स्वामी अडग़ड़ानंदजी महाराज यथार्थ गीता के सृजन ने महात्मा बना दिया

स्वामी अडग़ड़ानंदजी महाराज  यथार्थ गीता के सृजन ने महात्मा बना दिया

समाज में कुरीतियां, आडम्बर, अंधविश्वास कब नहीं थे?  हिंसा और अशांति कब नहीं थी? किस काल में नहीं थी? क्या प्रकाश-ही-प्रकाश था? अंधकार नहीं था? अंधेरा कल भी था और आज भी है। हिंसा चलती रहती है तभी अहिंसा का अस्तित्व समझ में आता है और शांति की बात होती है। अंधकार कहीं अवश्य है तभी प्रकाश के अस्तित्व का पता चलता है। अहिंसा की स्थापना और शांति की दिशा में प्रस्थान करना, समाज को रूढि़मुक्त बनाना लोक-मंगलकारी अभियान है। इस दिशा में कोई युगांतरकारी दिव्य-पुरुष ही सफलतापूर्वक गतिमान हो सकता है। इस श्रेणी का पुरुष शताब्दियों में कभी-कभी धरा-धाम पर अवतरित होता है जो सामुदायिक चेतना के विकास के लिए सर्वात्ममना अपना जीवन समर्पित कर देता है। एक महान धर्मनेता, अध्यात्मवेत्ता, यथार्थ गीता के प्रणेता एवं दार्शनिक चिंतक के रूप में स्वामी अडग़ड़ानंदजी महाराज का नाम देश और दुनिया में विख्यात है। उनकी दूरदर्शी सोच की आज पूरे विश्व को जरूरत है। आपका संक्षिप्त परिचय इतना ही है कि सारी धरती आपका घर है, दुनिया के सारे लोग आपके बंधु-बांधव एवं अनुयायी हैं, पूरा विश्व आपका परिवार है और मानवता के कल्याण एवं अमन-चैन के लिए आपका मार्गदर्शन और पाथेय सभी को सहज उपलब्ध है।

स्वामी अडग़ड़ानंदजी सत्य की खोज में विचरण करते हुए 1955 में युगपुरुष परमहंस स्वामी परमानंदजी की शरण में आए थे। तब उनकी आयु मात्र तेईस वर्ष थी। स्वामी परमानंदजी का आश्रम मध्य प्रदेश के सतना जिले के चित्रकूट अनुसुइया नामक स्थान पर था, जो उन दिनों बियावान जंगल था। स्वामीजी वहीं साधनारत थे। अपने गुरुदेव के सान्निध्य में वे भी साधना करने लगे। उन्हें अडग़ड़ानंद नाम भी गुरुदेव ने ही दिया। विलक्षण प्रतिभा के धनी स्वामी अडग़ड़ानंदजी ने हालांकि प्रारंभिक स्कूली शिक्षा भी पूर्ण नहीं की परन्तु उन्हें श्रीमद्भगवद् गीता सहित अनेक शास्त्र और उनकी व्याख्याएं कंठस्थ हैं। लेखन में अभिरुचि न होते हुए भी उन्होंने अपनी वाणी के बहुमूल्य योगदान से अनेक ग्रंथों की रचना की। स्वामी अडग़ड़ानंदजी का केन्द्र, मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) के नगरीय क्षेत्र से दूर शक्तेशगढ़ में श्री परमहंस आश्रम नाम से विख्यात है।

वास्तव में स्वामी अडग़ड़ानंदजी भौतिक वातावरण में अध्यात्म कह लौ जलाकर उसे तेजस्वी बना रहे हैं। वे जाति, धर्म व देशकाल की सीमाओं से परे होकर काम, क्रोध पर पूरी तरह विजय प्राप्त कर चुके हैं। उन्हें कण-कण में परमात्मा के ही दर्शन होते हैं। इसीलिए वे सामाजिक व पारम्परिक आडम्बरों से मुक्त होकर परमब्रह्म में सदैव लीन रहते हुए अपने भक्तों को सदा सद्मार्ग दिखाते आ रहे हैं। साथ ही अपने ज्ञान गंगा के वेग से उन्होंने जाति, धर्म व अन्य भेदभाव भरी संकीर्णता भरी दीवारों को धराशायी करने में काफी हद तक सफलता प्राप्त की है। स्वामीजी ने यथार्थ गीता के अलावा शंका समाधान, जीवनादर्शन एवं आत्मानुभूति, अंग क्यों फडक़तें हैं और क्या कहते हैं, अनछुए प्रश्न, एकलव्य का अंगूठा, षोडशोपचार पूजन पद्धति, योग प्राणायाम, भजन किसका करें आदि अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी है जो जन-जन के जीवन का पथ-दर्शन कर रही है। कहा जा सकता है कि वे ऐसे सृजनधर्मा साहित्यकार संत-मनीषी हैं जिन्होंने प्राचीन मूल्यों को नए परिधान में प्रस्तुत किया है।

