बहुत मुश्किल है शराबबंदी की डगर

बहुत मुश्किल है  शराबबंदी की डगर

बिहार के बाद अब मध्य प्रदेश में भी शराबबंदी हो सकती है। हाल ही में  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसके संकेत दे दिए हैं। उन्होंने नर्मदा यात्रा के दौरान कहा कि राज्य में सिलसिलेवार तरीके से शराब की दुकानें बंद की जाएंगी। इसकी शुरुआत नर्मदा नदी के किनारे 58 दुकानें बंद करने से हो गई है। इसके अगले चरण में रिहाइशी इलाकों में दुकानें बंद कराई जाएंगी, खासकर उन इलाकों में जहां स्कूल-कॉलेज और धार्मिक स्थान हैं। यह घोषणा इस बात की प्रतीक है कि राजनीति में शराबबंदी भी एक महत्वपूर्ण मुद्धा बनता जा रहा है जो महिलाओं में तो खासा लोकप्रिय है। देश के कई हिस्सों में महिलाएं शराब के खिलाफ सक्रिय और जोरदार आंदोलन चला रही है। हाल ही में योगी सरकार बनने के बाद महिलाओं ने कई जगह शराब के खिलाफ जबरदस्त मुहिम चलाई।

किसी जमाने में हमारे देश में शराबबंदी के साथ मोरारजी देसाई का नाम जुड़ा रहा है। उन्होंने मुंबई राज्य में कठोरता के साथ शराबबंदी लागू कराई थी। आज के समय में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम इसके साथ जुड़ गया है जिन्होंने बिहार में बहुत कठोरतापूर्वक शराबबंदी लागू की है और  वे इस प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे हैं। हाल ही में  नीतीश ने  शराबबंदी से पूर्ण नशाबंदी की ओर बिहार के बढऩे की बात कही और कहा बिहार पूर्ण नशाबंदी की ओर अग्रसर है, जिसमें आम लोगों का बड़े पैमाने पर सहयोग मिल रहा है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल यह है कि बिहार की 12 करोड़ से कम आबादी है और 21 जनवरी को मानव श्रृंखला में चार करोड़ लोगों ने भाग लेकर इतिहास रच डाला. इसके आधार पर वे कहते हैं कि शराबबंदी और नशामुक्ति की बिहार ने जो ज्योति जगाई है, वह ज्योति अब बुझने वाली नहीं है। अपने आलोचकों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि कुछ लोगों का कहना था कि शराबबंदी से सरकार को पांच हजार करोड़ रुपये की राजस्व हानि हो गयी, मैं इसे हानि नहीं मानता बल्कि बिहारवासियों का दस हजार करोड़ रुपये का बचत हो  रहा है और इसका उपयोग वे अच्छे कार्यों के लिये कर रहे हैं।

नीतीश कुमार अपनी पीठ भले ही थपथपा लें मगर शराबबंदी की नीति फिर से सवालों के घेरे में हैं। कुछ समय पहले राज्य सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर वैट बढ़ाने का फैसला किया है। बीजेपी का आरोप है कि शराबबंदी के कारण घटी आमदनी की भरपाई के लिए ही पेट्रोल-डीजल को महंगा किया जा रहा है. वहीं नीतीश कुमार ने शराबबंदी की नीति को हर तरह से जायज बताया और कहा कि इजाफा, वहीं प्रति लीटर डीजल की कीमत में 75 पैसे की बढ़ोत्तरी हुई है। दाम बढ़ा पेट्रोल और डीजल का लेकिन गुस्सा सरकार की शराबबंदी नीति पर निकला जा रहा है।

नीतीश कुमार ने 5 अप्रैल 2016 को पूरी तरह शराबबंदी लागू कर दी। एक अनुमान के मुताबिक नीतीश सरकार के इस फैसले से राज्य को हर साल करीब 4500 करोड़ रूपये का घाटा हो रहा है। अब राज्य सरकार इस घाटे को पूरा करने के लिए दूसरे चीजों पर टैक्स लगा रही है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार अपने शराबबंदी के फैसले को ऐतिहासिक बता रहे हैं। नीतीश कुमार ने कहा कि इतिहास में किसी ने पूरी तरह से शराबबंदी लागू नहीं की है। शुरू में बीजेपी इस फैसले से सहमत थी। पर अब अपना रूख बदल रही है। नीतीश कुमार के समर्थक कह रहे हैं कि पहले गांव में चौक चौराहों पर झगड़े तनाव का माहौल दिखता था। खासकर शादी-विवाह के मौकों पर घंटो-घंटो नृत्य करने तथा सडक़ जाम करने का दृश्य दिखाई देता था। शराबबंदी के लागू होने के पहले के विवाह और शराबबंदी लागू होने के बाद के विवाह को प्रत्यक्ष देखने वाले अनुभव कर सकते हैं कि शराब बंदी का क्या गहरा असर हुआ है। पहले जो शाम को शराब की दुकान पर पूरे दिन की अपनी कमाई दे आता था। जिससे उनके बच्चे शिक्षा के लिए नहीं जा पाते थें। कमजोर वर्ग के मजदूर बच्चों की बुनियादी सुविधाओं पर उचित खर्च नहीं कर पाते थे। इस वर्ग पर शराबबंदी की नीति का सबसे गहरा असर दिखाई देने लगा है।

