बीफ पर प्रतिबंध क्यों नहीं?

बीफ पर प्रतिबंध क्यों नहीं?

प्रस्तावित राष्ट्रीय पशु प्रतिबंध से मवेशियों की रक्षा और कसाईखानों पर क्षेत्रीय बंदिशों पर पुरे देश में बहस छिड़ गई है। तथाकथित गोरक्षकों की गैर-कानूनी हरकतों, जिनके लिए सरकार जवाबदेह नहीं है और न ही इस प्रस्ताव का उनसे कुछ लेना-देना है, के अलावा भी इसके खिलाफ कई तरह की आपत्तियां हैं। हालांकि कोई भी आपत्ति कायदे की नहीं है और मूल रूप से उसकी वजह देश के स्वभाव और कानून की समझ न होना है।

प्रतिबंध के खिलाफ मोटे तौर पर दो आपत्तियां हैं। एक, यह दावा है कि इससे लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन होगा-उपभोक्ता की पसंद-नापसंद के अधिकार का कि वह क्या खाए, क्या न खाए, और बिक्रेता की पेशागत आजादी का अधिकार दोनों इससे प्रभावित होते हैं। दूसरी दलील है कि धार्मिक भावनाओं पर आधारित प्रतिबंध धर्मनिरपेक्षता विरोधी है और गैर-हिंदुओं के खिलाफ भेदभाव भरा है।

पहली आपत्ति तो यही है कि बीफ पर प्रतिबंध से लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन होगा। बीफ दुनिया में बड़े पैमाने पर विशाल बहुसंख्यक आबादी का भोजन है। इसके अलावा, अपने देश में केरल और पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्य पशु बध और बीफ सेवन की खुली छूट देते हैं। दुनिया भर में और देश के कई क्षेत्रों में बीफ की उपलब्धता से यह धारणा बनी कि यह खाने का अधिकार है या होना चाहिए। यह बेहद सामान्य भोज्य-पदार्थ है और कई लोगों को लगता है कि वे जो चाहें उन्हें खाने का अधिकार होना चाहिए।

इसके अलावा, भारत दुनिया में बीफ का निर्यात करने वाला सबसे बड़ा निर्यातक है। हर साल इसका निर्यात करीब 4 अरब डॉलर का होता है। यह आंकड़ा बड़े पैमाने पर इस धंधे में लगे लोगों का भी एहसास दिलाता है। यानी राष्ट्रीय प्रतिबंध से काफी लोगों का रोजगार छिन जाएगा। यह माना जाता है कि इन लोगों को बिना किसी सरकारी बंदिश के अपना धंधा करने का अधिकार है।

ये दलीलें दो अधिकारों पर आधारित हैं। खाने का अधिकार और बिक्री का अधिकार। हालांकि इन दोनों अधिकारों को कभी संविधान, न्यायपालिका या सरकार की मान्यता हासिल नहीं हुई। कोई जो चाहे वह खाए या बीफ बिक्री का धंधा इन दोनों ही अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी सरकार नहीं देती। और बीफ प्रतिबंध के एक खास मामले में सुप्रीम कोर्ट 2005 में गुजरात राज्य के मामले में पहले ही कह चुका है कि इससे किसी तरह के मौलिक अधिकार का हनन नहीं होता।

ठीक इसी वजह से सरकार किसी व्यक्ति को खास चीजों के सेवन से रोक सकती है। जैसे सरकार ने मारिजुआना या गांजा, भांग, चरस पर प्रतिबंध लगती है या देश भर शराबबंदी वाले दिनों का ऐलान करती है जिनमें शराब नहीं बेची जा सकती। इसी तरह ब्रिकी के अधिकार के मामले में सरकार कई पेशों और धंधों पर नैतिकता या लोक कल्याण के मकसद से प्रतिबंध लगा सकती है। मसलन, वेश्यावृत्ति की दलाली, मादक पदार्थ बेचना या शीतल पेय में कॉफिन की मात्रा पर अंकुश लगाना वगैरह।

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यहां तक कि भारत के संविधान में दिए गए अधिकार भी (जिनमें कहीं भी जो चाहें खाने का अधिकार और किसी तरह का पेशा करने का अधिकार शामिल नहीं है) बिना शर्त नहीं हैं। केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट की राय थी कि इन अधिकारों को सरकार नियम बनाकर या संसद कानून बनाकर सीमित कर सकती है। इसका मतलब यह हुआ कि किसी को बीफ सेवन और बिक्री का अधिकार दिया भी गया है तो उससे पशु बध पर प्रतिबंध खारिज नहीं हो जाता है।

