क्या कश्मीर में बकरा पार्टी की लड़ाई अपने अंतिम दौर में पहुंच गई है?

क्या कश्मीर में बकरा पार्टी की लड़ाई अपने अंतिम दौर में पहुंच गई है?

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद हिन्दुस्तान के पहले शिक्षा मंत्री थे। इससे पहले वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रधान भी रह चुके थे। मुसलमानों के वे बहुत बड़े नेता थे। उन्होंने भारत विभाजन का विरोध किया था। यही कारण था कि वे विभाजन के बाद पाकिस्तान नहीं गए और उन्होंने हिन्दुस्तान में रहना ही उचित समझा। हिन्दुस्तान ने भी उन्हें मुल्क का शिक्षा मंत्री बना कर उनका सम्मान किया। भारत विभाजन का विरोध वे दो कारणों से करते थे। उनका कहना था कि हिन्दुस्तान के जिस हिस्से को पाकिस्तान बनाया जाएगा, वहां तो पहले से ही मुसलमानों का राज है। अस्सी प्रतिशत मुसलमान वहां हैं। देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था भी लागू हो जाएगी तब भी वहां मुसलमानों का ही राज रहेगा। इसलिए पाकिस्तान बनाए जाने वाले इलाके में मुसलमानों के लिए भयभीत होने की कोई वजह नहीं है। लेकिन मुस्लिम बहुल इलाके हिन्दुस्तान में से निकल जाने के कारण, शेष बचे हिस्से में मुसलमानों की संख्या बहुत कम रह जाएगी। इसलिए आजाद हिन्दुस्तान में उनकी हैसियत में बहुत फर्क पड़ जाएगा। लेकिन उन दिनों मुसलमानों का नेतृत्व जिनके हाथ में था, उन्होंने मौलाना की एक न सुनी। विभाजन होकर रहा। मुसलमानों द्वारा ठुकरा दिए जाने के बावजूद मौलाना शेष बचे हिन्दुस्तान में मुसलमानों के हितों की अनदेखी नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने पाकिस्तान में न जाकर यहीं रहकर मुसलमानों के हितों के लिए लडऩा ज्यादा बेहतर समझा। लेकिन इसके साथ ही मौलाना ने हिन्दुस्तान में मुसलमानों की संरचना पर एक बहुत ही महत्वपूर्ण टिप्पणी की जिसकी ओर बाद के अध्येताओं ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। यह अनजाने में भी हो सकता है या फिर जानबूझकर कर भी हो सकता है। लेकिन भारत में मुसलमानों के बारे में, उनके व्यवहार या सामाजिकता के बारे में अध्ययन करने से पहले मौलाना की यह टिप्पणी धरातल का काम कर सकती है। मौलाना ने लिखा है, ‘हिन्दुस्तान के 95 प्रतिशत मुसलमान हिन्दुओं की औलाद हैं। पांच प्रतिशत मुसलमान विदेशी विजेताओं के साथ आए थे। बाद में वे पांच प्रतिशत मुसलमान, जिनमें मेरा परिवार भी शामिल है, यहां हिल मिल गए।’ कितने हिल मिल गए, यह प्रश्न विवाद का नहीं है। यदि वे ऐसा कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे। लेकिन एक तथ्य उन्होंने लिखना शायद मुनासिब नहीं समझा। वह यह कि ये पांच प्रतिशत मुसलमान जिनके पूर्वज हिन्दुस्तान को जीतने के लिए आए थे और उन्होंने उसे सचमुच जीत भी लिया था, अभी भी अपने आपको 95 प्रतिशत हिन्दुस्तानी मुसलमानों, जो असल में हिन्दुओं की ही औलाद हैं, का नेता मानते हैं। इनको लगता है कि इन हिन्दुओं की औलाद का नेतृत्व करने और इन्हें मार्गदर्शन प्रदान करने का खुदाई अधिकार इनके पास है। वे पूरे हिन्दुस्तान के नेता हैं, ऐसा तो वे अब सोच नहीं सकते। खासकर पाकिस्तान बनने के बाद तो बिल्कुल ही नहीं। लेकिन इन हिन्दुओं की औलादों के वे नेता हैं, यह बात उनके मनोविज्ञान में से नहीं निकलती। इस मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि में कश्मीर घाटी में पनप रही आतंकवाद की समस्या को समझना होगा।

जम्मू-कश्मीर में केवल कश्मीर घाटी की चर्चा करना ही बेहतर होगा क्योंकि प्रदेश के केवल इस हिस्से में ही आतंकवाद का असर देखा जा सकता है। यह अलग बात है कि कश्मीर घाटी में भी, यह समस्या दक्षिणी कश्मीर के केवल चार जिलों तक सीमित है। कश्मीर घाटी के मुसलमानों की जनसंख्या भी, मौलाना के शब्दों का ही सहारा लेना हो तो, 95 प्रतिशत हिन्दुओं की औलाद है और पांच प्रतिशत उन मुसलमानों की, जिनके पूर्वज कश्मीर को जीतने आए थे और उसे जीत कर यहीं बस गए। जीत कर यहीं बसने वाले अपनी पहचान छिपाते भी नहीं। वे गौरव से उसका प्रदर्शन करते हैं। सैयद तो इसमें सबसे आगे हैं। वे अरब के सम्मानित कबीले से ताल्लुक रखते हैं। इसलिए अपने नाम के आगे बाकायदा लिखते हैं ताकि कोई गलती से भी उनको कश्मीरी न समझ ले। बाकी जो जिस देश से आया है या उसके जिस स्थान विशेष से आया है, उसकी पूंछ अभी भी अपने साथ चिपकाए घूमता है। मसलन गिलानी, हमदानी, करमानी, खुरासानी इत्यादि। कश्मीरी को डराने के लिए या फिर हर पल उनको याद दिलाने के लिए कि हमारे बाप दादा ने तुम्हारे बाप दादा को पराजित किया था। वे कश्मीरियों में हिलमिल पाए या नहीं, यह विवादास्पद है। सच तो यह है कि उनकी इच्छा कश्मीरियों में हिल मिल जाने की कभी थी ही नहीं बल्कि वे तो यह कोशिश करते रहे कि 95 प्रतिशत कश्मीरी इन पांच प्रतिशत में घुलमिल जाएं और चिनारों के विशालकाय पेड़ों को खजूर के पेड़ कहना शुरु कर दें। शारीरिक तौर पर कश्मीरियों ने चाहे इनके आगे पराजय स्वीकार कर ली लेकिन मानसिक रूप से कश्मीरियों ने इनके आगे हथियार नहीं डाले। किंतु वे अपने आपको आम कश्मीरी से श्रेष्ठ समझते हैं। कश्मीरियों को नियंत्रित करने  के लिए वे समय-समय पर अनेक तरीके इस्तेमाल करते रहे हैं और अभी भी करते रहते हैं। मस्जिदों पर नियंत्रण और उनका अपनी रणनीति को आगे बढ़ाने में प्रयोग करना, सबसे प्रभावशाली तरीका है।  