देश का बहुरूपिया प्रजातांत्रिक ढांचा

देश का बहुरूपिया प्रजातांत्रिक ढांचा

प्रजातन्त्र में, प्रशासनिक प्रणाली नियम-कानून और संविधान से चलेगी या वातावरण, प्रदर्शन और सामाजिक दबाव से। यह प्रश्न रामराज्य में भी उतना ही महत्वपूर्ण था, जितना आज है। बेकसूर सीता को वन जाना पड़ा, कोई अपराध नहीं था, वह पाक साफ भी प्रमाणित हुई। उनको सजा देने में कोई पंचायत नहीं बैठी, कोई गवाही सफाई नहीं हुई और न ही राम जैसे राजा से किसी अन्याय की कल्पना की जा सकती थी।

फिर क्या था? राजा और राज्य की प्रतिष्ठा का डर या अपने पराये के भेदभाव की चर्चा। सामाजिक दबाव या आदर्श मर्यादा की प्रतिस्थापना। रामराज्य की नींव क्या किसी अपने को सिर्फ दोष के संशय पर सजा देकर और अधिक मजबूती से प्रतिस्थापित हो पाती? पर वातावरण ने ऐसा अन्याय होने दिया। आज भी प्रदर्शन, वातावरण, पोस्टर और मीडिया या लोगों की भीड़, राजतंत्र को इतना डरा देती है कि उसे आम कानून का रास्ता छोडक़र दोहरे मापदंड अपनाने पड़ते हैं।

जैसे ए.आर. अंतुले को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था, सिर्फ सामाजिक भत्र्सना और राजनैतिक दबाव में। बाद में वे बेकसूर निकले, पर सजा तो पा ही गये। केंद्रीय मंत्री निहार रंजन लश्कर आदि का मंत्रिपरिषद से त्यागपत्र देना मामूली घटना थी। रोज मंत्री बनते-बिगड़ते हैं। देशभर में बहुत से मंत्री आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। कुछ पर मुकदमें चल रहे हैं। कई पर अपराध साबित हो चुके हैं। उन्हें न त्यागपत्र देने की आवश्यकता होती है और न कोई उन्हें मजबूर कर सकता है।

वहीं उमा भारती को उनके ऊपर लगे आरोपों का अदालत द्वारा संज्ञान लेते ही मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा था। अदालत द्वारा पाक साफ होने पर भी उन्हें मुख्यमंत्री पद पुन: नहीं मिल पाया था। पार्टी छोड़ी, राजनैतिक थपेड़े खाये। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी उमा की वापसी नहीं कराते तो बेगुनाह होते हुए भी, उनका राजनैतिक भविष्य अंधेरे में जा डूबा था।

यहां मैं किसी का इस्तीफा जायज या नाजायज नहीं ठहरा रहा हूं। पर यह तो तय करना ही पड़ेगा कि अपराध की परिधि अदालत तय करेगी कि वातावरण का गुबार।

लालकृ ष्ण आडवाणी पर भीड़ को भडक़ाने और कानून के खिलाफ उकसाने का आरोप लगा, मुकदमा चलता रहा। वह देश के गृह मंत्रालय यानी कानून-व्यवस्था की बागडोर पूरे पांच वर्ष संभाले रहे और कई राजनैतिक घटक बिना हील-हुज्जत के उसी सरकार का हिस्सा भी बने रहे। इस समय यह प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं है कि आडवाणी दोषी हैं या नहीं। महत्वपूर्ण है कि क्या इस दौरान उन्हें मंत्री बने रहना चाहिए था या नहीं? वही नेता जो उनके साथ मंत्रिमंडल में रहे, उनके खिलाफ अब गंभीर आरोप लगाने लगे हैं।

अपराध की परिभाषा तय कर, उसकी श्रेणियां विभक्त करनी होगी। किस किस्म के अपराधी या किस स्तर के अपराध पर किसी को देश की बागडोर नहीं सौंपी जा सकती है, इस पर खुली बहस आवश्यक है। आडवाणी का अपराध जघन्य अपराध जैसे कत्ल, बालात्कार, डकैती आदि की तरह का नहीं था। नाही लालू प्रसाद यादव की तरह घोर भ्रष्टाचार में लिप्त पाये जाने के कारण उच्चतम न्यायालय से सजायाफ्ता थे। अदालत में अपराधिक मामले या भ्रष्टाचार की, चार्जशीट दाखिल हो जाने पर कोइ व्यक्ति मंत्री, सांसद या लाभकारी पद पर रह सकता है या नहीं?

