समाज को निगलता  शराब-रूपी  दानव

समाज को निगलता  शराब-रूपी  दानव

देश की स्वतंत्रता के साथ ही जन-जन में पैदा हुई उदात्त महत्वाकांक्षा और राष्ट्रीय गौरव की पूर्ति की भावना का पहला उफान जैसे ही शांत पड़ा, शराब पीना सामाजिक जीवन का एक स्वीकार्य चलन बन गया।  स्वतंत्रता आंदोलन के सम्मानित नेता एक-एक कर चले गए। उन्होंने स्वेच्छा से अपनी जवानी, निजी स्वतंत्रता और पारिवारिक जीवन का बलिदान देश को औपनिवेशिक शासन से आजाद कराने के लिए दे दिया था। उनके जाने के बाद युवाओं के सामने ऐसे पुरुषों और स्त्रियों का कोई उदाहरण नहीं था जो विश्वास और नैतिक कद के लिहाज से ऐसे हों जिनका वे अनुकरण कर सकें। अंग्रेजी सरकारी भाषा के साथ-साथ देश के अलग-अलग हिस्सों को जोडऩे के उद्देश्य से बोलचाल की भाषा बन गई। अंग्रेजों की विरासत के तौर पर मिली देश की शिक्षा प्रणाली ने भारतीय नौजवानों में पश्चिम जीवनशैली को अपनाने की प्रेरणा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्हें जीवन के प्रति भारतीय अवधारणा और दार्शनिक सोच-समझ तथा सांस्कृतिक विचारधारा की अपेक्षा पश्चिमी जीवनशैली की जमीनी स्तर की व्यावहारिकता ने आकर्षित किया।

अंग्रेजी अखबारों, पत्रिकाओं, उपन्यासों, और आगे चलकर सैटेलाइट टीवी ने अपनी पश्चिमी शैली और विषयों से भारतीय युवाओं की सोच-समझ पर काफी हद तक कब्जा कर लिया और उनमें पश्चिमी जगत को लेकर एक जबरदस्त उत्सुकता पैदा की। विकास के लिए जब कृषि की बजाए औद्योगिक अर्थव्यवस्था पर जोर दिया गया, तो कश लगाना और जाम छलकाना उन लोगों की पहचान बन गया जो देश के बदलते सांस्कृतिक परिदृश्य के बीच आए जब वह साहसी नई दुनिया के साथ कदम मिलाने के दौर से गुजर रहा था। शायद ही कभी किसी रोमांटिक हीरो या मर्दानगी दिखाने वाले खलनायक को किसी पत्रिका के चमकते कवर पर होंठों तले सिगरेट दबाए बगैर देखा गया हो, या फिर उसकी आंखों में मदहोशी का नशा ना सवार हो या उसके करीब जाम से भरा प्याला मौजूद ना हो।

धाकड़ फिल्मी सितारों के कट्टर फैन्स अपने पसंदीदा हीरो, या विलेन के सांचे में खुद को ढालने को बेताब थे। लिहाजा न्होंने उनकी ही तरह सिगरेट के कश लगाने और शराब पीने को अपना फैशन या स्टाइल स्टेटमेंट बना लिया। युवाओं के कमरों में जहां पहले आध्यात्मिक और राष्ट्रवादी नायकों जैसे स्वामी विवेकानंद, रविंद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी की तस्वीरें हुआ करती थीं, अब उनकी जगह उन फिल्मी अभिनेताओं या सेक्सी वैंम्प्स ने ले ली जिन्हें पर्दे पर पियक्कड़ों के तौर पर दिखाया जाता था। पिछली पीढ़ी के युवा भारतीयों ने जहां उन्हें अपना सुख-चैन सब कुछ कुर्बान कर स्वतंत्रता दिला दी थी, वहीं आज की युवा पीढ़ी ने सुख-सुविधाओं वाली जीवनशैली अपनाने की तैयारी कर ली, जिसमें साथ बैठकर शराब पीना बुनियादी जरूरत की तरह हो गया। चाहे खुशी के मौके पर उनका उत्साह चरम पर हो या सितारे गर्दिश में हों और दुखों का पहाड़ टूट पड़ा हो, शराब में उन्हें एक सहारा भी दिखा और भरोसेमंद साथी भी।