कश्मीर घाटी में प्रत्येक छोटी-बड़ी मस्जिद का एक वाईज होता है। सीधी-साधी भाषा में कहा जाए तो वह मस्जिद का इन्चार्ज होता है और मस्जिद में नमाज इत्यादि पढ़ाने के अलावा हम मजहबों को उपदेश भी देता है। कभी-कभी फतवे भी जारी करता है। अपने उपदेश में वह केवल मजहबी नुक़तों पर बात करेगा, ऐसा कुछ नहीं है। अनेक बार तो वह मजहब को छोड़ कर बाकी सभी मुद्दों पर धुंआधार आग उगलता है। श्रीनगर की  मस्जिद जामिया मस्जिद बहुत बड़ी मस्जिद है, इसलिए इनके वाईज भी साधारण वाईज न होकर मीरवाइज कहलाते हैं। इस्लामी देशों के आक्रमणों के बाद जब कश्मीर घाटी में मस्जिदें बननी शुरु हुईं तो जाहिर है उनके मीरवाइज भी बाहर से आने वाले अरबों, तुर्कों, पठानों और मध्य एशियाई कबीलों के मौलवी बनाए गए। ताकि इन मीरवाइजों के माध्यम से कश्मीरियों को नियंत्रण में रखा जा सके। ऐसे प्रयास इस्लामी विजयों के शुरुआती दौर से ही किए गए। लेकिन कश्मीरियों ने जितना संभव हो सका, अपने तरीके से इसका विरोध किया। उन्होंने अपने जियारत खाने खोल लिए। कश्मीरी जियारत खानों में नतमस्तक होने लगे और मीरवाइज कश्मीरियों के इस पतन पर छाती पीटते रहे। मौलवी मस्जिद में अरबों की जीत की कहानियां सुनाते  रहे, कश्मीरी चरारे शरीफ़ में नुन्द ऋषि के आगे सिजदा करते रहे और लल्लेश्वरी के बाख रटते रहे। बाहर से आकर कश्मीर को जीतने वाले पांच प्रतिशत मुसलमानों के सैयद घाटी में छाती चौड़ी करके इतराते थे तो 95 प्रतिशत हिन्दुओं की औलाद मुसलमानों ने अपने शेख आगे कर दिए। उनके पास उंचे कद का सैयद है तो इनके पास शेख हैं। शेख वह मुसलमान है जो उंची जाति के हिन्दु से मतान्तरित हुआ है।

कश्मीर घाटी के इतिहास में कई सौ साल बाद ऐसा वक्त आखिर आ ही गया जब एक शेख ने पांच प्रतिशत के नेतृत्व को हाशिए पर धकेल कर 95 प्रतिशत हिन्दुओं की औलाद वाले कश्मीरी मुसलमानों का परचम फहरा दिया। (यह अलग बात है कि बाद में यही शेख, मोहम्मद अब्दुल्ला अपनी अलग डफली बजाने लगे) उस समय से आज तक मौलाना की शब्दावली में 95 प्रतिशत हिन्दुओं की औलाद वाले कश्मीरी मुसलमानों को शेर पार्टी कहा जाने लगा और पांच प्रतिशत बाहर से आए मीरवाइजों, सैयदों और गिलानियों की पार्टी को बकरा पार्टी कहा जाने लगा। अपने वक्त में कश्मीरी शेख अब्दुल्ला ने सब कश्मीरियों को एकत्रित करके मीरवायजों को कश्मीर घाटी में उनकी असली जगह बता दी थी। एक मीरवाइज तो भाग कर पाकिस्तान में ही चला गया। मामला यहां तक बढ़ा कि कश्मीरी अपने आपको शेर पार्टी कहने लगे और मीरवाइजों की सफों में बैठे अरबों, इरानियों, तुर्कों, पठानों और मध्य एशियाई लोगों को बकरा पार्टी कहने लगे। लेकिन मीरवाइजों के नेतृत्व में गिलानियों खुरासानियों ने कश्मीरियों पर अपना शिकंजा कसने के प्रयास निरंतर जारी रखे और वे प्रयास अब भी जारी हैं। यह कश्मीरियों का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि उनकी शेर पार्टी के  शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला अमेरिकी साम्राज्यवादियों के हाथों में चले गए, और बाद में स्वयं ही बकरा पार्टी की भाषा बोलने  लगे। यदि वे ऐसा न करते तो