गोवध: विरोध का गिरता स्तर

गोवध: विरोध का गिरता स्तर

किसी भी राज्य या फिर राष्ट्र की उन्नति अथवा अवनति में राजनीति की एक अहम भूमिका होती है। मजबूत विपक्ष एवं सकारात्मक विरोध की राजनीति विकास के लिए आवश्यक भी हैं लेकिन केवल विरोध करने के लिए विरोध एवं नफरत की राजनीति जो हमारे देश में आज कुछ लोग कर रहे हैं। काश एक पल रुक कर सोच तो लेते कि इससे न तो देश का भला होगा और न ही उनका।

मोदी ने जिस प्रकार देश की नब्ज अपने हाथ में पकड़ ली है, उससे हताश विपक्ष आज एक दूसरे के हाथ पकड़ कर सब मिलकर भी अति उतावलेपन में केवल स्वयं अपना ही नुकसान कर रहे हैं। अपने ही तरकश से निकलने वाले तीरों से खुद को ही घायल कर रहे हैं।

जिस निर्लज्जता के साथ यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने केरल के कुन्नूर में बीच सडक़ में प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ नारेबाजी करते हुए एक बछड़े का वध करते हुए अपना वीडियो डाला है तो खून के इन छीटों को कांग्रेस कभी अपने दामन से हटा नहीं पाएगी क्योंकि यह काम किसी एक व्यक्ति ने नहीं किया, बल्कि इस घटना को अंजाम दिया है कांग्रेस के झंडे तले उस यूथ कांग्रेस के पदाधिकारी ने जिस यूथ कांग्रेस का नेतृत्व कुछ सालों पहले स्वयं राहुल गांधी ने किया था।

संपूर्ण विश्व में अहिंसा के पुजारी के रूप में पूजे जाने वाले जिस गांधी के नाम के सहारे कांग्रेस आज तक जीवित है, वही पार्टी जब आज अपने विरोध प्रदर्शन के लिए हिंसा का सहारा ले रही है तो समय आ गया है कि भारत नाम के इस देश के नागरिक होने के नाते हम सभी सोचें कि हमारा देश कहां जा रहा है और ये राजनैतिक पार्टियां इस देश की राजनीति को किस दिशा में ले जा रही हैं।

सत्ता की राजनीति आज नफरत की राजनीति में बदल चुकी है और सभी प्रकार की सीमाएं समाप्त होती जा रही हैं। गाय के नाम पर राजनीति करने वाले शायद यह  भूल रहे हैं कि गाय को माता मान कर पूजना इस देश की सभ्यता और संस्कृति में शामिल है यह हमारे देश के संस्कार हैं आधारशिला है वोट बैंक नहीं। लेकिन दुर्भाग्यवश आज हमारे देश की राजनैतिक पार्टियों की नजर में इस देश का हर नागरिक अपनी जाति सम्प्रदाय अथवा लिंग के आधार पर उनके लिए वोट बैंक से अधिक और कुछ भी नहीं है।


 

पशु क्रूरता निरोधक : पशुधन बाजार नियमन: नियम 2017


 

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सरकार ने वध के लिए पशु बाजारों में मवेशियों की खरीद-फरोखत पर प्रतिबंध लगा दिया है।  पर्यावरण मंत्रालय ने पशु क्रूरता निरोधक अधिनियम के तहत सख्त पशु क्रूरता निरोधक (पशुधन बाजार नियमन) नियम, 2017 को लेकर नई अधिसूचना जारी की है।  इस अधिसूचना के मुताबिक, पशु बाजार समिति के सदस्य सचिव को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी शख्स बाजार में अवयस्क पशु को बिक्री के लिए न लेकर आए।

इस अधिसूचना के मुताबिक किसी भी शख्स को पशु बाजार में मवेशी को लाने की इजाजत नहीं होगी जब तक कि वहां पहुंचने पर वह पशु के मालिक द्वारा हस्ताक्षरित लिखित घोषणा-पत्र न दे दे जिसमें मवेशी के मालिक का नाम और पता हो और फोटो पहचान-पत्र की एक प्रति भी लगी हो। सरकार ने मवेशियों से जुड़ीं क्रूर परंपराओं पर भी प्रतिबंध लगाया है, जिसमें उनके सींग रंगना तथा उन पर आभूषण या सजावट के सामान लगाना शामिल है।

अधिसूचना के अनुसार मवेशियों को बेचने या उनके वध पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगा है। पर अब केवल वही लोग पशु बाजार में खरीद-फरोख्त कर सकेंगे, जो कृषि भूमि के मालिक होंगे। इस अधिसूचना के नियम गाय, बैल, भैंस, बछिया-बछड़ों के साथ ऊंटों पर भी लागू होंगे।