 

Layout 1वैश्वीकरण और शराब उद्योग

वैश्वीकरण की शुरुआत और भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारवादी होने के समय तक, देश में शराब उद्योग को अपने पैर जमाए एक युग बीत गया था। भारत में निर्मित विदेशी शराब (ढ्ढरूस्नरु) का कारोबार धड़ल्ले से चल निकला, जिसने सस्ती ‘देसी’ शराब जैसे ‘फेनी’, ‘ताड़ी’, ‘अरक’ इत्यादि को बाहर का रास्ता दिखा दिया। आमदनी में बढ़ोतरी, ग्रामीण आबादी का तेजी से शहरीकरण, समाज में साथ बैठकर शराब पीने की बढ़ती स्वीकार्यता, युवाओं के लिए शराब पीने की उम्र को कम करने के साथ-साथ विश्व व्यापार संगठन में शराब के आयात पर पाबंदियों को काफी हद तक कम करने की प्रतिबद्धता जताने जैसी बातों का काफी प्रभाव पड़ा। बहुराष्ट्रीय शराब कंपनियों को अपने उत्पाद के लिए भारत एक आकर्षक बाजार नजऱ आया और इस देश में अपनी उत्पादन इकाइयों को लगाने के साथ ही वे इस होड़ में शामिल हो गईं। स्थानीय शराब उद्योग ने भी उभरते बाज़ार का रुख देखते ही नए उत्पाद लॉन्च कर दिए। इनमें फ्लेवरयुक्त और हल्के मादक उत्पाद शामिल थे, जिन्होंने समाज के शराब न पीने वाले तबकों के युवाओं और युवतियों को अपनी ओर आकर्षित किया।

अवसर और अनगिनत बहाने

मालदार ग्राहकों, रईसों और मशहूर हस्तियों के लिए सांस्कृतिक क्षेत्र के उन जगहों पर मयखाने खुलने लगे, जिनमें ऐसे लोगों को एक ऐसी खास और एकांत वाली जगह दिखी जहाँ घर से दूर बैठकर रंगीन जाम या बीयर के ग्लास के साथ, वे कोई समस्या सुलझा सकते थे, बिजनेस की डील कर सकते थे, आपसी झगड़ा निपटा सकते थे या अपने जानने वालों से बस मिलना-जुलना कर सकते थे। वैसे भी आप इस तरह की बातें लड्डुओं के डब्बे के साथ नहीं करते और ना ही शरबत के ग्लास लेकर कहते हैं, बधाई हो! कहते हैं क्या? आप चाहे कितना ही क्यों न सोच लें, लेकिन उसका मुकाबला जाम से जाम टकराते हुए एक सुर में ‘चीयर्स’ कहने से जो माहौल बनता है उससे नहीं हो सकता। किसी भी पब में जितना अधिक समय बिताया जाए और साथ बैठकर जितनी शराब पी जाए, पीने वाले जितना ज्यादा बकवास करें, ऐसा माना जाता है कि दोस्ती या संबंधों की गांठ उतनी ही मजबूत और गहरी होती है!

जब एक सीधा-सादा और भला इंसान किसी कुटिल कारोबारी साथी या चालबाज दोस्त से धोखा खाता है या फिर अपनी प्रेमिका के द्वारा ठुकराया जाता है, तब मनुष्यों के प्रत्याशित व्यवहार को वास्तविकता में बदलने का काम अक्सर पब ही करते हैं, जिसे वह अपने सारे गम भुलाने के लिए पहली मुफीद जगह समझता है। मय से भरे प्याले में वह अपने सारे गम डुबो देता है और ऐसा लगता है जैसे पृष्ठभूमि में कोई अदृश्य और मूक गिटार उसकी बदनसीबी पर दूर रो रहा है। प्यार से लेकर कारोबार और साजिश रचने से लेकर सौदा करने के लिए एक मंच के तौर पर लोग अक्सर अपने पसंदीदा पब को चुनते हैं। धनाढ्य और ऊंची पहुंच रखने वाले लोगों के अपने खास क्लब होते हैं जहां शानदार मौकों पर जाम टकराने के लिए दरवाजे खुलते और बंद होते हैं। किसी नौजवान के लिए यह भी फैशनेबल बन गया कि रात की पार्टी के हैंगओवर को अपने चेहरे पर लिए अगली सुबह अस्त-व्यस्त हालत में पहुंचता है। उसके चेहरे पर दिखने वाली परेशानी और तौर-तरीकों में गैज-जिम्मेदाराना रवैया भी अजीब सा नहीं लगता।