शायद बकरा पार्टी का कश्मीर में अन्त हो जाता और इसके चलते इतिहास भी बदल जाता। शेर जब बकरे की भाषा बोलता है तो कितना दयनीय हो जाता है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। शेख अब्दुल्ला के बाद राज्य की कमान एक दूसरे कश्मीरी बख़्शी गुलाम मोहम्मद के हाथों आई। बे अन्त तक शेर पार्टी के ही रहे और बकरा पार्टी से भिड़ते रहे। मीरवाइजों की जमात उनसे सबसे ज्यादा दुखी रहती थी। लेकिन दिल्ली की आन्तरिक राजनीति का शिकार होकर वे रुखसत हुए। उसके बाद कश्मीर की कमान उनके हाथों में ही रही जो सैद्धान्तिक रूप से बकरा पार्टी के साथ थे। फिर चाहे वे गुलाम मोहम्मद सादिक हों, या मीर कासिम हों या फिर मुफ्ती मोहम्मद सईद हों। बीच में शेख अब्दुल्ला का कुनबा सत्ता में आता रहा लेकिन वह कुनबा अपने बाप की तरह स्थिर मन न होने के कारण कभी शेर पार्टी और कभी बकरा पार्टी के बीच भागता रहा। कालान्तर में उसका एक ही मकसद बचा-किसी भी तरीके से सत्ता पर कब्जा जमाए रखना। उनके लिए सत्ता कश्मीरी अवाम की सेवा के लिए नहीं बल्कि अपने कुनबे का पेट भरने का जरिया बन कर रह गई। बकरा पार्टी का नेतृत्व इसके कारण भी वरकरार रहा। वैसे भी जब शेख अब्दुल्ला जेल में थे, तो जिस रायशुमारी फ्रंट ने जन्म लिया था, उसमें ज्यादातर बकरे ही थे। कश्मीर की वादियों को अपनी चरागाह मान कर मुंह मारने का इन बकरों को लम्बा मौका मिला। कभी जमायत-ए-इस्लामी के नाम पर, कभी हुर्रियत कान्फ्रेंस के नाम पर या फिर किसी तीसरे एवं चौथे नाम पर ये बकरे तंजीमबंद होते रहे। बकरा पार्टी कश्मीर में कोशिश करती रही कि कश्मीरी अपनी तहजीब भूल जाएं, अपनी जुबान भूल जाएं, अपने संस्कार, अपनी कश्मीरियत भूल जाएं। ये सब भूल कर वे अरबों की तहजीब सीख लें। उन्हीं की जुबान बोलने लगें। केसर की क्यारियों में खजूर उगाने लगें। लेकिन कश्मीर घाटी में इन्हें इसमें सफलता नहीं मिल सकी। ऐसे वक्त में बकरा पार्टी को शायद लगा होगा कि जिन कश्मीरियों ने विदेशी हुकुमरानों के भीषण अत्याचारों के बाद भी अपना मजहब नहीं छोड़ा है, अभी भी हिन्दु ही हैं और मंदिरों में जाते हैं, उन्हीं की छूत के चलते मतान्तरित हो चुके कश्मीरी अपनी जड़ें नहीं छोड़ रहे। आलम तो यह था कि अपने जीवन के अंतिम चरण में बकरों के साथ ही मिल जाने के बावजूद, सुपुर्द-ए-खाक हो जाने से पहले शेख मोहम्मद अब्दुल्ला अपनी आत्मकथा में गौरव से यह बताने का मोह नहीं छोड़ सके कि हम भगवान दत्तात्रेय की पूजा करने वाले ब्राह्मणों के वंशज हैं। तब बकरा पार्टी ने सरहद पार से आने वाले आतंकियों की मदद से उन सभी कश्मीरी हिन्दुओं को घाटी से बाहर कर दिया, ताकि छूत के इस कारण को ही दफऩा दिया जाए। सचमुच उन्होंने ऐसा कर दिखाया भी। उसके बाद वे कभी नुन्द ऋषि का जियारतखाना जला कर कश्मीरियों को डराते रहे, कभी जियारतखानों के खिलाफ जहर उगलते रहे लेकिन उन्हें पूरी कामयाबी कभी हासिल नहीं हुई। इसे सचमुच कश्मीरियों की बदकिस्मती कहना होगा कि उनके अपने ही कुछ लोग बकरा पार्टी के साथ मिल गए। लेकिन यह हर युग में, हर कौम के साथ ऐसा होता आया है। जयचन्दों का इतिहास पुराना है।

