आत्मा क्या है?

आत्मा क्या है?

मनुष्य का विश्लेषण कर ऋषियों ने यह खोज निकाला कि व्यक्तित्व के पांच स्तर भौतिक हैं और भौतिक अपने आप में जड़ और अचेतन है। यद्यपि व्यक्ति भौतिक तत्वों से निर्मित है किन्तु यह चेतन है और अपने आस-पास के संसार के प्रति सचेत है। अत: इसका अर्थ यह है कि मनुष्य भौतिक तत्व के अतिरिक्त कुछ और है जिसके कारण वह चेतन है। यह चेतन तत्व आत्मा या ईश्वर है। यह चुम्बक में चुम्बकीय शक्ति की भांति है। चुम्बक उस लोहे से भिन्न होता है जिसमें चुम्बकीय शक्ति होती है।

आत्मा इन्द्रियों को वह शक्ति प्रदान करती है जिससे उन्हें विषयों का बोध होता है। उसी की शक्ति से मन अनुभव करता है और बुद्धि विचार करती है। अत: शास्त्रों में उसे शरीर, मन और बुद्धि में क्रमश: प्रत्यक्ष करने वाली, अनुभव करने वाली और विचार करने वाली कहा गया है। वह बिजली की भांति भिन्न-भिन्न रुप से अभिव्यक्त होती है।

अत: आत्मा स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों से अथवा भौतिक पंचकोशों से भिन्न कहा गया है। यह चेतना की जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्त अवस्थाओं का साक्षी तथा इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष करने वाला है। वह मन में अनुभव करने वाला और बुद्धि में विचार करने वाला है।

स्थूल शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियां (नेत्र, कर्ण, नासिका, जिव्हा और त्वचा) तथा पांच कर्मेन्द्रियां (हाथ, पैर, वाणी, उपस्थ और गुदा) होती हैं। इन्हीं के माध्यम से व्यक्ति बाह विषयों के संसार के संपर्क में आता है और सुख-दु:ख का अनुभव करता है।

सूक्ष्म शरीर मनोमय और विज्ञानमय कोशों से निर्मित है। इसमें मन के संवेग और अनुभव तथा बुद्धि के विचार और सिद्धांत रहते हैं। ये सभी भाव या वृत्तियां हैं। अत: सूक्ष्म शरीर भावात्मक होता है, जैसे आभूषण स्वर्ण के और घड़े मिट्टी के बने होते हैं।

फिर भी, विचार या भावों के कार्यभेद के कारण अन्त:करण के चार भाग किये गये है-

  1. मन २. बुद्धि ३. अहंकार ४. चित्त

ये चारों मिलकर हमारे आंतरिक उपकरण अर्थात् अन्त:करण कहलाते हैं और इनके विपरीत हमारी दस इन्द्रियां बाहकरण हैं। ये चारों एक ही तत्व के कार्य भेद से चार नाम हैं।

साभार: जीवन ज्योति

स्वामी चिन्मयानन्द

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