बिहार में शराबबंदी के समर्थकों और विरोधियों के अपने-अपने तर्क है उनमें दम भी हैं मगर सारे देश में शराबबंदी के अनुभव अलग-अलग हैं। भारत के कई राज्यों में इस योजना को लागू किया गया लेकिन राज्य सराकारों को पूरी तरह से कामयाबी हासिल नही हुई। तो किसी राज्य में कामयाबी भी मिली, और कई राज्य तो ऐसे भी हैं जहां कानूनी तौर पर तो शराब पर प्रतिबंध है लेकिन वहा शराब आप के लिए आसानी से उपलब्ध हो सकती है। शराब पर प्रतिबंध लगाना इस लिए भी राज्यों के लिए आसान नही होता क्योंकि राज्य सरकारों के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा इन पदार्थों से आता है।

अपनी कुदरती खूबसूरती के लिए मशहूर केरल राज्य ने भी अगस्त 2014 से राज्य में शराब पर प्रतिबंध की घोषणा की थी, लेकिन सरकार के इस फैसले को बार और होटल मालिकों ने चुनौती दी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया, सर्वोच्च न्यायलय ने राज्य सरकार के फैसले को बहाल रखा और सिर्फ पांच सितारा होटलों में ही शराब की इजाजत दी। बिहार से पहले आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, मिजोरम और हरियाणा में भी शराब पर प्रतिबंध की घोषणा की गई लेकिन यह ज्यादा दिन तक चल नही पाई। क्योंकि ज्यादातर सरकारे राज्य की महिलाओं की मांग को देखते हुए शराब पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की, लेकिन बाद में उन्ही महिलाओं ने इस प्रतिबंध को हटाने की मांग रखी।

आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू ने यह कह कर शराबबंदी हटा दी, कि इसे पूरी तरह लागू कर पाना संभव नहीं है। तो हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल ने भी कहा कि पूरी तरह से शराब बंदी कानून लागू करना संभव नही है। हालाकि उन्होने पहले कहा था कि चाहे मुझे घास काटनी क्यों न पड़ जाए शराब से प्रर्तिबंध नही हटेगा। शराबबंदी कानून के बाद बंसीलाल को तो कई राजनीतिक समस्याओं का सामना करना पड़ा था। हरियाणा में तो शराबबंदी कानून लागू करने के लगभग 21 महीने बाद ही सरकार के हाथ-पांव फूलने लगे थे। राज्य में एक ओर अवैध तस्करी के कई मामले सामने आए वही जहरीली शराब पीने से लगभग 60 लोगों की मौत हो गई थी।

अब आईये एक नजर डालते है उन राज्यों पर जहां या तो शराब बंदी कानून लागू है या फिर लागू करने के बाद हटा दिया गया है। इसमे महात्मा गांधी की जन्मभूमि रहे गुजरात है जहा 1960 से ही शराब पर प्रतिबंध है, लेकिन एक कहावत भी तो है जहां चाह वही राह, इस नीति को अपनाते हुए गुजरात में शराब बंदी के बावजूद लोगों को शराब आसानी से उपलब्द्ध हो जाती है। वहीं महाराष्ट्र में तीन जिलों में पूरी तरह शराब बेचना, पीना और पिलाना गैरकानूनी है। ओडीशा सरकार ने शराब के उपभोग और निर्माण पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने को अवास्तविक करार दिया। वहीं दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया पहले ही कह चुके हैं कि इस समय दिल्ली में शराब पर प्रतिबंध लगाने का हमारा कोई विचार नहीं है। अब अदालतें भी इस मामलें में कूद पड़ी है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह अहम फैसला दिया है कि  राष्ट्रीय राजमार्गों और स्टेट हाईवे से 500 मीटर तक अब शराब की दुकानें नहीं होंगी।

शराब की दुकानों के लाइसेंसों का नवीनीकरण नहीं होगा। नए लाइसेंस जारी नहीं होंगे। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह फैसला लागू होगा। इसके साथ ही राजमार्गों के किनारे लगे शराब के सारे विज्ञापन और साइन बोर्ड हटाए जाएंगे। राज्यों के चीफ सेकेट्री और डीजीपी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन कराने की निगरानी करेंगे।

भारत में हर साल सडक़ों पर डेढ़ लाख लोगों की मौत होती है। इसी का संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल हाईवे और स्टेट हाईवे पर शराब की दुकानों को बंद करने या 500 मीटर दूर रखने का आदेश दिया था। लेकिन राज्य सरकारों ने तो शायद सोच ही लिया है कि वो सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने की बजाय उसका पोस्टमॉर्टम करके ही दम लेंगे। तभी तो चंडीगढ़, पंजाब, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, राजस्थान सहित अन्य राज्यों ने हजारों किलोमीटर सडक़ों का दर्जा बदलकर स्थानीय, नगरपालिका या जिला स्तरीय कर दिया है। पश्चिम बंगाल सरकार भी राज्य से गुजरने वाले 275 किलोमीटर के हाईवे को नगर निकाय स्तरीय सडक़ में तब्दील करने की तैयारी में हैं। यह सब इस बात का प्रतीक है कि राज्य सरकारें भले ही शराबबंदी के बारे में नारेबाजी करती हों मगर उन्हें राजस्व भी बहुत प्यारा है जिससे वे हाथ धोना नहीं चाहती। इसलिए वे कई बार शराबबंदी को चरणबद्धरूप में लागू करने की बात करती है मगर असलियत यह है कि सभी नीतीश कुमार की तरह इसे लागू नहीं करते। इसलिए शराबबंदी भी लागू रहती है और शराब भी बहती रहती है।

सतीश पेडणेकर

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