प्रतिबंध के खिलाफ दूसरी आपत्ति उसके धार्मिक भावना पर आधारित होने को लेकर है। इसमें दो दलीलें उलझी हुई हैं। एक तो दावा यह है कि धार्मिक भावनाओं को संहिताबद्ध करना या रक्षा करना अनिवार्य रूप से धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है। इसके अलावा धार्मिक भेदभाव का दावा है कि यह नियम खासकर हिंदुओं के पक्ष में भेद भावमूलक है।

पहली दलील देने वाले भारत में धर्मनिरपेक्षता के स्वभाव को ही नहीं समझ पाते हैं। अधिकांश पश्चिमी देशों में धर्मनिरपेक्षता का मतलब कानून को धर्म से एकदम अलग करना होता है लेकिन यह भारतीय  रुझान कभी नहीं रहा है। हमारा कानून धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह लेता है कि सभी धर्र्मों की परंपराओं और रीति-रिवाजों को विधि तंत्र में शामिल करना चाहिए। हम धार्मिक मुद्दों को दरकिनार करने के बदले हर किसी की धार्मिक भावना की रक्षा करते हैं।

यही वजह है कि कोई समान नागरिक संहिता नहीं है। धार्मिक मान्यताओं, सामाजिक रिवाजों और सामुदायिक नैतिकता के मामले में कानून हर किसी की आस्था का याल रखता है, उसे खारिज नहीं करता। इसी वजह से इस्लाम में बहुविवाह के धार्मिक अधिकार को कानून स्वीकार करता है और हिंदू विवाह में सापिंड संबंधों को मान्यता देता है। इसी वजह से कुरान के मुताबिक विरासत में मिली एक-तिहाई से ज्यादा संपत्ति पर बंटवारे पर रोक की सरकार रक्षा करती है। इसीके साथ हिंदुधर्म के मुताबिक किसी को अपना सब कुछ दान देने के अधिकार को भी मान्यता देती है।

धर्मनिरपेक्षता के बारे में हमारी धारणा यह है कि कानून धार्मिक भावनाओं पर आधारित होंगे, बिलकुल बिना भेदभाव के।

इससे स्वाभाविक तौर पर भेदभाव से जुड़ी बहसें भी उभरती हैं। मसलन, अगर सामाजिक मान्यता और धार्मिक भावना ही बीफ पर पूरी तरह प्रतिबंध संबंधी कानून का पर्याप्त आधार है तो इसी आधार पर सूअर के बध पर प्रतिबंध क्यों नहीं होना चाहिए? आखिरकार जैसे हिंदू धर्म में गोमांस खाने पर मनाही है, उसी तरह इस्लाम में सूअर का मांस खाने पर रोक है। तो, जो एक मामले में सही है, वह दूसरे मामले में भी सही ही होगा, नहीं?

हालांकि यह तुलना गलत है। प्रतिबंध की मांग के पीछे वजहें दो ध्रुव के समान होंगी। बीफ खाने से मनाही इसलिए है क्योंकि गाय पूजी जाती है जबकि सूअर के मांस के सेवन से इसलिए रोका गया है कि सूअर अपवित्र माना जाता है।

इस्लाम में सूअर के मांस पर रोक सेहत या साफ-सफाई कह वजह से है। कुरान में कहा गया है कि कोई मुसलमान ‘‘सूअर का गोश्त’’ (2:173) न खाए, क्योंकि ‘‘वह यकीनन अपवित्र’’ (6:145) है। सूअर का मांस ‘हराम’, अपवित्र और अशुद्ध है। यानी कोई दूसरा सूअर का मांस खाए तो धार्मिक भावनाएं आहत नहीं होती, बल्कि इससे उनमें शराब पीने पर मनाही की ही तरह धार्मिक शुद्धता की भावना का पता चलता है।

लेकिन हिंदू बीफ खाने से इसलिए रोकता है क्योंकि गाय की रक्षा उसे खुद से नहीं दूसरों से करनी है। हिंदू के लिए बीफ खाना जितना अपने लिए पाप है, उतना ही दूसरों के लिए भी।

यही वह वजह है कि कोई ‘सूअर रक्षक’ आंदोलन नहीं चला या किसी और जानवर को बचाने के लिए कोई आंदोलन खड़ा नहीं हुआ। भारत में किसी और जानवर के प्रति उतनी श्रद्धा नहीं दिखाई जाती, जितनी गाय में। इसलिए ऐसी भावनाओं पर आधारित कानून को भेदभावमूलक कहना बेतुका है। इसमें किसी धर्म  के प्रति विरोध नहीं है, ऐसा सामाजिक रीति-रिवाज भी यह नहीं है जिसे भेदभावमूलक बताया जाए।

आकाश कश्यप

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