इन नियमों को अगले तीन महीनों के भीतर लागू करना होगा। नए नियम के अनुसार मवेशियों की खरीद-फरोख्त से जुड़ी कागजी कार्रवाई बड़ी है। अब मवेशी खरीदने से पहले खरीददार और विक्रेता दोनों को अपना पहचान-पत्र देना होगा। इसके बाद खरीददार को बिक्री के सबूत की प्रति विक्रेता समेत उसके जिले के स्थानीय राजस्व अधिकारी, पशु चिकित्सा अधिकारी और पशु बाजार समिति को देनी होगी। इसके अलावा एक शर्त यह भी है कि खरीददार मवेशी को खरीदने के 6 महीने के अंदर उसे बेच नहीं सकेगा।

सामान्य तौर पर पशु बाजार दूसरे राज्यों के खरीददारों को आकर्षित करने के उद्देश्य से सीमाओं के आस-पास लगते हैं, पर इस अधिसूचना में साफ कहा गया है कि अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के 50 और राज्य सीमाओं के 25 किलोमीटर के दायरे में पशु बाजार नहीं लगाए जा सकेंगे।

नियमावली में जानवरों के स्वास्थ्य, रहने, खाने-पीने, सोने व उन्हें रखने की जगह को लेकर भी निर्देश दिए गए हैं। इसके अलावा इस अधिसूचना के अनुसार अब कोई भी पशु बाजार जिला पशु बाजार कमेटी की अनुमति के बगैर नहीं लगाया जा सकेगा। इस कमेटी का प्रतिनिधित्व एक मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाएगा और सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त पशु कल्याण समूहों के दो प्रतिनिधि भी शामिल होंगे।


राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए हम गोहत्या करने से भी परहेज नहीं करते  गोहत्या के नाम पर एक दूसरे की हत्या भी हमें स्वीकार है और हम मानव सभ्यता के विकास के चरम पर हैं?

हम सभी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और हम जीने के लिए न सिर्फ दूसरे पर लेकिन प्रकृति पर भी निर्भर हैं तो एक दूसरे अथवा ईश्वर द्वारा बनाए गए अन्य जीवों एवं प्रकृति के प्रति इतने असंवेदनशील कैसे हो सकते हैं। वो भी उस गाय के प्रति जिसे हमारी संस्कृति में मां कहा गया है? क्या ये असंवेदनशील लोग इस प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं कि क्यों सम्पूर्ण दुधारु पशुओं में से केवल गाय के ही दूध को वैज्ञानिक अनुसंधानों के बाद मां के दूध के तुल्य माना गया? क्यों अन्य पशुओं जैसे भैंस, बकरी, ऊंटनी के दूध में मातृत्व के पूरक अंश नहीं पाए जाते? क्या गाय के अलावा किसी अन्य जीव के मल मूत्र में औषधीय गुण पाए जाते हैं?

जब ईश्वर ने स्वयं गाय का सृजन मनुष्य का पालन करने योग्य गुणों के साथ किया है और आधुनिक विज्ञान भी इन तथ्यों को स्वीकार कर चुका है तो फिर वह गाय जो जीते जी उसे  पोषित करती है तो क्यों हम उसे मां का दर्जा नहीं दे पा रहे? राजस्थान हाइकोर्ट की सलाह के अनुसार अपने पड़ोसी देश नेपाल की तरह क्यों नहीं हम भी गाय को अपना राष्ट्रीय पशु घोषित कर देते उसे मारकर उसके ही मांस से पोषण प्राप्त करने की मांग कहां तक उचित है? भारत में लोगों की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए बीफ की परिभाषा में से गोमांस को हटा दिया जाए तो मांसाहार का सेवन करने वाले लोगों को भी कोई तकलीफ नहीं होगी और भारतीय जनमानस की भावनाओं को भी सम्मान मिल जाएगा।

हमारे पास गाय के दूध गोबर और मूत्र के कोई विकल्प नहीं है लेकिन मांस के तो अन्य भी कई विकल्प हैं तो फिर ये कैसी राजनीति है जिसमें गोमांस से ही कुछ लोगों की भूख मिटती है? शायद यह भूख पेट की नहीं सत्ता की है ताकत की है नफरत की है साजिश की है।

नहीं तो जिस देश के लोग पेड़ पौधे ही नहीं पत्थर की भी पूजा करते हैं जिस देश में सभी के मंगल की कामना करते हुए कहा जाता हो

‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया: सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् तु भाग्भवेत्’

उसी देश में कुछ लोग विरोध करने के लिए इस स्तर तक गिर रहे हैं और जिस प्रकार कुतर्कों का सहारा ले रहे हैं, यही कहा जा सकता है कि ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ क्योंकि खून अकेले उस बछड़े का नहीं बहा खून उस पार्टी का भी बह गया जिसके झण्डे के नीचे यह कृत्य हुआ एवं अन्त केवल उस बछड़े का नहीं हुआ बल्कि उस पार्टी के भविष्य का भी हुआ कमजोर अकेले वो पार्टी नहीं हुई समूचा विपक्ष हो गया और बछड़े के प्राण आगे आने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा में एक बार फिर से नए प्राण फूंक गए।

 नीलम महेंद्र

 

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