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जब मर्द अपनी हदों को पार कर रहे हों तो क्या स्त्रियां पीछे रह सकती हैं? भारतीय महिलाएं किसी भी मायने में अपने पुरुष साथियों से पीछे नहीं हैं, चाहे बात शिक्षा की हो, रोजगार की या किसी भी अन्य क्षेत्र की। इसके अलावा, वैवाहिक जीवन की बेडिय़ां भी अब टूटने लगी हैं। संयुक्त परिवार वाली व्यवस्था में किसी युवती के आने-जाने और रहने पर कड़ी निगरानी रहती थी। मगर अब यह बात बीते जमाने की हो चुकी है और बरसों पहले इसे बकवास करार दिया जा चुका है। कामकाजी महिलाएं घर से दूर अपने दोस्तों और सहकर्मियों के साथ रहती हैं। लिव-इन रिलेशन में रहने की अवधारणा जोर पकड़ चुकी है और यह एक चलन बन चुका है। मंशा और मकसद चाहे कुछ भी हो, यह चलन अभी बदलने वाला नहीं है। अपने आप को बंधनमुक्त समझने वाली किसी भी कामकाजी महिला को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि दोस्तों के साथ, चाहे वे पुरुष हों या स्त्री, एक हसीन शाम किसी पब में बिताई जाए या फिर किसी कॉफी हाउस में। यही नहीं, कहा यह भी जाता है कि आखिर लडक़े ही सारी मौजमस्ती क्यों करें?

बेशक कड़ी मेहनत से ही सही, अपनी आमदनी खुद अर्जित करने, बुजुर्ग रिश्तेदारों की निगरानी से आजादी और पारिवारिक दायित्वों से मुक्ति एक ऐसा खतरनाक कॉकटेल बन जाता है जिसके लोभ से बच पाना असंभव हो जाता है। वह भी उन युवकों और युवतियों के लिए जो अपने व्यक्तित्व को सबसे ऊपर रखते हैं और यह मानते हैं कि पश्चिम की नकल करने में कुछ भी गलत नहीं है। शुरुआत में उनमें थोड़ी हिचक भले ही हो, लेकिन शराब अक्सर उनका हौसला बढ़ा देती है और सारी सीमाओं को तोड़ देने के लिए उकसाती है। हालांकि, पतन का रास्ता अक्सर फिसलन भरा होता है। जो चीज मौज-मस्ती के तौर पर शुरु होती है, उसका नतीजा तकलीफदेह होता है और अक्सर उससे छुटकारा नहीं मिल पाता। और फिर इसमें फंसे व्यक्ति को लगता है कि वापस लौटना मुमकिन नहीं है।

शादियों में खुलेआम या छिपकर शराब पीना कई राज्यों में उसी प्रकार आम तौर पर देखा जा सकता है जिस प्रकार मर्दानगी दिखाने वाले लोग उद्दंडता में हवा में फायरिंग करते हैं। दिवाली या होली पर भी शराब पीने को बुरी नजर से नहीं देखा जाता है। नए साल का आगाज तब तक अधूरा माना जाता है जब तक कि आप किसी ऐसी शानदार पार्टी में शामिल नहीं होते जहां आधी रात का ऐलान करने वाली घड़ी की गूंज के साथ ही शैंपेन की बौतलों के ढक्कन खोले जाने की आवाज मिल जाती है! शराब के नशे पर सवार होकर आप बीते साल से नए साल में कदम रखते हैं। यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि शराब पीने को भारतीय जीवनशैली के एक सामान्य व्यवहार के रूप में स्वीकार कर लिया गया है, भले ही देश के कुछ घर ऐसे भी हैं, विशेष रूप से मध्यमवर्गीय घर, जहां शराब पीना सामाजिक बुराई माना जाता है और शराब को एक बुरी चीज समझा जाता है।

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शराब पर पाबंदी की विदाई के कारण

