जगूड़ी का जादू

जगूड़ी का जादू

लीलाधर जगूड़ी के जीवन और कविताओं पर आधारित ‘आता ही होगा कोई नया मोड़’ का संपादन प्रमोद कौंसवाल ने किया है। इसमें कई लेखकों ने उनकी कविताओं पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। नामवर सिंह लिखते हैं कि जगूड़ी की कविताओं के केन्द्र में जो संसार बनता है, उससे वे सबसे अलग कवि बन जाते हैं। वे अवाम के कवि हैं। जगूड़ी की लोकप्रियता का एक कारण उनकी कविताओं का समाजिक होना है। जगूड़ी संस्कृत के प्रकांड विद्वान हैं लेकिन उन्होंने आम लोगों की भाषा में कविताएं लिखी हैं। एक संस्कृत पढ़ा-लिखा आदमी किंतु उसकी भाषा में उसकी परछाईं दूर-दूर तक नहीं है। जगूड़ी की हिन्दी साहित्य में उतनी चर्चा नहीं हो सकी, जितनी होनी चाहिए थी।

‘अनुभव और भाषा के बीच’ नामक लेख में ओम निश्चल लिखते हैं कि जगूड़ी की कविताओं की यह उल्लेखनीय विशेषता रही है कि जब वे संग्रह प्रकाशित करने के लिए चयन करते हैं तो अपने सृजन संसार में हर बार एक मोड़ पैदा करने की कोशिश करते हैं। सूचनाओं के विस्फोटक प्रसार के समय में जहां खबरें भी कमाई का जरिया बनती जा रही हैं, ऐसे समय में ‘खबर का मुंह विज्ञापन से ढंका है’ का प्रकाशन हमारी आधुनिक सांस्कृतिक चेतना को झकझोर कर रख देता है। ऐसे समय में जहां  सर्वनाश की खबरें उड़ रही हों, वहां लीलाधर जगूड़ी की कविता अपने अलग तरह के प्रयासों से हमारे डर को कुछ कम करती है। इन्हें पढ़ते हुए कविता के अल्पसंख्यक मगर महत्वपूर्ण पाठक अपने लिये कविता समझाने की और उसको अपने बीच घटित होते देखने की नई दृष्टि पाने की प्रक्रिया से गुजर रहे होते हैं। इसी क्रम में ओम निश्चल लीलाधर जगूड़ी की कविता ‘जब उसने कहा कि अब सोना नहीं मिलेगा, तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा, पर अगर यह कहता कि अब नमक नहीं मिलेगा, तो शायद मैं रो पड़ता।’ का उदाहरण देते हुए जगूड़ी को सरोकारों को जताने वाला कवि माना है।

आता ही होगा कोई नया मोड़

संपादक                 : प्रमोद कौंसवाल

प्रकाशक                : वाणी प्रकाशन

मूल्य                      : 450 रु.

पृष्ठ                        : 288

प्रमोद कौंसवाल से हुई बातचीत में कविता के संकट पर जगूड़ी बताते हैं कि एक समय था जब कविता का नारा हो जाना इसलिए अच्छा लगता था कि वह सूक्ति की क्षतिपूर्ति करता दिखता था। लेकिन अब नारे इतने अपार और अर्थहीन हो चले हैं कि वे एकदम सतही राजनीतिक सोच के नमूने लगते हैं। वे कविता और खबरों की भाषा में फर्क नहीं रहने देते। अब वक्त आ गया है कि वैश्विकता और स्थानीयता के टकराव खत्म होते जाएंगे। इसलिए मानवीय मूल्य और संवेदनाओं को ग्लोबल स्तर पर एक-दूसरे में पाना साहित्य की सार्वभौमिकता की पुनसर्थापना का कारण बनता दिखाई दे रहा है। स्थानीयता भी एक दिन वैश्विक हलचल का पहलू बनकर हमारे दुनियावी जीवन का जरूरी हिस्सा बन जाएगी।

इस किताब में अनेक लेखकों ने लीलाधर जगूड़ी द्वारा लिखी गई कविताओं का अपने शब्दों में वर्णन किया हैं, जिसके माध्यम से जगूड़ी को समझा जा सकता है। अत: पाठक इसमें अपनी रुचि दिखा सकते हैं।

 

 रवि मिश्रा

 

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