत्र से जुड़ी साधना और आत्म-अनुभव के बल पर उन्होंने अनेक सिद्धियां प्राप्त की हैं। एक सशक्त लेखक और एक प्रभावी प्रवचनकार के रूप में उनकी प्रतिभा अलौकिक और अद्वितीय है। यो तो उनकी प्रतिभा हर क्षेत्र में अतुलनीय है, चाहे योग साधना हो, दार्शनिक या ज्योतिषीय विश्लेषण हो, यंत्र-मंत्र-तंत्र साधना हो, वे एक सार्वभौमिक व्यक्तित्व हैं। आयुर्वेदिक ज्ञान और भौतिक क्षेत्र के विभिन्न विषयों पर उनके व्याख्यान और लिखित साहित्य जन-जन का मार्गदर्शन कर रहा है। उनके मुख्य तीन दृष्टिकोण हैं-माता की मां के प्रति वफादार रहें, अभिभावकों को सम्मान और सेवा प्रदान करें एवं किसी एक से सच्चाई के साथ विवाह गठबंधन में रहना चाहिए। उन्होंने अपने जीवन में  ट्रिपल एस-सेवा-सत्संग- सुमिरान को महत्व दिया है। बिना पारिश्रमिक के सेवा करना चाहिए। सत्संग के रूप में सभी धर्मों का आदर करना चाहिए एवं खुद को जानने के लिये सुमरिन- ईश्वर की भक्ति जरूरी है।

दाती महाराज आत्म-कल्याण के साथ-साथ समाज कल्याण को जरूरी मानते हैं। वे आत्मदृष्टा ऋषि हैं। वे चाहते हैं कि उनके अनुयायी भौतिकता में रहकर भी आत्मा की परिधि में रहें।  यही कारण है कि समाज के लिए कुछ करने की अभिलाषा उनके मन में सदैव रहती है। इसी उद्देश्य से 1999 से ही एक ऐसी जिम्मेदारी को निभा रहे हैं, जिसे आज तक हजारों बच्चों को प्रेम, सहयोग और सामथ्र्य की ममता का लाभ मिला है। सेवा-सत्संग और सुमिरन से वे संत जीवन जीते हैं तो ममता-मोह और मार्मिक भाव से अनाथ और गरीब बच्चों की सेवा करते हैं। 750 बच्चे हर साल दाती महाराज के जोधपुर के पास बने आश्वासन गुरुकुल सीनियर सेकेंडरी स्कूल में जीवन को संवारने का मौका पाते हैं, वे भी बिना किसी शुल्क के, मुफ्त में पढऩा, रहना और खाना। यह स्कूल आवासीय है। यहां ऐसे ही बच्चों को दाखिला मिलता है, जो या तो अनाथ हैं या माता या पिता से महरूम हैं और सबसे खास बात यह है कि यह गुरुकुल केवल बच्चियों या लड़कियों के लिए खोला गया विद्यालय है। आश्वासन बालग्राम आज 350 एकड़ में विशाल वटवृक्ष बन गया है। आज यह विद्यालय एक बड़े कॉलेज में तब्दील हो चुका है, जहां ग्रेजुएशन से जुड़े कोर्स और बीसीए जैसे तकनीकी शिक्षा भी प्रदान की जाती है। पिछले साल दाती महाराज ने एक अस्पताल का अनावरण किया, जहां गरीबों का इलाज मुफ्त होता है।

दाती महाराज पिछले कई सालों से एक और प्रेरणा को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। कन्या भू्रणहत्या की सामाजिक समस्या पर वे पिछले 21 सालों से कार्य कर रहे हैं और अपने जन्मदिन को वे भू्रणहत्या संरक्षण दिवस के तौर पर सादगी से मनाते हैं। इस खास आयोजन के इस बार 21 साल पूरे हुए, इसलिए समाज को एक प्रेरक संदेश देने के लिए दाती महाराज ने 21वां दाती कन्या भू्रण संरक्षण दिवस पर दिल्ली के श्री सिद्ध पीठ शक्तिधाम में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत बने। इसके साथ ही कार्यक्रम में कई केन्द्रीय मंत्री, राज्यपाल और समाज के अनेक क्षेत्रों से जुड़ी हस्तियां तथा संत समाज के भी कई माननीय महामण्डलेश्वरों तथा कई महान संतों ने शिरकत की।

दिल्ली में स्थित दाती महाराज का आश्रम श्री सिद्ध शक्ति पीठ शनिधाम ट्रस्ट अनेक सेवा योजनाएं संचालित कर रहा है। करीब एक हजार छात्राओं को सोलर लाइट, सोलर पंखा और स्कूली बैग, कॉपी-किताब ट्रस्ट की ओर से वितरण किया गया और दौ सौ दिव्यांगों को वीलचेयर, ट्राई साइकलों का भी वितरण किया। महिला सशक्तिकरण के तहत 500 विधवा महिलाओं को सिलाई मशीनों का वितरण श्री शनिधाम ट्रस्ट द्वारा किया गया। परमहंस दाती महाराज के सामाजिक और आध्यात्मिक कार्यों ने उन्हें दुनिया भर में लोकप्रिय बना दिया है। वे एक महान विभूति हैं। वे अध्यात्म की उच्चतम परम्पराओं, संस्कारों एवं महत जीवन-मूल्यों से प्रतिबद्ध एक महान् व्यक्तित्व हैं। उनमें त्याग, तपस्या और तेजस्विता का अप्र्रतिम समन्वय है। उनकी वैचारिक उदारता, ज्ञान की अगाधता, आत्मा की पवित्रता, सृजन-धर्मिता, सेवा-भावना और विनम्रता उन्हें विशिष्ट श्रेणी में स्थापित करती है।

ललित गर्ग

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