गाय और इस्लाम

गाय और इस्लाम

गाय पर मुस्लिम सूफी परंपरा के संतों के विचार काबिलेगौर हैं। नागपुर के बाबा ताजुद्दीन गायों से बड़ा प्रेम करते थे। उनकी अपनी गोशाला थी। प्रसिद्व ऋषि रावेआ ने भी गोशाला की स्थापना की थी। भारत में सूफियों ने अपनी पत्नियों ने साथ मिलकर अनेक स्थानों पर गोशालाएं बनाई और गो का पालन किया (देखें मुजफ्फर हुसैन का लेख इस्लाम और शाकाहार)।

मुस्लिम संत समद कहते है कि धातु में प्राण नहीं है, वनस्पति भी सुप्त अवस्था में है, लेकिन पशुओं में जाग्रत अवस्था है जबकि मनुष्य जाति पूर्ण जागृत और संवेदनशील स्थिति में है। ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती (अजमेर) ‘‘सीरते ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती’’ रजवी किताबघर दिल्ली द्वारा प्रकाशित किताब में गाय से संबंधित तीन महत्वपूर्ण प्रसंग है जो ख्वाजा साहब के जीवन की गहराई से जुड़े हैं।

हजरत हमीदुद्दीन नागौरी के परिसरमें बिल्कुल मंदिर की तरह कोई व्यक्ति मांस खाकर प्रवेश नहीं करता। यदि ऐसा करता है तो उसकी तबीयत खराब हो जाती है। बाबा हजरत हमीदुद्दीन नागौरी ताउम्र शाकाहारी रहे। आपने अपने जीवनकाल में ही वसीयत कर दी थी कि ताकयामत मेरे परिसर में कभी भी किसी भी रूप में मांस खाया-पकाया न जाए।

बाबा बंगलोरी मस्तान कहते हैं, ‘‘यदि कोई एक छोटी चिडिय़ा को बिना किसी कारण मारता है तो उसे कयामत के दिन उसका हिसाब देना होगा।‘’ जहां तक गाय का प्रश्न है तो मोहम्मद (सल्ल.) की चिकित्सा पद्धति को तिब-ए-नबदी अर्थात् नबी की चिकित्सा पद्वति के नाम से जाना जाता है। इसमें कहा गया है, ‘‘गाय का दूध  शिफा और गाय का मांस बीमारी है।‘’

सूफी परंपरा को छान लें। कहीं भी किसी भी प्रकार से गोमांस भक्षण का जिक्र नहीं आता है। ईरान के प्रसिद्व इस्लामी विद्वान अल गजाली 1058- ने दीन के पृष्ठ 23 पर 17-19 पंक्ति में महत्वपूर्ण बात का उल्लेख किया है। वह लिखते हैं।

‘’गाय का मांस मर्ज यानी बीमारी है, उसका दूध शिफा यानी स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद और दवा है तिब-ए-नबबी (हजरत मोहम्मद (सल्ल.) की चिकित्सा पद्वति)। ‘’

गाय की कुर्बानी करना इस्लाम का नियम नहीं है। बकरे और भेड़ की कुर्बानी गाय की कुर्बानी से अच्छी है।

(दारूलमुख्तियार भाग-4, पृष्ठ-228)

 

(मौलाना हसन निजमी का फतवा)

‘’न तो कुरान और न अरब की प्रथा ही गाय की कुर्बानी का समर्थन करती है।‘’

 

राष्ट्रीय मुस्लिम तंजीम के बैनरों पर एक नारा लिखा दिखता है, ‘गाय नहीं कटने देंगें, देश नहीं बंटने देंगें।’ ये नारा यथार्थ ही है क्योंकि पिछले कई सौ वर्षों से गोहत्या एक बड़ी वजह रही है जिसने इस देश के दो बड़े संप्रदायों को हमेशा आपस में संघर्षरत रखा और कभी भी उनके बीच स्थायी भाईचारा और एकता पनपने नहीं दी।