लेकिन अब लगता है कश्मीर घाटी में बकरा पार्टी और कश्मीरियों की शेर पार्टी की लड़ाई अपने अन्तिम चरण में पहुंच गई है। बकरों के पास उनके विदेशी आकाओं के दिए हुए हथियार हैं, सऊदी अरब से आने वाला बेपनाह पैसा है। उसी के बल पर वे कश्मीरियों को या तो चुप करा देना चाहते हैं या फिर उन्हें गोली का निशाना बना रहे हैं।

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22 जून 2017 की रात को लगभग साढ़े ग्यारह बजे कश्मीर घाटी के श्रीनगर में जामिया मस्जिद के सामने उन्मादी भीड़ ने पुलिस के उप-कप्तान मोहम्मद अयूब पंडित को पत्थर मार-मार कर मार दिया।  कहा जाता है कि वे मस्जिद के अन्दर से प्रार्थना करके आ रहे थे कि कुछ लोगों से उनकी तू-तू मैं-मैं हो गई। रमजान महीने के इस वीरवार की रात को इस्लाम मजहब में बहुत पवित्र माना जाता है। इसे शब-ए-कद्र भी कहा जाता है। अरबों में यह विश्वास है कि इसी रात को हजरत मोहम्मद को कुरान-ए-पाक का इलहाम हुआ था। दूसरे देशों के इस्लामपरस्त भी इसमें यकीन रखते हैं। बहुत से कश्मीरी भी इस बात को स्वीकार करते हैं। लेकिन उसी पवित्र रात को लगभग उसी समय एक कश्मीरी की बलि दी गई। 1998 में भी इसी दिन और इसी समय कश्मीर में बीस पंडितों को मारा गया था। कहा जाता है अयूब पंडित को  मारने से पहले उनको अलफ नंगा किया गया। नौहट्टा में जहां उन्हें मारा गया, उससे कुछ दूरी पर ही उनका घर था। जिस समय अयूब पंडित को मारा जा रहा था उस समय मस्जिद के अन्दर मस्जिद के मीरवाइज भी मौजूद थे। वैसे मीरवायज इसका खंडन करते हैं। उनका कहना है कि वे कुछ समय बाद पहुंचने ही वाले थे। वैसे यह अलग बात है कि जो लोग अयूब पंडित को दौड़ा-दौड़ा कर मार रहे थे, वे मीरवाइज के पक्ष में नारे भी लगा रहे थे। उनमें से बहुत अयूब पंडित को जानते भी थे। लेकिन बकरे खूंखार हो चुके थे। उन्हें कश्मीरियों के खून का स्वाद लग गया था। वे आदम बो, आदम बो चिल्ला रहे थे। लेकिन वह केवल भीड़ नहीं थी। इस भीड़ में बकरे थे। बकरे भीड़ में ही उचित अवसर और स्थान की तलाश में रहते हैं। यह कश्मीर घाटी में काम करने का बकरों का अपना तरीका है।