लोग आज भी शराब पर पाबंदी के सिद्धांत का पुरजोर समर्थन कर रहे हैं, जबकि उनमें यह उम्मीद अब बाकी नहीं रह गई है कि समाज कभी शराब की बुराई से उबर सकेगा। इस निराशा का कारण यह है कि गुजरात, बिहार, नगालैंड और मणिपुर के कुछ हिस्सों समेत केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप को छोडक़र, पूरे देश ने शराब पर पाबंदी की नीति को छोड़ दिया है। स्वतंत्र भारत की संविधान सभा ने निषेध को राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में शामिल किया था। हालांकि, व्यावहारिक तौर पर, अलग-अलग राज्यों ने यह रास्ता निकाला कि वे अपने नियम खुद बना सकें और अपने टैक्स लगा सकें। कई राज्यों को 15-20त्न राजस्व शराब पर लगाए गए टैक्स से मिलता है, जो सामान्य बिक्री कर/वैट के बाद दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है।

राज्य सरकारों के राजस्व जुटाने के लक्ष्य और स्वास्थ्य-कल्याण के कार्यक्रम विरोधाभासी हैं क्योंकि वे शराब के उत्पादन और उसकी बिक्री पर वृद्धिशील कोटा लगाकर उसकी बिक्री को बढ़ावा देना चाहते हैं। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ओर से शराब को बनाने और उसकी बिक्री को अनुमति देने के लिए दिए जाने वाले कारणों में अनेक प्रकार के बहाने शामिल हैं। इन बहानों में शराब के उत्पादन और बिक्री पर किसी नियम के अभाव में अवैध शराब की बिक्री का खतरा, पियक्कड़ों का अवैध शराब का शिकार बनना, पुलिसकर्मियों की कमी के कारण पाबंदी को लागू करने में असमर्थता तथा राज्य के पास मौजूद संसाधन की बर्बादी तथा इस कारण उत्पन्न होने वाली कानून-व्यवस्था की समस्या के बहाने शामिल हैं। इसके साथ ही, कुछ राज्य कहते हैं कि इस बदलते जमाने में शराब पर पाबंदी बेतुकी बात है क्योंकि लोग क्या खाएं और क्या पीएं ये उनकी सोच पर छोड़ देना चाहिए। हालांकि, मद्य-निषेध की विदाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण और मान्य कारण यह दिया जाता है कि राज्य इससे प्राप्त होने वाले राजस्व का लोभ छोड़ नहीं पाते।

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एक केस स्टडी

उदाहरण के लिए, तमिलनाडु को इस मायने में एक दुधारू गाय मिल गई है कि वह राज्य में निजी क्षेत्र को शराब की बिक्री की इजाजत नहीं देता है। उनकी बजाए, राज्य सरकार स्वयं शराब के कारोबार को चला रही है। देश में बनी विदेशी शराब की थोक और खुदरा बिक्री पूरे राज्य में, राज्य सरकार के स्वामित्व वाले तमिलनाडु राज्य विपणन निगम (ञ्ज्रस्रू्रष्ट) के करीब 7,000 दुकानों द्वारा की जाती है। 2013-14 के दौरान, (ञ्ज्रस्रू्रष्ट) ने रु 23,400 करोड़ की जबरदस्त कमाई की। राज्य सरकार इस राजस्व को तोहफे और सब्सिडी देने पर खर्च करती है, जिनका फायदा सत्ताधारी पार्टी को उसकी लोकलुभावन योजनाओं के जरिए मिलता है। कुछ तबकों द्वारा इसके घोर विरोध के बावजूद राज्य सरकार के लिए पाबंदी लगाना मुश्किल तो नहीं लेकिन उसकी इच्छा के विपरीत है। वह शराब पर पाबंदी लगाकर मोटे राजस्व को छोडऩा नहीं चाहती और इस कारण वह शराब की बिक्री की नीति को बढ़ाती चली जा रही है। यही बात उन सभी राज्यों पर लागू होती है जहां शराब पर पाबंदी लागू नहीं है।