जब किसी देश के दो बड़े संप्रदाय आपस में संघर्षरत हों तो फिर वो देश कभी तरक्की  नहीं कर सकता। देश के दो बड़े संप्रदायों के बीच का संशय और अविश्वास अबुनैम मुस्तदरिक अल हाकिस (तिब-ए-नबवी, पृष्ठ-320) राष्ट्रीय एकात्मकता को खंडित करता है और अंतत: यही विभाजन की वजह भी बनती है। 1947 में सनातन काल से अखंड रही भारत भूमि विभाजित हो गई। इस विभाजन के पीछे कई वजहें थी, जिसमें एक बड़ी वजह गोहत्या भी थी। मुसलमान जहां गोहत्या को अपना मजहबी अधिकार मानते हैं। वहीं किसी हिंदू के लिए गाय देवी और मां दोनों का दर्जा रखती है। गाय को लेकर विचारों का यह भारी अंतर और इस मसले पर हो रहे झगड़ों ने भारत विभाजन की मांग करने वाले मुहम्मद अली जिन्ना जैसे लोगों को एक तर्क पकड़ा दिया। मुहम्मद अली जिन्ना ने विभाजन के समर्थन में जो तर्क दिये थे। उसमें उन्होंने ये भी कहा था कि ‘हिन्दू और मुसलमान कभी भी एक साथ नहीं रह सकते क्योंकि चीजों को लेकर दोनों की मानसिकता में भारी अंतर है मसलन एक तरह हिन्दू जहां गाय को माता मानता है वहीं मुसलमान उसे काटता और खाता है।‘ इसलिए अगर गौ हत्या का मसला न होता तो शायद देश विभाजन की एक बड़ी वजह टल जाती।

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गोरक्षा और गोकशी का प्रश्न भारत के सामने सदियों से अनुत्तरित खड़ा है। इस मसले को लेकर भारत में हिन्दू और मुस्लिमों के बीच जितने फसाद हुये हैं अगर उसकी सूची बनाई जाये तो एक वृहद ग्रंथ बन सकता है। गोहत्या के मसले न सुलझने की सबसे बड़ी वजह है कि मुस्लिम समाज ने कभी अपने मजहब की किताबों और मुस्लिम उलेमाओं तथा बुद्धिजीवियों के फतवों और मशवरों की रोशनी में इस मसले का समाधान सोचा ही नहीं। इस्लाम की तालीमातों के अनुरूप किसी मसले पर रहनुमाई के लिए मुसलमानों को क्या करना चाहिये, इसका निर्देश नबी-करीम (सल्ल.) की एक हदीस में मौजूद है, जिसमें आता है कि एक इंसान नबी-करीम (सल्ल.) के पास आया और पूछा, हम हिदायत के लिए किसकी तरफ देखें? नबी-करीम (सल्ल.) ने फरमाया, कुरान की तरफ। उस इंसान ने पूछा, उसके बाद? आप (सल्ल.) ने फरमाया, मेरी सुन्नत की तरफ। उस व्यक्ति ने फिर पूछा, अगर वहां से भी समाधान न मिला तो? तो आप (सल्ल.) ने फरमाया, अपने उम्मत के उलेमाओं की तरफ रुजु होना। उस व्यक्ति ने फिर पूछा, अगर वहां से भी समाधान न मिला तो? तो इस पर आपने (सल्ल.) फरमाया, फिर खुदा ने तुम्हें अक्ल किस लिए दी है?

इसका अर्थ है कि किसी भी मसले का सबसे बेहतर समाधान मुसलमानों को कुरान से तलाशनी चाहिए, वहां से समाधान नहीं मिलता तो हदीस और नबी-करीम (सल्ल.) की सीरत से तलाशनी चाहिये और वहां से भी जवाब न मिलता हो तो उम्मत के उलेमाओं की तरफ रुजु होना चाहिये और वहां भी अगर निराशा हाथ लगे तो अपनी अक्ल का इस्तेमाल कर इस मसले का समाधान खोजना चाहिए। गोहत्या और गोरक्षा के विषय भी इसी आधार पर विचारणीय है। गाय के विषय पर सबसे बड़ी बात ये है कि इस मसले का समाधान इन चारों ही रास्तों से मिलता है। कुरान और नबी-करीम (सल्ल.) की सीरत में तो इस मसले का समाधान है ही साथ ही इस्लाम के बुर्जुग उलेमाओं ने भी इस मसले पर सार्थक रहनुमाई की है और हमारी अक्ल भी इस मसले का वही समाधान पेश करती है जो इन तीन रास्तों से निकल कर आता है।  तमाम फसाद और झगड़ों के बावजूद हम सब के लिये सबसे सुखद बात ये है कि इस देश में कई ऐसे ऋषितुल्य मुसलमान रहे हैं जिन्होंने अपनी-अपनी क्षमताओं के अनुरूप अहमद और मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे कई बड़े मुस्लिम नेताओं ने मुसलमानों को आह्वान किया कि वो अंग्रेजों के इस चाल में न फंसे और गोहत्या से दूर रहें। प्रख्यात शायर अकबर इलाहाबादी ने मुसलमानों को सलाह देते हुये कहा-