जम्मू-कश्मीर की पुलिस को अंदेशा है कि पंडित की हत्या मीरवाइज उमर फारुख के आदमियों ने की है। यह भी कहा जा रहा है कि पंडित को मीरवाइज की सुरक्षा के लिए ही तैनात किया गया था। पुलिस के उच्च अधिकारियों ने स्वीकार भी किया है कि मीरवाइज मस्जिद में अपना उपदेश देने के लिए आते हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा की व्यवस्था करना जरुरी है। कुछ साल पहले जम्मू-कश्मीर के वर्तमान विधायक सज्जाद लोन (लोन प्राचीन लावण्य जनजाति के लोग माने जाते हैं) के पिता अब्दुल गनी लोन की हत्या में भी किसी मीरवाइज का हाथ होने की आशंका थी। वैसे अब कश्मीरियों की ओर से यह सवाल भी उठाया जाने लगा है कि हुर्रियत कान्फ्रेंस के इन्हीं लोगों का समर्थन आतंकवादियों को मिलता है। इसलिए कश्मीरियों को इन हुर्रियत कान्फ्रेंसियों से सुरक्षा की जरुरत है, इसके उलट सरकार इन्हीं नेताओं को सुरक्षा प्रदान कर रही है। डी एस पी पंडित  इनको सुरक्षा देते-देते इनकी साजिश का शिकार हो गये। एक सप्ताह पहले ही आतंकवादियों ने दक्षिण कश्मीर के अनन्तनाग में घात लगा कर स्टेशन हाऊस आफिसर फिरोज धर समेत छह पुलिस वालों की हत्या ही नहीं की थी बल्कि उनका चेहरा भी क्षत- विक्षत कर दिया था। विदेशी रेगिस्तानों की धरती के जीवन मूल्यों ने इन नराधामी आतंकियों और बकरों को इतना अमानवीय बना दिया है कि वे मृतकों पर पाशविक अत्याचार करने को भी खुदा की खिदमत ही समझते हैं।

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लेकिन क्या श्रीनगर में अयूब पंडित को मध्ययुगीन बर्बरता से मारने का यह काम कश्मीर घाटी में विदेशों से संचालित आतंकवादियों और बकरा पार्टी की बढ़ती ताकत का प्रतीक है या फिर यह उनकी निराशा और अवसाद से उपजा घिनौना कृत्य है? बहुत से लोग इसका यही निष्कर्ष निकालेंगे की कश्मीर घाटी में सरकार की सत्ता का अवसान हो रहा है और जनमानस पर आतंकियों और बकरा पार्टी का प्रभाव और आतंक दोनों बढ़ रहे हैं। लेकिन यदि यह सचमुच होता तो सरहद पार से संचालित  आतंकियों को बकरा पार्टी की सहायता के लिए कश्मीरियों को मारने की जरुरत न पडती। आतंकियों का दावा है कि वे कश्मीरियों की आजादी और सुख के लिए लड़ रहे हैं। यह दावा अरब, ईरानी, तुर्क और मुगल पिछले सात सौ साल से कर रहे हैं। उनका तभी से कहना है कि वे कश्मीरियों की मुक्ति के लिए इस घाटी में आए हैं। यह सुख और मुक्ति देने के लिए लाखों कश्मीरियों को उन्होंने मौत की नींद सुला दिया। कश्मीरी मरते रहे, पिटते रहे लेकिन उन्होंने इन गिलानियों व खुरासानियों के आगे गर्दन नहीं झुकाई। कश्मीरी युवा सेना में भर्ती होने के लिए हजारों की संख्या में कतारें बांध कर खड़े होते हैं। वे सिविल सर्विस में जाने के लिए दिन-रात परिश्रम करते हैं और उसमें बड़ी संख्या में कामयाब भी होते हैं। कश्मीरी फिल्मों में काम करना चाहते हैं और अभिनय के बल पर वाहवाही लूटते हैं। दंगल की जायरा वसीम इसका उदाहरण है।  कश्मीरियों की इस हठधर्मिता के चलते बकरे आदमखोर होते जा रहे हैं। कश्मीरी अपनी गर्दन झुका लें, इसका प्रयास बकरे अभी तक कर रहे हैं। 