जीसस क्राइस्ट के शब्दों में-‘आध्यात्मिक दृष्टि से शांति स्थापित करना और भौतिक दृष्टि से शांति की प्रतिष्ठापना में रात-दिन का अंतर है।’ भौतिकता की दृष्टि में युद्ध व शांति दोनों अपने-अपने स्वार्थों से जुड़े हैं, इसीलिए इन दोनों को अलग कर पाना कठिन है। इसीलिए स्वामी अडग़ड़ानंदजी ने यथार्थ गीता के माध्यम से शांति स्थापित करने का जो बीड़ा उठाया है उसका पथ आध्यात्मिकता है। वे स्थायी शांति की चाह रखते हैं। उनका मानना है गीता वैश्विक ग्रंथ है और इसे सीमाओं में नहीं बांधना चाहिए। गीता को राष्ट्रीय नहीं, अंतर्राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किया जाना चाहिए। उनके अनुसार गीता किसी धर्म या सम्प्रदाय की स्थापना नहीं करती बल्कि संपूर्ण मानवजाति के उद्धार का मार्ग बताती है। चाहे वह किसी राष्ट्र, जाति या वर्ण का हो। ऐसे में गीता राष्ट्रीय ग्रंथ कैसे हो सकती है उसे राष्ट्रीय नहीं अंतर्राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करना चाहिए। उन्होंने गीता की टीका सरल एवं सहज समझ में आए इस रूप में लिखकर पूरी दुनिया के पढ़े लिखे तबके को अपने विशुद्ध ज्ञान का लोहा मानने पर विवश कर दिया। यथार्थ गीता के सृजन के साथ अंतर्मन की महानता और अथाह ज्ञान ने उन्हें पूर्ण महात्मा बना दिया है। गीता का सबसे पहला व्याख्यान भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा अर्जुन को महाभारत के युद्ध के दौरान दिया गया था, लेकिन इसे बहुत दूरी पर स्थित संजय के द्वारा भी सुना गया था। संजय को यह दिव्य दृष्टि ऋषि वेद व्यासजी के द्वारा प्रदान की गई थी। यह एक दिव्य शिक्षक और उसके शिष्य के बीच की बातचीत है। गीता वह सब कुछ है, जिसे याद नहीं किया जा सकता है जिसे केवल महसूस किया जा सकता है और भक्ति के माध्यम से अनुभव किया जा सकता है। यह हमें जीवन का सही रास्ता दिखाती है, जो ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाती है।

स्वामी अडग़ड़ानंदजी का मानना है कि गीता व्यावहारिक है इसमें राजनीति, मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र, सामाजिक और पारिवारिक जीवन के बारे में उल्लेख किया गया है। इसे घोषित करने या थोपने की जरूरत ही नहीं है। हर व्यक्ति को अपनी इच्छा और मान्यता को पूर्ण करने का संपूर्ण अधिकार है। गीता में जीवन के सभी सवालों के जवाब है। गीता के 700 श्लोकों में न सनातन शब्द है, न हिन्दू, न ही किसी धर्म का उल्लेख। यह एक तरह से व्यवहार का विज्ञान (साइंस ऑफ बिहेवियर) है।

स्वामी अडग़ड़ानंदजी महाराज लीक से हटकर सोचते हैं और समाज के लिए कुछ करने वाले संन्यासी के रूप में में प्रसिद्ध हैं। वे हिन्दू समाज को कुरीतियों और रूढिय़ों से मुक्त करने के पक्षधर हैं और उनका मानना है कि संकीर्णताओं से ऊपर उठकर ही हम धर्म की रक्षा कर सकते हैं। आज यह बात समूची मानव जाति को समझ में आ गई है कि एकता और सौहार्द बहुत आवश्यक है। परस्पर के संघर्ष में किसी का हित नहीं है। विकास व शांति की चाहत में एक सकारात्मक संबंध है। जो कमजोर हैं, निर्धन हैं वे ही सब युद्ध, बाढ़, शीतलहर, अकाल, सूखा, सांप्रदायिक दंगों में शिकार होते हैं। कमजोर व निर्धन के जीवन का कोई मूल्य नहीं है, क्या यह सब हमारी अंतरात्मा को नहीं कचोटता है?

इक्कीसवीं सदी में अध्यात्म का प्रकाश फैलाने वाले स्वामी अडग़ड़ानंदजी जिन्होंने युग के कैनवास पर नए-नए सपने उतारे हैं। वे एक व्यक्ति नहीं, संपूर्ण संस्कृति हैं, दर्शन हैं, इतिहास हैं, विज्ञान हैं। उनका व्यक्तिव अनगिनत विलक्षणताओं का दस्तावेज है। सृजन की नई-नई तरंगें आपके मस्तिष्क में तरंगित होती रहती हैं। इसलिए आप महानता की पराकाष्ठा तक पहुंचे हैं। क्योंकि आपके मन की पवित्रता, विचारों की विमलता, वाणी में मधुरता, व्यवहार में शिष्टता, हृदय में उदारता, चिंतन में स्पष्टता और वृत्तियों में अंतर्मुखता है। आप एक ऐसे उच्च कोटि के महान योगी, प्रवचनकार, भाष्यकार हैं, जिनकी जीवन यात्रा का प्रत्येक चरण साधना की सौरभ और उजाले से ओत-प्रोत हैं, जिनकी पारदर्शी चेतना क्षितिज के उस पार पहुंच चुकी है जहां केवल समता, सरलता, शांति व संतता के दर्शन होते हैं। आपने गीता-ज्ञान के द्वारा अंतर्दृष्टि को जागृत किया है। शक्ति संपन्न बनकर सम्पूर्ण राष्ट्र को शक्ति संपन्न बनाया है। अध्यात्म की गहराइयों में उतरकर नया सत्य उपलब्ध किया है। अपनी ऊर्वर मेधा से मानवता की धरती पर साहित्य की मंदाकिनी प्रवाहित की है। आपके हर साहित्य में जीवन निर्माण व विकास का अमर पाथेय है। आपका साहित्य विद्वद् समाज की अक्षय संपदा है। आप युग प्रणेता, युग प्रचेता, युग निर्माता, अध्यात्म नायक, यथार्थ गीता के प्रणेता  हैं

जिनके आध्यात्मिक नेतृत्व से  हिन्दू समाज ही नहीं, संपूर्ण मानवता लाभान्वित हो रही है।

ललित गर्ग

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