अच्छा यही है फेर ले आंखों से गाय को,

क्या रखा है रोज की इस हाय-हाय से।

हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के बारे में पवित्र कुरान सूरह अंबिया की 107वीं आयत में फरमाया है, ‘ऐ मुहम्मद! हमने आपको सारे आलम के लिये रहमत बना कर भेजा है। रसूल (सल्ल.) की रहमत सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं थी वरन् आपकी रहमत के समंदर में बेजुबान जानवर और परिंदे भी बसते थे। ये दया इतनी ज्यादा थी कि एक बिल्ली को तकलीफ देनेवाली एक महिला के बारे में आप (सल्ल.) ने फरमाया था कि यह औरत इस बिल्ली के कारण नरक में दाखिल होगी, जिसने इसे बांध दिया और न ही उसे छोड़ा ताकि वह जमीन के कीड़े-मकोड़े खा सके, (ये हदीस सही है और अब्दुल्ला बिन उमर से रिवायत हुई है।) इसी तरह अबू हुरैरा (रजि.) से रिवायत एक हदीस है जो बुखारी और मुस्लिम शरीफ दोनों में आई है। इस हदीस के अनुसार रसूल (सल्ल.) ने एक व्यक्ति को जन्नत की खुशखबरी दी थी क्योंकि उसने प्यास से हांफ रहे एक कुत्ते को पानी पिलाया था। अबू-हुरैरा (रजि.) इस घटना का बयान करते हुए फरमाते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने फरमाया, एक बार एक व्यक्ति रास्ते पर चल रहा था कि उसे बड़ी तेज प्यास लगी उसे एक कुंआ मिला जिसमें उतरकर उसने पानी पिया। फिर बाहर निकला तो देखा कि एक कुत्ता प्यास से हांफ रहा था और गीली मिट्टी चाट रहा था। यह देखकर वह आदमी कुंए में उतरा और अपने मोजे को पानी से भर लिया फिर उसने अपने मुंह में थामा और कुंए से बाहर आकर उस कुत्ते को पिला दिया। इस पर खुदा ने उसकी मग्रिफत फरमा दी। इस वाकिये को सुनाने के बाद आप (सल्ल.) ने फरमाया, प्रत्येक आद्र्र जिगर में तुम्हारे लिये प्रतिदान है। मुहम्मद (सल्ल.) की दयाशीलता का पता इस वाकिये से भी चलता है जिसमें आता है कि आप (सल्ल.) किसी अंसारी के बाग में दाखिल हुये, अंदर एक ऊंट था जो आप (सल्ल.) को देखकर आवाज करने लगा और उसकी आंखों से आंसू गिरने लगे तो आप (सल्ल.) उसके पास आये और उसकी गर्दन पर हाथ फेरा तो वह चुप हो गया। आप (सल्ल.) ने पूछा, इसका मालिक कौन है? एक अंसारी लडक़े ने उत्तर दिया कि ये मेरा ऊंट है। तो रसूल (सल्ल.) ने फरमाया, क्या इस जानवर के बारे में तुमको अल्लाह का डर नहीं है। इसने मुझसे शिकायत की है कि तुम इसे तेज हांकते हो और निरंतर उसके ऊपर भारी बोझ डाले रखते हो। (अबू दाऊद शरीफ)

इसी आशय की एक हदीस हजरत अब्दुल्ला बिन जाफर बिन अबी तालिब (रजि.) से रिवायत हुई है। वो कहते हैं कि एक बार नबी करीम (सल्ल.) ने हम लोगों से कहा, क्या तुम उस जानवर के बारे में अल्लाह से डरते नहीं जिसको अल्लाह ने तुम्हारे अधिकार में दे रखा है। क्योंकि वह मुझसे शिकायत करता है कि तुम उसे भूखा रखते हो और हमेशा उससे मेहनत का काम लेते हो। (मुस्लिम शरीफ) हजरत जाबिर से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने किसी जानवर के मुंह पर मारने और दागने से मना किया है। (हदीस: मुस्लिम शरीफ) हजरत सहल-बिन-हनजलिय्यह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्ल.) एक ऊंट के पास से गुजरे जिसकी पीठ उसके पेट से लग गयी थी। यह देखकर नबी (सल्ल.) ने फरमाया, इन बेजुबान जानवरों के संबंध में अल्लाह से डरो। इन पर ऐसी हालत में ही सवारी करो जब ये उसके योग्य और स्वस्थ हों।