केंद्र सरकार करे कार्रवाई

राज्य सरकारों द्वारा शराब पर पाबंदी लागू न करने के बहाने या सफाई चाहे कुछ भी हो, एक बात साफ है कि शराब को बनाना और उसकी बिक्री की इजाजत देना, वह भी राज्य सरकार द्वारा, न केवल अनैतिक है बल्कि अस्वीकार्य भी है। ऐसा कहने की पहली वजह यह है कि सरकार की भूमिका और जिम्मेदारी प्रमुख रूप से लोगों के कल्याण और सामूहिक भलाई को सुनिश्चित करना है। कोई भी सरकार महज ऐसी एजेंसी नहीं जो लोगों तक शराब, तंबाकू या नशे की लत लगाने वाले नुकसानदेह पदार्थ पहुंचाकर उन्हें उसका अभ्यस्त बना दे। यदि किसी राज्य में बहुत बड़ी संख्या में लोग यह चाहें कि वे भ्रूण हत्या या शिशु हत्या करने लग जाएं, तो सरकार के लिए उन अपराधों की अनुमति देना सोच से परे हैं। ऐसे में यह तो सोचा भी नहीं जा सकता कि वह उसमें साझीदार बनेगी या स्वयं भी ऐसा करने लगेगी।

यदि बड़ी संख्या में भारतीय शराब पीने के अभ्यस्त हो रहे हैं, तो इसका कारण शराब की सुलभता और शराब की बुराइयों के प्रति जागरुकता का अभाव है। इस वजह से, केंद्र सरकार को चाहिए कि वह चिकित्सकीय या औद्योगिक उद्देश्यों के सिवाय, पूरे देश में शराब को बनाने और उसकी बिक्री पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दे। देश भर में मद्य-निषेध होना चाहिए और उससे जुड़े कानून को तोड़े जाने को गंभीरता से लेते हुए भारी जुर्माना लगाया जाना चाहिए। इसके लिए, यह विषय केंद्र सरकार द्वारा कानून बनाए जाने के अधिकार के अंतर्गत लाया जाए, जो उन राज्य सरकारों को शराब की दुकानों के बंद होने से हुए राजस्व के नुकसान की भरपाई कर सके और उन्हें स्वास्थ्य सब्सिडी दे सके।

 

कुछ कदमों पर सुझाव  

Layout 1यह उस राज्य सरकार की जिम्मेदारी है जिसका लक्ष्य लोगों की भलाई करना है कि वह शराब की बुराइयों पर जागरूकता पैदा करे, विशेष रूप से छात्रों और युवाओं के बीच जिनकी आयु बहुत कम है और उन्हें इससे दूर रहने के फायदे बताए। जागरुकता अभियानों में कलाकारों, बुद्धिजीवियों, खिलाडिय़ों, मीडिया, डॉक्टरों, समुदाय के बुजुर्गों, विख्यात लोगों और इनसे भी महत्वपूर्ण रूप से उन व्यक्तियों को शामिल किया जाना चाहिए जो शराब की लत के शिकार बन गए थे और जिन्हें इस लत से छुटकारा दिलाया गया। शराब की लत से नुकसान उठा चुके व्यक्तियों पर केस स्टडी तैयार कर, उनका प्रचार-प्रसार आम लोगों के बीच किया जाना चाहिए।

कॉरपोरेट घरानों को भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए इन जागरुकता अभियानों में शामिल होना चाहिए तथा अपने स्टाफ से कहना चाहिए कि वे शराब से दूर रहें। स्वास्थ्य मंत्रालय को कॉरपोरेट घरानों के साथ मिलकर, समय-समय पर उन सरकारी और निजी क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों के लिए स्वास्थ्य जांच के कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए जिन्हें शराब पीने की लत है। इनका उद्देश्य यह होना चाहिए कि उन्हें उस बुरी लत से छुटकारा दिलाया जाए। इसी प्रकार का एक देशव्यापी अभियान आम लोगों के हित में भी चलाया जाना चाहिए। अच्छी शिक्षा, शराब की बुराइयों के प्रति जागरूकता पैदा करने वाले अभियानों तथा समय-समय पर होने वाले स्वास्थ्य जांच के साथ ही इलाज देकर, कुछ समय बाद, शराब पर पाबंदी का एक माहौल तैयार किया जा सकेगा, जिसका परिणाम सभी प्रकार से लोगों की भलाई और अच्छाई के रूप में सामने आएगा।

 सुनील गुप्ता

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