भारतीय कृषि सफलता की विफलता

भारतीय कृषि  सफलता की विफलता

साठ के दशक में ‘प्रोफेट ऑफ  डूम’ के  नाम से प्रसिद्ध पैडॉक ब्रदर्स, पॉल और विलियम ने भविष्यवाणी की थी कि अनाज की कमी भारत को विपत्ति की ओर ले जाएगी। स्टैंडफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पाल एलरिक ने 1968 में लिखी अपनी किताब ‘द पॉपुलेशन बम’ में यह चेतावनी दी थी कि  भारत जैसा देश जनसंख्या में हो रही लगातार वृद्धि के कारण सत्तर और अस्सी के दशक में भुखमरी की चपेट में आ सकता है।

यह भविष्यवाणी उस समय की गई थी जब भारत को 1965-66 में सुखे के कारण बाहर से एक करोड़ टन अनाज आयात करना पड़ा था। यह भविष्यवाणी करते समय उन्हें कहां पता था कि जहां 1962-63 में भारत में अनाज की पैदावार लगभग 1.12 करोड़ टन थी वह किसानों के नई टेक्नोलाजी के प्रयोग से अगले दस वर्षों में 2.49 करोड़ टन हो जाएगी। 2007 तक के आए आंकड़ों के अनुसार भारत में तब से लेकर अब तक गेहूं की पैदावार 2.49 करोड़ टन से बढ़कर 7.12 करोड़ टन और चावल की पैदावार में 3.5 करोड़ टन से लेकर 9.0 करोड़ टन की बढ़ोतरी हुई है। वित्त वर्ष 2015 में भारत में अनाज की पैदावार सबसे अधिक 25.11 करोड़ टन तक पहुंच गई थी। चावल और गेहूं की पैदावार क्रमश: अब 9.07 और 10.25 करोड़ टन तक थी, जिससे भारत आज पूरे विश्व में कृषि के निर्यात के क्षेत्र में ऊपर के 15 देशों में आता है। इस पैदावार की कीमत 1.31 लाख करोड़ रु. है।

भले ही कृषि का जीडीपी में योगदान लगातार कम हो रहा है लेकिन आज भी भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान काफी महत्वपूर्ण हैं। ग्रामीण भारत में आज भी 58 प्रतिशत लोग कृषि के ऊपर निर्भर हैं। 2007 के आकड़ों के अनुसार देश के 22 से 24 प्रतिशत लोगों को रोजगार इसी क्षेत्र से प्राप्त होता है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र जैसे वानिकी, पशुधन और मत्स्य पालन का अनुमानित सकल मूल्य 2014-15 में 2011-12 के मूल्य पर 16 प्रतिशत का योगदान रहा। लेकिन आज की स्थिति में कृषि का जीडीपी में योगदान लगातार कम हुआ है फिर भी हमारे देश के 60 प्रतिशत लोग कृषि के ऊपर ही निर्भर हैं।

भारत 15.73 करोड़ हेक्टेयर भूमि के साथ दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कृषि क्षेत्र वाला देश है। भारत में कृषि अनुकूल जलवायु  वाले 20 क्षेत्र हैं और 15 मुख्य जलवायु वृत्त यहां पाए जाते हैं। इसके फलस्वरूप भारत मसाले, दाल, दूध, चाय, काजू और जूट की पैदावार में पहले स्थान पर है। गेहूं, चावल, फल, चीनी, कॉटन आदि के क्षेत्र में दूसरे पायदान पर है। भारत पूरे विश्व में सबसे अधिक आम और केले की पैदावार करने वाला देश है। भारत का कृषि निर्यात, देश के कुल निर्यात का दस प्रतिशत है।

कृषि आंकड़ों को देखें तो भारत में अब तक मात्र 58 प्रतिशत भू-भाग की सिंचाई हुई है, जिसमें 38 प्रतिशत को भू-जल और 62 प्रतिशत भाग को भूजल से सिंचाई किया गया। यही कारण है कि पूरे विश्व में भूजल सिंचाई के क्षेत्र में भारत पहले स्थान पर हैं।

भारत के कृषि क्षेत्र में विकास के उलट यदि देखें तो इस उप-महाद्वीप में विश्व के आधे भूखे लोग निवास करते हैं । दक्षिण एशिया के पांच वर्ष से कम उम्र के आधे बच्चे कुपोषण का शिकार हो जाते हैं जो सब-सहारन अफ्रीका से भी अधिक है।