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हजरत मुहम्मद (सल्ल.) गाय के महत्व को जानते थे इसलिये समय-समय पर आपने अपने उम्मतियों को गाय की महत्ता से आगाह कराया। हयातुल हैवान में आता है रसूल (सल्ल.) ने फरमाया, गाय का दूध और घी शिफाबख्श है और इसका मांस बीमारी को बढ़ाने वाला है।

इमाम तबरानी ने भी इस हदीस को सहीह (प्रामाणिक) करार दिया है। हयातुल हैवान में इब्ने मसूद (रजि.) से रिवायत है कि नबी (सल्ल.) ने फरमाया कि तुम गाय का दूध, घी खाया करो तथा इसके गोश्त से बचा करो। वो इसलिये क्योंकि इसका दूध और घी इलाज है और गोश्त में बीमारी है। हजरत अब्दुल्ला इब्ने अब्बास से रिवायत एक हदीस में आता है कि पीने की चीजों में नबी (सल्ल.)-ए-करीम को सबसे अजीज दूध था। बीबी आयशा (रजि.) से रिवायत एक हदीस है जिसमें वो फरमाती है कि रसूल (सल्ल.) को हुजूर को खजूर में मक्खन और दही मिलाकर खाना बड़ा पसंद था। नबी (सल्ल.) ने ही नहीं वरन् इस्लाम के चौथे खलीफा हजरत अली (रजि.) ने भी यही फरमाया है कि गाय के घी से ज्यादा शिफा किसी चीज में नहीं है।

अबू दाऊद शरीफ में हजरत अब्दुल्ला बिन उमर (रजि.) से रिवायत एक हदीस है जिसमें वो फरमाते हैं कि जंगे-तबूक के दौरान नबी (सल्ल.) की खिदमत में पनीर पेश किया गया तो आपने बिस्मिल्ला पढक़र उसे काटा। (यानी रसूल (सल्ल.) पनीर को पसंद फरमाते थे)

नबी (सल्ल.) ने फरमाया, गाय के दूध से इलाज किया करो क्योंकि अल्लाह ने इसमें शिफा रखी है और यह हर किस्म के दरख्तों पर चढ़ती है। तिरमिजी शरीफ में हजरत मल्लिका बिंते अमरू (रजि.) रिवायत करती हैं कि नबी-करीम (सल्ल.) ने फरमाया, गाय के दूध में शिफा है, इसका मक्खन मुफीद है, अलबत्ता इसके गोश्त में बीमारी है। इसी रिवायत को हजरत सुहैब (रजि.) ने इब्नुस्समनी में नकल की है।

इमाम रिजा (रह.) जो इस्लाम में बहुत बड़े आबिद, हकीम और विद्वान रहे हैं वो जब तूस नामक जगह में कियाम कर रहे थे तो उन्होंने लोगों की एक मजलिस को खिताब करते हुए फरमाया था कि ‘गाय के दूध से बच्चे का दिमाग तेज होता है वहीं गाय का गोश्त दिमाग और याददाश्त को कमजोर बनाता है।‘ इमाम गजाली (1058-1111) जैसे बड़े विद्वान ने अपनी किताब इहया उलूमूल-दीन में लिखा था, गाय का मांस खाना बीमारियों का कारण है, इसके दूध में शिफा और इसका मक्खन दवा है। 973 ई. में सीरिया में जन्मे जन्मांध मुस्लिम  कवि अबू याला शाकाहारी थे और मुसलमानों को गाय आदि के मांस खाने से परहेज करने को कहते थे। हजरत मुहम्मद मौलाना फारूखी साहब ने अपनी किताब में गाय के महत्व को अर्थव्यवस्था से जोड़ते हुये कहा था कि गाय दौलत की रानी है।