2017 में भी उनके यह प्रयास जारी हैं। यही कारण है कि कुलगाम के बाईस साल के कश्मीरी नौजवान लेफ्टीनेंट उमर फैयाज को शादी के घर में से उठा कर उनको गोलियों से भून दिया जाता है। मकसद केवल एक ही है। कश्मीरी डर कर गिलानियो, खुरासानियों और बकरों के आगे आत्म-समर्पण कर दें। लेकिन चाहे वह अयूब पंडित हो, या फिर लेफ्टीनेंट उमर फैयाज, या फिर अनन्तनाग के वे छह सिपाही हों, वे पूरे कश्मीरियों के प्रतीक के रुप में लड़ कर शहीद हो गए पर उन्होंने कश्मीरियों का सिर नीचा नहीं होने दिया। जम्मू-कश्मीर पुलिस बल में स्थानीय लोग हैं। उसमें आम कश्मीरी है। बकरे अब आम कश्मीरी को डरा कर ही चुप कराना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने इन्सानियत की तमाम हदें पार कर ली हैं। वे पुलिस वालों के परिवार के लोगों को मार रहे हैं। वे कश्मीरियों को अपने खलीफा की झोली में डाल देना चाहते हैं। बकरे बगदादी का परचम कश्मीर घाटी में फहराना चाहते हैं। बकरे कश्मीर घाटी के हिन्दुस्तान से काट कर बगदादी की खिलाफत में शामिल करवाने का सपना पाल रहे हैं।  एक बार फिर मौलाना आजाद की शब्दावली में ही, पांच प्रतिशत बकरे 95 प्रतिशत कश्मीरी शेरों को डराना चाहते हैं। कश्मीरियों का एक ही दर्द है। उनके अपने ही कुछ लोग बकरों के साथ मिल गए हैं। यह दर्द उन्हें अन्दर ही अन्दर खाए जा रहा है। अयूब पंडित के रोते -बिलखते रिश्तेदारों के चेहरों पर यह दर्द साफ पढ़ा जा सकता है। तुर्की के कमाल पाशा अता तुर्क ने दशकों पहले जिस खलीफा और खिलाफत को नकार दिया था, घाटी में पनाहगीर के तौर पर कभी शरण पाए बकरे अब उसी घाटी से फिर खलीफा में जान डालने की कोशिश में लगे हैं। लेकिन कश्मीरी हैं कि विक्रमादित्य की तरह अपना हठ नहीं छोड़ रहे।

कश्मीरियों ने अपने जियारतखानों में जाना नहीं छोड़ा और मीरवाइजों ने अपनी मस्जिदों  से अपना फरमान जारी करना बन्द नहीं किया। इस लड़ाई में एक और कश्मीरी अयूब पंडित शहीद हो गया। उसको सलाम। आशा करनी चाहिए कि सरकार इस हत्या में मीरवाइज की भूमिका की जाच जरुर करेगी। अयूब पंडित के इस वहशियाना कत्ल पर शेख अब्दुल्ला, जिन्होंने कभी कश्मीरियों को शेर पार्टी का ब्रांड नाम दिलवाया था, के कुनबे के उमर अब्दुल्ला, जो अब अपने अब्बूजान फारुख अब्दुल्ला के साथ मिल कर बकरों की भाषा बोलने लगे हैं और पुलिस वालों को पत्थरों से मारने वालों को कश्मीरियों के नायक बता रहे हैं, ने कहा है जिन्होंने डीएसपी को मारा है, वे दोजख की आग में सड़ेंगे। उमर अब्दुल्ला के श्राप से वे दोजख की आतिश में जलते हैं या फिर मीरवाइजों के वरदान से जन्नत में आनन्द मनाते हैं, इससे इस धरती पर रहने वालों को सुकून नहीं मिलेगा। अब्दुल्ला परिवार को स्पष्ट करना होगा कि इस लड़ाई में वे कश्मीरियों के साथ हैं या फिर बकरा पार्टी के साथ?

कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

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