मोदी का नेतान्याहू-ट्रंप कार्ड

मोदी का नेतान्याहू-ट्रंप कार्ड

पिछले तीन वर्षो में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा की गई साठ विदेश यात्राओं के बारे में काफी  कुछ कहा गया है। अमेरिका सहित पश्चिम के कुछ देशों ने तो उन्हे वीजा देने तक से मना कर दिया था, लेकिन अब-तक प्रधानमंत्री मोदी ने सबसे अधिक दौरा इन देशों का ही किया है। जब यही पश्चिमी देश प्रधानमंत्री मोदी को वीजा देने से मना कर रहे थे तब इजरायल ने नरेन्द्र मोदी का गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में स्वागत किया था और इसी देश का दौरा करने में हमारे प्रधानमंत्री ने तीन साल लगा दिये। प्रधानमंत्री मोदी इजरायल का दौरा पहले भी कर सकते थे, लेकिन नौकरशाही और परंपरायें इनकी राह का रोड़ा बनती रहीं।   इजरायल और भारत के बीच लंबे समय से कूटनीतिक और सामरिक संबन्ध रहे हैं, जो अब प्रधानमंत्री के इस दौरे से जग-जाहिर हो जाता है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि अमेरिका की यह यात्रा दर्शाती है कि भारत-अमेरिका सुरक्षा सहयोग कितना महत्तवपूर्ण है और साथ ही इजरायल भी इसका एक आवश्यक हिस्सा है। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुये यह कहा जा सकता है कि मोदी सरकार की विदेश नीति सही दिशा में आगे बढ़ रही है। यदि हाल ही में प्रधानमंत्री के अमेरिका दौरे को संज्ञान में ले तो ट्रंप प्रशासन का भारत के निकट आना इस क्षेत्र के लिए शुभ संकेत है। यह संबन्ध एशियन नाटों के निर्माण में कारगर होगा, जिसके तहत इस क्षेत्र में चीन की विस्तारवादी नीति को रोका जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने इस सफल अमेरीकी दौरे से दोनों देशों के संबन्धों को एक नयी उड़ान देने में मदद की है।

विरोध करने वाले कुछ भी कह सकते हैं, लेकिन यह पहली बार है कि भारत के किसी प्रधानमंत्री ने अमेरीकी राष्ट्रपति के साथ ‘रोज गार्डेन’ में अपना साझा वक्तव्य दिया। मोदी का तीन बार ट्रंप को गले लगाना यह साफ दिखलाता है कि वह निर्भय होकर कोई भी कदम उठाने में मोदी सक्षम हैं और इससे पता चलता है कि हमने एक मजबूत नेता को अपना नेतृत्व सौपा है। पूर्व में नजर डालें तो ट्रंप की दूसरे देशों के नेताओं से हुई मुलाकातें काफी असहज माहौल में हुआ करती थी। लेकिन नरेन्द्र मोदी के साथ उनकी बैठक काफी  शांत ढ़ंग से हुई। ट्रंप भी नरेन्द्र मोदी के साथ काफी सहज दिख रहे थे। यह सहजता और भी प्रगाढ़ दिखी जब दोनों नेताओं ने पाकिस्तान द्वारा फैलाये जा रहे आतंकवाद के मुद्दे को बढ़-चढ़ कर उठाया। अब तो अमेरिका को भी विश्व स्तर पर भारत की ताकत का आभास होने लगा है। भारत और अमेरीका के ये गहरे होते संबन्ध ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाते है जब सिक्किम के निकट भुटान-भारत और चीन बार्डर से सटे हिस्से को चीन बलपूर्वक हथियाने का प्रयास कर रहा है। यदि इस कदम के द्वारा चीन, भारत की अमेरिका से बढ़ती नजदीकियों के कारण धमकाना चाहता है तो अब चीन को समझ लेना चाहिए कि वह असफल हो चुका है। चीन का उत्तर कोरिया के पक्ष में खड़ा होना अमेरिका को लगातार उकसाने जैसा है। यही कारण है कि अमेरिका ने हाल ही में दो चीनी नागरिकों और एक शिपिंग कंपनी पर प्रतिबंध लगा दिया, जो अभी एक आरंभ है।

यह तो बिल्कुल साफ है कि चीन एक सैन्य-शक्ति है और अमेरिका इस पर सैन्य कार्यवाही नहीं कर सकता। लेकिल चीन का हिन्द-महासागर में बार-बार दखल देना सभी के लिए चिन्ता का विषय है। दोनो देशों की साझा वार्ता के समय चीन के प्रति अमेरिका का गुस्सा साफ देखने को मिला जब अमेरिका ने भारत का ‘बेल्ट एंड रोड’ के प्रति विरोध का समर्थन किया। व्हाईट हाउस में मोदी और ट्रंप की हुई मुलाकात के समय ट्रंप ने कहा कि भारत और अमेरिका के संबन्ध सबसे उच्चत्तम स्तर पर है जो दोनों लोकतांत्रिक देशों के लिये अच्छा समाचार है। मोदी और ट्रंप दोनों विश्व स्तर के नेता है, दोनों के साथ लोगों की भावनायें जुड़ी हुई हैं। जहां एक तरफ मोदी विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के नेता है, वहीं ट्रंप विश्व के पुराने लोकतंत्र का नेतृत्व करते हैं।

विश्व के दो महान लोकतंत्र भारत और अमेरिका आतंकवाद से लड़ रहे हैं। इस संबन्ध में यह खुशी की बात है कि दोनो देश एक साथ आतंकी संगठनों का खात्मा करने की ओर अपना कदम बढ़ा रहे है। अमेरिका और भारत ने पाकिस्तान को कड़े शब्दों में चेता दिया है कि पाकिस्तान अपनी जमीन से भारत में आतंकवाद फैलाना बंद करे और इस्लामिक स्टेट, जैश-ए-मुहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और डी कंपनी जैसे संगठनों पर सख्त कार्यवाही करे। इसी क्रम में भारत अमेरिका की सहायता से हिजबुल प्रमुख सैयद सलाहुदिन को ‘ग्लोबल आतंकी’ घोषित करवाने में सफल रहा। यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि डोनाल्ड ट्रंप उन सभी मुद्दों को हल करने से पीछे नहीं हट रहे जिसे बराक ओबामा सहित अन्य अमेरिकी नेता छूने से बचते थे। अब हमे यह मान लेना चाहिए कि भारत और अमेरिका के संबन्ध अपने चरम पर है, जो दोनों देशों के भविष्य के लिए अच्छा है। यहां हमें यह नहीं भुलना चाहिए कि 2016 में हिजबुल कमाण्डर बुरहान वानी को भारतीय फौज द्वारा मार गिराये जाने पर पाकिस्तान ने अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्यों को इस मुद्दे की ओर झुकाने का भरपूर प्रयास किया था। लेकिन उसमें भी वह असफल ही हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री की यह मुलाकात काफी सक्रिय रहीं, जिसमें काफी उत्साहवर्धक बातें निकलकर सामने आयीं। हमे प्रसन्नता होनी चाहिए कि हमारे प्रधानमंत्री को अभूतपूर्व सम्मान मिला। आशा करते हैं कि अमेरिका की यह यात्रा आगे आने वाले भविष्य में भारत को विश्वगुरू बनाने में सहायक होगी।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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