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मौलाना हयासाहबखानखाना ने गोहत्या को हदीस के खिलाफ बताया था। अल्लाह की नेमतों में गाय का मांस कहीं भी नहीं। पवित्र कुरआन में और अहादीसे-नबबी में जन्नत और धरती पर के बतौर नेअमत कई खाने-पीने लायक चीजों के नाम आये है, ‘वल्अर्-ज व-ज-अहा लिल अनामि, फीहा फाकि हतुंव वन्नख्लु जातुल् अक्वामि, वल्हब्बु जुल्-अस्फि वर्-रैहान, फबि अय्यि आलाई रब्बिकुमा तुकज्जिबान! ‘यानी’ और उसी ने खल्कत के लिये जमीन बिछायी, उसमें (धरती) मेवे और गिलाफ वाली खजूरें हैं, और भुस के साथ अनाज और रैहान, तो ऐ जिन्न और इंसान तुम दोनों अपने रब की कौन-कौन सी नेमतों को झुठलाओगे? (सूरह रहमान, 10-12)। इसी तरह बाद की आयतों में खजूर और मेवे को नेअमत बताया गया है। (सूरह रहमान, आयत-68)

इसी तरह सूरह वाकिया में जन्नती नेअमतों के बारे में कुरान कहता है: ‘‘अम्मा इन् का-न मिनल मुकर्रबीन, फरौहुव-व रैहानु व-व जन्नतु नअीम।‘’ अर्थात्, ‘‘जो खुदा के निकटवर्ती है (उनके लिए) आराम, खुश्बूदार फूल और रैहान है।‘’ (सूरह वाकिया, 88-89)। कुरान में और भी कई आयतें हैं जिनमें ऐसी नेअमतों का वर्णन आया है।

उदा.-श और वहां मेवे हैं जिसे पसंद करे। (सूरह मुरसलात, 77:42) और जो लोग ईमान ले आए और अनुकूल कर्म किए, उन्हें यह शुभ सूचना दे दो कि उनके लिए ऐसे बाग हैं जिनके नीचे नहरें बह रही होगी, जब-जब इन बागों में से कोई फल इन्हें खाने को दिया जाएगा, तो कहेंगे कि यह तो वही है जो इससे पहले हमें मिला था। (सूरह अल-बकरह, आयत-25) वे वहां निश्चिततापूर्वक हर प्रकार के मेवे तलब करते होंगे। (सूरह अद-दुखान, आयत-55) उस जन्नत का हाल यह है जिसका वादा डर रखने वालों से किया गया है, उसमें पानी की नहरें हैं जिसमें सड़ांध नहीं, और दूध की नहरे हैं, जिनका मजा बदला नहीं और साफ-सुथरे शहद की नहरे हैं, और उनके लिए वहां हर प्रकार के फल हैं। (सूरह मुहम्मद, आयत-15) और बहुत सा मेवा है। (सूरह वाकिया, 56:32)। (सूरह वाकिया, 56:20) तुम्हारे लिए यहां बहुत से मेवे हैं जिन्हें तुम खाओगे। (अज-जुखुरुफ, आयत-73) बाग है और अंगूर (सूरहनबा, आयत-78:32) जन्नतियों के लिए उपलब्ध भोजन में अगर मांस का वर्णन आया भी है तो वहां वह वर्णन केवल पक्षियों के मांस है। (सूरह वाकिया, आयत-21) परन्तु इन जन्नती नेअमतों में कही भी गाय का मांस का जिक्र नहीं है। अगर गाय के मांस की अहमियत इस्लाम में इतनी ही अधिक होती तो क्या अल्लाह उसे जन्नत की या धरती की नेअमतों में शामिल नहीं करते?

इस देश में कई ऐस लोग हैं जो नहीं चाहते कि गोहत्या बंद हो क्योंकि उनके लिए यह मसला अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने और कई दूसरे स्वार्थों को पूरा करने का है। गोहत्या का मसला यूं ही चलता रहे इसके लिए हमेशा उनकी ये कोशिश रहती है कि किसी भी तरह इस मुद्दे को उलझा कर रखा जाये और ऐसा करने के लिए वो कई तरह की दलीलें भी देते हैं। मसलन, हिन्दू धर्म ग्रंथों और विशेषकर वेदों में यह वर्णन आता है कि हिन्दू भी गोमांस का सेवन करते थे।

(साभार: गाय और इंसान–गौशास्त्र)

डॉ. श्रीकृष्ण मित्तल

 

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