देश का 65 प्रतिशत कृषि क्षेत्र एक-एक हेक्टेयर से कम के क्षेत्र में बंटा हुआ है जो लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण कम होता जा रहा है। 2001 के अंकड़ों के अनुसार देश के 49 करोड़ लोग इन्हीं छोटे-छोटे कृषि क्षेत्र के टुकड़ों पर निर्भर करते हैं, जो पूरे देश का 42 प्रतिशत है। भारत में 70 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्र में निवास करते हैं जिनमें 40 प्रतिशत वो भाग है जो आज भी सड़क से नहीं जुड़े हैं। यातायात की कमी और कटाई के बाद जमीन की उपज बढ़ाने के लिये प्रयोग की जाने वाली प्रक्रिया से देश को प्रतिवर्ष साढ़े तीन लाख करोड़ से 50 हजार करोड़ का नुकसान होता हैं। इसके पीछे कई कारण हैं जिनमें एक है सरकारी खरीद में पक्षपात होना। सरकार सबसे अधिक अन्न की खरीद पंजाब, हरियाणा, आंध्र प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से करती है, जो कुल खाद्यान्न का 83.51 प्रतिशत है। 1990-91 में जो खाद्य सब्सिडी 24 हजार पांच सौ करोड़ की होती थी वह 2016 तक दो लाख तीस हजार करोड़ की हो गयी। एफसीआई को अंतिम विकल्प बनाने की बजाय, यह किसानों की पसंद बन गया, सरकार को इसमें सुधार लाने की आवश्यकता है।

किसानों को रसायन और बिजली में दी जाने वाली सब्सिडी जो 1992-93 में 73 हजार करोड़ थी वो बढ़कर 3 लाख चार हजार करोड़ रु. तक पहुंच गई है।

सब्सिडी लागू करने का असल कारण निम्न वर्ग के किसानों तक पहुंचना था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं, इसका फायदा केवल बड़े किसानों को ही हुआ है। नि:शुल्क बिजली ने भूजल को अधिक कम कर दिया है। कृषि के क्षेत्र में निजी निवेश छठी पंचवर्षीय योजना से घटा है। जो निवेश 1985-90 में 64 हजार करोड़ था वो अब 49 हजार करोड़ से भी कम हो चुका है। सकल पूंजी निर्माण में जहों कृषि का शेयर साढ़े पंद्रह प्रतिशत था वो 2001 तक सात प्रतिशत तक रह गया।

वर्ष 2050 तक भारत की जनसंख्या एक अरब सत्तर करोड़ तक हो जायेगी, जो कि चीन और अमेरिका की जनसंख्या के योग के बराबर होगा। क्या भारत 1.7 अरब लोगों को खिला पायेगा? इन चार दशक में हरियाणा और पजाब में होने वाली गेहूं की पैदावार में नौ गुना की बढ़ोतरी हुई है और चावल की पैदावार में तीस गुना की बढ़ोतरी हुई है। अत: ये दो राज्य और आंध्र प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के कुछ भाग के लोगों के पेट भरने के लिये काफी है। 2050 में जो भारत की जनसंख्या 1.7 अरब की होगी, उसे खिलाने के लिये 22.5 से 23 करोड़ टन पैदावार की आवश्यकता होगी, जबकि 2014-15 के आंकड़ों के अनुसार भारत में अन्न की पैदावार 25.1 करोड़ टन है।

उपरोक्त बातों से यह साफ है कि अधिक मात्रा में पैदावार के कारण ही किसानों को अच्छी रकम नहीं मिल पा रही है। और इन आंकड़ों को देखते हुए यह पता चलता है कि भारत के किसान आगे भी लोगों के पेट से अधिक मात्रा में पैदावार करते रहेंगे। अत: अन्न की पैदावार इस देश के लिये कोई बड़ी बात नहीं है, बल्कि गरीबों को आर्थिक ताकत संपन्न करना बड़ा मुद्दा है।

मुख्य बात यह है कि सरकार की फसलों के मूल्य को अपने नियंत्रण में रखने का कारण इसके द्वारा शहरों में रहने वाले नागरीकों को सबसे अधिक तवज्जो दिया जाना है। किसान को मोटरसाइकल और ट्रैक्टर खरीदना होता है तो उसे उतना ही धन देना पड़ता है जो पूरे विश्व में चलता है। अत: प्रश्न यह खड़ा होता है कि आखिर इन बड़ी कंपनियों को किसान अपना फसल अपने पेट पर लात मारकर इतने कम मूल्य में क्यों दें?

 

मोहन गुरुस्वामी

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