यह आम धारणा है कि कोई भी व्यक्ति भ्रष्टााचार में कोर्ट से चार्जशीट हो जाने पर मंत्री बनने की पात्रता नहीं रखता। पर देश का लचर, शिथिल कानून उसे रोक भी नहीं पाता है। इसी तरह हम मागें आजादी के नाम पर जेएनयू में जो कृत्य हुये उसने जेएनयू जैसे संस्थान पर देश-द्रोही कार्यवाही पनपने का दाग पक्का कर दिया। मीडिया, प्रदर्शन सें और कम्यूनिस्ट नेताओं के नाजायज बयानों और दबाव के कारण पुलिस अपना काम समय से और समुचित रूप में नहीं कर पायी। धर्म के नाम पर या अन्य किन्हीं कारणों से किसी को, व्यक्ति या समुदाय पर अन्याय करने नहीं दिया जा सकता। पर ऐसा हुआ है कि नहीं, इसका फैसला तो अदालत ही करेगी और न्यायिक प्रक्रिया में राजा (सरकार) या प्रजा (जनता) का किसी किस्म का दखल प्रजातंत्र की नींव खोखली ही करेगा।

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समस्याओं तक पहुंचने या उनका हल निकालने के लिये सृदृढ़ प्रजातांत्रिक प्रणाली का एक और स्वरूप है आयोग। आयोग (कमीशन) का कार्य न्यायिक प्रक्रिया को तेज करना और सत्य के पास पहुंचना है। पिछले अनुभव ऐसे हैं कि  अधिकांश कमीशन इस प्रक्रिया को और देर करने तथा भ्रम की स्थिति में ले गये हैं।

1984 के दंगों को वर्षों बीते। इतने समय में तो अदालत से ही फैसले हो जाते। सात-आठ जांचें और कमीशन, फिर भी नतीजा शून्य रहा। न्यायिक और आर्थिक दृष्टिकोण से कमीशनों की नियुक्ति बन्द हो तो ही ठीक है। कमीशन में बैठे लोग अक्सर समय सीमा बढ़ाते रहते हैं, निर्धारित समय सीमा में कोई कमीशन शायद ही अपना कार्य पूरा करता हो। और ऊपर से कमीशन की रिपोर्ट मानने के लिये सरकार बाध्य भी नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में विशेष न्यायालय में लगातार सुनवाई ही सही रास्ता होगा।

राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद, मुख्य न्यायाधीश, आर्मी जनरल, उपाध्यक्ष, योजना आयोग जैसे सर्वोच्च पदों पर अल्पसंख्यक वर्ग के लोग पदासीन होते रहते हैं, यह एक स्वस्थ प्रजातंत्र का नमूना है। इससे एक बात तो साफ हो जाती है कि बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक समुदाय देश चलाने के बिन्दु पर जरा भी बंटा नहीं है। भले उनको बांटकर राजनैतिक पार्टिया सत्ता में आने के मनसूबे पूरे करने में लगी रहती हों।

राजशाही की ज्यादतियों और जुल्म रोकने के लिए प्रजातंत्र का रास्ता चुना गया था और राजाशाही, तानाशाही को तिलांजलि दे दी गयी। अब अपराधी सत्ता के भागीदार बन गये, प्रजातंत्र का स्वरूप बिगड़ गया और जरूरत के हिसाब से उसकी व्याख्या की जाने लगी। ऐसे बहरूपिया राजतन्त्र से नयाय की आशा लगाना बेमानी लगता है।

प्रजातंत्र के दोहरे मापदंड पर विराम लगे, कानून और नियमों की धारायें हर व्यक्ति पर एक जैसी लागू हों। ऐसी मजबूत व्यवस्था निर्मित हो कि सरकारें, प्रदर्शन, हड़ताल, मीडिया और सामाजिक दबाव के प्रभाव में न आये, और सरकारें वोटों को दृष्टिगत रखके न चलायीं जायें अन्यथा जिस रास्ते पर हमारी प्रजातंत्र प्रणाली चल रही है यह पुरानी राजशाही के अभिशापों को भी मात दे देगी और एक नई कुव्यवस्था बना डालेगी।

 डॉ. विजय खैरा

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